Thursday, 18 August 2011

झूठा आरोप

डॉ0 एस दत बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1996 एआईआर 523) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि शब्द भ्रष्टतापूर्वक बेइमानी या छलपूर्वक का समानार्थी न होकर विस्तृत है। उनके अनुसार यदि आचरण छलपूर्वक या बेईमानी पूर्वक न हो और यदि यह अन्यथा दोषारोपण योग्य हो या अनुचित हो तो भी शामिल है। यह देखा गया है कि डॉ0 दत का कार्य दण्ड संहिता की धारा 192 तथा 196 द्वारा आच्छादित है। यदि डॉक्टर ने न्यायालय में झूठी गवाही दी या उसने झूठी गवाही बनायी तो यह स्पष्ट रूप से धारा 193 का अपराध है। यदि उसने झूठी गवाही काम में ली तो धारा 196 का अपराध किया गया। इन अपराधों के विषय में संज्ञान लिया  जाने से पूर्व ( धारा १९५ दण्ड प्र स के अनुसार ) सत्र न्यायाधीश  द्वारा लिखित शिकायत होना आवश्यक है।
बम्बई उच्च न्यायालय ने पेपा बालाराव देसाई (एआईआर 1926 बम्बई 284) में स्पष्ट किया है कि हमारे निर्णयन में प्रार्थी का कथन जहां तक कि वह धारा 211( मिथ्या दोषरोपण) से सम्बन्ध रखता है ठीक है और इस पर जिला मजिस्ट्रेट द्वारा झूठा आरोप लगाने की शिकायत दर्ज करवाना जब तक वह कानून के अनुसार शिकायत की जांच नही कर ले जिसकी प्रार्थी ने शिकायत की है, खुला नहीं है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रघुनाथसिंह बनाम राज्य (एआईआर 1950 इला0 471) मे स्पष्ट किया है कि आरोपित व्यक्ति इस बात के लिए स्वतन्त्र नहीं है कि उसने कथित अपराध दूसरे व्यक्ति के उकसाने पर किया।

Wednesday, 17 August 2011

पुलिसवाले अपने आप में कानून नहीं हैं

दिल्ली उच्च न्यायालय ने एफ.डी. लारकिन्स बनाम राज्य (1984 (2) क्राईम्स 734) में कहा है कि सारांश  रूप में परिवादी या उसके साक्षियों की धारा 200 या 202 के अन्तर्गत परीक्षा किये बिना सत्र न्यायाधीश को मामला कमिट करने में कोई तात्विक अनियमितता या कानूनी कमजोरी से ग्रसित नहीं है। दूसरे शब्दों में वर्तमान प्रकरण में कमिटमेन्ट पूर्णतया वैध तथा उचित है और इस न्यायालय के हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है। फिर भी जैसा कि पूर्व में पाया गया परिवाद को व्यक्तिशः प्रस्तुत नहीं करना कोई क्षेत्राधिकार की ऐसी चूक नहीं है जिसे प्रारम्भ में ही मूल पर काट दिया जावे या ऐसी कोई सारभूत चूक नहीं है जिससे न्याय हेतु विफल होता हो।

मद्रास उच्च न्यायालय ने भी ए.नलासिवन बनाम तमिलनाडू राज्य (1995 क्रि.ला.ज. 2754 मद्रास) में कहा है कि यदि एक पुलिस अधिकारी दं.प्र.संहिता की धारा 160 (1) ( साक्ष्यों को स्वयं के थाना क्षेत्र या उसके चिपते क्षेत्र  से महिला एवं १५ वर्ष से छोटे बच्चों को छोड़कर बुलाना) के विपरीत कार्य करता है तो उसे तुरन्त दण्डित किया जाना चाहिए क्योंकि पुलिस वाले अपने आप में कानून नहीं हो सकते जो दूसरों से कानून पालन की अपेक्षा रखें।

Tuesday, 16 August 2011

उच्च न्यायालय को परिवाद के आरोपों की सत्यता परीक्षण का अधिकार नहीं है

राजस्थान उच्च न्यायालय ने उमाकान्त बनाम राजस्थान राज्य (1992 क्रि.ला.रि. राज. 492) में स्पष्ट किया है कि कोई भी व्यक्ति अपने स्वयं के प्रकरण में न्यायाधीश नहीं हो सकता। यह एक पवित्र कहावत है और एक विवादित विषय वस्तु में एक हितबद्ध को न्यायाधीश होने से रोकता है। एक न्यायिक कार्यवाही में न्याय मात्र होना ही नहीं चाहिए अपितु दिखाई भी देना चाहिए और विवाद्यक के मानस में पक्षपात की कोई तर्कसंगत आशंका नहीं रहनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने सतविन्दर कौर बनाम राज्य (1999 (8) एससीसी 728) में कहा है कि उच्च न्यायालय को परिवाद में लगाये गये आरोपों या संलग्न दस्तावेजों के आधारों पर कार्यवाही करनी होती है। उसे आरोपों की सत्यता या अन्यथा परीक्षण का कोई क्षेत्राधिकार नहीं है। रिकॉर्ड पर उपलब्ध विषय वस्तु का मूल्यांकन करे कि क्या परिवादी द्वारा लगाये आरोपों से कोई अपराध बनता है यदि उन्हें हूबहू स्वीकार कर लिया जाये। इसलिए न्यायालयों को अभिव्यक्त कानूनी प्रावधानों से अलग अन्तनिर्हित शक्तियां उचित जो कि कार्यों और कर्त्तव्यों, विधि द्वारा अधिरोपित के उचित निर्वहन के लिए आवश्यक है।

