Monday, 5 September 2011

पारदर्शी और जिम्मेदार न्यायपालिका

उच्च तकनीकि प्रणाली से समय का अधिक दक्षता पूर्वक उपयोग, पारदर्शिता में वृद्धि  और सुधरी हुई न्यायसदन की कार्यवाहियां सुलभ  होती हैं| साथ साथ इन लाभों से न्यायिक निकाय में जन विश्वास में भी वृद्धि होती है| उदाहारण के लिए इस रिकार्डिंग प्रणाली से न्यायपालिका द्वारा लोगों को रिकार्ड की गयी कार्यवाही की प्रतियाँ शीघ्र और सस्ती दर पर उपलब्ध करावाई  जा सकती हैं| इससे भी बढ़कर यह है कि ये गुणवता में सामान्य नकलों से अधिक सही और अच्छी होती हैं| सार रूप में उन्नत ग्राहक सेवा न्यायपालिका को अधिक सकारात्मक और विश्वसनीय बनाती है| जब न्यायालय द्वारा स्वचालित रिकार्ड वाले निर्णित मामले की अपील सुनवाई के लिए आती है तो अपील प्रक्रिया अधिक दक्ष होती है क्योंकि न्यायालय आसानी से परीक्षण न्यायालय के रिकार्ड तक पहुँच सकता है और परीक्षण न्यायालय के पूर्ण रूप से  सही रिकार्ड पर विश्वास कर सकता है| स्वचालित मशीनी रिकार्ड के संचयी सकारात्मक प्रभाव से अपील प्रक्रिया अधिक दक्ष बनती है| अंतिम किन्तु महत्वपूर्ण यह है कि पारदर्शिता एवं जिम्मेदारी  से कार्य करने पर कम ही मामलों में अपील की आवश्यकता पड़ती है| कजाखिस्तान परियोजना  पर एक रिपोर्ट के अनुसार मशीन से रिकार्ड किये गए मामलों की तुलना में न रिकार्ड किये गए मामलों में अपील की संख्या लगभग तीन गुणा अधिक  है|

इस  वचनबद्धता के लिए सावधानीपूर्वक आयोजन और लक्ष्य निर्धारण के साथ साथ विस्तृत रूप में लागू करने और प्रशिक्षण के दिशा निर्देश में परिवर्तित किये जाने की आवश्यकता है| भारत इन देशों के अनुभव से लाभान्वित हो सकता है| इन उपायों की दक्षता पर लगातार ध्यान रखने और मूल्यांकन करने की आवश्यकता की अनदेखी नहीं की जा सकती है| परिवर्तन प्रबंधन की नींव विशेष रूप से सशक्त राजनैतिक और वितीय  इछाशक्ति है| एक बार जब न्यायालय में स्वचालित रिकार्डिंग प्रणाली अपना ली जाय तो परियोजना में अप्रत्याशित चुनौतियों का सामना करना पड सकता है और कई लोगों को तदनुसार  दिशा बदलनी पड सकती है| दिशा में यह परिवर्तन खर्चीला, समय लेने वाला और हतोत्साही हो सकता है इसलिए परियोजना की सफलता परिवर्तन के प्रति ठोस राजनैतिक प्रतिबद्धता और सशक्त आर्थिक आधार पर निर्भर है| बहुत से मामलों में इस प्रकार के परिवर्तन के लिए न्यायिक मानसिकता में परिवर्तन की आवश्यकता चाहता है |

पुरानी  और नई प्रणाली के मध्य एक सहज एवं सामंजस्यपूर्ण परिवर्तन के लिए लक्ष्य सहित स्पष्ट योजना की आवश्यकता है| न्याय प्रबंधन संस्थान (अमेरिका) के अनुसार इस नवीन परिवर्तन के लिए निम्नांकित आठ क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता है :-

परिवर्तन के अधीन न्यायालय के लिए सशक्त नेतृत्व और परामर्श की आवश्यकता है| विभिन्न न्यायालयों के लिए लक्ष्य उनकी आवश्यकताओं और साधनों के अनुरूप होने चाहिए| न्यायालयों में रिकार्डिंग प्रणाली के लिए शुद्धता के मानदंड ,समयबद्धता,लागत  और रिकार्ड की उपयोगिता के स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किये जाने चाहिए| उदाहरण के लिए कई बार वीडियो रिकार्डिंग हाथ से लिखने से अधिक उपयोगी हो सकती है किन्तु कई बार यह विपरीत भी हो सकता है| परिवर्तन योजना में विद्यमान आधारभूत तकनीकि ढांचे का मूल्यांकन किया जाना चाहिए और यह देखा जाना चाहिए कि क्या यह नवीन प्रणाली के लिए सहायक हो सकता है| रिकार्ड का उत्पादन न्यायालय का मुख्य कार्य है और इसका अच्छा पर्यवेक्षण किया जाना चाहिए| कंप्यूटर आधारित लेखन प्रणाली में चुम्बकीय रिकार्डिंग प्रणाली कार्य करती है जोकि बोले गए शब्दों को आलेख में परिवर्तित कर देती है |


बेहतरीन परिवर्तनों के लिए समस्त ग्राहकों से सुझाव लेना महत्वपूर्ण है| एक अच्छा रिकार्ड अपील प्रक्रिया को आसान बना सकता है किन्तु बुरे रिकार्ड से मात्र समय नष्ट, कुंठा और न्याय प्रणाली में अविश्वास उत्पन्न  होता है| मेरीलैंड प्रान्त में न्यायालयों के पुराने स्टाफ को पहले प्रशिक्षित किया गया| न्यायालय कुशल स्टाफ को आकर्षक वेतन भत्ते प्रस्तावित कर सकता है| परिवर्तन हेतु विस्तृत योजना और ठोस लक्ष्य निर्धारण  के बाद प्राधिकारियों को चाहिए कि वे न्यायाधीशों, और अन्य समस्त जो रिकार्डिंग, संग्रहण, और रिकार्ड प्रदनागी  से जुड़े हैं के उपयोग के लिए विस्तृत परिचालन प्रक्रिया मनुएल तैयार करें जिसमें रोजमर्रा के सभी कार्यों एवं समस्याओं और उनके समाधानों का वर्णन हो| प्राधिकारियों को चाहिए कि नवीन  प्रणाली के निष्पादन पर निगरानी रखे और उसका मूल्यांकन करता रहे| इस प्रणाली की समय समय पर जांच की जानी चाहिए और यदि आवश्यक समझा जाय तो कुछ समय के लिए समानांतर प्रक्रिया भी अपनाई जा सकती है | स्वचालित रिकार्डिंग प्रणाली विश्व स्तर पर विकाशील एवं संघर्षरत राष्ट्रों सहित में लागू की जा रही है |

इंग्लैंड में भी संसद ने जनता और सांसदों को अपनी बात कहने के  सुगम, प्रभावी और पारदर्शी तरीके के लिए ई-पिटीशन प्रणाली की अनुशंसा की है| अमेरिका में भी  कागजी कार्यवाही कटौती अधिनियम पारित कर सूचना तक पहुँच का रास्ता सुगम बना दिया गया है|वहाँ न्यायालय का समस्त रिकार्ड इन्टरनेट पर उपलब्ध है| अमरीकी सरकार का मानना है कि समस्त रिकार्ड का कम्प्यूटरीकरण करने से सूचना के प्रकटन, संग्रहण, निर्माण, संधारण, विकेन्द्रीकरण, प्रसारण आदि के व्यय में भी कमी आयेगी| इससे निर्णय की गुणवता में सुधार और जिम्मेदारी आयेगी व सरकार और समाज में पारदर्शिता को बढ़ावा मिलेगा| प्रणाली को जनोन्मुखी बनाने के लिए जनता की भागीदारी ली जायेगी तथा सूचना तंत्र के विकास के लिए नीतियों, योजनाओं, नियमों, विनियमों, प्रक्रियाओं, और मार्गदर्शनों, और सरकार सूचनाओं के संग्रहण के पुनरीक्षणों के लिए जनता और इच्छुक एजेंसियों को टिपण्णी के लिए अर्थपूर्ण अवसर देगी| न्यायालयों द्वारा जनता  के लिए नागरिक चार्टर जारी करने की आवश्यकता की अनदेखी नहीं की जा सकती |

