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Friday, 6 December 2013

यदि देश का पुलिस बल निष्ठा पूर्वक कार्य करता तो शायद नीतिनिर्माण के अतिरिक्त गृह मंत्रालय की कोई आवश्यकता ही नहीं रहती

गृह मंत्रालय सरकार एक प्रमुख अंग है जो मुख्य रूप से पुलिस से सम्बन्ध रखता है व  पुलिस ज्यादतियों से सम्बंधित शिकायतों पर समुचित कार्यवाही करने का दायित्व मंत्रालय पर है| किन्तु व्यवहार में पाया गया है कि स्वतंत्रता के बाद भी पुलिस के रवैये में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है| देश में पुलिस बलों का गठन यद्यपि जनता की सुरक्षा के लिए किया गया है किन्तु देश की पुलिस आज भी अपने कर्कश स्वर का प्रयोग जनता को भयभीत करने के लिये ही कर रही है परिणामत: देश का पुलिस संगठन अपराधियों का मित्र और आम नागरिक के दुश्मन की तरह देखा जाता है| आज भी आम नागरिक पुलिस से दूर ही रहना चाहता है|
मंत्रालय भी अपने कर्तव्यों में घोर विफल है और पुलिस अभी भी बेलगाम है तथा पुलिस बल का उपयोग आमजन की सुरक्षा की बजाय मात्र (आर्थिक या राजनैतिक) सतासीन लोगों की रक्षा के लिए हो रहा है| इस स्थिति पर दृष्टिपात करें तो ज्ञात होता है कि स्वयं केन्द्रीय गृह मंत्रालय में 20 से अधिक पुलिस अधिकारी नियुक्त/प्रतिनियुक्त हैं जो गृह मंत्रालय सचिवालय की कार्यशैली व संस्कृति को अपदूषित कर रहे हैं| राज्यों की स्थिति भी लगभग समान ही है| इससे यह गृह मंत्रालय कम और पुलिस मंत्रालय ज्यादा नजर आता है| मैं अपने अनुभव से यह बात स्पष्ट तौर पर कह सकता हूँ कि सम्पूर्ण देश के पुलिस बलों में निष्ठावन और योग्य व्यक्ति मिलने कठिन है | देश के पुलिस बलों का वातावरण ही ऐसा है कि वहां कोई भी निष्ठावान  व्यक्ति टिक नहीं सकता| जो लोग आज पुलिस बलों में टिके हुए हैं वे सभी अपने कर्तव्यों और जनता के प्रति निष्ठावान के स्थान पर अपने वरिष्ठ अधिकारियों और राजनेताओं के स्वामिभक्त अधिक हैं और उनके प्रसाद स्वरुप ही पदोन्नतियाँ और पदक पा रहे हैं| यदि कोई निष्ठावान व्यक्ति भ्रान्तिवश इस बल में भर्ती हो भी जाए तो उसे भीरु बनकर पुलिस की अस्वस्थ परम्पराओं को निभाना पडेगा या पुलिस सेवा छोडनी पड़ेगी| यदि एक व्यक्ति सर्वगुण  सम्पन्न होते हुए भीरु हो तो उसके सभी गुण निरुपयोगी हैं क्योंकि वह उनका कोई उपयोग नहीं कर सकता|
पुलिस के विरुद्ध आने वाली समस्त शिकायतों में दोषी पुलिस अधिकारी का बचाव करने के लिए गृह मंत्रालय में पर्याप्त पुलिस अधिकारी लगा रखे हैं| ऐसी स्थिति में पुलिस सुधार की कोई भी आशा करना ही व्यर्थ है| गृह मंत्रालय में इन पुलिस अधिकारियों को लगाने से कोई जन अभिप्राय: सिद्ध नहीं होता क्योंकि जो पुलिस वाले अपने कार्यक्षेत्र में रहते हुए पुलिस को जनोंन्मुखी नहीं बना सके वे मंत्रालय में किस प्रकार सहायक हो सकते हैंयदि देश का पुलिस बल निष्ठा पूर्वक कार्य करता तो शायद नीतिनिर्माण के अतिरिक्त गृह मंत्रालय की कोई आवश्यकता ही नहीं रहती और जितना बड़ा गृह मंत्रालय का बीड़ा है उसका एक चौथाई ही पर्याप्त रहता|  

वैसे भी पुलिस तो जनता की सुरक्षा के लिए क्षेत्र में कार्य करने वाला बल जिसका कार्यालयों में कोई कार्य नहीं है| सभी स्तर के पुलिस अधिकारियों को कार्यक्षेत्र में भेजा जाना चाहिए और उन्हें, अपवादों को छोड़कर, हमेशा ही चलायमान ड्यूटी पर रखा जाना चाहिए| आज संचार के उन्नत साधन हैं अत: आवश्यकता होने पर किसी भी पुलिस अधिकारी से कभी भी कहीं भी संपर्क किया जा सकता है व आमने सामने बात की जा सकती है और पुलिस चलायमान ड्यूटी पर होते हुए भी कार्यालय का कामकाज देख सकती है|
वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को यह भी निर्देश हो को वे पुलिस थानों के कार्यालय की बजाय जनता से संपर्क कर निरीक्षण रिपोर्ट बनाएं| पुलिस का कार्य विशुद्ध रूप से जनता को सुरक्षा उपलब्ध करवाना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, किसी भी प्रकार से प्रशासन में हस्तक्षेप करना उनका कार्य नहीं है| पुलिस को वैसे भी सचिवालय में कार्य करने का कोई प्रशिक्षण नहीं होता अपितु शस्त्र चलाने, कानून-व्यवस्था का ही प्रशिक्षण दिया जाता है अत: सचिवालय के लिए पुलिस का कोई उपयोग न्यायोचित नहीं है| सचिवालय को, जो पुलिस अधिकारी कहीं पर उपयुक्त न हों, ऐसे नाकाम पुलिस अधिकारियों की शरण स्थली नहीं बनाया जाए

वास्तव में देखा जाये तो वर्दी में छिपे अपराधी ही आज समाज के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हैं| अतेव गृह मंत्रालय को पुलिस प्रभाव से पूर्णतया मुक्त कर गृह मंत्रालय का शुद्धिकरण किया जाये, पुलिस को अपने कार्य क्षेत्र में भेजा जायऔर प्रत्यक्ष सुरक्षा के अतिरिक्त किसी भी पुलिस अधिकारी को गृह मंत्रालय में नियुक्ति अथवा प्रतिनियुक्ति पर नहीं रखा जाए|  

आपराधिक मामलों में पुलिस जांच अपराधी को कम और पीड़ित को ज्यादा दुःख देने वाली होती है| यहाँ तक की पुलिस द्वारा जांच में, निर्धारित नियमों से विपरीत प्रक्रिया अपनाई जाती है| यद्यपि पुलिस को अपराध की सूचना मिलने पर तुरंत घटना स्थल पर जाकर प्रमाणों को सुरक्षित करना चाहिये और अपराधी का पक्ष जानना  चाहिए किन्तु पुलिस ठीक इसके विपरीत, पहले पीड़ित के बयान लेती है और अक्सर पीड़ित को धमकाकार उसे मामला वापिस लेने के लिए दबाव बनाती है| जबकि यदि पुलिस पहले अपराधी के बयान ले और बाद में इन बयानों के आधार पर पीड़ित के बयान ले तो पीड़ित पक्षकार, अपराधी के बयानों के विषय में, और बेहतर स्पष्टीकरण  दे सकता है और पीड़ित के बयान तो स्वयम ऍफ़ आई आर या न्यायालय के माध्यम से प्राप्त परिवाद में पहले से ही होते हैं| इससे स्थिति प्रारम्भिक स्तर पर ही अधिक स्पष्ट हो सकेगी| पुलिस अनुसन्धान का अभिप्राय किसी पक्ष को पीड़ा पहुंचाना न होकर दोनों पक्षों को सुनकर निष्पक्ष तथ्यात्मक रिपोर्ट तैयार करना है  जबकि पुलिस द्वारा मनमानी प्रक्रिया अपनाई जाती| आश्चर्य होता जब कई बार पुलिस किसी अभियुक्त की लम्बी अवधि के लिए रिमांड की मांग करती है वहीं कई बार अभियुक्त से कोई पूछताछ किये बिना ही उसे दोषी मान बैठती है|  