Monday, 15 August 2011

आपराधिक कार्यवाही पर नियंत्रण का मजिस्ट्रेट को अधिकार

राजस्थान उच्च न्यायालय ने रैनबैक्सी लेबोरेट्री बनाम इन्द्रकला (1997 (88)) कंपनी केसेज 348 (राज.) में कहा है कि एक बार याची कम्पनी और उस पर लागू कानून ने इसके लाभ के लिए पूरे देश में इसके शेयरों की खरीद बिक्री के सौदों की अनुमति दे दी तो ऐसा व्यवसाय इस तर्क से विफल करने नहीं दिया जा सकता कि लोगों को जहां कम्पनी का कार्यालय स्थित है मात्र वहां राहत दी जा सकती है। इस प्रकार की विचारधारा अधिनियम के तथा अन्य सम्बन्ध अधिनियमों के सुसंगत प्रावधानों को विफल करना होगा। यह आपति कि मजिस्ट्रेट को क्षेत्राधिकार नहीं है टिकने योग्य नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने धारीवाल टोबेको प्रोडक्टस लि0 बनाम महाराष्ट्र  राज्य के निर्णय दिनांक 17.12.08 में कहा है कि जब परिवाद में कोई अपराध प्रकट नहीं होता तो एक परिवाद को निरस्त करने के लिए कहा जाय तब न्यायालय तथ्य के प्रश्न की जांच कर सकता है।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने स्वातीराम बनाम राजस्थान राज्य (1997(2) क्राईम्स 148 राज.) में कहा है कि धारा 157 अनुसंधान अधिकारी पर यह कर्त्तव्य अधिरोपित करती है कि सम्बद्ध मजिस्ट्रेट के पास संज्ञेय अपराध की रिपोर्ट तुरन्त भेजे। रिपोर्ट को मजिस्ट्रेट के पास भेजने का उद्देश्य उसे संज्ञेय अपराध के अनुसंधान से सूचित रखना है ताकि यदि आवश्यकता हो तो वह अनुसंधान को नियंत्रित कर सके व उचित दिशा निर्देश दे सके। मात्र एफआईआर के प्रेषण  के विलम्ब से अभियोजन की पूरी तरह फेंकने का कोई आधार नहीं है। मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट भेजना दी गई परिस्थिति में संदेह  उत्पन्न करती है कि विचार विमर्श तथा सोच समझ के बाद एफआईआर दर्ज की गई तथा यह इसमें दर्ज समय के काफी समय बाद दर्ज हुई और यह प्रकट करती है कि अनुसंधान उचित एवं सही नहीं है।

JAI HIND
                                          



Sunday, 14 August 2011

अन्वीक्षण के लिए विश्वसनीय सामग्री होना आवश्यक है

मधुबाला बनाम सुरेश कुमार (1997 क्रि.ला.ज.3757) में स्पष्ट कहा गया है कि आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने मुथुराजू  सत्यनारायण बनाम आन्ध्रप्रदेश सरकार (1997 क्रि.ला.ज. 374 आंध्र) में कहा है कि यदि एक पुलिस थाने का प्रभारी का विचार है तथा इस आशय की अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करता है कि अभियुक्त को अन्वीक्षण पर भेजने का कोई मामला नहीं बनता है तो कोई प्राधिकारी उसे विचार बदलने और आरोप पत्र दाखिल करने के लिए निर्देश नहीं दे सकता । फिर भी मजिस्ट्रेट पर पुलिस रिपोर्ट को स्वीकारने का कोई दायित्व नहीं है, यदि वह पुलिस के विचार से असहमत है ।
सुप्रीम कोर्ट ने एस.एस. छीना बनाम विजय कुमार महाजन (मनु/सुको/0585/2010) में कहा है कि दुष्प्रेरण में एक व्यक्ति की ऐसी मानसिक प्रक्रिया समाहित है जिसमें एक व्यक्ति को कुछ करने के लिए उकसाया जाता है या मदद की जाती है। एक व्यक्ति द्वारा अभियुक्त की ओर से उकसाने या आत्महत्या करने में सकारात्मक कार्य के बिना दोषसिद्धि टिक नहीं सकती। प्रस्तुत मामले में अपीलार्थी के विरूद्ध कोई भी विश्वसनीय सामग्री या साक्ष्य के अभाव में दोष सिद्धि टिक नहीं सकती। धारा 306 के अन्तर्गत अपराध करने का स्पष्ट आशय होना चाहिए। अपीलार्थी के विरूद्ध धारा 306 भा.द.सं. के आरोप विरचित करने का आदेश गलत एवं अटिकाऊ है। अतः अपीलार्थी के विरूद्ध किसी विश्वसनीय सामग्री के अभाव में आपराधिक अन्वीक्षा का सामना करना उचित एवं न्यायपूर्ण नहीं होगा। परिणामतः धारा 306 के तहत आरोप विरचित करने का आदेश तथा समस्त कार्यवाहियां निरस्त व अपास्त किये जाते है।

Saturday, 13 August 2011

सिविल उपचार आपरधिक कार्यवाही में अवरोध नहीं है

सुप्रीम कोर्ट ने चर्चित प्रकरण हरियाणा राज्य बनाम भजनलाल (1992 सपली (1) एससीसी 335) में कहा है कि यदि पुलिस अनुसंधान न करे तो मजिस्ट्रेट हस्तक्षेप कर सकता है। अभिव्यक्ति-2 का अभिप्राय प्रत्येक मामले के तथ्यों व परिस्थितियों से अधिशासित हो और उस चरण पर एफआईआर में लगाये गये आरोपों के समर्थन में पर्याप्त प्रमाण का प्रश्न  नहीं उठता।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने नेमाचन्द मिश्रीलाल बनाम राजस्थान राज्य (1996 क्रि.ला.रि.(राज.) 330) में कहा है कि विलम्ब मुख्यतः याची की अपेक्षा पर कारित हुई है और विलम्ब के लिए बैंक या अभियोजन दोषी नहीं है। इसलिए यह उपयुक्त मामला नहीं है जिसमें कि अन्तनिर्हित शक्तियों का प्रयोग करते हुए कार्यवाही को निरस्त किया जावे। विद्वान मजिस्ट्रेट द्वारा याचीगण के विरूद्ध भा.द.सं. की धारा 420 तथा 120 बी के अपराध का प्रसंज्ञान पहले ही ले लिया गया है। प्रतिभा रानी बनाम सूरज कुमार (1985) 2 एसीसी सी 370 में यह पहले की धारित किया जा चुका है कि सिविल उपचार का विकल्प आपराधिक क्षेत्राधिकार के लिए कोई अवरोध नहीं है।

