अपने मातहत पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राप्त
दुर्व्यवहार की सभी शिकायतों, आदि की तुरंत जांच एक राजपत्रित अधिकारी द्वारा करवाया
जाना जिला अधीक्षक के महत्वपूर्ण कर्तव्यों
में से एक होना चाहिए और की गई कार्रवाई के संबंध शिकायतकर्ताओं को सूचना भेजी जानी
चाहिए| इसके अलावा, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दिन-रात हर समय जनता
के लिए आसानी से सुलभ होना चाहिए |पुलिस अधिकारियों की दक्षता को पहचानने के लिए
उन पर अनुचित बल प्रयोग जैसी अवांछनीय प्रथाओं- अपराध के गैर पंजीकरण या न्यूनतम
पंजीकरण , निर्दोष व्यक्तियों को दंड प्रक्रिया संहिता या विशेष अधिनियमों
आदि में निवारक धारा में फांसने के विभिन्न प्रकार के लिए प्रेरित किये जाने को अस्वस्थ
मान्यता प्राप्त हो रही है| वरिष्ठ अधिकारियों को आंकड़ों से जल्दबाजी में कोई निष्कर्ष नहीं
निकालने का परिवेश बनाना चाहिए| वे अपराध के पूर्ण और सही पंजीकरण के लिए प्रोत्साहित करें, और एक अच्छा सांख्यिकीय रिकॉर्ड बनाने के लिए निर्दोष
व्यक्तियों को फंसाने के किसी भी प्रयास के साथ सख्ती से निपटें| हमारे लिए यह विशेष चिंता
का विषय है कि यह बात विशेष रूप से समाज के गरीब और कमजोर वर्गों को प्रतिकूल प्रभावित
करता है| बेहतर प्रशिक्षण, शिकायतों का गहन पर्यवेक्षण और तुरंत ध्यान
से जांच अधिकारी को कदाचारों से दूर रखने और पुलिस के कामकाज के तरीकों में अधिक से
अधिक जनता के विश्वास को बढ़ावा मिलेगा| मौजूदा आपराधिक कानून के तहत अपराधों के संज्ञेय और गैर संज्ञेय के रूप में वर्गीकरण पुलिस
की छवि को प्रतिकूल प्रभावित करता है क्योंकि संज्ञेय क्षेत्र तक ही पुलिस सेवा सीमित है| इस तरह के वर्गीकरण से
सबसे अधिक समाज के गरीब और कमजोर वर्गों के लोग प्रभावित होते हैं जिनके पास अदालत
में जाने के लिए अपने संसाधन या समय नहीं होता है| एक ओर जहां पुलिस से
हमारे कल्याणकारी लोकतंत्र की प्रोन्नति
की भूमिका अदा करने की उम्मीद कर रहे हैं तो गैर संज्ञेय मामलों में उल्लंघन के खिलाफ सकारात्मक
या तत्काल कार्रवाई के लिए पुलिस को स्वयं कार्यवाही से रोके जाने से प्रतिकूल प्रभाव
पड़ता है | इस तरह के विभेद का
एक मुश्त उन्मूलन व्यावहारिक नहीं है, लेकिन सरकार को जल्द से जल्द इस समस्या पर विचार
करना चाहिए |पुलिस को समाज कल्याण कानून के प्रवर्तन के लिए जिम्मेदार होना
चाहिए | वे समुदाय के कमजोर वर्गों के कल्याण के लिए अपनी प्रतिबद्धता
की भावना के साथ इस कार्य को पूरा किये बिना बहुसंख्य लोगों के सामने खुद की अच्छी छवि पेश नहीं कर सकते | इस प्रक्रिया में पुलिस
की विस्तृत भागीदारी से उनकी ताकत बढ़ाने की
जरूरत होगी | सामाजिक सुरक्षा कार्य में भी पुलिस की अधिक से अधिक भागीदारी
होनी चाहिए|छात्र समुदाय के साथ संपर्क पुलिस जनता के संबंधों में एक बहुत
ही संवेदनशील और नाजुक मामला है| बड़े शहरों और विश्वविद्यालयों में छात्र समस्याओं
से निपटने के लिए पुलिस अधिकारियों को विशेष रूप से चयनित और प्रशिक्षित किया और उन्हें
विश्वविद्यालय संकाय और छात्र समुदाय दोनों के साथ निकट संपर्क का विकास करना चाहिए| माध्यमिक स्कूलों में
छात्र समुदाय के साथ खेलकूद, विभिन्न मुद्दों पर स्कूल कार्यों और एक
साथ बैठकों में भागीदारी के माध्यम से संपर्क स्थापित किया जाना चाहिए | वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों
को इस संबंध में एक मिसाल कायम करनी है और
स्वतंत्र रूप से छात्र समुदाय के साथ घुलमिल जाने के लिए और, यातायात जैसे पुलिस कर्तव्यों
में, जितना संभव हो सके, स्कूलों आदि के पास
भीड़ नियंत्रण आदि में उन्हें सक्रिय रूप से शामिल करने के लिए प्रयास
करने के लिए अपने अधीनस्थ अधिकारियों को प्रोत्साहित करना चाहिए| उन्हें सीमाओं आदि की पुलिस चौकसी, सड़क , सुरक्षा , अपराध की रोकथाम के उपायों
के नियम जैसे विषयों पर फिल्म शो के साथ वार्ता करने के लिए कभी कभी स्कूलों और कॉलेजों
का दौरा करना चाहिए|युवा स्कूल के लिए पाठ्य पुस्तकों में पुलिसकर्मी द्वारा लोगों
को मदद जैसे अध्याय शामिल करना चाहिए | पुलिस जनता की भलाई के
लिए क्या करती है या क्या कर सकती है की एक उद्देश्यपरक तस्वीर प्रस्तुत करने में सहायता
के लिए साहित्यकारों, पत्रकारों और फिल्म निर्माताओं
के साथ वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को मुक्त रूप से रूप से घुलना मिलना चाहिए | पुलिस महानिदेशक को काम के विभिन्न पहलुओं के बारे में लेख लिखने
के लिए और उनकी कठिनाइयों को दूर करने के लिए और उपलब्धियों को प्रसारित करने के
लिए प्रसिद्ध व्यक्तियों को आमंत्रित करने की संभावना तलाशनी चाहिए | उपयुक्त पुस्तकें नाटक
और दस्तावेजी फ़िल्में भी जनता के आकलन में पुलिस छवि को ऊपर उठाने में महत्वपूर्ण योगदान
कर सकती हैं| हमलों और अन्य आंदोलनकारी
गतिविधियों से निपटने में पुलिस कार्रवाई से भी लोगों के बड़े वर्गों के साथ गलत समझ
और तनावपूर्ण संबंधों के लिए जिम्मेदार है| ऐसे अवसरों पर पुलिस को तटस्थता का
परिचय देना चाहिये और यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि पुलिस हिंसा और शांति के उल्लंघनों