जनता की पुलिस के प्रति शिकायतों में भी कोई कमी नहीं आयी है और पुलिस वालों को यह विश्वास है  कि वे चाहे जो करें उनका कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं है| आंकड़े बताते हैं कि वर्ष भर में पुलिस के विरुद्ध प्राप्त होने वाली शिकायतों में मुश्किल से मात्र 1 प्रतिशत में ही कोई कार्यवाही होती है क्योंकि  इन शिकायतों की जांच किसी पुलिस अधिकारी के द्वारा ही की जाती है| आखिर वे अपनी  बिरादरी के विरुद्ध कोई कदम कैसे उठा सकते हैं? अत: यह व्यवस्था की जाए कि भविष्य में किसी भी पुलिसवाले चाहे किसी भी स्तर का क्यों न हो, के विरुद्ध जांच पुलिस द्वारा नहीं की जायेगी| अब तक की प्रवृति के अनुसार देश में जांचें दोषियों को बचाने के लिए की जाती रही हैं न कि दोषी का दायित्व निश्चित करने के लिए| मैं एक उदाहरण से आपको यह स्पष्ट करना चाहूंगा| एक बार ट्रेन के कुछ डिब्बे पटरी से उतर गए तो जांच के लिए इंजीनियर आये और डिब्बे वाले इंजीनियरों ने रिपोर्ट दी कि पटरी का अलायन्मेंट सही नहीं था और पटरी वाले इंजीनियरों का कहना था कि डिब्बे के पहियों का अलायन्मेंट ठीक नहीं था किन्तु किसी ने भी अपने विभाग को सही और दुरस्त होने या सही नहीं होने पर कोई टिपण्णी नहीं कीआज हमारी सरकारें इस प्रकार के छद्म बहानों की तामीर पर ही चल रही हैं और जांचों में मुख्य मुद्दे से हटकर ही कोई निष्कर्ष निकाला जाता है जिससे दोषियों को फलने फूलने का अवसर मिल रहा है और देश में दोषी लोक सेवक रक्तबीज की तरह बढ़ रहे हैं
अनुसन्धान में अग्रसर होने के लिए पुलिस तुरंत अपराधी का पक्ष जाने और पहले पीड़ित के बयान लेने में अनावश्यक समय बर्बाद नहीं करे क्योंकि जांच का उद्देश्य अभियुक्त की गिरफ्तारी के मजबूत आधार तैयार करना नहीं होकर सत्य का पता लगाना है|   न ही अभियुक्त की गिरफ्तारी न्याय का अंतिम लक्ष्य है|

दंड प्रक्रिया संहिता एवं पुलिस नियमों में पुलिस हैड कांस्टेबल को पुलिस थाना के प्रभारी की शक्तियां दी  हुई हैं  अत: निरीक्षक का हमेशा थाने पर उपस्थित रहना आवश्यक नहीं और एफ आई आर दर्ज करने के लिए हैड कांस्टेबल को किसी प्रशासनिक आदेश की भी आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह कानून द्वारा ऐसा करने के लिए पहले से ही सशक्त है और कोई भी पुलिस अधिकारी कानून से ऊपर नहीं है|  जरूरत है पुलिस की कार्य शैली और भूमिका में जनानुकूल परिवर्तन कर इसे एक नई दिशा दी जाए |

Monday, 14 October 2013

संवेदनहीन पुलिस के दिए जख्मों पर न्यायालय की मानवीय मरहम

यह शर्मिला शर्मा के बच्चों का दुर्भाग्य था या पंचकुला पुलिस की घोर लापरवाही कि अक्टूबर 2012 में एक सडक दुर्घटना में शर्मिला के पति की मृत्यु हो गयी थी| हरियाणा सरकार ने कहने को तो ऐसे मामलों में मुआवजा देने की घोषणा कर रखी है किन्तु पीड़ितों को अभी तक कोई मुआवजा नहीं दिया गया| शर्मिला अपने बच्चों का येन केन प्रकारेण पालन पोषण कर रही थी और अपने पति की मृत्यु के लिए मुआवजे हेतु संघर्ष कर रही थी कि 6 माह बाद दिनांक 07.05.13 को उसके परिवार पर दुखों का एक और पहाड़ टूट पडा| चंडीगढ़ के सेक्टर 10 में चंडीगढ़ परिवहन उपक्रम की एक बस उसे कुचलते हुए निकल गयी| शर्मिला के सिर में गहरी चोट आयी थी| जिस स्थान पर यह दुर्घटना हुई वहां से मल्टी स्पेसीलिटी अस्पताल मात्र 100 मीटर की दूरी पर ही है| किन्तु अपने आचरण के लिए ख्यात लापरवाह और अमानवीय पुलिस अधिकारी वहां 2 घंटे बाद पहुंचे जिससे शर्मिला को बचाया नहीं जा सका| सेक्टर 3 पुलिस थाने के प्रभारी श्री प्रकाश जब 2 घंटे बाद घटना स्थल पर पहुंचे तो शर्मिला सडक पर खून से लथपथ पड़ी थी यद्यपि अधीनस्थ पुलिस उस स्थान पर पहले से ही उसकी प्रतीक्षा करते रहे| इस घटना से शर्मिला के दो किशोरवय बच्चे पूरी तरह से अनाथ हो गये| यह भी ध्यान देने योग्य है कि शहरी क्षेत्र में परिवहन के लिए अधिकतम 10 मीटर तक लम्बाई की बसें ही उपयुक्त हैं जबकि 13.5 मीटर तक लम्बी असुरक्षित बसों को प्रयोग किया जा रहा है|   