भारत में भी आडियो/वीडियो रिकार्डिंग प्रणाली के अभाव में काफी समय पूर्व से न्यायाधीशों  पर मनमानेपन के  आरोप लगते रहे हैं| सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश श्री जे सी शाह पर आरोप लगाते हुए सी के दफ्तरी बनाम ओ पी गुप्ता (1971 ए आई आर 1132) में कहा गया कि यद्यपि दोनों न्यायाधीश जिन्होंने निर्णय दिया इसके लिए जिम्मेदार हैं किन्तु श्री जे सी शाह का दायित्व अधिक गंभीर है क्योंकि वे वरिष्ठ न्यायधीश हैं और प्रकरण के प्रभारी हैं| अन्य न्यायाधीश ने तो मात्र उनकी पंक्तियों का अनुसरण किया है| अपने कनिष्ठ के माध्यम से निर्णय सुनाने की उनकी चतुराई भी किसी को धोखा नहीं दे सकती| जहाँ लोक सभा में बोला गया प्रत्येक शब्द लिखा जाता है वहीँ सुप्रीम कोर्ट में पक्षकारों के तर्कों या न्यायाधीश के सम्प्रेक्षणों को न्यायाधीशों द्वारा नोट नहीं किया जाता है| यही कारण है कि न्यायाधीश शाह ने न्यायालय में इस विश्वास में इस प्रकार अवैध और बेईमानी पूर्वक मौखिक टिप्पणियां की कि ये टिप्पणियां रिकार्ड में दर्ज नहीं होंगी और कोई भी उसे तोड़ नहीं सकेगा|
हमारे माननीय विधि एवं न्यायमंत्री ने मार्च 2012 तक न्यायालयों के पूर्ण कम्प्यूटरीकरण का आश्वसन दिया था किन्तु कम्प्यूटरीकरण की मंथर गति एवं न्यायपालिका व उससे जुड़े लोगों की अनिच्छा व अरुचि, और प्रबल इछाशक्ति के अभाव में यह लक्ष्य दिवा स्वप्न ही दिखाई देता है| ई-कोर्टस परियोजना के बजट का भी पूरा उपयोग नहीं हो रहा है| भारत के सुप्रीम कोर्ट में 01.10.06 से यद्यपि ई-फाईलिंग प्रणाली प्राम्भ कर दी गयी है किन्तु इसका उपयोग अभी नगण्य है| कुल फाइल होने वाले मामलों का मात्र 00.10% ही ई-फाईलिंग के जरिये दाखिल किया  जाता है| इसमें से भी अधिकांश भाग बाहर दूर बैठे व्यक्तिशः याचियों द्वारा फाइल किया जाता है और उसमें न्यायालय के रजिस्ट्रारों द्वारा बिना नियमों के सन्दर्भ के अनुचित कमियां निकालकर उन्हें प्रारंभिक स्तर पर ही निरस्त कर दिया जाता है| व्यक्तिशः याचियों द्वारा दायर शेष  याचिकाओं में से अधिकांश को न्यायालय द्वारा याची को सुना गया/मामले में सार नहीं है/निरस्त किया जाता है जैसे परंपरागत संक्षिप्त आदेश पारित कर पटाक्षेप कर दिया जाता है जबकि स्वयं न्यायालय ने कई बार कहा है कि कारण के बिना निर्णय प्राण हीन हैं और न्यायालय को निरस्त कीजैसा एक शब्द लिखकर सारांश रूप में याचिका निरस्त नहीं करनी चाहिए| यद्यपि मामला चाहे सारहीन हो किन्तु उसका सम्यक निपटान भी उठाये गए बिन्दुओं का जवाब देकर किया जा सकता है| सारहीन अपने आप में अस्पष्ट और कूटनीतिक शब्द है जिसका कोई निश्चित अभिप्राय नहीं  निकाला जा सकता| न ही सारहीन शब्द से यह ज्ञात हो पाता है कि सारपूर्ण होने के लिए और किन तत्वों या तथ्यों की आवश्यकता है|ऐसे शब्दों से युक्त आदेश न्यायिक आदेश कम और कूटनीतिक शब्दजाल की बाजीगरी अधिक परिलक्षित होते हैं| व्यक्तिशः फ़ाइल किये जाने वाले मामलों के नमूना सर्वेक्षण से भी इसी बात की पुष्टि होती है कि उन्हें सुनवाई का अर्थपूर्ण अवसर नहीं दिया जाता है बल्कि मात्र रस्म या औपचारिकता की ही पूर्ति की जाती है| यदि हमारी न्यायपालिका वास्तव में निष्ठावान है तो उसे रिकार्डिंग प्रणाली को शीघ्र ही लागू करने में पहल कर स्वयं को संदेह के दायरे से बाहर रखना चाहिए| भारत में वकीलों एवं न्यायालय स्टाफ के मध्य एक गुप्त समझाईस है जिसके चलते वे ई-फाईलिंग व व्यक्तिशः पैरवी को नापसंद और हतोत्साहित करते हैं इसी का परिणाम है कि ई-फाईलिंग प्रणाली लोकप्रिय नहीं हुई है तथा इसका उपयोग पांच वर्ष बाद भी एक प्रतिशत से ही नीचा है| वैसे भी जहाँ  व्यक्तिगत लेनदेन होना हो वहाँ ई-फाईलिंग प्रणाली से उद्देश्य पूर्ति नहीं होता है| जबकि आयकर एवं वाणिज्यिक कर आदि की ई-रिटर्नों व विवरणियों के मामलें में परिणाम सुखद है| इससे आंकड़ों का संकलन एवं बजटिंग और आयोजन में एक ओर सहायता मिलती है वहीँ विभाग के स्टाफ को दी जाने वाली भेंट की राशियों में भी कटौती हुई है | जिस प्रकार ट्रेफिक नियमों एवं संकेतों का अनुपालन न करने वालों के लिए स्पीड ब्रेकर आवश्यक हैं ठीक उसी प्रकार अनुशासनहीन और नियंत्रणहीन न्यायपलिका के लिए रिकार्डिंग  प्रणाली अत्यंत आवश्यक है| 

मेरे महान भारत से अपेक्षा है कि वह विदेशों के खट्टे-मीठे अनुभवों के आधार पर न्यायालयों के मशीनीकरण की व्यावहारिक योजनाओं का शीघ्र निर्माण करे और उन्हें लागू करने में तत्परता और प्रतिबद्धता दिखाकर अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करे|

Sunday, 4 September 2011

न्यायालयों के मशीनीकरण से उत्कर्ष्ट न्यायतंत्र की ओर

न्यायालयों में सुनवाई के सार का  सही एवं विश्वसनीय रिकार्ड ,फाइलिंग एवं सक्रिय सहभागिता  एक सशक्त , पारदर्शी  और विश्वसनीय न्यायपालिका की कुंजी है | 1960 के दशक से ही पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका के विकसित देशों में आंतरिक रिकोर्ड रखरखाव की प्रक्रिया की प्रभावशीलता में सुधार के लिए मांग उठी| सामान्यतया अधिक लागत वाली श्रम प्रधान (हाथ से संपन्न होने वाली) प्रक्रिया की तुलना में स्वचालित रिकार्ड करने और स्टेनोग्राफी के उपकरणों की ओर परिवर्तन को उत्तरी अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के बाहर एक चुनौती के रूप में देखा जाता है| विकसित राष्ट्रों में  न्यायालयों को सशक्त सूचना संचार तकनीक ढांचे और कुशलता का लाभ मिलता है जिससे रोजमर्रा की कार्यवाहियों का ऑडियो वीडियो रिकार्ड, स्टेनो मशीन और बहुत से अन्य कार्य कंप्यूटर प्रणालियाँ के माध्यम से करना अनुमत है |

विकासशील और संघर्षरत राष्ट्रों में तकनीकि ढांचे का सामान्यतया अभाव है| इसलिए स्वस्थ न्यायिक तंत्र के निर्माण या पुनर्निर्माण में अन्तर्वलित महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दों के अतिरिक्त विकासशील और संघर्षरत राष्ट्रों को न्यायसदन में रिकार्डिंग प्रणाली में सुधारों को प्रभावी बनाने हेतु तकनीकि ढांचे में भी सुधार करने चाहिए| आज अमेरिकी राज्यों सहित नाइजीरिया, बुल्गारिया, कजाखस्तान और थाईलैंड में मशीनीकरण पर भूतकालीन और चालू अनुभव  के आधार पर अध्ययन करने वाले निकाय हैं| मशीनीकृत रिकार्डिंग प्रणाली वाले न्यायसदन स्थापित करने और विकसित करने का ज्ञान रखने  वाले  निकाय दिनों दिन बढ़ रहे हैं| इन अध्ययनों में पश्चिमी विकसित  और विकासशील -दोनों- देशों में कुशल न्यायसदन रिकार्डिंग प्रणालियाँ स्थापित करने में चुनौतियाँ उभरकर सामने आई हैं | इन अध्ययनों में विकासशील राष्ट्रों की न्यायसदन में हाथ से  रिकार्डिंग की प्रणाली से अधिक दक्ष स्वचालित रिकार्डिंग प्रणाली की ओर परिवर्तन में सहायता करने के महत्त्व की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है और इससे होने वाले लाभों की सूची भी दी गयी है|