को रोकने के लिए ही मौके पर मौजूद है व किसी भी पार्टी का साथ देने के लिए नहीं | ऐसे दृष्टिकोण को विकसित
किया जाना चाहिए कि अक्सर बिगड़ी हुई परिस्थितियों को बल प्रयोग के बिना हल किया जा
सकता है| धैर्य और समझदारी के दृष्टिकोण को अपनाया जाना चाहिए| दोनों के बीच अपर्याप्त या प्रतिबंधित संचार से लोगों और पुलिस के बीच की खाई बढ़ी है | लोगों की सेवा में पुलिस द्वारा किए गए कई महत्वपूर्ण
योगदान को अक्सर जनता नहीं जानती है | पुलिस अधिकारियों को पुलिस विभाग की गतिविधियों
के बारे में जनता के लिए उद्देश्यपरक जानकारी
प्रस्तुत करने से यह संभव है | समान रूप से यह भी
आवश्यक है कि लोगों को यह बताया जाए कि वे सामाजिक सुरक्षा के लिए क्या करें व क्या न करें
और वे किन तरीकों तथा साधनों से पुलिस के लिए महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं| पुलिस अधीक्षक द्वारा
जिले , उप – खंड और पुलिस थाना स्तर पर समुदाय
और अन्य सम्मानित व्यक्तियों की विभिन्न व्यावसायिक समूहों के प्रतिनिधियों से मिलकर
नागरिक समितियों के गठन का प्रयोग उपयोगी हो सकता है |
वास्तविक लोकतंत्र की चिंगारी सुलगाने का एक अभियान - (स्थान एवं समय की सीमितता को देखते हुए कानूनी जानकारी संक्षिप्त में दी जा रही है | आवश्यक होने पर पाठकगण दिए गए सन्दर्भ से इंटरनेट से भी विस्तृत जानकारी ले सकते हैं|पाठकों के विशेष अनुरोध पर ईमेल से भी विस्तृत मूल पाठ उपलब्ध करवाया जा सकता है| इस ब्लॉग में प्रकाशित सामग्री का गैर वाणिज्यिक उद्देश्य के लिए पाठकों द्वारा साभार पुनः प्रकाशन किया जा सकता है| तार्किक असहमति वाली टिप्पणियों का स्वागत है| )
Wednesday, 18 December 2013
Friday, 6 December 2013
यदि देश का पुलिस बल निष्ठा पूर्वक कार्य करता तो शायद नीतिनिर्माण के अतिरिक्त गृह मंत्रालय की कोई आवश्यकता ही नहीं रहती
गृह मंत्रालय सरकार एक प्रमुख अंग है जो मुख्य
रूप से पुलिस से सम्बन्ध रखता है व पुलिस ज्यादतियों
से सम्बंधित शिकायतों पर समुचित कार्यवाही करने का दायित्व मंत्रालय पर है| किन्तु व्यवहार में पाया
गया है कि स्वतंत्रता के बाद भी पुलिस के रवैये में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है| देश में पुलिस बलों का
गठन यद्यपि जनता की सुरक्षा के लिए किया गया है किन्तु देश की पुलिस आज भी अपने कर्कश
स्वर का प्रयोग जनता को भयभीत करने के लिये ही कर रही है परिणामत: देश का पुलिस संगठन
अपराधियों का मित्र और आम नागरिक के दुश्मन की तरह देखा जाता है| आज भी आम नागरिक पुलिस
से दूर ही रहना चाहता है|
मंत्रालय भी अपने कर्तव्यों में घोर विफल है
और पुलिस अभी भी बेलगाम है तथा पुलिस बल का उपयोग आमजन की सुरक्षा की बजाय मात्र (आर्थिक
या राजनैतिक) सतासीन लोगों की रक्षा के लिए हो रहा है| इस स्थिति पर दृष्टिपात
करें तो ज्ञात होता है कि स्वयं केन्द्रीय गृह मंत्रालय में 20 से अधिक पुलिस अधिकारी
नियुक्त/प्रतिनियुक्त हैं जो गृह मंत्रालय सचिवालय की कार्यशैली व संस्कृति को अपदूषित
कर रहे हैं|
राज्यों की
स्थिति भी लगभग समान ही है| इससे यह गृह मंत्रालय कम और पुलिस मंत्रालय
ज्यादा नजर आता है|
मैं
अपने अनुभव से यह बात स्पष्ट तौर पर कह सकता हूँ कि सम्पूर्ण देश के पुलिस बलों में
निष्ठावन और योग्य व्यक्ति मिलने कठिन है | देश के पुलिस बलों का वातावरण ही ऐसा है कि
वहां कोई भी निष्ठावान व्यक्ति टिक नहीं सकता| जो लोग आज पुलिस बलों
में टिके हुए हैं वे सभी अपने कर्तव्यों और जनता के प्रति निष्ठावान के स्थान पर अपने
वरिष्ठ अधिकारियों और राजनेताओं के स्वामिभक्त अधिक हैं और उनके प्रसाद स्वरुप ही पदोन्नतियाँ
और पदक पा रहे हैं|
यदि
कोई निष्ठावान व्यक्ति भ्रान्तिवश इस बल में भर्ती हो भी जाए तो उसे भीरु बनकर पुलिस
की अस्वस्थ परम्पराओं को निभाना पडेगा या पुलिस सेवा छोडनी पड़ेगी| यदि एक व्यक्ति सर्वगुण सम्पन्न होते हुए भीरु हो तो उसके सभी गुण निरुपयोगी
हैं क्योंकि वह उनका कोई उपयोग नहीं कर सकता|
पुलिस के विरुद्ध आने वाली समस्त शिकायतों में
दोषी पुलिस अधिकारी का बचाव करने के लिए गृह मंत्रालय में पर्याप्त पुलिस अधिकारी लगा
रखे हैं|
ऐसी
स्थिति में पुलिस सुधार की कोई भी आशा करना ही व्यर्थ है| गृह मंत्रालय में इन
पुलिस अधिकारियों को लगाने से कोई जन अभिप्राय: सिद्ध नहीं होता क्योंकि जो पुलिस वाले
अपने कार्यक्षेत्र में रहते हुए पुलिस को जनोंन्मुखी नहीं बना सके वे मंत्रालय में
किस प्रकार सहायक हो सकते हैं| यदि देश का पुलिस बल
निष्ठा पूर्वक कार्य करता तो शायद नीतिनिर्माण के अतिरिक्त गृह मंत्रालय की कोई आवश्यकता
ही नहीं रहती और जितना बड़ा गृह मंत्रालय का बीड़ा है उसका एक चौथाई ही पर्याप्त रहता|
वैसे भी पुलिस तो जनता की सुरक्षा के लिए क्षेत्र
में कार्य करने वाला बल जिसका कार्यालयों में कोई कार्य नहीं है| सभी स्तर के पुलिस अधिकारियों
को कार्यक्षेत्र में भेजा जाना चाहिए और उन्हें, अपवादों को छोड़कर, हमेशा ही चलायमान ड्यूटी
पर रखा जाना चाहिए|
आज संचार
के उन्नत साधन हैं अत: आवश्यकता होने पर किसी भी पुलिस अधिकारी से कभी भी कहीं भी संपर्क
किया जा सकता है व आमने सामने बात की जा सकती है और पुलिस चलायमान ड्यूटी पर होते हुए