उक्त तथ्य पंजाब हरियाणा उच्च न्यायालय के ध्यान में आने पर दिनांक 10.05.13 को स्व-प्रेरणा से संज्ञान लिया गया और अग्रिम कार्यवाही की गयी| उच्च न्यायालय ने अपने हाल ही के आदेश दिनांक 25.09.13 में कहा और आदेश दिया है कि पुलिस के संवेदनहीन आचरण से दो बच्चे अनाथ हो गये| किसी सामाजिक सुरक्षा की योजना के अभाव में इन दुखान्तिकाओं से नाबालिग बच्चे और अधिक पीड़ित हैं| न्यायालय ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए आदेश दिया कि हरियाणा सरकार की योजनानुसार 15 दिन के भीतर एक लाख रुपये की राशि भुगतान की जाए| न्यायालय की टिप्पणी थी कि संघ राज्य क्षेत्र चंडीगढ़ की संवेदनहीन पुलिस पीड़ित को मदद करने की बजाय क्षेत्राधिकार के मुद्दे को उलझाने में अधिक रुचिबद्ध रही है| न्यायालय के हस्तक्षेप से पहले तक तो दोषी अधिकारियों का अनुचित बचाव किया जाता रहा| सुनवाई के दौरान यह बताया गया है कि अब कई अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही प्रारंभ की गयी है जिसका अभी तक निष्कर्ष नहीं निकला है किन्तु इससे अवयस्क अनाथ बच्चों को कोई सांत्वना प्राप्त नहीं होती है| कम से कम, बच्चों को आर्थिक मदद तो दी ही जा सकती है| अत: चंडीगढ़ प्रशासन को आदिष्ट किया जाता है कि दोनों बच्चों के नाम से 1-1 लाख रूपये की राशि अंतरिम राहत के तौर पर 15 दिन के भीतर जमा करवाए| सत्यापन के बाद बच्चों को प्रतिमाह शिक्षा व पालन पोषण खर्चे के लिए 14200 रूपये भुगतान किये जाएँ| यह राशि सितम्बर माह से प्रारंभ होगी जोकि 7 अक्तूबर या इससे पूर्व देय होगी| न्यायमित्र की सहायता से तदनुसार आवेदन का निपटान किया गया|
फिर भी चंडीगढ़ प्रशासन और पंजाब सरकार से हरियाणा की तर्ज पर ऐसे मामलों में एक सम्यक नीति बनाने की अपेक्षा की गयी| इस प्रकार की घटनाओं को टालने के उपाय करने और दोषी पुलिस अधिकारियों पर अधिकतम एक माह की अवधि में कार्यवाही करने की रिपोर्ट के लिए मामले को पुन: दिनांक 19.11.13 को सूचीबद्ध करने के आदेश दिए गए व आदेश की दस्ती प्रति पक्षकारों को दी गयी|   

    

Tuesday, 1 October 2013

बंदर कहना महँगा पड़ा ...

ओंटारियो की एक कृषि फर्म को अपने एक कर्मचारी को बंदर कहना महँगा पडा जबकि वहां के मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ने चर्चित प्रकरण एड्रिअन मोंरोसे बनाम डबल डायमंड एकड़ लिमिटेड (2013 एच आर टी ओ 1273)  में दोषी पर भारी जुर्माना लगाया| किंग्सविले की एक टमाटर उत्पादक कंपनी डबल डायमंड एकड़ लिमिटेड  को मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ओंटारियो (कनाडा)  ने शिकायतकर्ता एड्रिअन मोंरोसे को बकाया वेतन और गरिमा हनन के लिए कुल 23,500 पौंड क्षतिपूर्ति देने के आदेश दिया है| 
तथ्य इस प्रकार हैं कि शिकायतकर्ता ने प्रतिवादी संस्थान में प्रवासी मौसमी कृषि मजदूर के रूप में दिनांक 9.1.09 से कार्य प्रारंभ किया था| शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि प्रतिवादी संस्थान के एक कर्मचारी करिरो ने चिल्लाते हुए मुझे कहा कि तुम पेड़ शाखा पर बंदर जैसे लगते हो और वह चला गया| मौसमी मजदूरों के करार के अनुसार उनके वेतन का पच्चीस प्रतिशत वेतन उन्हें बाद में भेजे जाने के लिए काटा जाता है किन्तु उसे समय पर भुगतान नहीं किया गया| आवेदक –शिकायतकर्ता-एड्रिअन मोंरोसे के अनुसार उसने यह मामला प्रतिवादी के समक्ष माह जनवरी व फरवरी 2009 में उठाया था| किन्तु उसकी  शिकायत के फलस्वरूप बदले की भावना से उसे नौकरी से ही निकाल दिया जिससे वह 5500 पौंड मजदूरी से वंचित हो गया| मामला जब ट्रिब्यूनल के सामने निर्णय हेतु आया तो ट्रिब्यूनल का यह विचार रहा कि क्षतिपूर्ति के उचित मूल्याङ्कन के लिए बदले की भावना से प्रेरित कार्यवाही से उसकी गरिमा, भावना और स्व-सम्मान को पहुंची ठेस के लिए प्रार्थी क्षतिपूर्ति का पात्र है| प्रार्थी  ने अपने देश वापिस भेज दिए जाने सहित मजदूरी के नुक्सान आदि इन सबके लिए कुल 30000 पौंड के हर्जाने की मांग की है| ओंटारियो मानवाधिकार संहिता की धारा 46.3 के अनुसार किसी संगठन के कर्मचारियों, अधिकारियों या एजेंटों द्वारा भेदभाव पूर्ण आचरण करने पर संस्था का प्रतिनिधित्मक दायित्व है, तदनुसार करेरो और मस्टरोनारडी के कृत्यों के लिए डबल डायमंड एकड़ लिमिटेड जिम्मेदार हैट्रिब्यूनल ने आवेदक को 15000 पौंड का हर्जाना बदले के भावना से हुए मानवाधिकार हनन के लिए स्वीकृत किया और मजदूरी के नुक्सान की भरपाई के लिए 5000 पौंड मय ब्याज के देने के आदेश दिए|
आवेदक ने यह भी मांग की कि प्रत्यर्थी अपने यहाँ मानवाधिकार नीति को लागू करने के लिए ओंटारियो मानवाधिकार आयोग से अनुमोदन करवाकर एक निश्चित प्रक्रिया लागू करे| इस पर ट्रिब्यूनल ने आदेश दिया कि प्रत्यर्थी 120 दिन के भीतर मानवाधिकार कानून विशेषज्ञ की सहायता से एक व्यापक मानवाधिकार और भेदभाव विरोधी नीति विकसित करे व प्रत्यर्थी के सभी अधिकारीकर्मचारी, जिन पर किसी भी प्रकार के पर्यवेक्षण का दयित्व हो वे, 101 मानवाधिकारों के विषय में 120  दिन के भीतर ऑनलाइन प्रशिक्षण प्राप्त करें |
वहीं भारतीय परिपेक्ष्य में मानवाधिकारों पर नजर डालें तो स्थिति अत्यंत दुखद कहानी कहती है| ओड़िसा में जुलाई 2008 में संजय दास को पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की निस्संकोच अवहेलना करते हुए गिरफ्तार कर लिया था अत: पुलिस की इस अनुचित कार्यवाही से व्यथित होकर पीड़ित ने वर्ष 2009 में उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल की| खेद का विषय है कि इस याचिका पर उच्च न्यायालय ने 4 वर्ष बाद अब वर्ष  2013 में सरकार से जवाबी हलफनामा दायर करने को कहा हैप्रकरण में जवाब देते हुए राज्य के पुलिस महानिदेशक ने कहा है कि अब दोषी की पहचान करना कठिन है| वास्तव में देखा जाए तो भारत भूमि के अधिकाँश लोगों, चाहे वे कोई भी पद धारण करते हों, के चिंतन से लोकतंत्र का मूल दर्शन ही गायब है| विधायिकाएं आधे-अधूरे और जनविरोधी कानून बनाती हैं, न्यायपालिका उन्हें लागू करते हुए और भोंथरा बना देती परिणामत: पुलिस का मनोबल और दुस्साहस-दोनों इस वातावरण में मुक्त रूप से पनपते  रहते  है|   पुलिस द्वारा न केवल आम नागरिक के साथ अभद्र व्यवहार करने और सरे आम गाली गलोज करने के  मामले मानवाधिकार तंत्र के सक्रिय या निष्क्रिय सहयोग और सानिद्य में जारी हैं बल्कि हिंसा तक  बेहिचक की जाती है| देश की सवा अरब की आबादी  में ढूंढने से भी उदाहरण मिलना मुश्किल है जहां बीस लाख में से एक भी पुलिस वाले को अपशब्दों के लिए या मानव गरिमा हनन के लिए दण्डित किया गया हो|