विकसित, विकासशील और संघर्षरत राष्ट्रों में इस उच्च तकनीकि परिवर्तन में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है जैसे लागत में वृद्धि, सामान्य कानून एवं सिविल कानून में साक्ष्य रिकार्डिंग के भिन्न भिन्न मानक, उपकरणों के उपयोग के लिए प्रारंभिक एवं उतरवर्ती प्रशिक्षण, सुविधाओं का अभाव और मशीनीकरण के कारण बेरोजगारी| उच्च तकनीकि रिकार्डिंग प्रणालियाँ स्थापित करने के लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति के साथ साथ पर्याप्त वितीय संसाधनों की आवश्यकता है| दूसरे राष्ट्र  ऊँची लगत वाली उन्नत रिकार्डिंग मशीनों की लागत वसूली के लिए संघर्ष करते रहते हैं| अमेरिका में मेरीलैंड राज्य में और कजाखिस्तान गणतंत्र में  राजनैतिक इच्छाशक्ति और  वितीय संसाधन दोनों ही विद्यमान थे तथा वहाँ परंपरागत रिकार्डिंग प्रणाली से नई उन्नत तकनीक की ओर  परिवर्तन सफल रहा |
मेरीलैंड के अध्ययन से प्रदर्शित होता है कि नई रिकार्डिंग मशीन प्रणाली लगाने की एकमुश्त लागत प्रतिपूर्ति करने वाले दीर्घकालीन लाभों- वेतन भत्तों में कमी  आदि - को देखते हुए न्यायोचित है| अन्यथा एकमुश्त लागत एक चुनौती ही रहती है| कजाखिस्तान जैसे कई राष्ट्रों ने वितीय चुनौतियों पर विजय पाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से साझेदारी भी की गयी है| दीर्घकालीन लाभों को देखते हुए मुख्य न्यायालयों में उच्च तकनीक वाली रिकार्डिंग प्रणाली लगाया जाना तुलनात्मक रूप में वहनीय हो सकता है| किसी भी सूरत में  समस्त विकासशील या संघर्षरत देशों में राजनैतिक इछाशक्ति, आधारभूत ढांचा और या साझी संस्थाओं के साथ नवीन प्रणाली स्थापित करने के संबंधों का अभाव है| वर्तमान में युद्धजर्जरित लाइबेरिया में न्यायाधीश सुनवाई हेतु  बैठने के लिए स्थान पाना मुश्किल पा रहे हैं| ढांचे विद्युत शक्ति सहित- को स्थिर करना भी एक समस्या है|

वितीय पहलू के अतिरिक्त न्यायालय अपने ऐतिहासिक परम्पराओं के कारण भी एक चुनौती का सामना कर सकते हैं| परंपरागत आपराधिक कानून मौखिक साक्ष्य और मौखिक रिकार्ड को उच्च प्राथमिकता देता है जबकि सिविल न्याय मौखिक रिकार्ड को कम महत्त्व देता है| गवाह न्यायाधीश के सामने साक्ष्य देते हैं (भारत में व्यवहार में न्यायाधीश की अनुपस्थिति में भी साक्ष्य चलता रहता है), और न्यायाधीश इसका सार  रजिस्ट्रार को देता है जोकि इसे टाइप करता है| पक्षकार/साक्षी को समय-समय पर इसे पुष्ट करने के लिए कहा जाता है कि क्या  यह सही है और पक्षकार को जहाँ कहीं वह उचित समझे दुरुस्त कराने के लिए प्रेरित किया जाता है| आडियो वीडियो प्रणाली से अवयस्कों और उन लोगों का भी परीक्षण संभव है जो मुख्य न्यायालय में सुनवाई में उपस्थित नहीं हो सकते हैं|

फ़्रांस में न्यायालय क्लर्क न्यायाधीश और पक्षकारों के मध्य विनिमय किये गए समस्त रिकार्ड का लेखाजोखा रखने के दयित्वधीन है| वहाँ कोई मौखिक रिकार्ड नहीं रखा जाता है |इस प्रकार फ़्रांसिसी सिविल मामलों में मौखिक परीक्षण का रिकार्ड रखने के बजाय परीक्षण कार्यवाही के सार पर बल दिया जाता है | आपरधिक मामलों में फ़्रांस में दृष्टिकोण थोडा भिन्न है| इन मामलों में न्यायाधीश ऑडियो वीडियो रिकार्ड की अपेक्षा कर सकता है | फ़्रांस में आपराधिक मामलों में ऑडियो वीडियो रिकार्डिंग स्वतः नहीं है अपितु न्यायाधीश के विवेक पर है| ऐसी रिकार्डिंग जो स्पष्टतया अनुमोदित नहीं हो मुख्य न्यायाधीश द्वारा 18000 यूरो से अन्यून दंडनीय है| ऐतिहासिक मामलों में ऑडियो वीडियो रिकार्डिंग संग्रहालय में भी संधारित की जाती हैं| उदाहराणार्थ  उक्रेन में मामले  के दोनों अथवा एक पक्षकार द्वारा आवेदन करने या न्यायाधीश द्वारा पहल करने के अतिरिक्त कार्यवाही की रिकार्डिंग नहीं की जाती है| परिणामस्वरूप अधिकांश कार्यवाही पुराने परंपरागत ढंग से स्टेनो, टाइप आदि द्वारा जारी रहती है| सामान्यतया न्यायाधीशों द्वारा भी इस नवीन प्रणाली का प्रतिरोध किया जाता है| जहाँ कहीं भी नए कानूनी प्रावधान मौखिक रिकार्डिंग के पक्ष में हैं न्यायाधीश परिवर्तन का विरोध करते हैं|
भारत में भी सिविल मामलों में यद्यपि गवाह  द्वरा बयान शपथ पत्र द्वारा वर्ष 1999 से ही अनुमत किया जा चुके हैं किन्तु अभी भी गवाहों को बयान के लिए कठघरे में बुलवाने की परमपरा जारी है| मार्क्स ज़िमर के अनुसार सिविल न्यायाधीश ऐसी पारदर्शिता से भयभीत हैं जो  मौखिक परीक्षण रिकार्डिंग से उद्भूत होती हो और वे मामले के पक्षकारों को ऐसी पारदर्शिता से होने वाले  सामाजिक लाभों  को ही विवादित करते हैं| सिविल न्यायाधीश मानते हैं कि पारदर्शिता से अपीलों की संख्या और न्यायाधीशों के विरुद्ध अनाचार के व्यक्तिगत मामले दोनों में वृद्धि होगी| यद्यपि आज तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि ये भय न्यायोचित हैं अथवा निर्मूल हैं| वर्तमान में कजाखस्तानी न्यायाधीश मौखिक साक्ष्यों की रिकार्डिंग की ओर बदलाव कर रहे  हैं| मौखिक साक्ष्यों की रिकार्डिंग की स्वीकार्यता में उनके मानसिक परिवर्तन और शुद्धता, पारदर्शिता, और अन्ततः सुरक्षा जो मौखिक रिकार्ड से न्यायाधीश एवं पक्षकार दोनों को उपलब्ध हो रही है| दक्षिण अफ्रीका में भी साक्ष्यों की ऑडियो रिकार्डिंग पर्याप्त समय से प्रचलन में है और इस उद्देश्य के लिए वहाँ अलग से स्टाफ की नियुक्ति की जाती है जो ऐसी प्रतिलिपि को सुरक्षित रखता है| न्यायालयों में प्रयोज्य उपकरणों के दक्ष उपयोग के लिए प्रारंभिक और लगातार प्रशिक्षण आवश्यक है| प्रत्येक प्रशिक्षण का वातावरण भिन्न होता है और समयांतराल से परिपक्व होता है| कई अफ्रीकी देशों यथा लाइबेरिया में सीमित न्यायिक सुविधाएँ हैं और न्यायालय जीर्णशीर्ण और टूटी फूटी इमारतों में संचालित हैं| इसलिए कानूनी कार्यवाहियाँ प्रायः न्यायाधीशों के कार्यालयों में ही संपन्न होती हैं |