भी कार्यालय का कामकाज देख सकती है|
वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को यह भी निर्देश हो
को वे पुलिस थानों के कार्यालय की बजाय जनता से संपर्क कर निरीक्षण रिपोर्ट बनाएं| पुलिस का कार्य विशुद्ध
रूप से जनता को सुरक्षा उपलब्ध करवाना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, किसी भी प्रकार से प्रशासन
में हस्तक्षेप करना उनका कार्य नहीं है| पुलिस को वैसे भी सचिवालय में कार्य करने का
कोई प्रशिक्षण नहीं होता अपितु शस्त्र चलाने, कानून-व्यवस्था का ही प्रशिक्षण दिया जाता है
अत: सचिवालय के लिए पुलिस का कोई उपयोग न्यायोचित नहीं है| सचिवालय को, जो पुलिस अधिकारी कहीं
पर उपयुक्त न हों, ऐसे नाकाम पुलिस अधिकारियों की शरण स्थली नहीं बनाया
जाए|
वास्तव में देखा जाये तो वर्दी में छिपे अपराधी
ही आज समाज के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हैं| अतेव गृह मंत्रालय को पुलिस प्रभाव से पूर्णतया
मुक्त कर गृह मंत्रालय का शुद्धिकरण किया जाये, पुलिस को अपने कार्य क्षेत्र में भेजा जाय, और प्रत्यक्ष सुरक्षा के अतिरिक्त किसी भी पुलिस
अधिकारी को गृह मंत्रालय में नियुक्ति अथवा प्रतिनियुक्ति पर नहीं रखा जाए|
आपराधिक मामलों में पुलिस जांच अपराधी को कम
और पीड़ित को ज्यादा दुःख देने वाली होती है| यहाँ तक की पुलिस द्वारा जांच में, निर्धारित नियमों से
विपरीत प्रक्रिया अपनाई जाती है| यद्यपि पुलिस को अपराध की सूचना मिलने पर तुरंत
घटना स्थल पर जाकर प्रमाणों को सुरक्षित करना चाहिये और अपराधी का पक्ष जानना चाहिए किन्तु पुलिस ठीक इसके विपरीत, पहले पीड़ित के बयान लेती
है और अक्सर पीड़ित को धमकाकार उसे मामला वापिस लेने के लिए दबाव बनाती है| जबकि यदि पुलिस पहले
अपराधी के बयान ले और बाद में इन बयानों के आधार पर पीड़ित के बयान ले तो पीड़ित पक्षकार, अपराधी के बयानों के
विषय में,
और बेहतर
स्पष्टीकरण दे सकता है और पीड़ित के बयान तो
स्वयम ऍफ़ आई आर या न्यायालय के माध्यम से प्राप्त परिवाद में पहले से ही होते हैं| इससे स्थिति प्रारम्भिक
स्तर पर ही अधिक स्पष्ट हो सकेगी| पुलिस अनुसन्धान का अभिप्राय किसी पक्ष को
पीड़ा पहुंचाना न होकर दोनों पक्षों को सुनकर निष्पक्ष तथ्यात्मक रिपोर्ट तैयार
करना है जबकि पुलिस द्वारा मनमानी
प्रक्रिया अपनाई जाती| आश्चर्य होता जब कई बार पुलिस किसी अभियुक्त की लम्बी अवधि
के लिए रिमांड की मांग करती है वहीं कई बार अभियुक्त से कोई पूछताछ किये बिना ही
उसे दोषी मान बैठती है|
जनता की पुलिस के प्रति शिकायतों में भी कोई
कमी नहीं आयी है और पुलिस वालों को यह विश्वास है
कि वे चाहे जो करें उनका कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं है| आंकड़े बताते हैं कि वर्ष
भर में पुलिस के विरुद्ध प्राप्त होने वाली शिकायतों में मुश्किल से मात्र 1 प्रतिशत में ही कोई
कार्यवाही होती है क्योंकि इन शिकायतों की
जांच किसी पुलिस अधिकारी के द्वारा ही की जाती है| आखिर वे अपनी बिरादरी के विरुद्ध कोई कदम कैसे उठा सकते हैं? अत: यह व्यवस्था की जाए कि भविष्य में किसी
भी पुलिसवाले –
चाहे
किसी भी स्तर का क्यों न हो, के विरुद्ध जांच पुलिस द्वारा नहीं की जायेगी| अब तक की प्रवृति के
अनुसार देश में जांचें दोषियों को बचाने के लिए की जाती रही हैं न कि दोषी का दायित्व
निश्चित करने के लिए|
मैं
एक उदाहरण से आपको यह स्पष्ट करना चाहूंगा| एक बार ट्रेन के कुछ डिब्बे पटरी से उतर गए
तो जांच के लिए इंजीनियर आये और डिब्बे वाले इंजीनियरों ने रिपोर्ट दी कि पटरी का अलायन्मेंट
सही नहीं था और पटरी वाले इंजीनियरों का कहना था कि डिब्बे के पहियों का अलायन्मेंट
ठीक नहीं था किन्तु किसी ने भी अपने विभाग को सही और दुरस्त होने या सही नहीं होने
पर कोई टिपण्णी नहीं की| आज हमारी सरकारें इस प्रकार के छद्म बहानों
की तामीर पर ही चल रही हैं और जांचों में मुख्य मुद्दे से हटकर ही कोई निष्कर्ष निकाला
जाता है जिससे दोषियों को फलने फूलने का अवसर मिल रहा है और देश में दोषी लोक सेवक
रक्तबीज की तरह बढ़ रहे हैं|
अनुसन्धान में अग्रसर होने के लिए पुलिस तुरंत
अपराधी का पक्ष जाने और पहले पीड़ित के बयान लेने में अनावश्यक समय बर्बाद नहीं करे
क्योंकि जांच का उद्देश्य अभियुक्त की गिरफ्तारी के मजबूत आधार तैयार करना नहीं होकर
सत्य का पता लगाना है| न ही अभियुक्त की गिरफ्तारी न्याय का अंतिम
लक्ष्य है|
दंड प्रक्रिया संहिता एवं पुलिस नियमों में
पुलिस हैड कांस्टेबल को पुलिस थाना के प्रभारी की शक्तियां दी हुई हैं
अत: निरीक्षक का हमेशा थाने पर उपस्थित रहना आवश्यक नहीं और एफ आई आर दर्ज करने
के लिए हैड कांस्टेबल को किसी प्रशासनिक आदेश की भी आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह कानून
द्वारा ऐसा करने के लिए पहले से ही सशक्त है और कोई भी पुलिस अधिकारी कानून से ऊपर
नहीं है|
जरूरत है पुलिस की कार्य शैली और भूमिका में जनानुकूल
परिवर्तन कर इसे एक नई दिशा दी जाए |
Saturday, 9 November 2013
भारत में पुलिस और नागरिक सम्बन्ध-कल और आज
पुलिस
सुधार के लिए भारत में समय समय पर स्वर उठते रहे हैं और जनता के उबाल पर ठन्डे
छींटे मारने के लिए विभिन्न कमेटियों/आयोगों/बोर्डों का गठन किया जाता रहा है