Friday, 12 August 2011

अन्तर्निहित शक्तियाँ आपवादिक तौर पर ही प्रयोज्य

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूसन बनाम दातार स्वीच गियर (मनु/सुको/0815/2010) में कहा है कि उच्च न्यायालय को अन्तर्निहित शक्तियों का प्रयोग यदाकदा तथा न्यायालय की प्रक्रिया के दुरूपयोग को रोकने के लिए ही और इस बात का ध्यान रखते हुए कि न्याय के लक्ष्य सुरक्षित रहे । जहां कहीं भी कानूनी मान्यता के सिद्धान्त से प्रतिनिधिक तौर पर दायित्व बनता है और एक व्यक्ति जो कि अन्यथा अपराध कारित करने में दायी नहीं है ऐसा सम्बन्धित कानून में विशिष्टतया प्रावधान होना चाहिए। भा.द.सं. की धारा 192 या 199 में ऐसा कोई प्रतिनिधिक सिद्धान्त नहीं है अतः परिवादी को अपने परिवाद में प्रत्येक अभियुक्त के विषय में ऐसा विशिष्टिक कथन करना चाहिए था। अभियुक्त सं. 1 के विरूद्ध प्रथम दृष्टया मामला बनता है अतः उसके पक्ष में धारा 482 की शक्तियां प्रयोग नहीं की जा सकती।   
( व्यावहारिक स्थिति यह है कि प्रत्येक सक्षम अभियुक्त इन शक्तियों के प्रयोग हेतु उच्च न्यायलय अवश्य जाता है |  फिर भी दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा ४८३ में प्रकरणों के शीघ्र निपटान के लिए यह प्रावधान भी है कि प्रत्येक उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायालयों पर अपने अधीक्षण का प्रयोग इस प्रकार करेगा जिससे यह सुनिश्चित हो जाये कि ऐसे मजिस्ट्रेटों द्वारा मामलों का निपटारा शीघ्र और उचित रूप से किया जाता है| किन्तु व्यावहारिक स्थिति लगभग ठीक विपरीत है| मामलों में धारा ४८२ के अंतर्गत निषेधाज्ञा जारी कर उन्हें वर्षों तक लटकने के लिए छोड़ दिया जाता है जब तक महत्वपूर्ण साक्ष्य नष्ट हो जायं और इतिहास के पन्नों से पुष्टि होती है कि धारा ४८३ की शक्तियाँ प्रयोग करने के उदाहरण दुर्लभ हैं| इस प्रकार दिखावटी न्याय द्वारा आपवादिक शक्तियों प्रयोग रोजमर्रा तौर पर और शीघ्र न्याय के पक्ष में शक्तियों का प्रयोग दुर्लभ ही किया जाता है| न्यायजगत से जुड़े लोगों का यह कथन निराधार लगत है कि समुचित कानून के अभाव में अपराधियों को दण्ड नहीं दिया जा सकता है| यक्ष प्रश्न यह है कि जो अछे प्रावधान कानूनों में पहले से ही हैं उनका कितना सदुपयोग किया जा रहा है| शायद इसका सम्यक जवाब नहीं है )
दिल्ली उच्च न्यायालय ने अजय जैन बनाम कम्पनी रजिस्ट्रार (मनु/दिल्ली/2450/2010) में कहा है कि याची कम्पनी ने भावी निवेशकों के लिए प्रविवरण जारी करते समय यह पूर्वानुमान दिया कि वह मात्र पट्टे का कार्य करेगी और असत्य व भ्रामक कथन निवेशकों को जारी किया। मिथ्या कथन का आशय निवेशकों को धोखा देना या गुमराह करना था। यह स्पष्ट है कि कथन जानबूझकर पूर्णतया जानते हुए कि धन जिस उद्देश्य के लिए संग्रहित किया जा रहा है नहीं लगाया जावेगा जारी किया गया। याची का तर्क कि मामला धारा 406 का बनता है चलने योग्य नहीं है। यह जानबूझकर गलत विवरण देने का मामला है और मियाद की अवधि तुलन पत्र फाईल करने की तिथि से गणना की जावेगी न कि प्रविवरण जारी करने से।

Thursday, 11 August 2011

मजिस्ट्रेट प्रसंज्ञान लेने से मना करने के लिए स्वतंत्र नहीं है

राजस्थान उच्च न्यायालय ने राजू उर्फ राजस्थान सिंह बनाम राजस्थान राज्य (1979 क्रि.ला.रि. (राज) 300) में स्पष्ट किया है कि मेरा यह विचार है कि मजिस्ट्रेट अपने सम्मुख प्रस्तुत पुलिस रिकॉर्ड से अपराध का ज्ञान प्राप्त कर सकता है। यदि पुलिस अधिकारी द्वारा प्रदत सूचना इस प्रभाव में है कि कोई अपराध घटित नहीं हुआ है तथा यह सूचना मजिस्ट्रेट को प्राप्त होने पर वह जान पाता है कि अपराध हुआ है तो उसे प्रसंज्ञान लेने का क्षेत्राधिकार है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने चितो अधिकारी बनाम विद्याभूषण (एआईआर 1952 इला 455) में कहा है कि द0प्र0सं0 की धारा 190 मजिस्ट्रेटों  के क्षेत्राधिकार का वर्णन करते हुए परिवाद पर प्रसंज्ञान लेने के विषय में कहती है। यह कहती है कि मजिस्ट्रेट प्रसंज्ञान ले सकता है। यद्यपि धारा के शब्दों में अनुमति लगती है किन्तु विधायिका का आशय अपराध के प्रसंज्ञान के विषय में मजिस्ट्रेट को विवेकाधिकार देना है । यदि एक परिवाद से संज्ञेय अपराध प्रकट होता है जिस पर मजिस्ट्रेट को क्षेत्राधिकार है जो कि धारा 195 जैसे प्रावधान से बाधित नहीं है वह प्रसंज्ञान लेने के लिए बाध्य प्रतीत होता है। धारा में ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह परामर्श देता हो कि वह प्रसंज्ञान लेने से मना कर सकता है ।संभव है उसके पास पूर्ण आंकड़े न हो जिससे कि वह प्रसंज्ञान  लेने या न लेने का निर्णय कर सके किन्तु यदि उसके पास कुछ आंकड़े हो तो वह प्रसंज्ञान से मना करने के लिए स्वतन्त्र नहीं है।