जिन राष्ट्रों में न्यायालयों में काफी ज्यादा स्टाफ है उनमें मशीनीकरण से बेरोजगारी उत्पन्न होने का भय विकसित राष्ट्रों के बजाय ज्यादा है| न्यायालय स्टाफ को नवीन प्रक्रिया के योग्य बनाकर, स्वेच्छिक सेवा निवृति, अन्य विभागों में स्थानांतरण करके अथवा सेवा निवृतियों को ध्यान में रखकर चरणबद्ध मशीनीकरण कर इसका समाधान किया जा सकता है| स्वतंत्रता से पूर्व देशी राज्यों  के मध्य आयात पर जगात (आयात कर) लगता था | स्वंत्रता के उपरांत जगात  समाप्त कर स्टाफ का राज्यों द्वारा विलय कर लिया गया था| इसी प्रकार हाल ही में चुंगी समाप्त कर स्टाफ का समायोजन किया जाना एक अन्य उदाहरण है|  न्यायालयों में सारांशिक कार्यवाही के योग्य सिविल एवं आपरधिक मामलों का दायरा बढाकर भी त्वरित न्याय दिया जा सकता है| वैश्वीकरण के बहाव में कुछ वर्ष पूर्व कम्प्यूटरीकरण, दक्षता एवं लाभप्रदता में वृद्धि के लिए बैंकों और अन्य सार्वजानिक उपक्रमों में स्वेच्छिक सेवा निवृति और निष्कासन योजना को प्रोत्साहन दिया गया था| यद्यपि इस योजना का श्रम संघों द्वारा विरोध किया गया था किन्तु न्यायालयों एवं विधायिका दोनों द्वारा इसे उचित ठहराया गया था| अतः इसे अब न्यायालयों में लागू करने में भी कोई बाधा प्रतीत नहीं होती है|

कजाखिस्तान, बुल्गारिया, बोस्निया, हेर्ज़ेगोविना और अन्य बहुत से राज्यों में मशीनीकरण और आधुनिकीकरण के सकरात्मक परिणाम मिले हैं| इनमें समय की बचत ,पारदर्शिता एवं शुद्धता में वृद्धि, न्याय सदन की उन्नत प्रक्रियाएं, न्यायपालिका में विश्वास में वृद्धि ,अपील प्रक्रिया का अधिक दक्ष उपयोग  आदि प्रमुख हैं| दृश्य श्रव्य (ऑडियो-वीडियो) और उच्च तकनीकि न्यायालय रिकार्डिंग मशीनों से उच्च पारदर्शिता आती है क्योंकि वे सुनवाई का अच्छी तरह से सही और सम्पूर्ण रिकार्ड प्रस्तुत करती हैं| इससे से भी आगे कि परीक्षण न्यायालय का रिकार्ड अपीलीय न्यायालय द्वारा आसानी से अवलोकन किया जा सकता है| अधिकांश मामलों में रिकार्डिंग मशीनों द्वारा तैयार रिकार्ड असंपादित होता है, शब्दशः रिकार्ड जिसकी अपेक्षा करने पर मूल रूप में न्यायाधीश और पक्षकार दोनों द्वारा समीक्षा की जा सके| सही एवं शुद्ध रिकार्ड न्यायालय की प्रक्रिया में सुधार लाते हैं क्योंकि दावे के समस्त पक्षकार और न्यायाधीश सभी जानते हैं कि उनका व्यवहार रिकार्ड पर है |


दृश्य श्रव्य रिकार्डिंग से न्यायिक प्रक्रिया का संरक्षण होता है क्योंकि इससे सभी पक्षकारों  को वास्तविक कार्यवाही के प्रति जिम्मेदार ठहराये जाने के लिए इसे मोनिटरिंग उपकरण के रूप में प्रयोग किया जा सकता है| न्यायिक प्रक्रिया और प्रोटोकोल का सही सही एवं संकलित और पूर्ण चित्र प्रदान करने से यह प्रणाली नागरिकों को अपने अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति शिक्षित करती है जिससे  अंततोगत्वा न्यायसदन में न्यायाधीश और पक्षकार दोनों के निष्पादन में सुधार आता है| यह ज्ञात होने पर कि इसे न्यायाधीश द्वारा विस्तार से देखा जा सकता है पक्षकार अधिक स्पष्ट और सही बयान देंगे| न्यायिक आचरण भी इससे मोनिटर किया जा सकता है और इससे अपील के आधारों की स्पष्टता और प्रमाणिकता बढती है |परिणामतः इससे निर्णय देने और मामला प्रस्तुत करने सम्बंधित प्रोटोकोल और व्यावसायिकता का निर्णयन में सही उपयोग करने को प्रोत्साहन मिलता है| न्यायाधीशों की  समयनिष्ठा एवं अनुशासनबद्धाता के साथ-साथ न्यायिक प्रक्रिया में  दुरभिसंधियों पर भी इससे अंकुश लगता है|

Saturday, 3 September 2011

न्याय विफल हो गया हो तो एक पुनः अन्वीक्षण दोष सिद्धि या दोषमुक्ति या जैसी भी स्थिति हो को अपास्त कर आदेशित की जा सकती है

सुप्रीम कोर्ट ने बाजेश्वर प्रसाद मिश्रा बनाम प. बंगाल राज्य (1965 एआईआर सुको 1887) में कहा है कि संहिता में प्रावधान है कि यदि पहले से हुई अन्वीक्षा असंतोषजनक है या न्याय विफल हो गया हो तो एक पुनः अन्वीक्षण दोष सिद्धि या दोषमुक्ति या जैसी भी स्थिति हो को अपास्त कर आदेशित की जा सकती है। इसी प्रकार संहिता अपील न्यायालय को अतिरिक्त साक्ष्य लेने के लिए सशक्त करती है  जिनको कि वह लेखबद्ध किये जाने वाले कारणों से आवश्यक समझता है। चूंकि अपील न्यायालय को विस्तृत शक्तियां दी गई है अतः न्यायालय का क्षेत्राधिकार सीमा परिस्थितियों की आवश्यकतानुसार होनी चाहिए और अच्छी समझ ही मात्र सुरक्षित दिग्दर्शिका है। अतिरिक्त साक्ष्य कई कारणों से आवश्यक हो सकते हैं जो कि यहां सूचीबद्ध करना मुश्किल से आवश्यक है। अतिरिक्त साक्ष्य इसलिए आवश्यक नहीं होने चाहिये कि इसके बिना निर्णय नहीं सुनाया जा सकता बल्कि इसलिए कि इसके बिना न्याय विफल हो जायेगा। इस शक्ति का प्रयोग यदा-कदा और उपयुक्त मामलों में किया जाना चाहिए। ऐसा आदेश सामान्यतः नहीं किया जाना चाहिए यदि न्याय की आवश्यकताएं अन्यथा ऐसी अपेक्षा नहीं करती हो। यदि अभियोजन को उचित अवसर दिया गया था और उसने उसे प्रयोग नहीं किया।

Friday, 2 September 2011

क्या उम्र कैद फांसी का विकल्प है ?

फांसी की सजा के विषय में हमेशा से ही विवाद बना रहा है| कुछ उदारवादी लोगों का कहना है कि जब जीवन देना मनुष्य के वश में नहीं है तो जीवन लेने का अधिकार भी नहीं है | ऐसी परिस्थितियों में फांसी की सजा या मृत्यु दण्ड का औचित्य नहीं रह जाता है| किन्तु इस विषय का दूसरा पहलू  यह भी है कि  हमारे दण्ड कानून में भी बड़ी उदारता है और मृत्यु दण्ड केवल आपवादिक परिस्थितियों में ही दिया जा सकता है अर्थात मृत्यु दण्ड की सजा देने के लिए न्यायाधीश को पर्याप्त कारण बताने पड़ते हैं कि अमुक प्रकरण में मृत्यु दण्ड ही क्यों दिया जावे| भारतीय कानून में कारावास भुगत रहे व्यक्ति द्वारा जेल के स्टाफ पर प्राण घातक हमला करने पर मात्र फांसी की सजा का ही प्रावधान था किन्तु इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक ठराया जा चुका है| यह प्रावधान तो अंग्रेजों ने अपने हित सुरक्षित करने के लिए किया था|
फांसी की सजा की संवैधानिकता पर भी कई बार प्रश्न उठें हैं किन्तु इसे संवैधानिक ही ठहराया गया| इस प्रकरण का दूसरा चिंताजनक पहलू यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा फांसी की सजा को अंतिम कर दिए जाने के बाद राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर की जा सकती है और दया याचिकाओं को सरकार द्वारा रहस्यमय करणों से  लंबे समय तक विचाराधीन रखा जाता है| इस अवधि में दोष सिद्ध व्यक्ति जीवन और मृत्यु के बीच संघर्षरत और संतप्त रहता है| राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका का अधिकतम 6 माह की अवधि में निपटारा कर दिया जाना चाहिए | अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह रह जाता है कि न्यायालय ने तो ऐसे व्यक्ति को मात्र मृत्यु दण्ड की सजा दी थी किन्तु सरकार और उसके अधिकारियों की अकर्मण्यता के कारण उसने लंबा कारावास अतिरिक्त भुगता है जो कि विधिसम्मत नहीं है | ऐसी स्थिति में इस अतिरिक्त कारावास के लिए जिम्मेदार अधिकारी की पहचान कर उस पर भी उपयुक्त कार्यवाही होनी चाहिए| गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश में मृत्यु दंड से दंडादिष्ट 477 व्यक्ति प्रतीक्षारत हैं जबकि गत 8 वर्षों में मात्र 1 व्यक्ति को ही मृत्यु दंड से वास्तव में दण्डित किया गया है|ऐसी स्थिति में मृत्यु दंड दिया जाना अपने आप में  एक पहेली मात्र है| 