किन्तु पुलिस के कर्कश स्वर में अभी तक कोई कमी नहीं आई है| प्राय: आरोप लगते रहते
हैं कि पुलिस अपराधियों के साथ अपवित्र गठबंधन रखती है| आम जनता पुलिस से दूर ही
रहना चाहती है चाहे उसे कोई वहनीय नुक्सान ही क्यों न हो जाए क्योंकि पुलिस के पास
जाने पर हानि निश्चित है लाभ हो या न हो| मद्रास उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने
भी कहा है कि जिन लोगों के आपसी विवाद हैं उनमें से मात्र 10 प्रतिशत ही
न्यायालयों तक आते हैं| यह कथन भारत की न्यायिक प्रणाली पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह
लगाता है जिस पर न्यायिक जगत को मंथन और आत्मावलोकन करने की आवश्यकता है| देश में
न्यायपालिका अपने आपको सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च होने का दम भरती है अत: जो कुछ पुलिस, प्रशासन और राजनीति में अवांछनीय हो रहा है उसमें न्यायपालिका
का सक्रिय नहीं तो कम से निष्क्रिय योगदान
से इंकार नहीं किया जा सकता|
स्वतंत्रता के बाद, अंग्रेजी शासन की ही
भांति तुष्टिकरण के एक कदम के रूप में, दिनांक
10.11.1971 को पुलिस सुधार के लिए गोरे कमिटी का आज से 42 पूर्व गठन किया गया था
जिसने अपनी रिपोर्ट सरकार को प्रस्तुत की थी किन्तु संभवतया इसकी सिफारिशें आजतक धूल
चाट रही हैं| इस रिपोर्ट में कहा गया है कि
पुलिस को अब उनके विभिन्न कार्यों के निर्वहन में सेवा उन्मुख होना होगा | यह रिपोर्ट पुलिस और लोगों के बीच एक सार्थक संबंध की जरूरत
और महत्व को रेखांकित करती है| पुलिस की अपने सभी कामों में सफलता समुदाय से उपलब्ध स्वैच्छिक
सहयोग पर निर्भर है| पुलिस और जनता के बीच संवाद की बिल्कुल कमी इसकी नैतिकता को
प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है जो बेख़बर आलोचना का कारण बनती है| किसी भी पुलिस बल की शक्ति का आधार, एक लोकतांत्रिक देश में, `जनता का विश्वास' ही है | एक विकासशील समाज में
पुलिस अधिकारी का जनता की अपेक्षाओं का ध्यान रखने में विफल रहना बर्दाश्त नहीं किया
जाना चाहिए| संविधान और एक समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष समाज की
अवधारणा में पुलिस की भूमिका, पुलिस और समुदाय के बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों की पृष्ठभूमि
पर निर्भर है| दरअसल पुलिस के सभी विकास कार्यक्रमों की सफलता, शांति और व्यवस्था
बनाए रखने के लिए लोगों के समर्थन की जरूरत है| पुलिस आचरण के आदर्श
सिद्धांतों, जिसे 1960 में पुलिस के महानिरीक्षकों के सम्मेलन द्वारा अपनाया गया था,
में जनता के सहयोग और लोकप्रिय समर्थन के लिए आवश्यकता पर बल दिया गया था| इसमें विकसित तीन मुख्य सिद्धांतों में, पुलिस भी
जिन कर्तव्यों का पालन करती है हर नागरिक को भी करना है और वे केवल इस अंतर के साथ नागरिक हैं कि पुलिस एक पूर्णकालिक
आधार पर नियोजित संगठन हैं| पुलिस अपने कृत्यों द्वारा जब तक कुशल प्रदर्शन व सम्मान के साथ लोगों का विश्वास हासिल करने और प्रयास
करने के लिए खुद के आचरण को जनानुकूल नहीं बनाएगी जनता उनसे दूरी बनाए रखेगी|
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि पुलिस का कर्तव्य है कि बल के इस्तेमाल के बिना स्थितियों
से निपटने, और सहानुभूति व समाज के सभी वर्गों के कल्याण के प्रति जागरूक
और उनके सामाजिक संबंध के बिना व्यक्तिगत सेवा, दोस्ती और जरूरत में लोगों को सहायता देने के
लिए हमेशा तैयार खड़ी रहे| यह सुनिश्चित करने के लिए वरिष्ठ के पुलिस अधिकारियों को पुलिस
के सिद्धांतों को व्यवहार में अपनाकर एक अनुकरणीय उदाहरण स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए| राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने में आजादी के बाद से चाहे पुलिस ने अच्छा काम किया है, लेकिन आम आदमी थाना पुलिस
के आचरण से सबसे अधिक चिंतित है | हमारे सामने उपस्थित सबूत से पता चलता है कि
थाना पुलिस की सार्वजनिक छवि असंतोषजनक है | पुलिस के नजरिए में परिवर्तन के अलावा पुलिस के प्रति लोगों के नजरिए को नई दिशा भी जरूरी हैं| हिंसक और असामाजिक तत्वों के साथ लगातार संपर्क में रहना पुलिसकर्मियों के सभी प्रकार के व्यवहार और दृष्टिकोण
को प्रभावित करता है| लोगों की नजर में यह
पुलिस के काम से जुडा होने से यह निश्चितरूप
से एक कलंक है| वार्षिक पुलिस परेड, खेल , आदि जैसे पुलिस के विभिन्न कार्यों में और उपयुक्त
अवसरों पर पुलिस संस्थाओं का दौरा करने से जनता को भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए
| ग्राम रक्षा समितियों
आदि सार्वजनिक आयोजन से पुलिस
को करीब लाने में मदद मिलेगी जो नागरिकों की भागीदारी कार्यक्रम का एक उपयोगी हिस्सा
हो सकता है |
भ्रष्टाचार एक बदनुमा दाग है जो पुलिस बल को सार्वजनिक सम्मान और सहयोग से
वंचित करता है| एक बेईमान व्यक्ति का सेवा में बने रहना असंभव बनाने के लिए
के लिए एक ठोस अभियान की शुरुआत होनी चाहिए| भ्रष्टाचार की सभी शिकायतों की तुरंत जांच की
जानी चाहिए और दोषी के खिलाफ जो कुछ भी कार्रवाई अपने स्तर से हो वह कठोर होनी चाहिए| भ्रष्टाचार निवारण के लिए एक अथक अभियान के लिए राजपत्रित पुलिस अधिकारियों