Wednesday, 10 August 2011

कानून से बहुत ऊपर

भारतीय न्यायालयों के इतिहास का यह दुखद पहलू रहा है कि अंतिम बहस सुनने के पश्चात भी लंबे समय तक निर्णय नहीं सुनाये जाते हैं| ऐसे उदाहरणों का अभाव नहीं है जिनमें अनावश्यक रूप से लंबे समय तक मामलों को आंशिक सुना रखा जाता है या बहस के बाद कई महीनों तक ही नहीं अपितु वर्षों तक भी निर्णय नहीं सुनाये गए हैं| दूसरी ओर इनमें निर्णय सुनाने के लिए प्रतीक्षाकर दोनों पक्षों से मोलभाव कर न्याय को अनुकूलतम कीमत पर नीलाम करने की सम्भावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है| ऐसे मामलों के बारे में किसी सूचना को स्वेच्छा से उजागर भी नहीं किया जाता है| यहाँ तक कि मांगने पर भी न्यायालयों द्वारा सूचनाएँ देने में संकोच किया जाता है और जनता को अँधेरे में रखा जाता है| आखिर न्यायपालिका अपने आप को कानून से ऊपर जो समझती है| मुकदमेबाजी एक सामाजिक बीमारी है जिसे भारत में छुपाकर रखा जाता है परिणामतः इसका इलाज नहीं हो पाता है| इंग्लैंड में न्यायालय का समस्त रिकार्ड जनता और प्रेस के लिए खुला है और वहाँ निर्णय के अतिरिक्त सुप्रीम कोर्ट प्रेस के लिए सार और जारी करता है| वहाँ निजी व्यक्तियों और संगठनों द्वारा किये गए सर्वेक्षणों को भी वहाँ न्याय विभाग अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित करता है| अमेरिका में समस्त न्यायिक रिकोर्ड वेबसाईट पर ही उपलब्ध है और न्यायालयों  में होने वाली कार्यवाही भी साथ साथ रिकोर्ड कर वेबसाईट पर जारी कर दी जाती है |  

हाल ही में उजागर होते न्यायिक दुराचरण के मामलों को देखते हुए न्यायपालिका में पारदर्शिता की आवश्यकता है| यद्यपि न्यायिक दुराचरण भारत के लिए नया नहीं है और न ही इसमें यह वृद्धि हाल ही में हुई है किन्तु तकनिकी विकास एवं सूचना के अधिकार के कारण यह सार्वजनिक तौर पर प्रकट होना अभी प्रारम्भ हुआ है| हमारे तथाकथित समाज सेवी भी देश की न्यायपालिका का अनावश्यक  महिमामन्डन गुणगान कर उसका वास्तविकता से अधिक मूल्यांकन करते हैं और न्यायपालिका में व्याप्त दोषों को उजागर नहीं करते| इसकी परिणति यह होती है कि न्याय व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हो पाता है और महिमा मन्डन करने वाले लोग वास्तविक अर्थों में न्याय का बड़ा अहित कर रहे हैं| मेरे विचार से देश की न्यायपालिका ने लोकतंत्र को मजबूत बनाने में जितना योगदान दिया है शायद उससे कहीं अधिक उसे कमजोर बनाने में योगदान दिया है जिसका शुद्ध परिणाम जनता के सामने है| यहाँ तक कि एकांत में वकीलों के श्रीमुख से भारतीय न्यायपालिका की निरंकुशता की तुलना पाकिस्तानी सेना से करते हुए भी सुना जा सकता है|       

उदाहरण के लिए जनहित याचिकाओं को हमारे न्यायलयों का नया अविष्कार बताया जाता है और विधि की शिक्षा में भी यही भ्रामक बात बताई जाती है | किन्तु वास्तविकता यह है की सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा ९१ व ९२ में लोकहित के मामलों में सिविल न्यायलय में कार्यवाही का अधिकार ०१.०१.१९०९ से पहले से ही प्रभावी है और यह स्पष्ट है कि जो अधिकार एक  निचले स्तर के न्यायालय को है वह ऊपरी न्यायालय भी प्रयोग कर सकता है| इसी प्रकार न्यायलयों द्वारा निषेधाज्ञा जारी करने में प्रमुखता इस बात को दी जानी चाहिए कि यदि निषेधाज्ञा जारी नहीं की गयी तो अपूरणीय क्षति हो जायेगी किन्तु बड़ी दुखद बात है कि जनता को सूचना प्रदान करने के आदेशों के विरुद्ध भी हमारे माननीय न्यायालयों द्वारा निषेधाज्ञाएं जारी  कर दी जाती हैं| यद्यपि दिल्ली उच्च न्यायालय ने पुलिस कमिश्नर की रिट याचिका सं0 8396/2009 के निर्णय में कहा है कि कथित सूचना सूचना का अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत चाही गयी है और सूचना देय है या नहीं इसका निर्णय सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रावधान लागू करके ही जांच की जा सकती है। लोक सूचना अधिकारी या अपील प्राधिकारी सूचना देने के लिए नये कारण या आधार नहीं जोड़ सकते। किन्तु जब यही प्रश्न न्यायिक रिकोर्ड के बारे में उठा तो आर एस मिश्रा के मामले में केन्द्रीय सूचना आयोग के सूचना देने के फैसले पर दिल्ली उच्च न्यायलय ने ही रोक लगा दी| इससे यह विश्वास सुदृढ़ होता है कि न्यायपालिका कानून से भी ऊपर है  क्योंकि उसके ऊपर लागू किये जाने वाले कानून के मानक भिन्न हैं| क्या इसे कानून का (अच्छा) शासन कहा जा सकता है? इस प्रकार हमारी न्यायपालिका का दोहरा चरित्र समय समय पर उजागर होता रहता है| संभवतया हमारी न्यायपालिका न्याय के नाम पर कुछ ऐसा कर रही है जिसे सार्वजानिक करना उसके स्वयं के हित में नहीं समझती है |
       सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश ३९ नियम ३ क में एकतरफा निषेधाज्ञा के लिए अधिकतम अवधि ३० दिन निर्धारित है और उच्च न्यायालयों द्वारा अंतरिम निषेधाज्ञा के लिए संविधान के अनुच्छेद २२६(३) के अंतर्गत भी २ सप्ताह का समय नियत है किन्तु इनकी होने वाली अनुपालना सर्व विदित है |
हल ही दिनांक ०३.०८.११ को लोकेश बत्रा के मामले में केन्द्रीय सूचना आयोग द्वारा  कहा गया है कि बहस के बाद निर्णय सुनाने के लिए बकाया मामलों के बारे में जिन आंकड़ों को अपीलार्थी जानना चाहता है सुप्रीम कोर्ट के पास नहीं रखे जाते हैं| यद्यपि सुप्रीम कोर्ट के प्रतिनिधियों ने (जिसमें राजकीय व्यय पर एक वकील भी शामिल था) कहा कि सामान्यतया निर्णय सुरक्षित रखने के बाद २ से ४ सप्ताह के भीतर  उदघोषित कर दिया  जाता है, मात्र कुछ मामलों में ही लंबे समय के बाद निर्णय पारित किये जाते हैं जिनके बारे में आंकडे नहीं रखे जाते हैं |