हमारे विधानमंडलों द्वारा समय समय पर भावुकतावश  एवं सस्ती लोकप्रियता के लिए सर्वसम्मति से अनुचित निर्णय लिया जाना कोई आश्चर्यजनक बात  नहीं है| मैंने विदेशी कानूनों एवं विदेशी विधायिकाओं के कृत्यों का भी अध्यन किया है| दुर्भाग्य से हमारे राजनैतिक चिंतन में गंभीरता का अभाव है और यहाँ वोट बैंक की राजनीति का स्थान राष्ट्रीय हित से ऊपर रहता है| पूर्व प्रधान मंत्री श्री अटल  बिहारी वाजपेयी ने पायोनियर को दिए गए एक साक्षात्कार में भी कहा था कि  विधायी कार्य को जिस सीमा तक सक्षमता या प्रतिबद्धता से करना चाहिए  न तो संसद, न ही राज्य विधान सभाएं कर रहीं है। उनके अनुसार, कुछ अपवादों को छोड़कर जो लोग इन लोकतांत्रिक  संस्थानों के लिए चुने जाते है, वे औपचारिक या अनौपचारिक रूप से विधि-निर्माण में न तो प्रशिक्षित हैं और न ही अपने पेशे में सक्षमता और आवश्यक ज्ञान का विकास करने में प्रवृत प्रतीत होते हैं। समाज के वे लोग जो मतदाताओं की सेवा में सामान्यतः रूचि रखते हैं और विधायी कार्य कर रहे हैं, आज की मतदान प्रणाली में सफलता प्राप्त करना कठिन पाते हैं और मतदान प्रणाली धन-बल, भुज-बल और जाति व समुदाय आधारित वोट बैंक द्वारा लगभग विध्वंस की जा चुकी है। श्री वाजपेयी के अनुसार शासन के ढांचे में भ्रष्टाचार ने लोकतंत्र के सार-मताधिकार- को ही जंग लगा दिया है ।
 तमिलनाडु विधान सभा द्वारा पारित प्रस्ताव को भी इसी श्रेणी में माना जा सकता है| कुछ समय पूर्व पंजाब विधान सभा द्वारा सर्वसम्मति से अन्य राज्यों को पानी नहीं देने का प्रस्ताव पारित किया गया था| किन्तु एक तरफ पंजाब का पडौसी राजस्थान जैसा राज्य है जहाँ पीने के पानी का संकट है और दूसरी ओर  पंजाब अपनी खेती के लिए सारा पानी उपयोग करना चाहता है| संविधान के अनुसार भी  जल राष्ट्रीय सम्पदा है| मात्र संवैधानिक ही नहीं मानवीय दृष्टिकोण से भी किसी को पेय जल से वंचित करना न्यायोचित नहीं है |


समाज में स्थिरता बनाये रखने के लिए सजा दिया जाना भी आवश्यक है अन्यथा दण्ड के भय बिना सामाजिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जायेगी और अराजकता अपने पांव पसार लेगी|यदि बड़ा दण्ड किसी को दिया ही न जाये तो छोटे अपराधी भी गंभीर अपराध करने को प्रवृत और लालायित हो सकते हैं| इसी प्रकार गंभीर और खूंखार अपराधियों जिनमें सुधार की संभावनाएं नगण्य हैं को मृत्यु दण्ड दिया जाना उचित ही है | मृत्यु दण्ड सबसे बड़ा दण्ड है अतः समान रूप से यह भी आवश्यक है कि गंभीर अपराधियों को बड़ा दण्ड दिया जाये चाहे वह किसी भी धर्म, जाति, संप्रदाय या स्थान का निवासी हो  अन्यथा छोटे और बड़े अपराधी दोनों को यदि समान दण्ड दिया जाता है तो यह कानून के समक्ष समानता और अनुच्छेद 14 का सपष्ट उल्लंघन होगा |

Thursday, 1 September 2011

अभियोजन द्वारा विलम्ब और न्यायालय द्वारा दोष मुक्ति

सुप्रीम कोर्ट ने मोहम्मद सफी बनाम बंगाल राज्य (1966 एआईआर 69) में कहा है कि जब एक व्यक्ति ने कुछ ऐसा किया है जो कानून द्वारा दण्डनीय है वह अन्वीक्षण का सामना करने के लिए दायी है और दायित्व महज इसलिए समाप्त नहीं हो जाता कि न्यायालय के समक्ष अन्वीक्षण हेतु प्रस्तुत किया गया उसका विचार है कि उसे आरोपित अपराधी के लिए अन्वीक्षण करने या अपराध का प्रसंज्ञान लेने के लिए कोई क्षेत्राधिकार नहीं है। इसलिए जहां एक न्यायालय चाहे एक गलती से कहे, कि उसे अपराध से दोषमुक्त करने का कोई अधिकार नहीं है। वास्तव में दोष मुक्ति का आदेश शून्य है।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने रामजीलाल बेसीवाल बनाम राजस्थान राज्य ( 1996 क्रि.ला.री. 371) में कहा है कि मैं इस बात पर गंभीर चिन्ता प्रकट करना चाहूंगा कि जिस प्रकार से अधिनस्थ न्यायालयों द्वारा यहां तक कि गंभीर आरोपों के मामले में भी आपराधिक अन्वीक्षा को लिया जा रहा है प्रायः देखा गया है कि अभियोजन एजेन्सी त्वरित अन्वीक्षण के लिए गंभीर नहीं है तथा अभियोजन द्वारा उन साक्ष्यों को परीक्षण एवं प्रस्तुत करने हेतु उचित प्रयास नहीं किये जाते हैं तथा अधिकांश विलम्ब इनकी ओर से ही होता है। यदि अभियोजन एजेन्सी सतर्कता रखे और बिना विलम्ब के अभियोजन साक्ष्यों की परीक्षा करे या अनावश्यक स्थगन नहीं मांगे जाये तो अन्वीक्षण में देरी के लिए मुश्किल से ही कोई आधार होगा। यह भी देखा गया है कि अन्वीक्षण न्यायालय कहने मात्र से स्थगन देने में अत्यधिक उदार हैं और उनके द्वारा साक्ष्यों की उपस्थिति प्राप्त करने के लिए सख्त और सकारात्मक कदम नहीं उठाये जाते हैं। मामलों में बिना गंभीर आरोपों पर ध्यान दिये दयनीय रूप से स्थगन दिये जाते हैं। यदि हम समाज के प्रति न्याय करना चाहते है तो ऐसी परम्परा को जितना जल्दी रोक दिया जाये अच्छा है।

Wednesday, 31 August 2011

निश्चित तरीके से भिन्न ढंग से कार्य मना है

सुप्रीम कोर्ट ने चर्चित प्रकरण ए.आर. अन्तुले बनाम रामदास श्री निवास नायक (1984 एआईआर 718) में कहा है कि यह एक जग जाहिर सिद्धान्त है जिस पर कि अपराध नीति लागू की गई है अर्थात् कानून द्वारा तत्समय दण्डनीय बनाया गया कृत्य या अकृत्य मात्र जो व्यक्ति हानि सहन करता है के संदर्भ में ही अपराध नहीं है बल्कि समूचे समाज के विरूद्ध अपराध है। हमारे विचार में ये कोई जबाब नहीं है कि न्यायालय के ध्यान में ऐसा कोई मामला नहीं आया जिसमें गत बतीस वर्षों में 1947 के (भ्रष्टाचार निवारण )   अधिनियम के अधीन विशेष न्यायाधीश ने अपराध पर प्रसंज्ञान लिया हो। यदि भूतकाल में घटित न होना ही मात्र एक दिग्दर्शिका हो और भविष्य के लिए मनाही हो तो कानून स्थिर हो जायेगा और धीरे-धीरे दूर भाग जायेगा। दं.प्र.सं. की योजना स्पष्ट प्रकट करती है कि जो कोई अपराध की सूचना देना चाहता  वह मजिस्ट्रेट या थाना प्रभारी तक जा सकता है। यदि न्यायालय प्रक्रिया पूर्व सावधानी बरतते हुए परिवादी के समस्त गवाहों की परीक्षा पर बल देगा तो यह परिणाम विपरीत होगा जिससे त्वरित अन्वीक्षण का उद्देश्य विफल होगा। इसी प्रकार जब तक आदेशिका जारी नहीं की जाती है तब तक अपराधी तस्वीर में ही नहीं आता। वह भौतिकतः उपस्थित हो सकता है किन्तु कार्यवाही में भाग नहीं ले सकता। यह कहा गया है कि गंभीर अपराध मात्र सत्र न्यायालय द्वारा अन्वीक्षणीय है। जहां कानून एक कार्य करने के लिए निश्चित तरीके से करने की अपेक्षा करता है वह उसी प्रकार किया जाना चाहिये अन्यथा बिल्कुल नहीं। निष्पादन के अन्य तरीके आवश्यक रूप से निषिद्ध हैं।