को नेतृत्व के लिए आगे आना चाहिए|अपराध की रोकथाम और पता लगाने में पुलिस की पेशेवर दक्षता
से जनता के साथ उनके संबंधों पर सीधा असर पड़ता है | अपराधों के पंजीकरण से मनाही से अपराध में कमी करने के दिखावटी तरीके के संबंध में
प्रचलित छवि, अंडर-वर्ल्ड के साथ मिलीभगत, अंधाधुंध गिरफ्तारी और
निहितार्थ के साथ जांच के अनुचित तरीकों को बंद किया जाना है | प्रशिक्षण के अलावा कानूनी
प्रक्रियाओं, काम करने के तरीकों व उपकरणों, वैज्ञानिक उपकरणों
का प्रयोग , विशेषज्ञता व कार्य भार की अधिकता , स्टाफ की संख्या और संगठन के रूप में कई कारक इसमें शामिल है| सुसज्जित
स्वागत कक्षों और शिकायतकर्ताओं और गवाहों के लिए पुलिस स्टेशनों पर अन्य सुविधाओं
की कमी को जितनी जल्दी संभव हो दुरुस्त करने के प्रयास किए जाने चाहिए| पुलिस स्टेशन में तैनात पुलिस अधिकारियों पर कार्य भार भी अत्यधिक है| किन्तु इन पंक्तियों के लेखक का स्वतंत्र मत है कि पुलिस यह
भार भी बिना किसी अतिरिक्त आकर्षण या लालच के वहन नहीं कर रही है जैसे रोडवेज में
ड्राइवर व कंडक्टर गत 20 वर्षों से बिना ओवरटाइम के कार्य कर रहे हैं| एक दूसरा पहलू
यह भी है कि उचित कार्य दशाएं, सीमित कार्य घंटे और नियमित विश्राम पुलिस वालों के
भी मानवाधिकार हैं और उल्लंघन होने पर वे भी आम नागरिकों के समान ही कानूनी उपचार
प्राप्त कर सकते हैं| किन्तु मानवाधिकार तंत्र को तो पुलिस वाले अपना
प्रतिद्वंद्वी और शत्रु मानते हैं अत: वे ऐसे उपचार के विषय में सोच भी नहीं पाते
हैं|
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि अपने सरकारी
कार्यों को तुरंत पूरा करने और अपनी निजी जरूरतों और मनोरंजन के लिए कभी - कभी रचनात्मक
गतिविधियों के लिए कुछ अतिरिक्त समय निकालने के लिए पुलिस स्टेशन के कर्मचारियों की
संख्या में वृद्धि को तर्कसंगत बनाया जाना चाहिए| पुलिस से जल्दी जानकारी प्राप्त होना बहुधा व्यथित पक्षकार की
भावनाओं को चोट लगने में कमी लाने और पुलिस को जनता के
करीब लाने में मददगार है| एक उचित संचार प्रणाली और पर्याप्त परिवहन के साथ सुसज्जित पुलिस
के माध्यम से जवाब देने के समय को कम किया जाना चाहिए
| इसके अलावा , वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को विशेष रूप से , पुलिस स्टेशनों पर तैनात
अपने सभी अधीनस्थ कर्मचारियों से पुलिस कार्रवाई में ` जवाब देने के समय ' में कटौती की आवश्यकता
पर बल देना चाहिए|
Thursday, 31 October 2013
Monday, 14 October 2013
संवेदनहीन पुलिस के दिए जख्मों पर न्यायालय की मानवीय मरहम
यह शर्मिला शर्मा
के बच्चों का दुर्भाग्य था या पंचकुला पुलिस की घोर लापरवाही कि अक्टूबर 2012 में
एक सडक दुर्घटना में शर्मिला के पति की मृत्यु हो गयी थी| हरियाणा सरकार ने कहने
को तो ऐसे मामलों में मुआवजा देने की घोषणा कर रखी है किन्तु पीड़ितों को अभी तक
कोई मुआवजा नहीं दिया गया| शर्मिला अपने बच्चों का येन केन प्रकारेण पालन पोषण कर
रही थी और अपने पति की मृत्यु के लिए मुआवजे हेतु संघर्ष कर रही थी कि 6 माह बाद दिनांक
07.05.13 को उसके परिवार पर दुखों का एक और पहाड़ टूट पडा| चंडीगढ़ के सेक्टर 10 में
चंडीगढ़ परिवहन उपक्रम की एक बस उसे कुचलते हुए निकल गयी| शर्मिला के सिर में गहरी
चोट आयी थी| जिस स्थान पर यह दुर्घटना हुई वहां से मल्टी स्पेसीलिटी अस्पताल मात्र
100 मीटर की दूरी पर ही है| किन्तु अपने आचरण के लिए ख्यात लापरवाह और अमानवीय पुलिस
अधिकारी वहां 2 घंटे बाद पहुंचे जिससे शर्मिला को बचाया नहीं जा सका| सेक्टर 3
पुलिस थाने के प्रभारी श्री प्रकाश जब 2 घंटे बाद घटना स्थल पर पहुंचे तो शर्मिला
सडक पर खून से लथपथ पड़ी थी यद्यपि अधीनस्थ पुलिस उस स्थान पर पहले से ही उसकी
प्रतीक्षा करते रहे| इस घटना से शर्मिला के दो किशोरवय बच्चे पूरी तरह से अनाथ हो
गये| यह भी ध्यान देने योग्य है कि शहरी क्षेत्र में परिवहन के लिए अधिकतम 10 मीटर
तक लम्बाई की बसें ही उपयुक्त हैं जबकि 13.5 मीटर तक लम्बी असुरक्षित बसों को
प्रयोग किया जा रहा है|
उक्त तथ्य पंजाब
हरियाणा उच्च न्यायालय के ध्यान में आने पर दिनांक 10.05.13 को स्व-प्रेरणा से
संज्ञान लिया गया और अग्रिम कार्यवाही की गयी| उच्च न्यायालय ने अपने हाल ही के आदेश
दिनांक 25.09.13 में कहा और आदेश दिया है कि पुलिस के संवेदनहीन आचरण से दो बच्चे
अनाथ हो गये| किसी सामाजिक सुरक्षा की योजना के अभाव में इन दुखान्तिकाओं से
नाबालिग बच्चे और अधिक पीड़ित हैं| न्यायालय ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए आदेश
दिया कि हरियाणा सरकार की योजनानुसार 15 दिन के भीतर एक लाख रुपये की राशि भुगतान
की जाए| न्यायालय की टिप्पणी थी कि संघ राज्य क्षेत्र चंडीगढ़ की संवेदनहीन पुलिस
पीड़ित को मदद करने की बजाय क्षेत्राधिकार के मुद्दे को उलझाने में अधिक रुचिबद्ध
रही है| न्यायालय के हस्तक्षेप से पहले तक तो दोषी अधिकारियों का अनुचित बचाव किया
जाता रहा| सुनवाई के दौरान यह बताया गया है कि अब कई अधिकारियों के विरुद्ध
अनुशासनिक कार्यवाही प्रारंभ की गयी है जिसका अभी तक निष्कर्ष नहीं निकला है
किन्तु इससे अवयस्क अनाथ बच्चों को कोई सांत्वना प्राप्त नहीं होती है| कम से कम,