एक बार जब भारत ने मानवाधिकार संधि का अनुमोदन कर दिया तो उसके बाद सम्पूर्ण देश में मानवाधिकार की रक्षा करना, प्रोन्नति करना और उसका उल्लंघन रोकना सरकार का दायित्व हो जाता है ऐसा उल्लंघन चाहे किसी सरकारी सेवक द्वारा किया जा रहा हो या किसी नीजि व्यक्ति द्वारा| सरकार मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में ऐसा कोई भेदभाव नहीं बरत सकती किन्तु भारत के मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 12 में मात्र लोक सेवकों द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में ही आयोग द्वारा जांच का प्रावधान रखा गया है और इस प्रकार नीजि व्यक्तियों को मानवाधिकार उल्लंघन की खुली छूट दे दी गयी है कि उनके विरुद्ध शिकायतों पर आयोग कोई कार्यवाही नहीं करेगा| वहीं ओंटारियो राज्य ने अपने लिए एक विस्तृत और व्यापक मानवाधिकार संहिता बना रखी है| संहिता की धारा 29 में मानवाधिकार संरक्षण और प्रोन्नति के व्यापक प्रावधान है और यह कहा गया है कि आयोग का कार्य मानवाधिकारों (न केवल रक्षा करना बल्कि) के सम्मान को आगे बढ़ाना और प्रोन्नत करना आयोग का कार्य है तथा इसमें नीजि या सरकारी उल्लंघन के मध्य किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया गया है| मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ओंटारियो न केवल अपने मुख्यालय पर बल्कि कैम्प लगाकर घटना स्थल के नजदीक सुनवाई का अवसर देता है ताकि पीड़ित पक्ष अपना दावा आसानी से प्रभावी ढंग प्रस्तुत कर सके| उक्त मामले से यह भी स्पष्ट है कि वर्ष 2009  के मामले में ओंटारियो के ट्रिब्यूनल ने अपना निर्णय सुना दिया है जबकि समान अवधि के मामले में ओड़िसा उच्च न्यायालय ने अभी सरकार से जवाब ही मांगा है, निर्णय  में लगने वाले समय और मिलने वाली राहत के विषय में कोई सुन्दर पूर्वानुमान  नहीं लगाया  जा सकता| उल्लेखनीय है कि भारत जब मानवप्राणी  के रूप में प्राप्त अधिकारों के विषय में कनाडा से इतना पीछे है तो नागरिक के तौर पर उपलब्ध मूल अधिकारों के विषय में अभी चर्चा करना ही अपरिपक्व होगा, चाहे कागजी तौर पर वे संविधान में सम्मिलित हों| यह भी ध्यान देने योग्य है कि कनाडा, ब्रिटिश संसद के नियंत्रण से वर्ष 1982 में ही अर्थात भारत से 35 वर्ष बाद पूरी तरह से मुक्त हुआ है| अब देश की जनता कर्णधारों से जवाब मांगती है कि इस अवधि में इन्होंने आम भारतीय के लिए अब तक क्या किया और भविष्य में जो करने जा रहे हैं उसकी रूप रेखा क्या है|  


Wednesday, 14 March 2012

पूर्ण न्याय देने में संकोच कैसा

....

प्रतिष्ठा में,
माननीय श्री ऐ एस ओका
न्यायाधिपति,
व माननीय श्री ऐ वी पोतदार,
न्यायाधिपति,
बम्बई उच्च न्यायालय,
फोर्ट, मुंबई 400032

मान्यवर,
विषय : दाण्डिक रिट याचिका  संख्या  1666-10 -सुश्री वीणा सिप्पी बनाम नारायण दुम्ब्रे आदि

पुलिस द्वारा अवैध हिरासत एवं गिरफ्तारी के उक्त प्रकरण में आपके निर्णय दिनांक 05.03.2012  के लिए मैं आप द्वय को धन्यवाद देता हूँ| महिला याचिकाकर्त्री सुश्री वीणा सिप्पी भी इस साहसिक कार्य के लिए धन्यवाद की पात्र है जिसने महाराष्ट्र पुलिस जैसे संगठन से मुकाबला किया है| मीडिया व महिला जगत में आपके उक्त निर्णय की बड़ी सराहना हो रही है किन्तु इस प्रसंग में मेरा विचार किंचित भिन्न है|