Tuesday, 30 August 2011

न्यायाधीशों द्वारा अवमान

सुप्रीम कोर्ट ने अवमान के सम्बन्ध में ब्रेड कान्ता बनाम उड़ीसा उच्च न्यायालय (एआईआर 1974 सु.को.710) में कहा है कि एक न्यायाधीश ऐसा कार्य करते समय अपनी भाव भंगिमा से न्याय प्रशासन को दूषित कर सकता है।
हरिशचन्द्र बनाम अली अहमद (1987 क्रि.ला.रि.ज. 320 पटना ) में  कहा है कि एक न्यायाधीश जिसमें वह अध्यक्ष पीठासीन है उस न्यायालय  का अवमान कर सकता है।
बी.एन.चौधरी बनाम एस.एस.सिंह (1967 क्रि.ला.रि.ज. पटना 1141) में  कहा है कि मजिस्ट्रेट को अपने भारी दायित्व के प्रति सचेत रहना चाहिए तथा विवाद्यकों के हित के विपरीत कार्य नहीं करना चाहिये।
बरेली बनाम जम्बेरी (1988 क्रि.ल स.रि.ज.90) में कहा गया है कि यदि अधीनस्थ न्यायालय का एक पीठासीन अधिकारी न्यायालय के अवमान का दोषी है तो अधिनियम की धारा 15 के अन्तर्गत संदर्भ का प्रावधान लागू नहीं हो सकता।

Monday, 29 August 2011

जांच आयोग व जनहित याचिकाएं

सुप्रीम कोर्ट ने संजीव कुमार बनाम हरियाणा राज्य के निर्णय दिनांक 25.11.03 में स्पष्ट किया है कि हम महसूस करते है कि इस प्रकार के मामले में जांच करने में भारत के आयोग अधिक उपयुक्त हैं जिनका उद्देश्य सत्य का पता लगाना है जिससे भविष्य के लिए सबक सीख सकें तथा नीतियां इस प्रकार तैयार करे या विधायन करे कि उन कमियों की पुनरावृति न हो। इस प्रकार के आयोग दोषी को दण्ड देने के उद्देश्य की पूर्ति के लिए उपयुक्त नहीं है।
राजीव रंजन सिंह ललन बनाम भारत संघ के निर्णय दिनांक 21.08.06 में कहा है कि न्यायालय के लिए प्रार्थी की शिकायत की विषय वस्तु को देखे बिना उसके हित को देखना गलत है। यदि याची सार्वजनिक कर्तव्य की विफलता दर्शाता है तो उसकी लोकहित याचिका को निरस्त करने में न्यायालय गलत है। इस न्यायालय की खण्डपीठ ने न केवल सी.बी.आई. को नौकरशाहों के विरुद्ध जांच का निर्देश दिया है बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा परियोजना के लिए दिये गये 17 करोड़ रूपये का पता लगाने के लिए भी कहा है। विभाग को सहयोग से काम करना होता है। यदि सदस्यों के लिए मुद्दों को समझना कठिन था तो एक व्यक्ति यह समझने में असमर्थ है कि ट्रिब्यूनल द्वारा विभाग के उच्चाधिकारियों को दण्डित क्यों किया गया। एक संतोषजनक न्यायिक निकाय मुख्य रूप से निचले स्तर के न्यायालयों के कार्य करने पर निर्भर करता है।

Sunday, 28 August 2011

अभियोजन स्वीकृति एवं वास्तविक न्याय

सुप्रीम कोर्ट ने बशीर उल हक बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1953 एआईआर 293) में कहा है कि एक ही संव्यवहार में दो अलग-अलग अपराध हुए हैं, एक धारा 409 के अन्तर्गत दुर्विनियोग का अपराध है और दूसरा धारा 477ए के अन्तर्गत जिसके लिए राज्यपाल की स्वीकृति आवश्यक है। इसमें बाद के अपराध का प्रसंज्ञान नहीं लिया जा सकता। यह अपीलार्थी की अन्वीक्षा के लिए कोई अवरोध नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रसिद्ध प्रकरण अब्दुल रहमान अंतुले बनाम आर.एस. नायक (1992 एआईआर एस सी 1701) में स्पष्ट किया है कि अन्वीक्षण के अधिकार से मनाही की आपति तथा उपचार के लिए पहले उच्च न्यायालय ऐसे अभिवचन को व्यवहृत करता है तो भी सिवाय गंभीर मामलों तथा आपवादिक प्रकृति में सामान्यतया कार्यवाही नहीं रोकी जानी चाहिए । उच्च न्यायालय में ऐसी कार्यवाही प्राथमिकता के आधार पर निपटायी जानी चाहिये। यह सही है कि यह राज्य का कर्तव्य है कि वह त्वरित अन्वीक्षण सुनिश्चित करे और राज्य में न्यायपालिका शामिल है किन्तु बजाय पाण्डित्यपूर्ण के वास्तविक तथा व्यावहरिक विचारधारा इस प्रकार के मामलों में अपनायी जानी चाहिए ।

Saturday, 27 August 2011

व्यक्तिगत उपस्थिति

सुप्रीम कोर्ट ने गोरी शंकर स्वामीगलू बनाम कर्नाटक राज्य के निर्णय दिनांक 05.03.08 में कहा है कि हम यह समझने में असमर्थ हैं कि सुनवाई के प्रत्येक दिन अपीलार्थी की उपस्थिति पर क्यों जोर दिया गया और उसकी अनुपस्थिति पर प्रतिकूल टिप्पणियां की गई। एक विघ्नकारी तथ्य जो कि उच्च न्यायालय के समक्ष हुआ इस पर इस चरण पर ध्यान दिया जा सकता है। यद्यपि अपीलार्थी पर जघन्य अपराध करने का आरोप है। न्यायालय द्वारा वरिष्ठ स्वामी जी व अपीलार्थी के मध्य उपजे सिविल विवाद को हल करने का प्रयास किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने जमुना चौधरी बनाम बिहार राज्य (1974(3) एससीसी 774) में कहा है कि अनुसंधान अधिकारी का कर्तव्य मात्र अभियोजन का ऐसा मामला तैयार करना नहीं है जिससे कि न्यायालय दोषसिद्धि दर्ज कर सके अपितु वास्तविक और बिना लीपापोती के सत्य को समक्ष लाना है।

Friday, 26 August 2011

अभियुक्त को दस्तावेज निशुल्क दिए जाने चाहिए

राजस्थान उच्च न्यायालय ने रामनाथ बनाम राजस्थान राज्य (1989 क्रि.ला.रि. राज0 785) में कहा है कि डूप्लीकेट कैसेट देने से मनाही का तर्क ठीक प्रतीत नहीं होता। न्यायालय मे कैसेट चलाकर सुनना बचाव पक्ष तैयार करने के लिए वांछित सुविधा नहीं देगा। दं.प्र.सं. की धारा 207 में विशिष्ट उल्लेख है कि पुलिस द्वारा रिपोर्ट और अन्य प्रलेख अभियुक्त को बिना देरी के तथा निःशुल्क दिये जायेंगे। जब अभियुक्त से इन प्रलेखों का कोई शुल्क नहीं लिया जा सकता और प्रलेखों में बोला गया प्रलेख शामिल है तब कैसेट अभियुक्त को निःशुल्क दी जानी चाहिये। उसे अपने खर्च पर यह तैयार करवाने का कहना न्यायोचित नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य बनाम एस जे चौधरी (1996 क्रि.ला.रि. सु.को. 286)  में कहा है कि वर्तमान मामले में हस्तलिपि में धारा 45 में टाईपलिपि भी शामिल है। हम यह जोड़ते हैं कि टेलीग्राफ शब्द में टेलीफोन भी शामिल है जबकि 1863 के अधिनियम में जबकि टेलीफोन का आविष्कार नहीं हुआ था। 1872 के अधिनियम में हस्तलिपि में इसे हम वर्तमान मामले में टाईपलिपि पढेंगे ऐसा इसलिए है कि लगभग एक शताब्दी पूर्व अधिनियम में हस्तलिपि में टाईपलिपि शामिल है क्योंकि हाथ से लिखने के बजाय टाईप से लिखना सामान्य हो गया है और यह परिवर्तन टाईपराईटरों ने और जब अधिनियम 1872 में लागू हुआ था उसके बाद सामान्य प्रचलन होने से है। यह एक अतिरिक्त हमारे लिए कारण है कि टाईपराईटर विशेषज्ञ की राय धारा 45 के परिपेक्ष्य में स्वीकार्य है।