बच्चों को आर्थिक मदद तो दी ही जा सकती है| अत: चंडीगढ़ प्रशासन को आदिष्ट किया जाता
है कि दोनों बच्चों के नाम से 1-1 लाख रूपये की राशि अंतरिम राहत के तौर पर 15 दिन
के भीतर जमा करवाए| सत्यापन के बाद बच्चों को प्रतिमाह शिक्षा व पालन पोषण खर्चे
के लिए 14200 रूपये भुगतान किये जाएँ| यह राशि सितम्बर माह से प्रारंभ होगी जोकि 7
अक्तूबर या इससे पूर्व देय होगी| न्यायमित्र की सहायता से तदनुसार आवेदन का निपटान
किया गया|
फिर भी चंडीगढ़
प्रशासन और पंजाब सरकार से हरियाणा की तर्ज पर ऐसे मामलों में एक सम्यक नीति बनाने
की अपेक्षा की गयी| इस प्रकार की घटनाओं को टालने के उपाय करने और दोषी पुलिस
अधिकारियों पर अधिकतम एक माह की अवधि में कार्यवाही करने की रिपोर्ट के लिए मामले को
पुन: दिनांक 19.11.13 को सूचीबद्ध करने के आदेश दिए गए व आदेश की दस्ती प्रति
पक्षकारों को दी गयी|
Wednesday, 2 October 2013
सांसदों का वेतन छ: लाख रुपये प्रतिमाह करने की साजिश
देश के सांसदों का प्रतिमाह वेतन, वर्ष जो 2005 तक 4000 रूपये था, को दिनांक 12.09.2006 से 16000 और शीघ्र ही दिनांक 18.05.09 से बढाकर 50000 रूपये
कर दिया गया है! दूसरी ओर न्यूनतम मजदूरी की ओर देखें तो यह वर्ष 2005 में रुपये 2500 रूपये थी जो 2009 में बढ़कर मात्र 4000 रूपये ही हो पायी है| इस प्रकार हमारे माननीय जन प्रतिनिधियों की परिलब्धियों में
4 वर्ष में 1100% से अधिक बढ़ोतरी हुई और महंगाई की मार से त्राहीत्राही करते आम मेहनतकश
मजदूर की मजदूरी में समान अवधि में मात्र 60% वृद्धि हुई है| ठीक इसी प्रकार कृषि उत्पादों के मूल्यों की तुलना में
औद्योगिक उत्पादों की कीमतों में वृद्धि भी 50% अधिक हुई है और देश के अन्न
उत्पादक आत्म हत्याएं कर रहे हैं| देश का संविधान
कहता है कि इस प्रकार की आर्थिक नीतियाँ अपनायी जाएँगी कि क्षेत्रीय और वर्गवार विषमता
में कमी आये| आम नागरिक यह समझने में असमर्थ है कि इन नीतियों से किस प्रकार
विषमता दूर हो रही है| जहां आम आदमी के लिए 30 रुपये रोजना पर्याप्त बताये जाते हैं
वहीं एक दिन के समारोह पर करोड़ों फूंक दिये जाते हैं और जनता के धन से खुद पर रोजाना
10000 रुपये से भी ज्यादा खर्च किये जाते हैं| यदि 30 रूपये प्रतिदिन पर्याप्त हों
तो, कार्य करने के बदले वेतन को छोड़ भी दिया जाए,
कम से कम सरकारी कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों को बिना कार्य किये मिलने
वाली पेंशन तो 900 रूपये प्रतिमाह किया जाना उचित ही है|
सरकार जनता को विभन्न प्रलोभन देकर सब्ज
बाग़ दिखाकर बना रही है| एक ओर यह वक्तव्य
दिये जाते हैं कि देश में मात्र 20% लोग गरीब हैं, वहीं दूसरी ओर दो तिहाई जनता को
अन्न उपलब्ध करवाने के लिए खाद्य सुरक्षा कानून बनाकर सच्चाई की अनूठी बानगी
प्रस्तुत की जाती है| केंद्र सरकार के कर्मचारियों की परिलब्धियों में वृद्धि के अध्ययन
के लिए वेतन आयोग ने पूर्व में विदेशी दौरे भी किये और वहां की वेतन सम्बंधित स्थिति
का जायजा लिया| किन्तु इस दल ने विदेशी कार्मिकों के कार्य
निष्पादन, जवाबदेही,
आचरण
के नियम, भूमिका, कार्यप्रणाली आदि के
विषय में कोई जानोपयोगी जानकरी नहीं ली है| न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण
हेतु देश से कोई दल शायद ही विदेशों में अध्ययन हेतु भेजा गया हो| दिल्ली उच्च न्यायालय अनुसार निचले तबकों में तो शादियाँ टूटने
का एक कारण मुद्रास्फीति/महंगाई की मार भी है जिसके चलते वे इस महंगे शहर में जीवन
निर्वाह करना मुश्किल पाते हैं| हमारे वित्तमंत्री इस
उपलब्धि और सुन्दर (शोषणकारी) नियोजन के लिए
धन्यवाद के पात्र हैं|
आज से 16 वर्ष
पूर्व भारत में सेवा कर नाम का कोई कर नहीं था और आज इस नाम से 100000 करोड़ रुपयों
की जनता की जेब प्रतिवर्ष काटी जाती है| लगभग सभी सेवाओं पर कर लगा दिया गया है
तथा आज सेवा कर न लगने वाली सेवाओं की (नकारात्मक) सूची है व इन सेवाओं को छोड़कर
सभी सेवाओं पर सेवा कर देय है| देश के अपरिपक्व या अस्वच्छ बुद्धि वाले नागरिक इसे
अच्छा नियोजन भी कह सकते हैं| एक तरफ देश की आम आदमी से प्रत्येक सेवा और वस्तु पर
कर वसूलो और बाद में दो तिहाई लोगों को गरीबी के नाम पर नरेगा, अनुदान आदि के नाम
पर बांटो| पहले करों की वसूली में भ्रष्टाचार और बाद में जनता का ही धन जनता को
बांटने में| नौकरशाही और जनप्रतिनिधियों की पौ बारह है| सरकार का कुतर्क हो सकता
है कि इससे राजस्व में वृद्धि हो रही है किन्तु राजस्व और भ्रष्टाचार में क्या
अनुपात है शायद सरकार को ज्ञान नहीं है| भारत आज भ्रष्टाचार के मामले में मात्र
चौथे पायदान पर है| जब देशी बंदूक के लाइसेंस का शुल्क एक रुपया पचास पैसा था तब
नवीनीकरण के लिए पांच रूपये रिश्वत ली जाती थी| जमीन के एक कारोबारी से बातचीत में
उसने बताया कि जमीन के उपयोग परिवर्तन के लिए जितना शुल्क जमा करवाया उससे दुगुना
पैसा कलेक्टर को देना पडा| नगर नियोजक, राजस्व विभाग, स्थानीय निकाय, पटवारी आदि
को दी जाने वाली भेंटे अलग हैं| सरकार कर संग्रहण के आंकड़ों से भी बड़ी खुश होती है
और राजस्व विभाग के अधिकारियों की पीठ थपथपाती है| किन्तु देश में 2% प्रतिवर्ष
जनसंख्या वृद्धि से सेवाओं और वस्तुओं के उपभोग में वृद्धि हो रही है तथा गत दशकों