     सुप्रीम कोर्ट के प्रतिनिधियों का कहना था कि इन आंकड़ों को तैयार करने के लिए प्रत्येक फाइल की संवीक्षा करनी होगी और यह लगभग असम्भव कार्य होगा| अपीलार्थियों  की  ओर से तर्क दिया गया कि यदि सुप्रीम कोर्ट अभी तक यह सूचना नहीं रख रहा है तो अब समय आ गया है कि बकाया मामलों की नागरिकों को जानकारी देने के लिए उसे ऐसा करना चाहिए| अब चूंकि कम्प्यूटरीकरण का लाभ उपलब्ध है अतः ऐसे आंकड़ों को लोगों के सामने रखना कठिन कार्य नहीं होगा| अतः सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि अब वह ऐसा करे ताकि लोग बकाया मामले जान सकें| केन्द्रीय जन सूचना अधिकारी को निर्देश दिए गए कि  इस निर्णय के १५ दिन के भीतर सूचना अधिकारी को निर्देश दिए गए कि  इस निर्णय के १५ दिन के भीतर , यदि उपलब्ध हो तो,  सूचना उपलब्ध कराये और यदि नहीं हो तो सक्षम अधिकारी के इसे ध्यान में लाया जाकर भविष्य में  संकलन तथा प्रकटन हेतु आवश्यक व्यवस्था की जावे| यद्यपि केन्द्रीय सूचना आयोग ने यह लोकतान्त्रिक निर्णय दे दिया है किन्तु हमारी न्यायपालिका के चरित्र और इतिहास को देखते  हुए  तो इसकी नियति तो अभी भी भविष्य के गर्भ में है |

Tuesday, 9 August 2011

अनुसन्धान प्रकरण दर्ज के बाद प्रारम्भ होता है

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश राज्य बनाम अहमदुल्ला (1961 एआईआर 998) में धारित किया है कि वह क्षण जब अपराध किया गया था अपराधी यह समझने में समर्थ था कि वह गलत या कानून के विपरीत कर रहा है और इस कारण वह भा..सं. की धारा 84 के अन्तर्गत दोषमुक्त होने का पात्र नहीं है। इस प्रमुख प्रकरण में अभियुक्त ने मिर्गी के दौरे के प्रभाव में होने के कारण विमुक्ति मांगी थी तथा निचले न्यायालयों ने उसे दोषमुक्त कर दिया था किन्तु सुप्रीम कोर्ट ने इस आपवादिक मामले में दोषी ठहराया।
न्यायालय ने अपने दिलावर सिंह बनाम दिल्ली के निर्णय दिनांक 05.09.07 में कहा है कि विलम्ब से ,न्यायालय के समक्ष हूबहू मामला यथाशीघ्र प्रस्तुत करने के अवसर विफल हो जाता है। इस प्रकार का अनुसंधान इस आशय के लिए पुलिस थाने में निर्धारित पुस्तक में प्रविष्टि के बाद प्रारम्भ होता है जब संज्ञेय अपराध से सम्बन्धित सूचना का सार इसमें दर्ज हो जाता है| ऐसा कोई कारण नहीं है कि जब संज्ञेय अपराधों के विषय में अनुसंधान करना प्राथमिकतः पुलिस का कार्य है तो मजिस्ट्रेट का समय क्यों बर्बाद किया जावे।

सुप्रीम कोर्ट ने गोपालदास सिंघी बनाम असम राज्य (1961 एआईआर एस सी 986) में स्पष्ट  किया है कि यदि परिवाद में संज्ञेय अपराध प्रकट होता हो तो भी वह उसका संज्ञान लेने के लिए बाध्य नहीं है वह इसे अनुसंधानार्थ पुलिस को भेज सकता है। एक परिवाद में यदि संज्ञेय अपराध प्रकट होता है तो मजिस्ट्रेट धारा 156 (3) के तहत पुलिस को भेज सकता है।

Monday, 8 August 2011

प्रसंज्ञान अपराध का लिया जाता है न कि अपराधी का

आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने पेमासनी वेकटाचलापति राव बनाम गोविन्दारामूलू (एआईआर 1960 आन्ध्र 300) में कहा है कि धारा 190 (1) (सी) के प्रथम भाग का प्राकृतिक अर्थ यह है कि सूचितकर्ता का आशय स्वयं मजिस्ट्रेट तक कार्यवाही हेतु सूचना, चाहे प्रत्यक्ष या परोक्ष हो, पहुंचने का होना चाहिये। संहिता की यह नीति है जिसे ध्यान देना है कि कोई भी व्यक्ति जिसे अपराध घटित होने का ज्ञान हो, स्पष्ट कानूनी अपवादों के अध्यधीन जैसे कि धारा 195 से 199 तक , वह आपराधिक कानून को गतिमान कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर क्रिकेट इन इंडिया बनाम नेताजी क्रिकेट क्लब (2005 (4) एससीसी 741) में कहा है कि यह कहना गलत है कि न्यायालय पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार प्रयोग करते समय उतरवर्ती घटनाओं पर विचारण नहीं कर सकता। इस प्रकृति के मामले में न्यायालय अपनी गलती स्वीकारता है।
सुप्रीम कोर्ट ने पोपुलर मुथैया बनाम राज्य (2006 (7) एस सी सी 296) में स्पष्ट किया है कि यह सुनिश्चितत कानून है कि न्यायालय अपराध का प्रसंज्ञान लेता है न कि अपराधी का।