Thursday, 25 August 2011

औपचारिकताएं अभियोजन में बाधक नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने धर्मेश उर्फ नानू नितिन भाई शाह बनाम गुजरात राज्य के निर्णय दिनांक 01.08.02 में कहा है कि यदि हमने इस तर्क पर विचार कर भी लिया तो याची को कोई सारभूत लाभ नहीं मिलेगा। यह मानते हुए याची अपने तर्क में ठीक है अधिकतम यही हो सकता है कि मामला मजिस्ट्रेट के पास अभियोजन द्वारा स्वीकृत आदेश फाईल किये जाने के पश्चात कमीटल की नई प्रक्रिया द्वारा गुजरेगा। फिर भी मामला पुनः सत्र न्यायालय के पास आयेगा। इस औपचारिकता के साथ अनुपालना याची को बिना किसी लाभ के अन्वीक्षण में देरी के रूप में परिणित होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य बनाम डी.ए.एम. प्रभू के निर्णय दिनांक 11.02.2009 में कहा है कि अकेली कम्पनी का अभियोजन किया जा सकता है, प्रभारी अधिकारी मात्र का अभियोजन किया जा सकता है। मिलीभगत वाले अधिकारी का व्यक्तिशः अभियोजन किया जा सकता है। एक कुछ या सभी का अभियोजन किया जा सकता है। यह कोई कानूनी विवशता नहीं है कि प्रभारी अधिकारी या कम्पनी का अधिकारी अभियोजित नहीं होगा जब तक की कम्पनी के साथ उसे जोड़ा नहीं जाय।

Tuesday, 23 August 2011

अवमान में अधिकारी का नाम नहीं होने पर भी दण्डित किया जा सकता है

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सावित्री देवी बनाम सिविल जज (एआईआर 2003 इलाहा 321) में कहा है कि अवमान कार्यवाही में अर्द्ध आपराधिक प्रकृति के कारण प्रमाण का स्तर तथा भार आपराधिक कार्यवाही के समान है। यह सुनिश्चित है कि एक सह-हिस्सेदार अपना हिस्सा अंतरण/भारित कर सकता है किन्तु यदि सम्पति का नाप तौल कर विभाजन नहीं किया तो अन्तरिती को कब्जा नहीं दिया जा सकता। इसलिए अंतरिती के लिए यदि विभाजन नहीं होता है तो कब्जा लेने की अनुमति नहीं है। यहां तक की निगम निकाय संस्थायें जैसे कि नगरपालिका/सरकार को भी दण्डित किया जा सकता है चाहे पक्षकार के रूप में किसी अधिकारी का नाम न हो।
सुप्रीम कोर्ट ने डॉ0 डी.सी. सक्सेना (एआईआर 1996 सु0को0 2481) में कहा है कि वकील या पक्षकार जो कि व्यक्तिशः उपस्थित होता है अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता दी गई है किन्तु जैसा कि ऊपर कहा गया है उनका समान रूप से यह कर्तव्य है कि वे न्यायालय कार्यवाही में गरिमा, अनुशासन तथा व्यवस्था बनाये रखेंगें। मुक्त अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ किसी भी संस्था पर निराधार आरोप लगाने से नहीं है। तद्नुसार न्यायधीशों को निष्पक्ष बने रहना चाहिये और लोगों द्वारा उनका निष्पक्ष होना जाना चाहिये। यदि उन पर अपवित्र उद्देश्य से पनपती भ्रष्टता एवं भेदभाव आदि का आरोप लगाया जाये तो लोग उनमें विश्वास खो देंगे।

Monday, 22 August 2011

न्यायिक अवमानना

सुप्रीम कोर्ट ने सेबास्टेन एम. हंगरी बनाम भारत संघ (क्रि.ला.रि. १९८४ सुको 237) में कहा है कि ऐसे तथ्य जो रिकॉर्ड पर हों उन्हें तोड़मोड़कर न्यायालय में प्रस्तुत कर न्यायालय को गुमराह करके बन्दी प्रत्यक्षीकरण याचिका की जानबूझकर स्वैच्छा से अवज्ञा की गयी है। इस प्रकार स्थापित है कि प्रतिपक्षी सं0 12 और 4 ने रिट की स्वेच्छा से अवज्ञा कर सिविल अवमान किया है। इस प्रकार के मामलों में जैसा कि अनुमत है उदाहरणात्मक क्षतिपूर्ति स्वरूप प्रतिपक्षी सं0 12 उपरोक्त दोनों औरतों प्रत्येक को 1 लाख रूपये आज से 4 सप्ताह के भीतर देंगे।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने कर्णसिंह बनाम राज्य (1986 क्रि.ला.रि. राज0 31) में कहा है कि मुझे यह प्रतीत होता है कि धारा 344 द.प्र.सं.) वे जो कि झूठा साक्ष्य गढकर झूठी गवाही देते हैं के आरोपियों को दण्ड देने तथा अन्वीक्षा के लिए एक अतिरिक्त विधि प्रदान करती है। यह  प्रावधान विवेकाधीन है और जहां न्यायालय का विचार है कि कोई जटिल प्रश्न उपस्थित हो सकते हैं, या कृत्य के लिए अन्यथा गंभीर दण्ड दिया जाना चाहिए या जहां कार्यवाही समीचीन समझी जाती है कि अन्वीक्षण के अंतिम आदेश के निर्णय के चरण तक पहुँचने से पहले संहिता के सामान्य प्रावधानों के तहत कार्यवाही के लिए न्यायालय निर्देश दे सकता है। मजिस्ट्रेट ने धारा 218 भा.द.सं. के अन्तर्गत स्वयं ने प्रसंज्ञान नहीं लिया है और दं.प्र.सं. की धारा 344 का प्रश्न नहीं उठता है। मजिस्ट्रेट परिवाद फाईल करने का निर्देश देने के लिए कानूनतः सक्षम है और कथित आदेश किसी क्षेत्राधिकार या कानूनन सक्षमता की चूक से ग्रसित नहीं है।

Sunday, 21 August 2011

राजनैतिक हथियारों का सृजन


 जब दिल्ली पूर्णतया संघ शासित प्रदेश था तब दिल्ली पुलिस अधिनियम के अंतर्गत दिल्ली प्रदेश में कानून व्यवस्था की देखभाल के लिए दिल्ली पुलिस का गठन किया गया था| इसी अधिनियम के अंतर्गत विशेष पुलिस संगठन के तौर पर केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो की स्थापना की गयी| हमारी केन्द्रीय सरकार के सामने जब जब किसी राज्य में कानून व्यवस्था की बिगडती स्थित का प्रश्न उठाया जाता है तो वह सामान्यतया यह कहकर दायित्वमुक्त होना चाहती है कि कानून व्यवस्था राज्य सरकार का विषय है| इससे स्वयं  केंद्र सरकार के अधीन कार्यरत केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो की संवैधानिकता एवं वैधता पर प्रश्न चिन्ह लगता है| राज्य सरकार के अनुरोध पर केंद्र सरकार केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो से जांच का निर्देश दे सकती है | किन्तु राजनैतिक शिकार के लिए केन्द्र सरकार केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो का भरपूर उपयोग करती है और राज्य सरकारों के इस अधिकार क्षेत्र में  अतिक्रमण करती रहती है| अभी हाल ही में योगी बालकृष्ण द्वारा फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट लेने के मामले में केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो द्वारा जांच ऐसा ही एक उदहारण है| निश्चित रूप से इस मामले में कोई  बड़ा  राष्ट्रीय हित संलिप्त नहीं है जिसके लिए ऐसी विशेषज्ञ एजेंसी की सेवाएँ लेकर सार्वजनिक धन, समय और सीमित संसाधनों एवं ऊर्जा का अपव्यय किया जाये| इसे राज्य पुलिस भी देख सकती है| दूसरी ओर करोड़ों रुपये के जनता द्वारा सूचित किये गए विभिन्न घोटालों को केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो या तो स्वयं राज्य पुलिस को भेज देता है अथवा विभागीय जांच हेतु स्वयं चोर को ही कोतवाली सौंपकर अपने दायित्व की इतिश्री कर लेता है| केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो केंद्र में सतासीन राजनेतिक पार्टी के हाथों की कठपुतली और जनता के लिए एक अनियंत्रित घोड़े के समान है| लोकत्तंत्र में सभी निकाय जनता के लिए बनाये जाते हैं किन्तु केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो किसी संवैधानिक न्यायलय या केंद्र सरकार के आदेश पर ही मामला दर्ज करता है| केंद्र सरकार अपने राजनेतिक समीकरणों के आधार पर ही जांच का आदेश देते है|