माननीय न्यायालय के उक्त निर्णय का सम्मान करते हुए मेरे विचार इस प्रकार हैं:
1.                 माननीय न्यायालय ने प्रासंगिक प्रकरण में निर्णय प्रसारित करते हुए अन्य बातों  के साथ साथ कहा है कि मामले की परिस्थितियों को देखते हुए याचिकाकर्त्री को 250000रुपये क्षतिपूर्ति जिस दिन उसे अवैध रूप से गिरफ्तार किया गया अर्थात दिनांक 05.04.2008 से 8% वार्षिक ब्याज सहित आंकना उचित समझते हैं| राज्य सरकार इस क्षतिपूर्ति का भुगतान करेगी| याचिकाकर्त्री इस न्यायालय में कम से कम 22 बार उपस्थित हुई जिसके लिए हम 25000रुपये खर्चे के दिलाना उपयुक्त समझते हैं| राज्य सरकार इस क्षतिपूर्ति और खर्चे की, दोषी अधिकारियों का दायित्व निर्धारित करने के पश्चात, उनसे वसूली करने को स्वतंत्र है|
2.                 माननीय सुप्रीम कोर्ट ने रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा (AIR 2002 SC 1771)   के मामले में कहा है कि कानून को समाज का अनुसरण करना चाहिए न कि उसका त्याग| अतः न्यायालय का यह भी कर्तव्य है कि वह समाज के वास्तविक धरातल को ध्यान रखे| मेरा निवेदन है कि स्वतंत्र भारत में मुद्रा स्फीति की औसत वार्षिक चक्रवृद्धि दर 8% से अधिक आती है और इतना ब्याज तो वास्तव में शून्य हो जाता है| गत वर्षों की मुद्रा स्फीति की दर तो 10% से अधिक चल रही है अतः 8% ब्याज देने से तो लाभार्थी को ऋणात्मक ब्याज मिलेगा और उसे हानि ही होगी| अतः माननीय न्यायालय को किसी भी मामले में ब्याज देते समय इस तथ्य को ध्यान रखना चाहिए कि पीड़ित पक्ष को हुई हानि की ब्याज से पूर्ति अवश्य हो|
3.                 प्रकरण के विचारण के दौरान माननीय न्यायालय ने यह भी पाया है कि याचिकाकर्त्री को पुलिस ने अवैध रूप से गिरफ्तार कर पुलिस लोक अप में डाल दिया और उस पर बम्बई पुलिस अधिनयम, 1959 की  धारा 117 सहपठित 112 के आरोप मिथ्या रूप से गढ़ दिए गए| यही नहीं याचिकाकर्त्री की गिरफ्तारी का कोई पंचनामा तक तैयार नहीं किया गया और न ही उसकी 90 वर्षीय वृद्ध और बीमार माता को कोई सूचना दी गयी किन्तु इन सभी अभियोगों से बचाव के लिए पुलिस ने फिर कुछ फर्जी दस्तावेज गढे हैं और महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपाया भी है|
4.                 यह है कि माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय ने अवैध गिरफ्तारी के समान प्रकरण संजीव कुमार सिंह बनाम दिल्ली राज्य के निर्णय दिनांक 25.02.2008 में सम्पूर्ण घटनाक्रम की सी बी आई जांच करवाने और दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही के अतिरिक्त आदेश दिए थे| माननीय न्यायालय का भी यह पुनीत कर्तव्य है कि वह पूर्ण न्याय के लिए दोषियों के प्रति कोई उदारता और नरमी नहीं बरते|
5.                 याचिकाकर्त्री ने यह भी कहा है कि उसने मजिस्ट्रेट को निवेदन कर दिया था कि उसे झूठा फंसाया गया है और उसे 700रुपये के निजी मुचलके पर रिहा किया गया| उसने यह भी स्पष्ट आरोप लगाया है कि उसे माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा डी के बासु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य के मामले में दिए गए निर्देशों के सरासर उल्लंघन में गिरफ्तार किया गया| उसके अनुसार संविधान के अनुच्छेद 2122 द्वारा प्रदत उसके अधिकारों का उल्लंघन हुआ है और उसे अवैध रूप से हिरासत में रखा गया| उक्त के परिणाम स्वरुप उसे शारीरिक, मानसिक और आर्थिक पीड़ा हुई है| याचिकाकर्त्री महिला को 40व्यक्तियों के साथ  एक पुलिस लोक अप में अमानवीय दशा में एक रात बितानी पड़ी | याचिकाकर्त्री का यह भी कहना है कि लोक अप में ताज़ा हवा का अभाव था अतः उसका दम घुटता रहा| इस आरोप का प्रत्यर्थी गण ने भी कोई विरोध नहीं किया|
6.                 माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट ओन रिकोर्ड एसोसिएसन (AIR 1994 SC 268)  के मामले में कहा है कि ऊपरी स्तर के न्यायालयों के लिए, अन्तर्निहित सीमाओं के अध्यधीन, आकाश के नीचे कोई भी प्रकरण न्यायिक समीक्षा के लिए खुला है| माननीय न्यायालय को यह भी स्मरण में रहना चाहिए कि संवैधानिक न्यायालय के लिए पूर्ण और वास्तविक न्याय देने हेतु संविधान ही सीमा है, यदि न्याय देने में  विधायिका का कोई अन्य कानून अपूर्ण हो अथवा किसी सुसंगत कानून का अभाव हो तो भी संवैधानिक न्यायालय पूर्ण न्याय दे सकते हैं| कानून और न्याय प्रदानगी निकाय का उद्देश्य यह है कि पीड़ित पक्षकार को समुचित राहत मिले और पीडक पक्षकार को उचित दंड मिले ताकि अन्य लोग भविष्य में वैसा दंडनीय कृत्य करने से दूर रहें|
7.                 माननीय सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो बनाम अनुपम कुलकर्णी (1992 AIR 1768) के मामले में कहा है कि कानून पुलिस हिरासत के पक्ष में नहीं है| राष्ट्रीय पुलिस आयोग ने भी अपनी तीसरी रिपोर्ट में कहा है कि देश में 60% गिरफ्तारियाँ अनावश्यक होती हैं जिन पर जेलों में अनावश्यक 43.2% खर्चा होता है| माननीय न्यायालय ने जोगिन्दर कुमार बनाम उत्तरप्रदेश राज्य(AIR 1994 SC 1349) के मामले में भी स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जघन्य अपराध के अतिरिक्त गिरफ्तारी को टाला जाना चाहिए| भारत के विधि आयोग की  एक सौ बहत्तरवीं रिपोर्ट दिनांक 14 दिसम्बर 2001 में कहा गया है, गिरफ्तार करने की शक्ति पुलिस द्वारा उद्दापन और भ्रष्टाचार का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है .... जहाँ तक बहुसंख्य अपराधियों का प्रश्न है (हत्या , डकैती , लूटपाट , और राज्य के विरुद्ध अपराध आदि को छोड़ते  हुए) वे गायब होने वाले नहीं हैं| उपरोक्त से स्पष्ट है कि जघन्य अपराध, जिनकी अन्वीक्षा सत्र न्यायाधीश द्वारा की जाती है, के अतिरिक्त सामान्यतया गिरफ्तारी नहीं की जानी  चाहिए| संविधान के अनुछेद 141 के आलोक में सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित उक्त निर्णय कानून का प्रभाव रखता है| माननीय न्यायालय ने जोगिन्दर कुमार बनाम उत्तरप्रदेश राज्य के मामले के निर्णय के पैरा 27 में  स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जिस मजिस्ट्रेट के सामने गिरफ्तार व्यक्ति को पेश किया जाए उसका यह कर्तव्य होगा कि इन अनुदेशों की पालना से वह संतुष्ट हो|
8.                 यह है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता एक व्यक्ति के जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण अधिकार है और इसे ध्यान में रखते हुए इन्दर मोहन गोस्वामी बनाम उत्तरांचल राज्य के मामले के निर्णय दिनांक 09.10.2007 में कहा है कि मजिस्ट्रेटों को गिरफतारी वारंट जारी करने का विकल्प अंतिम उपचार के रूप में ही प्रयोग किया जाना चाहिए| गिरफ्तार करने का उद्देश्य अभियुक्त का न्यायिक प्रक्रिया से बचना रोकना है और जब व्यक्ति स्वयम पुलिस थाने में उपस्थित हो तो ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती| अतः दी गयी परिस्थितियों में याचिकाकर्त्री की गिरफ्तारी प्रथम दृष्टया ही अवैध है|
9.                 यह है कि जो गिरफ्तारी अनावश्यक, व सुप्रीम कोर्ट के अनुदेशों के उल्लंघन में हो कानून उसका समर्थन नहीं करता और ऐसा कृत्य स्पष्टतया  भारतीय दंड संहिता की धारा 342 (सदोष परिरोध) की परिधि में अपराध है| जहां तक  पुलिस अधिकारियों ने  याचिकाकर्त्री पर दुर्व्यवहार और गाली गलोज के आरोप लगाये हैं तो यदि यह सत्य हो तो भी पुलिस के कर्तव्यहीन आचरण ने ही उसे इस सीमा तक उतेजित किया है और  पुलिस संवर्ग अपने वरिष्ठ अधिकारियों और प्रभावी राजनेताओं से ऐसा व्यवहार अक्सर पाता है किन्तु एक भी मामलें में वे उनके विरुद्ध कोई अपराध दर्ज नहीं करते| आखिर क्यों..?