से 10% से ऊपर महंगाई दर में वृद्धि हो रही है| अत: 12% तक कर संग्रहण में वृद्धि
तो स्वाभाविक है और इससे कितनी अधिक वृद्धि हो रही है, यह सरकार और जनता दोनों
जानते हैं| 12% तक जनहित के किसी मद में बजट में प्रतिवर्ष वृद्धि का अभिप्राय तो
मात्र स्थिरता है और वास्तव में कोई वृद्धि नहीं है|
विदेशों में समान प्रकृति के कार्य के लिए
सरकारी क्षेत्र में निजी क्षेत्र से 2-3 गुणा वेतन दिया जाता है जबकि भारत में
समान कार्य के लिए सरकारी सेवा में 6-8 गुणा वेतन दिया जा रहा है| भारत में सरकारी
कार्यालय डाक घर की भांति मात्र पत्रों को इधर-उधर भेजने का कार्य कर रहे हैं और
प्रतिमाह लाखों रुपये जनता के खजाने से लेने वाले कई आई ए एस तो पूरे महीने में जनता
से सम्बन्धित 10 निर्णय लेने/टिपण्णी हस्ताक्षर करने का कार्य भी नहीं करते हैं|
वे मात्र ऊँचे अधिकारियों से आने वाले पत्रों का जवाब देना आवश्यक समझते हैं | सरकारी
क्षेत्र के लगभग 4 करोड़ संगठित कर्मचारियों के 20 करोड़ परिजनों के लिए भी छठा वेतन
आयोग वरदान साबित हुआ था और उनकी परिलब्धियों में पूर्व में वर्ष 2006 में 150% से अधिक की वृद्धि कर हमारे जन प्रतिनिधियों
ने अपने लिए वेतन और सुख- सुविधा वृद्धि का मार्ग सुगम, निर्विघ्न और निष्कंटक बना लिया| केंद्र सरकार के वेतन आयोग
के बाद सभी राज्य सरकारों, सार्वजनिक उपक्रमों और शासन के अन्य अंगों में वेतन
वृद्धियां आवश्यक हो जाती है| अभी हाल ही में केंद्र सरकार ने सातवें वेतन आयोग की
स्वीकृति दे दी है| आखिर दे भी क्यों नहीं चुनावी वर्ष है और करों के रूप में
वसूली गयी जनता की गाढे पसीने की कमाई को ये लोग अपनी पैत्रिक सम्पति समझते आये
हैं| अब जनता को समझ लेना चाहिए कि वेतन आयोग के गठन से जनप्रतिनिधियों के वेतन
में न केवल बढ़ोतरी का मार्ग पुन: निष्कंटक होगा बल्कि सत्तासीन दल अपने पक्ष में अधिक मतों की भी अपेक्षा रखता
है| मंहगाई में वृद्धि होगी जिससे सांसदों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा और व्यापारियों,
जमाखोरों व उद्योगपतियों के मुनाफे में
वृद्धि होने से वे अच्छा चुनावी चन्दा दे सकेंगे| पसीने तो आम जनता के छूटने हैं|
इस प्रकार सातवें वेतन आयोग के गठन से सरकार ने एक ही ढेले में कई चिड़िया मारने की
योजना बनाई है| अब जनता को सावधान हो जाना चाहिए कि जन प्रतिनिधियों के नापाक
मंसूबों को सिरे न चढ़ने दें और मांग करें कि वेतन आयोग में बहुमत में सिविल
सोसायटी के लोग सदस्य हों जो जनहित पहलू पर विचार कर सकें क्योंकि नौकरशाह और जन प्रतिनिधि
तो अपना हित त्याग नहीं सकते| नौकरशाहों और जन प्रतिनिधियों का स्पष्ट हित तो जनता की जेब से अधिकतम दोहन करने में
है| हमारे माननीय प्रधान मंत्री और वित्तमंत्री दोनों ही विदेशों में अंग्रेजी वातावरण
में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त हैं| भारत पूर्व में भी अंग्रेजों की कुटिल नीतियों का लम्बे समय तक शिकार रह चुका
है| छठे वेतन वेतन आयोग के बाद सांसदों के वेतन में 4 वर्षों में 16 गुणी वृद्धि
कर उसे 50000 रुपये प्रतिमाह कर दिया था और अब इसमें यदि इसी दर से वृद्धि की गयी
तो अगली लोकसभा में सांसदों का वेतन 600000
रुपये प्रतिमाह हो जाएगा| अत: मेरे प्रिय भारतवासियों जागो समय आ गया है, सरकार की
संविधान विरोधी और जन विरोधी नीतियों का एकजुट होकर पुरजोर विरोध करने का – याद
रहे|
Tuesday, 1 October 2013
बंदर कहना महँगा पड़ा ...
ओंटारियो
की एक कृषि फर्म को अपने एक कर्मचारी को बंदर कहना महँगा पडा जबकि वहां के
मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ने चर्चित प्रकरण एड्रिअन मोंरोसे बनाम डबल डायमंड एकड़ लिमिटेड (2013 एच आर टी ओ 1273) में दोषी पर भारी
जुर्माना लगाया| किंग्सविले की एक टमाटर उत्पादक कंपनी डबल डायमंड एकड़
लिमिटेड को मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ओंटारियो
(कनाडा) ने शिकायतकर्ता एड्रिअन मोंरोसे
को बकाया वेतन और गरिमा हनन के लिए कुल 23,500 पौंड क्षतिपूर्ति देने के आदेश दिया
है|
तथ्य इस
प्रकार हैं कि शिकायतकर्ता ने प्रतिवादी संस्थान में प्रवासी मौसमी कृषि मजदूर के
रूप में दिनांक 9.1.09 से कार्य प्रारंभ किया था| शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि
प्रतिवादी संस्थान के एक कर्मचारी करिरो ने चिल्लाते हुए मुझे कहा कि तुम पेड़ शाखा
पर बंदर जैसे लगते हो और वह चला गया| मौसमी मजदूरों के करार के अनुसार उनके वेतन
का पच्चीस प्रतिशत वेतन उन्हें बाद में भेजे जाने के लिए काटा जाता है किन्तु उसे समय पर भुगतान नहीं किया गया| आवेदक –शिकायतकर्ता-एड्रिअन
मोंरोसे के अनुसार उसने यह मामला प्रतिवादी के समक्ष माह जनवरी व फरवरी 2009 में
उठाया था| किन्तु उसकी शिकायत के फलस्वरूप
बदले की भावना से उसे नौकरी से ही निकाल दिया जिससे वह 5500 पौंड मजदूरी से वंचित
हो गया| मामला जब ट्रिब्यूनल के
सामने निर्णय हेतु आया तो ट्रिब्यूनल का यह विचार रहा कि क्षतिपूर्ति के उचित
मूल्याङ्कन के लिए बदले की भावना से प्रेरित कार्यवाही से उसकी गरिमा, भावना और स्व-सम्मान को
पहुंची ठेस के लिए प्रार्थी क्षतिपूर्ति का पात्र है| प्रार्थी ने अपने देश वापिस भेज दिए जाने सहित मजदूरी के