Sunday, 7 August 2011

सूचना पर भी संज्ञान लिया जा सकता है

सुप्रीम कोर्ट ने आर.आर. चारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1951 एआईआर 207) में कहा है कि धारा 190 की शब्दावली से स्वस्पष्ट है कि एक व्यक्ति के विरूद्ध कार्यवाही अपराध के प्रसंज्ञान मजिस्ट्रेट द्वारा धारा में दी गई तीन संभाव्यताओं में प्रारम्भ होती है। प्रथम संभावना असंज्ञेय अपराध जैसा कि व्यथित व्यक्ति द्वारा परिवाद पर संस्थित होती है। दूसरी स्थिति पुलिस रिपोर्ट पर जो कि एक मामले में संज्ञेय अपराध में पुलिस द्वारा अनुसंधान पूर्ण करने पर और मजिस्ट्रेट के पास आदेशिका जारी होने के लिए आने पर। तीसरी स्थिति वह है जब मजिस्ट्रेट स्वयं अपराध का संज्ञान लेकर आदेशिका जारी करता है।
आन्ध्रप्रदेश उच्च न्यायालय ने डी.राजगोपाला राव बनाम आन्ध्रप्रदेश राज्य (एआईआर 1960 आन्ध्र 184) में कहा है कि यह माना जाना चाहिए कि पुनरीक्षण याचिका में समाहित सूचना धारा 190 (1) (सी) के अर्थ में सूचना है और जिला मजिस्ट्रेट मामले का प्रसंज्ञान लेने का अधिकारी है तथा जांच व अन्वीक्षण के लिए अपने अधिनस्थ मजिस्ट्रेट को अन्तरण कर सकता है।

Saturday, 6 August 2011

अपराधी का बचना सामाजिक प्रदूषण है

सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश बनाम नारायणसिंह (एआईआर 1989 एस सी 1789)  में कहा है कि धारा 7 (1) में प्रयुक्त शब्दावली यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर, साशय या अन्यथा धारा 3 के अन्तर्गत आदेश का उल्लंघन करता है। यह धारा व्यापक रूप से शब्दजड़ित है जिससे इसके भीतर मात्र जानबूझकर या साशय  किया गया उल्लंघन ही नहीं आता है अर्थात बिना आशय के किया गया भी शामिल है। अतःयदि धारा 3 का तथ्य निर्यात करना या निर्यात का प्रयत्न करने का साक्ष्य रिकॉर्ड पर मौजूद हो तो बिना वैध लाईसेन्स के खाद के निर्यात के लिए आशय घटक एक व्यक्ति की दोष सिद्धि के लिए आवश्यक नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने उड़ीसा राज्य बनाम राजेश्वर राव (एआईआर 1992 एस सी 240) में कहा है कि खाद्य अपमिश्रण रोकथाम अधिनियम स्वास्थ्य को खतरा रोकने का कल्याणकारी विधायन है। अपमिश्रित खाद्य के सेवन में आशय एक आवश्यक घटक नहीं है। यह एक सामाजिक बुराई है तथा अधिनियम अपराध करने को मना करता है। आवश्यक बात विक्रेता द्वारा क्रेता को विक्रय करना है। अभियोजन के द्वारा यह साबित करना पर्याप्त है कि विक्रेता ने क्रेता को अपमिश्रित खाद्य पदार्थ(खाद्य निरीक्षक सहित)  बेचा है और खाद्य निरीक्षक ने यह अधिनियम के प्रावधानों की सख्त अनुपालना में खरीदा है।
सुप्रीम कोर्ट ने मनोहरलाल बनाम विनेश आनन्द के निर्णय दिनांक 09.04.01 में स्पष्ट किया है कि अपराध कारित होने पर अपराधी का पीछा करना सामाजिक आवश्यकता की अनुसेवा करना है। एक अपराधी का बच निकलना समाज सहन नहीं कर सकता क्योंकि वह एक सामाजिक प्रदूषण की स्थिति लायेगा जो कि न तो वांछनीय है और न ही न्यायोचित है और यह बिना मान्य स्थिति के है और अपराध शस्त्र में मान्य स्थिति का विचार पूर्णतया विदेशी है।

Friday, 5 August 2011

अपराध के लिए आशय आवश्यक घटक नहीं है

सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक राज्य बनाम अपा बालू इंगले (एआईआर 1993 एस सी 1126) में कहा है कि आपराधिक कानून प्राथमिकतः सामाजिक सुरक्षा की चिन्ता करता है तथा सभी द्वारा अनुपालन वाले नियम निर्धारित करता है तथा उनमें विचलन - अतिक्रमण या चूक-पर दण्ड देता है । यह निर्धारित कानून है कि  जहां समाज कल्याण के दृष्टिकोण से सामाजिक आवश्यकता मांग करती है या अभियुक्त की मनोदति को प्रमाणित करने में कठिनाई आती है न्यायशास्त्र आशय के प्रमाण के भार बिन्दु को छोड़ देता है।
सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश बनाम नारायणसिंह (एआईआर 1989 एस सी 1789)  में कहा है कि धारा 7 (1) में प्रयुक्त शब्दावली यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर, साशय या अन्यथा धारा 3 के अन्तर्गत आदेश का उल्लंघन करता है। यह धारा व्यापक रूप से शब्दजड़ित है जिससे इसके भीतर मात्र जानबूझकर या साशय  किया गया उल्लंघन ही नहीं आता है अर्थात बिना आशय के किया गया भी शामिल है। अतःयदि धारा 3 का तथ्य निर्यात करना या निर्यात का प्रयत्न करने का साक्ष्य रिकॉर्ड पर मौजूद हो तो बिना वैध लाईसेन्स के खाद के निर्यात के लिए आशय घटक एक व्यक्ति की दोष सिद्धि के लिए आवश्यक नहीं है।