जहाँ राज्य पुलिस द्वारा दर्ज मामलों में दोषसिद्धियाँ मात्र १.५% आती हैं वहीँ केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो का यह प्रतिशत ७० के लगभग है| विचारणीय प्रश्न यह है कि जब इन्हीं कानूनों के अंतर्गत केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो द्वारा ७०% दोष सिद्धियाँ करवाई जा सकती हैं तो फिर राज्य पुलिस इतने कम परिणामों में ही संतोष क्यों कर लेती है| एक अन्य दुखद पहलू यह भी है कि केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो द्वारा दर्ज कुल ८१५ मामलों में से मात्र १८६ ही सरकारी आदेशों से दर्ज हुए हैं शेष ६२९ (७७%) संवैधानिक न्यायलयों के आदेशों पर ही दर्ज हुए हैं | निष्कर्ष यह है कि केंदीय अन्वेषण ब्यूरो एक जन निकाय की तरह कार्य नहीं कर रहा है बल्कि उसे गतिमान करने के लिए तथाकथित सक्षम न्यायालय या सरकार का आदेश चाहिए जोकि आम नागरिक सामान्यतया  प्राप्त  नहीं कर पाता है| हमारे देश में शक्तिसंपन्न लोगों  द्वारा कानून का मनमाना और अपने लिए अनुकूल  अर्थ  लगाया जाता है| दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा २ (ज) में कहा गया है कि अन्वेषण के अंतर्गत वे सब कार्यवाहियां हैं जो इस संहिता के अधीन पुलिस अधिकारी द्वारा या (मजिस्ट्रेट से भिन्न) किसी भी ऐसे व्यक्ति द्वारा जो मजिस्ट्रेट द्वारा इस निमित अधिकृत किया गया है, साक्ष्य एकत्र करने के लिए की जाए| अर्थात मजिस्ट्रेट किसी भी व्यक्ति को अन्वेषण के लिए आदिष्ट कर  सकता है तो फिर केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो इसका अपवाद कैसे हो सकता है| इस धारा के अनुसार हमारी विधायिका का यह अभिप्राय रहा  है कि मजिस्ट्रेट द्वारा भी विशेषज्ञ एजेंसी (केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो) को उपयुक्त मामले में अन्वेषण के लिए आदेश दिया जा सकता है| किन्तु व्यवहार में स्थिति भिन्न है और हमारे संवैधानिक न्यायलय इसे मात्र अपने लिए सुरक्षित एकाधिकार समझते हैं| रुपये ३००० प्रतिमाह कमाने वाले आम नागरिक के लिए उच्च न्यायलय या उच्चतम न्यायालय पहुँचना संभव नहीं है क्योंकि उसके लिए भारी धन की आवश्यकता है और व्यक्तिशः उपस्थित होने वाले याचिगणों को न्यायालयों द्वारा कोई महत्त्व नहीं दिया जाता है और उन्हें अप्रसन्नता की दृष्टि से देखा जाता है| आम नागरिक यदि न्यायालय के सामने किसी कानून की व्याख्या प्रस्तुत करे तो उसे सहर्ष ग्रहण करने स्थान पर न्यायाधीश उसे अपनी विद्वता को चुनौती समझाते हैं| उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट पर उपलब्ध सूचना के विश्लेषण से ज्ञात होता है कि (अपराधियों को छोड़कर) व्यक्तिशः प्रस्तुत होने वाली याचिकाओं को लगभग प्राथमिक स्तर पर ही ख़ारिज कर औपचारिक निपटान कर दिया जाता है| न्यायधीशों के ऐसे कृत्यों का विरोध करने वाले अधर्मियों को भयभीत किया जाता है और उन पर खर्चे लगाने का भय दिखाकर याचिका ही वापस करवा दी जाती है| उच्चतम न्यायालय में वैसे भी प्रभावी लोगों और घोटालों से सम्बंधित मामलों का बाहुल्य है जिसके चलते आम नागरिक या जनहित के मामलों की सुनवाई के लिए जल्दी बारी ही नहीं आती है| स्पष्ट है कि केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो एक सार्वजानिक एजेंसी कम है और  राजनैतिक हथियार के तौर पर अच्छा कार्य कर रही है |


संक्षेप में यह कटु सत्य है कि द्रौपदी रूपी लोकतंत्र का चीर हरण में लोकतंत्र का कोई भी स्तंभ पीछे नहीं है और सभी शक्ति संपन्न  निरीह जनता का रक्तपान करने को आतुर हैं| इस स्थिति से छुटकारा पाने के लिए आमूलचूल परिवर्तन आवश्यक हैं मात्र कुछ तुष्टिकारक सुधारों से कोई अभिप्राय सिद्ध नहीं होगा | वर्तमान में तो  सरकार द्वारा सृजित होने वाला प्रत्येक नया पद भी मात्र भ्रष्टाचार और जन यातना का एक नया केंद्र साबित हो रहा है |

Saturday, 20 August 2011

सूचना कानून की गुत्थियां

केन्द्रीय सूचना आयोग के अनुसार वर्ष २००७-८ से लेकर २०१०-११ तक केंद्रीय सूचना अधिकारियों को १८३२१८१ सूचनार्थ आवेदन किये गए जिनमें से १७३३६२० प्रकरणों में सूचनाएँ प्रदान की गयीं अर्थात ९८५६१ प्रकरणों में सूचनाएँ नहीं दी गयीं| दुर्भावनापूर्वक सूचना देने से मना करने, बिना उचित कारण के विलम्ब करने, आवेदन स्वीकार करने से मना करने या भ्रामक या असत्य सूचना देने पर  केन्द्रीय सूचना आयोग को अधिकतम रूपये २५०००/ अर्थदंड लगाने का अधिकार है| स्मरण रहे कि सम्पूर्ण सूचना का अधिकार अधिनियम में कहीं भी विवेकाधिकार शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है| यदि विधायिका आयोग को विवेकाधिकार देना चाहती तो वह ऐसा स्पष्टतया कर सकती थी किन्तु विधायिका का ऐसा कोई अभिप्राय नहीं रहा है| किन्तु फिर भी  आयोग द्वारा अर्थदंड नहीं लगाया जा रहा है| यद्यपि जो आंकडे आयोग ने सूचना प्रदान करने के दिए हैं वे तो सूचना अधिकारियों के अनुसार हैं, दी गयी सूचना कितनी संतोषजनक अथवा उद्देश्यपरक है यह तो आवेदक ही अच्छी तरह बता सकते हैं |

इसी अवधि में आवेदकों से रुपये २२१५६३६३ की राशि वसूली गयी जबकि दोषी सूचना अधिकारियों से मात्र रुपये ४४२३२२१ अर्थदंड के रूप में वसूली गयी है| यदि यह माना जाय कि औसतन प्रति सूचना अधिकारी अधिकतम राशि वसूली गयी है तो यह प्रकट होता है कि सूचना हेतु मना करने वाले ९८५६१ में से मात्र १७७ अधिकारियों को ही दण्डित किया गया है और शेष दोषी अधिकारियों को आयोग द्वारा अभयदान दे दिया गया है| यह स्थिति आयोग की प्रासंगिकता, निष्पक्षता और उपादेयता पर प्रश्नचिन्ह लगाती है| इसके अतिरिक्त आयोग में ऐसे भी प्रकरण हैं जिनमें अर्थदंड आदेश पारित कर दिए गए हैं किन्तु उनकी न तो पत्रावलियां आयोग में  उपलब्ध हैं और न ही उनमें वसूली की कोई  कार्यवाही प्रस्तावित है| आयोग के उक्त चरित्र से परिलक्षित होता है कि वह  सूचना कानून की धार को भोंथरा बनाने में पूर्ण ऊर्जा से संलग्न है| आयोग में बढ़ते प्रकरणों के मूल में यही कारण है |

Friday, 19 August 2011

अवमान में व्यक्तिगत शिकायत भी हो सकती है

सुप्रीम कोर्ट ने पी.एन.दूबे बनाम पी. शिवशंकर (एआईआर 1988 एस सी 1208) में स्पष्ट किया है कि न्यायालय द्वारा स्पष्ट रूप से स्वप्रेरणा से (अवमान का) प्रसंज्ञान लिया जा सकता है किन्तु आम जनता को भी न्यायालय जाने का अधिकार है। न्यायालय के ध्यान में लाने का अधिकार अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल की सहमति पर निर्भर है और यदि ऐसी सहमति बिना कारण के धारा 15 के अन्तर्गत अधिकार के रोक ली जाती तो वह व्यक्ति के न्यायालय में आवेदन पर अनुसंधान की जा सकती है।