नुक्सान आदि इन सबके लिए कुल 30000 पौंड के हर्जाने की मांग की है| ओंटारियो मानवाधिकार संहिता की धारा 46.3 के अनुसार किसी
संगठन के कर्मचारियों, अधिकारियों या एजेंटों द्वारा
भेदभाव पूर्ण आचरण करने पर संस्था का प्रतिनिधित्मक दायित्व है, तदनुसार करेरो और मस्टरोनारडी के कृत्यों के लिए डबल डायमंड एकड़
लिमिटेड जिम्मेदार है| ट्रिब्यूनल ने आवेदक को 15000 पौंड का हर्जाना
बदले के भावना से हुए मानवाधिकार हनन के लिए स्वीकृत किया और मजदूरी के नुक्सान की
भरपाई के लिए 5000 पौंड मय ब्याज के देने के आदेश दिए|
आवेदक ने यह भी मांग की कि प्रत्यर्थी अपने यहाँ मानवाधिकार नीति को
लागू करने के लिए ओंटारियो मानवाधिकार आयोग से अनुमोदन करवाकर एक निश्चित प्रक्रिया
लागू करे| इस पर ट्रिब्यूनल ने आदेश
दिया कि प्रत्यर्थी 120 दिन के भीतर मानवाधिकार कानून विशेषज्ञ की सहायता से एक
व्यापक मानवाधिकार और भेदभाव विरोधी नीति विकसित करे व प्रत्यर्थी के सभी अधिकारी–कर्मचारी, जिन पर किसी भी प्रकार
के पर्यवेक्षण का दयित्व हो वे, 101 मानवाधिकारों के विषय में 120 दिन के भीतर ऑनलाइन प्रशिक्षण प्राप्त करें |
वहीं भारतीय परिपेक्ष्य में मानवाधिकारों पर नजर डालें तो स्थिति
अत्यंत दुखद कहानी कहती है| ओड़िसा में जुलाई 2008 में संजय
दास को पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की निस्संकोच अवहेलना करते हुए
गिरफ्तार कर लिया था अत: पुलिस की इस अनुचित कार्यवाही से व्यथित होकर पीड़ित ने
वर्ष 2009 में उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल की| खेद का विषय है कि इस
याचिका पर उच्च न्यायालय ने 4 वर्ष बाद अब वर्ष
2013 में सरकार से जवाबी हलफनामा दायर करने को कहा है| प्रकरण में जवाब देते हुए राज्य के पुलिस महानिदेशक
ने कहा है कि अब दोषी की पहचान करना कठिन है| वास्तव में देखा जाए तो भारत भूमि के अधिकाँश लोगों, चाहे वे कोई भी पद धारण
करते हों, के चिंतन से लोकतंत्र का
मूल दर्शन ही गायब है| विधायिकाएं आधे-अधूरे और
जनविरोधी कानून बनाती हैं, न्यायपालिका उन्हें लागू
करते हुए और भोंथरा बना देती परिणामत: पुलिस का मनोबल और दुस्साहस-दोनों इस
वातावरण में मुक्त रूप से पनपते रहते है| पुलिस द्वारा न केवल आम नागरिक के साथ अभद्र व्यवहार करने
और सरे आम गाली गलोज करने के मामले मानवाधिकार तंत्र के सक्रिय या निष्क्रिय सहयोग और
सानिद्य में जारी हैं बल्कि हिंसा तक बेहिचक की जाती है| देश की सवा अरब की आबादी में ढूंढने से भी उदाहरण मिलना मुश्किल है जहां
बीस लाख में से एक भी पुलिस वाले को अपशब्दों के लिए या मानव गरिमा हनन के लिए
दण्डित किया गया हो|
एक बार जब भारत ने मानवाधिकार संधि का अनुमोदन कर दिया तो उसके बाद सम्पूर्ण
देश में मानवाधिकार की रक्षा करना, प्रोन्नति करना और उसका उल्लंघन रोकना सरकार का
दायित्व हो जाता है – ऐसा उल्लंघन चाहे किसी
सरकारी सेवक द्वारा किया जा रहा हो या किसी नीजि व्यक्ति द्वारा| सरकार मानवाधिकार उल्लंघन
के मामले में ऐसा कोई भेदभाव नहीं बरत सकती किन्तु भारत के मानवाधिकार संरक्षण
अधिनियम की धारा 12 में मात्र लोक सेवकों द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में
ही आयोग द्वारा जांच का प्रावधान रखा गया है और इस प्रकार नीजि व्यक्तियों को
मानवाधिकार उल्लंघन की खुली छूट दे दी गयी है कि उनके विरुद्ध शिकायतों पर आयोग
कोई कार्यवाही नहीं करेगा| वहीं ओंटारियो राज्य ने
अपने लिए एक विस्तृत और व्यापक मानवाधिकार संहिता बना रखी है| संहिता की धारा 29 में मानवाधिकार
संरक्षण और प्रोन्नति के व्यापक प्रावधान है और यह कहा गया है कि आयोग का कार्य
मानवाधिकारों (न केवल रक्षा करना बल्कि) के सम्मान को आगे बढ़ाना और प्रोन्नत करना
आयोग का कार्य है तथा इसमें नीजि या सरकारी उल्लंघन के मध्य किसी प्रकार का भेदभाव
नहीं किया गया है| मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ओंटारियो न केवल अपने मुख्यालय पर
बल्कि कैम्प लगाकर घटना स्थल के नजदीक सुनवाई का अवसर देता है ताकि पीड़ित पक्ष
अपना दावा आसानी से प्रभावी ढंग प्रस्तुत कर सके| उक्त मामले से यह भी स्पष्ट है कि
वर्ष 2009 के मामले में ओंटारियो के
ट्रिब्यूनल ने अपना निर्णय सुना दिया है जबकि समान अवधि के मामले में ओड़िसा उच्च
न्यायालय ने अभी सरकार से जवाब ही मांगा है, निर्णय में लगने वाले समय और मिलने वाली राहत के विषय
में कोई सुन्दर पूर्वानुमान नहीं
लगाया जा सकता| उल्लेखनीय है कि भारत जब
मानवप्राणी के रूप में प्राप्त अधिकारों
के विषय में कनाडा से इतना पीछे है तो नागरिक के तौर पर उपलब्ध मूल अधिकारों के
विषय में अभी चर्चा करना ही अपरिपक्व होगा, चाहे कागजी तौर पर वे संविधान में
सम्मिलित हों| यह भी ध्यान देने योग्य है कि कनाडा, ब्रिटिश संसद के नियंत्रण से वर्ष
1982 में ही अर्थात भारत से 35 वर्ष बाद पूरी तरह से मुक्त हुआ है| अब देश की जनता
कर्णधारों से जवाब मांगती है कि इस अवधि में इन्होंने आम भारतीय के लिए अब तक क्या
किया और भविष्य में जो करने जा रहे हैं उसकी रूप रेखा क्या है|
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