10.             यह है कि भारत संयुक्त राष्ट्र संघ (संक्षेप में संघ) का सदस्य है और मानवाधिकार संरक्षण के विषय में संघ द्वारा बनाये गए कानून भी संविधान के अनुच्छेद 2122 के अलोक में विधि का बल रखते हैं| जिस प्रकार किसी विधिक प्रावधान के अभाव में भी माननीय न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 21 22 की जनतांत्रिक व्याख्या कर क्षतिपूर्ति का आदेश दिया है ठीक उसी प्रकार मानवाधिकारों की रक्षा के लिए माननीय न्यायालय पुलिस को भी मानवाधिकार संरक्षण के लिए समुचित आदेश प्रदान कर सकता है|
11.             यह है कि मूल अधिकार मात्र नागरिकों को ही उपलब्ध हैं जबकि मानवाधिकार मनुष्य के रूप में जन्म लेने मात्र से उपलब्ध हैं और उनका स्थान मूल अधिकारों से ऊपर है| मानवाधिकार अंतर्राष्ट्रीय संधियों से प्राप्त हैं और उनकी मांग करने के लिए विधायिका के किसी औपचारिक कानून की अनिवार्यता नहीं है बल्कि वे संविधान के अंतर्गत स्वतः ही उपलब्ध हैं|
12.             यह है कि संघ ने हिरासती व्यक्तियों के उपचार हेतु न्यूनतम मानक नियम बना रखे हैं| उक्त का नियम 9 (1) यह प्रावधान करता है कि एक कमरे या सेल में एक से अधिक व्यक्ति नहीं रखे जायेंगे| नियम 10 यह प्रावधान करता है कि शयन व्यवस्था इस प्रकार होगी कि वह स्वास्थ्य, मौसम, घन फीट हवा तत्व, न्यूनतम स्थान, रोशनी, (सर्दी के मौसम में) ताप और रोशनदान आदि का पूर्ण ध्यान रखे| जहाँ हिरासती व्यक्ति रहते अथवा कार्य करते हों वहाँ खिडकियां इतनी बड़ी व इस प्रकार से होंगी कि हिरासती व्यक्ति प्राकृतिक रोशनी में पढ़ सकें और चाहे कृत्रिम रोशनदान हों अथवा नहीं किन्तु ताज़ा हवा आ सके| कृत्रिम रोशनी इतनी पर्याप्त दी जायेगी कि हिरासती व्यक्ति आँखों को बिना किसी प्रकार की क्षति के आराम से पढ़ अथवा कार्य कर सके| नियम 12 के अनुसार सफाई व्यवस्था पर्याप्त होगी, नियम 13 के अनुसार  मौसम के अनुकूल स्नान की व्यवस्था होगी तथा नियम 14 के अनुसार हिरासती व्यक्तियों के प्रयोग में आने वाले संस्था के सभी भाग सफाई से रखे जायेंगे| आगे के नियमों के अनुसार उन्हें धोने के लिए साबुन और जल उपलब्ध करवाया जायेगा तथा हिरासती व्यक्ति अपना स्वाभिमान बनाये रखें इसलिए उन्हें बालों और दाढ़ी की उचित देखभाल करने के लिए सुविधाएं दी जाएँगी व पुरुषों को नियमित दाढ़ी बनाने की सुविधा दी जायेगी| प्रत्येक हिरासती व्यक्ति को साफ़ सुथरे कपडे और बिस्तर दिया जायेगा| नियम 20 के अनुसार प्रत्येक हिरासती व्यक्ति को स्वास्थ्य वर्धक और अच्छी तरह बनाया हुआ भोजन, व आवश्यकतानुसार जल उपलब्ध करवाया जायेगा|
13.             यह है कि भारत में अंग्रेजी शासन काल में जेल अधिनियम, 1894 व उसके सुसंगत नियम और मनुअल बनाये गए थे जिनका उद्देश्य अंग्रेजी  शासन द्वारा भारतियों का दमन कर उनके शोषण से ब्रिटिश खजाने को भरना था किन्तु आज कल्याणकारी राज्य में ये सभी प्रासंगिक  नहीं रह गए हैं| जबकि स्वयं ब्रिटिश शासन ने इंग्लॅण्ड में लागू जेल अधिनियम को 1952 में ही बदल दिया है| इसी स्थिति से चिंतित होकर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने राम मूर्ति बनाम कर्नाटक राज्य के मामले (1996) में केंद्र और राज्य सरकारों को  एक नई आदर्श जेल मनुअल बनाने का निर्देश दिया था| इन्हीं निर्देशों की अनुपालना में गृह मंत्रालय भारत सरकार ने वर्ष 2003 में आदर्श जेल मनुअल तैयार कर ली है किन्तु अधिकांश राज्य सरकारों ने अभी तक इसे लागू नहीं किया है और हिरासती व्यक्तियों के मानवाधिकारों का खुला हनन जारी है|
14.             यह है कि माननीय न्यायालय का यह पुनीत कर्तव्य है कि वह मानव गरिमा की रक्षा के लिए राज्य सरकार को निर्देश दे कि वह आदर्श जेल मनुअल तथा संयक्त राष्ट्र संघ के हिरासती व्यक्तियों के उपचार हेतु न्यूनतम मानक नियमों को अविलम्ब लागू करे ताकि अभिरक्षा के दौरान नागरिकों को मानवोचित व्यवहार मिले |
15.             यह है कि माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने न्यायपालिका के कर्तव्यों को रेखांकित करते हुए शेलेस्वर नाथ सिंह के मामले के निर्णय दिनांक 11.08.1999  में कहा भी है कि प्रत्येक को समझ लेना चाहिए कि न्यायपालिका जनता की सेवा के लिए बनाई  गयी है न कि वकीलों और न्यायाधीशों की सेवा के लिए| कानून के अच्छे शासन के लिए आवश्यक है कि न केवल उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट उक्त नियमों का लागू किया जाना सुनिश्चित करें बल्कि निचले स्तर के न्यायालय भी इस प्रक्रिया में निर्भय होकर समान रूप से भागीदार बनें| प्रकरण से स्पष्ट है कि सम्बंधित मजिस्ट्रेट ने भी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनुपालना सुनिश्चित नहीं की है| माननीय न्यायालय ने  याचिकाकर्त्री की गिरफ्तारी को अवैध पाया है| जिन अभियोगों के लिए अधिकतम दंड मात्र 1200रुपये अर्थदंड ही हो और कारावास का कोई प्रावधान ही न हो उन अभियोगों में तो गिरफ्तार करना सरासर अनुचित और अवैध है| जब गिरफ्तारी मूल रूप से अवैध हो तो गिरफ्तार व्यक्ति से जमानत की अपेक्षा ही क्यों की जाय अर्थात मजिस्ट्रेट को उसे दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 59 के अंतर्गत बिना शर्त रिहा करना चाहिए था| किन्तु माननीय न्यायालय ने न तो मजिस्ट्रेट के आचरण पर कोई टिपण्णी की है और न ही विधि के उल्लंघन के लिए मजिस्ट्रेट के विरुद्ध  किसी प्रकार की कार्यवाही प्रारम्भ की है|
16.             यह है कि माननीय न्यायालय के निर्णयों से जनता को यह सन्देश नहीं जाना चाहिए कि राज्य में अच्छे कानून के शासन का अभाव है अथवा लोकतंत्र के तीनों स्तंभ एक ही जैसे व एकजुट हैं और जरुरत पडने पर आपस में एकदूसरे का बचाव करते हैं| न्याय के पूजनीय मंदिर पीडितों को यह सन्देश न दें कि भारतीय गणतंत्र के संवैधानिक न्यायालयों में भी न्याय एक अपवाद मात्र ही है|
17.             यह है कि उक्त घटनाक्रम से पुलिस द्वारा न्यायिक अवमान के साथ-साथ कानून का उल्लंघनकर क्षति पहुँचाने,  मिथ्या  दस्तवेज तैयार करने व  काम में लेने, तथ्यों को छुपाने और सदोष परिरोध के आरोप प्रथम दृष्टया स्थापित होते हैं किन्तु माननीय न्यायालय ने इन अपराधों का कोई प्रसंज्ञान नहीं लिया है और न ही कोई निर्देश दिए हैं| जहां तक पीड़ित व्यक्ति को राजकोष से क्षतिपूर्ति देने का प्रश्न है, यह परिपाटी लंबे समय से चली आरही है किन्तु इससे पुलिस की मनोवृति में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं हुआ है| न्यायालय के निर्णय से पुलिस प्रशासन को इस प्रकार सन्देश जाना चाहिए कि इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृति न हो| यदि सरकार इस रकम की पुलिस अधिकारियों से व्यक्तिगत वसूली करे तो भी पुलिस के अनैतिक व भ्रष्ट आचरण और उससे संभावित आय को देखते हुए यह रकम तो पुलिस अधिकारियों के लिए तुच्छ्मात्र है|
18.             यह है कि राज्य सरकारें पुलिस से अनुचित कार्य लेती हैं फलतः वे पुलिस से डरती हैं| माननीय सुप्रीम कोर्ट ने देल्ही जुडीशियल सर्विस एसोसिएसन (1991 AIR 2176) के मामले में कहा भी है, पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध प्रभावी कार्यवाही करने में सरकारी उदासीनता से यह सन्देश मिलता है कि गुजरात राज्य में प्रशासन पर पुलिस भारी पड़ती है अतः प्रशासन दोषी पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही करने में संकोच कर रहा है| यदि यही प्रवृति और परिपाटी बढ़ने दी गयी तो यह राज्य में विधि के शासन का नाश कर देगी| ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से गुजरात और महाराष्ट्र राज्य समानपृष्ठ भूमि वाले ही हैं| अतः माननीय न्यायालय के कड़े निर्देशों के अभाव में महाराष्ट्र राज्य सरकार पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध मुश्किल से ही कोई कार्यवाही करेगी|