Thursday, 4 August 2011

परिवाद डाक से भी भेजा जा सकता है

सुप्रीम कोर्ट ने पी.के. प्रधान बनाम सिक्किम राज्य के निर्णय दिनांक 24.07.01 में स्पष्ट किया है कि धारा 197 के अन्तर्गत स्वीकृति का प्रश्न  प्रसंज्ञान के बाद कभी भी उठाया जा सकता है यह प्रसंज्ञान के बाद, आरोप विरचित करते समय और अन्वीक्षण के निष्कर्ष  या दोष सिद्धि के बाद भी। इस निष्कर्ष  पर पहुंचने के लिए कि क्या अभियुक्त द्वारा दावा किया गया कार्य उसके कर्त्तव्यों के निष्पादन में था, तर्कसंगत था किन्तु बनावटी नहीं, बहानेबाजी मात्र नहीं, अन्वीक्षण के दौरान बचाव पक्ष को अवसर देकर परीक्षा की जा सकती है। ऐसी स्थिति में स्वीकृति का प्रश्न  मुख्य निर्णय के निर्धारण हेतु खुला छोड़ा जा सकता है जो कि अन्वीक्षा के पूर्ण होने पर दिया जावे।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राज्य बनाम एस.डी. गुप्ता (1973 क्रि.ला.ज. 999) में यह कहा है कि उपधारा (1) में परिवाद प्राप्त होने पर शब्द प्रयुक्त किये गए हैं। प्राप्त करना शब्द में डाक द्वारा प्राप्त करना शामिल है। इस प्रकार यह लगता है कि धारा 190 में कुछ भी ऐसा नहीं है जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि एक परिवादी द्वारा स्वयं या पैरोकार के माध्यम से मजिस्ट्रेट को प्रस्तुत किया जाय। चूंकि परिवाद प्राप्त होते ही तुरन्त परिवादी की परीक्षा करना आवश्यक नहीं है। यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि धारा 200 स्वगर्भित रूप में यह दायित्व डालती है कि परिवाद न्यायालय में परिवादी द्वारा व्यक्तिगत रूप से प्रस्तुत होना चाहिए। यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि जब-जब विद्यायिका ने किसी प्रार्थना पत्र को व्यक्तिशः  प्रस्तुत करने का आशय  रखा है तब-तब ऐसा अभिव्यक्त रूपेण किया गया है। चूंकि द प्र सं में अभिव्यक्त या गर्भित ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि परिवादी को मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद व्यक्तिशः  प्रस्तुत करना पड़ेगा यह धारित नहीं किया जा सकता कि डाक द्वारा परिवाद वैध नहीं है और उस पर प्रसंज्ञान नहीं लिया जा सकता। चूंकि फैक्ट्री इंसपेक्टर ने पूर्व में ही कथन किया कि वह कोई बहस नहीं करेगा और बाद की तिथि पर उसकी उपस्थिति स्पष्टतया आवश्यक नहीं है। यह अवधारणा है कि इस आधार पर मजिस्ट्रेट को परिवाद निरस्त नहीं करना चाहिए था।

Wednesday, 3 August 2011

अनुसन्धान एवं अभियोजन की सही दिशा

सुप्रीम कोर्ट ने बहादुरसिंह लखूभाई गोहिल बनाम जगदीश भाई (2004 (2) एससीसी 65) में कहा है कि अनावश्यक जल्दबाजी में किया गया कार्य दुर्भावनापूर्ण ठहराया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने चारा घोटाला प्रमुख प्रकरण बिहार राज्य बनाम पी.पी.शर्मा (1991 एआईआर 1260) मे स्पष्ट किया है पुलिस का प्राथमिक कर्त्तव्य अपराध घटित होने के साथ साक्ष्य संग्रहण करना तथा छानना है। यह देखने के लिए कि क्या अभियुक्त ने कोई अपराध किया है या विश्वास करने का कारण है और उपब्लध साक्ष्य अभियोग को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है और सक्षम मजिस्ट्रेट को अपराध का प्रसंज्ञान लेने के लिए रिपोर्ट भेजे। अनुसंधान अधिकारी कानून की एक भुजा है तथा आपराधिक न्याय प्रशासन तथा कानून व व्यवस्था बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। पुलिस अनुसंधान नींव का पत्थर है जिस पर आपराधिक अन्वीक्षा का भव्य भवन खड़ा है जिसमें कि चूक से न्यायिक स्खलन की परिणति हो सकती है तथा अभियोजन दोष मुक्ति में बदल सकता है। अनुसंधान अधिकारी का कर्त्तव्य तथ्यों का विनिश्चयीयकरण ,अर्द्धसत्य या टूटे फूटे कथन में से घटनाओं की कड़ी जोड़ने वाले सत्य को निकालना है। अनुसंधान अधिकारी कानून की पूर्ण अनुपालना करते हुए सत्य का पता लगाने के लिए गहन अनुसंधान करेगा व व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का ध्यान रखेगा। विवेकाधिकार में कार्य करना मनमानेपन से कार्य करना नहीं होगा। यह कोई पीड़ादायी शक्ति नहीं है, न ही किसी मनमानेपन से जुड़ी है, न ही यह कानूनी गैर जिम्मेदारी, दूषित उद्देश्य के लिए निर्धारित शर्तों को अमान्य करते हुए कानूनी आधारों से अधिक विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग करना है। दुर्भावना का अर्थ सद्विश्वास का अभाव, व्यक्तिगत पक्षपात, असंतुष्टि, छुपा हुआ या अनुचित या दूषित उद्देश्य है।  लोक प्रशासन न्यायिक अलगाव से नहीं चलाया जा सकता। परिणाम यह होगा कि अपराध बिना पता लगे रह जायेंगे और समाज को लाइलाज क्षति होगी। अपराधी दुस्साहसी हो जायेंगे तथा लोग कानून और व्यवस्था की दक्षता में विश्वास खो देंगे। लोक सेवक का यह कोई कर्त्तव्य नहीं है कि वह षड़यन्त्रकर रिकॉर्ड में जालसाजी करे, खातों का मिथ्याकरण करे, छल या दुर्विनियोग करे या अवैध पारितोषण मांगे या स्वीकार करे यद्यपि शक्तियों के प्रयोग ने उसे अपराध करने का अवसर दिया है। न्यायालय अवैधता एवं अन्याय के नाटक में मूक दर्शक नहीं है। बिना स्वीकृति के आरोप पत्र दाखिल करना अवैध नहीं है और न ही यह पूर्ववर्ती शर्त है। प्रसंज्ञान से भी पहले आरोप पत्र को निरस्त करना नवजात शिशु का वध है। जब तक अपराधिक न्यायालय अपराध का संज्ञान नहीं लेता तब तक कोई अपराधिक कार्यवाही बकाया नहीं है। आपराधिक मामले का त्वरित अन्वीक्षण महत्वपूर्ण नियम है। विलम्ब सामाजिक व्यवस्था को अन्याय देता है और रिट याचिका व्यवहृत करना, विलम्ब को प्रोत्साहित करेगा विभिन्न चालाकियों से एक अभियुक्त विलम्ब के उद्देश्य से रिट याचिका का सहारा लेता है कई गुणावगुण के प्रश्न  उठाता है और कार्यवाही को लम्बित रखना चाहता है। परिणाम यह होगा कि लोग विधि शासन की दक्षता में विश्वास खो देंगे।