मैं यहाँ पर यह भी निवेदन करना प्रासंगिक समझता हूँ कि प्रत्येक विवेकी शक्ति के प्रयोग का आधार जनहित प्रोन्नति होना चाहिए विशेषतः जब यह अहम प्रश्न संविधान के संरक्षक उच्च न्यायालय के सामने हो| माननीय न्यायालय के उक्त निर्णय के विरुद्ध अपील भी दायर की जा सकती है किन्तु वह भी एक अंतहीन, खर्चीली और जटिल व थकाने वाली प्रक्रिया होगी| यद्यपि माननीय न्यायालय स्वप्रेरणा से इस प्रकरण में पुनरीक्षा कर पूर्ण और वास्तविक न्याय देने के लिए सशक्त है| भारतीय गणतंत्र को मज़बूत बनाने की ईश्वर आप द्वय को सदैव सद्प्रेरणा देते रहें| इसी आशा और विश्वास के साथ ,

आपका शुभेच्छु

मनीराम शर्मा
(राष्ट्रीय अध्यक्ष के राज्य सलाहकार )                   दिनांक :13.03.2012
ईमेल :maniramsharma@gmail.com  


Thursday, 1 March 2012

निरीक्षक स्तर तक के लिए अभियोजन स्वीकृति आवश्यक नहीं


नागराज बनाम मैसूर राज्य (१९६४ ए आई आर २६९) में निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि  अधिनियम की धारा २६ में प्रावधान है कि सहायक अधीक्षक से नीचे की श्रेणी का कोई भी अधिकारी जिसे उपधारा ३ के अंतर्गत  अधिकृत किया हो और उपधारा ३ में प्रावधान है कि धारा ८ के प्रावधानों के अध्यधीन सहायक अधीक्षक से नीचे की श्रेणी के किसी पुलिस अधिकारी को दण्डित करने का  अधिकार महानिरीक्षक को होगा| इसका अभिप्राय यह है कि महानिरीक्षक एक उपनिरीक्षक को बर्खास्त कर सकता है जो कि सहायक अधीक्षक से निम्नतर श्रेणी का होता है| इसलिए अपीलार्थी के अभियोजन के लिए राज्य सरकार से कोई स्वीकृति लेने की कोई आवश्यकता नहीं है यहाँ तक कि यदि उसने अपने शासकीय कार्य निष्पादन के समय यह अपराध किया हो|

Monday, 27 February 2012

पुलिस अभिरक्षा में मृत्यु, कानून द्वारा शासित सभ्य समाज में एक कलंक है

दाण्डिक अपील संख्या ८५७/ १९९६  शकीला अब्दुल गफार खान बनाम वसंत रघुनाथ ढोबले में निर्णय सुनते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि  सरकार सर्वशक्तिमान और सर्वत्र व्याप्त अध्यापक की तरह लोगों के सामने उदाहरण प्रस्तुत करती है, यदि सरकार ही कानून तोडने वाली हो जाये तो यह कानून के अपमान को जन्म देती है| जमीनी हकीकत को नजरंदाज कर, ऐसे समय में जब स्वयं अभियोजन एजेंसी की भूमिका दांव पर हो तो मामले को प्रत्येक संभावित संदेह से परे साबित करने की अपेक्षा करना, प्रकरण विशेष की परिस्थितियों में जैसा कि वर्तमान मामले में ,न्यायिक स्खलन में परिणित होता है व न्यायप्रणाली को संदेहास्पद बनाता है| अंतिम परिणाम में समाज पीड़ित होता है और अपराधी प्रोत्साहित होता है| पुलिस अभिरक्षा में यातनाओं में हाल ही में हुई वृद्धि से न्यायालयों की  इस अवास्तविक विचारधारा  से प्रोत्साहित होती है इससे लोगों के दिमाग में यह विश्वास मजबूत होता है कि यदि एक व्यक्ति की लोकप में मृत्यु हो जाती है तो भी उनका कुछ भी नहीं बिगडेगा कारण कि उसे यातना के प्रकरण में प्रत्यक्ष रूप से लपेटने के लिए अभियोजन के पास मुश्किल से ही कोई साक्ष्य उपलब्ध  होगा| न्यायालय को इस तथ्य को नजरंदाज नहीं करना चाहिए कि पुलिस अभिरक्षा में मृत्यु, कानून द्वारा शासित सभ्य समाज में एक कलंक है और यह व्यवस्थित सभ्य समाज के लिए गंभीर खतरा है| अभिरक्षा में यातनाएं भारतीय संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों का हनन हैं और यह मानवीय गरिमा से टकराव हैं|