Tuesday, 2 August 2011

आशय परिस्थितियों से ही प्रमाणित हो सकता है

सुप्रीम कोर्ट ने{छेड़छाड़ के चर्चित प्रकरण}  रूपन देवल बजाज बनाम कंवरपाल सिंह गिल (1996 एआईआर 309) में कहा है कि यदि आशय या ज्ञान किसी अपराध के घटकों में से हो तो एक व्यक्ति की दोष सिद्धि के लिए अन्य घटकों की तरह साबित करना पड़ेगा। लेकिन समान रूप से यह भी सत्य है  कि ये घटक मानसिक स्थिति के हैं अतः इन्हें प्रत्यक्ष साक्ष्य से साबित नहीं किया जा सकता और मामले में की दी गई परिस्थितियों से ही अर्थ लगाया जा सकता है। अभिव्यक्ति हानि जो कि इस धारा में समाहित है कि व्याख्या में इस न्यायालय ने कहा है कि यह पर्याप्त विस्तृत है जिसमें शारीरिक क्षति के साथ-साथ क्षतिकारक मानसिक प्रतिक्रिया भी शामिल है। विधि द्वारा निर्धारित स्थिति कि एक एफआईआर या परिवाद को निरस्त करते समय उच्च न्यायालय द्वारा घटना की संभाव्यता, लगाये गये आरोपों की शुद्धता या विश्सनीयता की जांच करना न्यायोचित नहीं है। कारण स्पष्टता जोड़ते हैं और मनमानेमपन के आरोपों को न्यूनतम करते हैं। मजिस्ट्रेट पुलिस के निष्कर्षों से बाध्य नहीं है यहां तक कि वह परिवादी के परिवाद के निष्कर्षों से भी बाध्य नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश राज्य बनाम एस.बी. जोहरी (2000 एससीसी क्रि. 311) में कहा है कि उच्च न्यायालय ने प्रथम दृष्टया मामले पर विचार करने के स्थान पर रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री का इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए मूल्यांकन और वजन किया कि प्रत्यर्थी के विरूद्ध आरोप नहीं बनाये जाने चाहिए थे। यह सुनिश्चित नियम है कि आरोप बनाने के चरण पर न्यायालय को मात्र प्रथम दृष्टया यह देखना होता है कि क्या अभियुक्त के विरूद्ध कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने धारित किया कि उच्च न्यायालय के लिए अन्वीक्षण न्यायालय द्वारा बनाये गये आरोपों को निरस्त करने का कोई न्यायोचित कारण नहीं था।

Monday, 1 August 2011

आपराधिक कार्यवाही

सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश  राज्य बनाम अवध किशोर गुप्ता के निर्णय दिनांक 18.11.03 में कहा है कि यदि उस चरण पर भी आरोप बनाये जाते है तो न्यायालय को अभियुक्त के विरूद्ध कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधारों के अस्तित्व के विषय में प्रथम दृष्टया संतुष्ट होना है। केवल उस सीमित उद्देश्य के लिए न्यायालय सामग्री तथा प्रलेखों का मूल्यांकन कर सकता है लेकिन साक्ष्य का मूल्यांकन नहीं। उच्च  न्यायालय को धारा 482 (अन्तर्निहित) के साथ संलग्न अनुलग्नकों पर कार्य नहीं करना चाहिए जो कि जांची तथा साबित, साक्ष्य नहीं कही जा सकती।
जब सूचना पुलिस थाने में दे दी जाती है और अपराध दर्ज हो जाता है तब सूचितकर्ता की दुर्भावना गौण महत्व की हो जाती है ।यह अनुसंधान में संग्रहित विषय वस्तु तथा न्यायालय में दिया गया साक्ष्य है जो कि अभियुक्त की नियति निर्धारित करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब बनाम राजसिंह (1998 एआईआर एसी 768) में कहा है कि द0प्र0सं0 की धारा 195 के पठन से ये स्पष्ट है कि जब न्यायालय धारा 190 (1) के अन्तर्गत प्रसंज्ञान लेने का आशय रखता हो तभी लागू होती है और पुलिस द्वारा संज्ञेय अपराध के अनुसंधान के कानूनी अधिकार से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यहां तक कि यदि अपराध न्यायालय में कार्यवाही में या उसके सम्बन्ध में किया गया हो। दूसरे शब्दों में पुलिस के संहिता के अन्तर्गत अनुसंधान के कानूनी अधिकार संहिता की धारा 195 द्वारा न तो किसी प्रकार नियंत्रित है और न किसी प्रकार बाधित है। वास्तव में सही यह है कि यदि ऐसे अपराध में न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किया जाता है तो धारा 195 (1) बी द्वारा लगाये गये प्रतिबन्ध के कारण प्रसंज्ञान लेने में न्यायालय सक्षम नहीं होगा। किन्तु इसकी कोई भी बात एफआईआर के आधार पर न्यायालय को शिकायत दर्ज करवाने से नहीं रोकती है और न्यायालय अनुसंधान के दौरान संग्रहित विषय वस्तु तथा संहिता की धारा 340 में विहित प्रक्रिया का अनुसरण करे।