बंदी के साथ पुलिस ज्यादतियां और दुर्व्यवहार किसी भी सभ्य राष्ट्र की छवि को कलंकित करते हैं और खाकी वर्दी वालों को अपने आपको कानून से ऊपर  व कई बार तो स्वयं को ही कानून समझने को प्रोत्साहित करते हैं| यदि स्वयं बाड़ द्वारा खेत को खाने की दूषित मनोवृति को कड़े उपाय कर रोकने का यत्न नहीं किया गया तो  आपराधिक न्याय प्रदनागी निकाय की नींव ही हिल जायेगी और सभ्यता का अव्यवस्था की ओर बढकर विनाश होने व जंगली युग में परिणित होने का गंभीर खतरा उत्पन्न हो जायेगा| इसलिए न्यायालयों को चाहिए कि वे ऐसे मामलों में वास्तविक ढंग से और वांछित संवेदना के साथ कार्यवाही करें अन्यथा आम आदमी का न्यायिक निकाय की विश्वसनीयता में से धीरे धीरे विश्वास उठ जायेगा, यदि ऐसा हुआ तो यह बहुत ही दुखद दिन होगा| यदि मात्र तर्क के लिए ही यह मान लिया जाया कि अभियुक्त को दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं है तो भी सरकार का यह कर्तव्य है कि वह स्पष्ट करे कि व्यक्ति को किन परिस्थितयों में चोटें आयीं व उपयुक्त मामले में इसके कार्यकारियों यह निर्देश दिए जा सकते हैं कि राज्य सरकार द्वारा मामलें में अग्रिम कार्यवाही हेतु ध्यान में लाया जाय| न्यायालय का कर्तव्य है कि वह अनाज में से फूस को अलग करे| किसी साक्ष्य या सामग्री विशेष का मिथ्या होने से मामला प्रारम्भ से अंत तक समाप्त नहीं हो जाता है| भारत में यह सिद्धांत बहुत जोखिमपूर्ण है कि यदि एक साक्षी झूठ कहा रहा है तो उस सम्पूर्ण साक्ष्य को ही नकार दिया जाय किन्तु यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि न्याय प्रशासन प्रभावित लोगों को न्याय देने के लिए ही  अस्तित्व में है| 
विचारण/प्रथम अपील न्यायालय मात्र तकनीकि बारीकियों से प्रभावित नहीं हो सकते और उन तथ्यों को अनदेखा नहीं कर सकते जिनकी सकारात्मक जांच करने और ध्यान देने की आवश्यकता है| न्यायालय विचारण के उद्देश्य अर्थात सत्य प्राप्त करने और उस भूमिका से असावधान रहने जिसके लिए संहिता में पर्याप्त शक्तियाँ हैं, को नजरंदाज कर मात्र एक साक्ष्य दर्ज  करने वाले टेप रिकोर्डेर  की भांति कार्य करने के लिए ही नहीं है| इस पर भारी कर्तव्य और दायित्व अर्थात न्याय देना है, विशेष कर ऐसे मामले में जहां स्वयं अभियोजन एजेंसी की भूमिका ही विवादित हो|  कानून को प्राणहीन रूप से बैठे नहीं देखा जाना चाहिए जिससे कि जो इसकी अवज्ञा करे बच निकले और जो इसका संरक्षण मांगे वह निराश हो बैठे | न्यायालयों को यह सुनिश्चित करना है कि दोषियों को दण्डित किया जाय और यदि अनुसन्धान या अभियोजन में कोई कमी दिखाई देती है या पर्दा उठा कर समझी जा सकती है तो उसके साथ कानूनी ढांचे के भीतर उचित ढंग से व्यवहार किया किया जाय| जैसा कि लोकप्रिय है यद्यपि कानून को अंधा दिखाया जाता है किन्तु यह मात्र एक पर्दा है जो पक्षकारों को नहीं देखने के लिए है और यह अन्याय  को रोकने के लिए अपने कर्तव्य  की उपेक्षा कर न्यायालय के सामने आये तथ्यों को नजरंदाज करने या हेतुक से मुंह मोडने के लिए नहीं है| This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.
जब एक सामान्य नागरिक शक्तिशाली प्रशासन, असहानुभूती, अकर्मण्यता ,या आलस्य के विरुद्ध शिकायत करता है तो न्यायालय स्तर पर कोई भी अकर्मण्यता या सुस्ती से विकलांगता की प्रवृति बढ़ेगी और अंततोगत्वा चरणबद्ध रूप में विश्वास में गिरावट आकर ,देश का न्याय प्रदनागी निकाय ही नष्ट हो जायेगा| न्याय करना अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्य है और इस कर्तव्य में लालफीताशाही की अनुमति नहीं दी जा सकती| 


Sunday, 26 February 2012

सूचना प्राप्त करने के लिए एक व्यक्ति को यातना देना निश्चित रूप से इसमें शामिल नहीं है


सुप्रीम कोर्ट द्वारा दाण्डिक अपील संख्या ९१९/१९९९ मुंशी सिंह गौतम बनाम मध्यप्रदेश राज्य के निर्णय दिनांक १६.११.२००४ में कहा गया है कि न्यायालयों को, विशेष रूप से हिरासत में अपराधों के सम्बन्ध में,  अपने रुख, प्रवृति और विचारधारा में परिवर्तन लाने और अधिक संवेदनशीलता दिखाने तथा संकीर्ण तकनीकि सोच के स्थान पर वास्तविक विचारधारा अपनानी चाहिए, हिरासती हिंसा के मामलों की प्रक्रिया में यथा संभव अपनी शक्तियों के भीतर, सत्य का पता लगाया जाय व दोषी बच नहीं जाए ताकि अपराध से पीड़ित को संतोष हो सके कि आखिर कानून की श्रेष्ठता जीवित है| एक अपराध की रिपोर्ट प्राप्त होने पर पुलिस का कर्तव्य है कि सत्य का पता लगाने के लिए  साक्ष्यों का संग्रहण करे जिन्हें विचारण के समय प्रस्तुत किया जा सके| सूचना प्राप्त करने के लिए एक व्यक्ति को यातना देना निश्चित रूप से इसमें शामिल नहीं है चाहे वह अभियुक्त हो अथवा साक्षी हो| यह कर्तव्य कानून की चारदीवारी के भीतर होना चाहिए| कानून लागू करने वाले साक्ष्य संग्रहण के नाम पर कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकते | यह तर्क कि मृतक पुलिस थाने पर अत्यंत गंभीर हालत में आया था और अपना नाम बताने के बाद मर गया, झूठा लगता है क्योंकि अभियुक्त ने धारा ३१३ के अपने बयानों में स्पष्ट कहा है कि सूचना प्राप्त होने पर जहाँ कि मृतक घायल अवस्था  में बेहोश पड़ा था| इस दृष्टिकोण से जहां तक अभियुक्त गुलाबसिंह पर हिरासती यातना का आरोप है , साबित हो गया है |

Thursday, 26 January 2012

पुलिस द्वारा फर्जी मुठभेड़ में उन्हें मृत्यु दण्ड ही दिया जाना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने प्रकाश कदम बनाम रामप्रसाद विश्वनाथ गुप्ता (मनु/सुको/0610/2011) के निर्णय में कहा है कि यह कोई निरपेक्ष नियम नहीं है कि एक बार अभियुक्त को जमानत दे दी जाय तो मात्र जमानत का दुरूपयोग होने की सम्भावना पर ही निरस्त की जा सकती है| बहुत से दूसरे कारण भी हैं जब उन पर भी जमानत निरस्त करते समय विचार किया जा सकता है| यह बड़ा ही गंभीर मामला है जिसमें प्रथम दृष्टया कुछ पुलिस अधिकारी और स्टाफ को निजी व्यक्तियों ने अपने विरोधियों को मारने के लिए नियुक्त किया गया| यदि कुछ पुलिस अधिकारी और स्टाफ का निजी व्यक्तियों द्वारा अपने विरोधियों को मारने के लिए ठेके पर उपयोग किया जाये तो गवाहों के दिमाग में भी अपनी सुरक्षा के प्रति पर्याप्त भय हो सकता है| यदि पुलिस अधिकारी और स्टाफ तीसरे पक्षकार के कहने पर मार सकते हैं तो इस बात की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता कि अपने आप को बचाने के लिए वे महत्वपूर्ण गवाह या उसके रिश्तेदार को भी मार सकता हैं  या अन्वीक्षण के समय उसे धमकी दे सकते हैं|

जमानत देते समय सत्र न्यायाधीश ने इस पहलू की पूर्णतः उपेक्षा कर दी है| उच्च न्यायालय ने अभियुक्त अपीलार्थी की जमानत निरस्त करने में पूर्णतः ठीक है| आगे परीक्षण में पुलिसवाले द्वारा फर्जी मुठभेड़ साबित होने पर इसे दुर्लभतम मामला समझकर उन्हें  मृत्यु दण्ड ही दिया जाना चाहिए| फर्जी मुठभेड़, जिस व्यक्ति से कानून को बनाये रखने की जिम्मेदारी हो उसके द्वारा, एक शीत रंजित नृशंस संहार है|अपीलें निरस्त की जाती हैं|