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Saturday, 17 May 2014

अपराध और भ्रष्टाचार के लिए अनुकूल भारत की जलवायु

समाज में अपराध भर्त्सनीय हैं क्योंकि ये मानव मात्र के सह अस्तित्व के मौलिक सिद्धांत के विपरीत कार्य करते है| वे सामाजिक ढांचे को न केवल कमजोर करते हैं अपितु  उसको नष्ट करने के लिए ताल ठोकते हैं| ये शांतिमय व्यक्तिगत जीवन का त्याग करते हैं और अनावश्यक पीड़ा या मृत्यु का कारण बनते हैं|  अपराध जब संगठित रूप में प्रायोजित किये जाएँ तो और अधिक घातक हो जाते हैं| और जब इन अपराधियों की प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उन्हीं लोगों द्वारा मदद की जाए जिनका कर्तव्य इन्हें रोकना है तो स्थिति बद से बदतर हो जाती है|   जब पीड़ित व्यक्ति को दुःख सहन करने के लिए विवश किया जाए  और अपराधी बच  निकलते हैं तो यह असीम आक्रोश उत्पन्न करता है | आज भारत कुछ ऐसी ही हालत से गुजर रहा है|
 आपराधिक न्याय प्रशासन के प्रत्येक क्षेत्र में सुधार की आवश्यकता है| जहां एक ओर न्याय प्रणाली में सुधार के लिए तुरंत, गंभीर और निष्ठा पूर्वक प्रयासों की आवश्यकता है वहीं अपराधियों के प्रति सामन्यतया नरम  रुख अपनाने का फैशन बनता जा रहा है और मृत्यु दंड को बंद करने की चर्चाएँ  हो रही हैं| उचित अनुसंधान की आवश्यकता के विषय में कोई दो राय नहीं हो सकती| एक अभियुक्त को  तब तक दोषी  नहीं माना जाना चाहिए जब तक कि  दोष प्रमाणित न  हो जाए| किसी भी व्यक्ति के साथ निर्मम व्यवहार उचित नहीं है| अपराध को उचित ठहरानेवाली परिस्थितयों पर समुचित विचार किया जाना चाहिए| इन सब के साथ साथ समाज में अच्छा व्यवहार सुनिश्चित करने के लिए और संकट को टालने के लिए दंड दिए जाने की  भी मुख्य भूमिका है| आपराधिक न्याय प्रशासन में दंड कोई बदला लेने के लिए नहीं दिया जाता| इसका आँख के बदले आँख के सिद्धांत से कोई लेनादेना नहीं है|  यद्यपि यह अप्रासंगिक है फिर भी गांधीजी को उद्धृत  किया जाता है कि यदि आँख के बदले आँख के सिद्धांत को लागू किया गया तो समस्त संसार ही अंधा हो जाएगा|  किन्तु वास्तविकता तो यही है कि समस्त विश्व को अंधा होने से मात्र भय और आँख के बदले आँख के सिद्धांत की  संभावना  ने ही बचा रखा है| भय के अभाव में विश्व में दो  तरह के लोग होंगे, एक वे जिन्होंने दूसरों की आँखें फोड़ दी और दूसरे वे जो उनके द्वारा बदले में अंधे कर दिए गए|
यदि न्यायालय एक दोष सिद्ध व्यक्ति पर  मृत्युदंड सहित कोई दंड आरोपित करता है तो वह बदला बिलकुल नहीं है अपितु यह तो पेशेवर, न्यायिक, निष्पक्ष और प्रशासनिक कृत्य है जोकि समाज के वृहतर हित में और अन्य लोगों को अपराध करने से रोकने के लिए उपाय है| प्राचीन तमिल संत थिरुवावल्लुर ने कहा है, “जिन लोगों ने  हत्या जैसे संगीन अपराध किये हैं उन्हें कड़ा दंड देने में राजा का कृत्य ठीक वैसा ही है मानो कि फसलों  को बचाने के लिए एक किसान खरपतवार को हटाता है|” एक अच्छी सरकार को कानून का सम्मान करने वाले अपने नागरिकों  का सर्व प्रथम ध्यान रखना चाहिए| इसके लिए आवश्यक है कि अपराधियों के साथ सख्ती से निपटे| भारत में वर्तमान में विद्यमान स्थिति इसके ठीक विपरीत है| यहाँ कानून का सम्मान करने वाले नागरिक पीछे धकेल दिए गए हैं और अपराधियों को कोई भय नहीं है| अपराध लगातार बढ़ रहे हैं | वे न  केवल बढ़ रहे हैं अपितु  सुनियोजित और क्रूरतर  तरीके से   किये जाने लगे हैं| अपराधी लोग और अधिक धनवान व दुस्साहसी हो रहे हैं, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनकी भूमिकाएं महत्वपूर्ण होती जा रही हैं – विशेषकर व्यापार और राजनीति में | अपराधियों के प्रभाव को कम करने के किसी भी प्रयास का संगठित राजनैतिक वर्ग द्वारा कड़ा  विरोध किया जाता है | यद्यपि वे किसी राष्ट्रीय  मुद्दे के लिए इतने जल्दी  संगठित नहीं होते हैं |
आज संगठित अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं, इसके कई कारण हैं | इनमें खराब शासन, राजनैतिक हस्तक्षेप, अपराधियों का धन बल, अनुसन्धान व अभियोजन में संवेदनहीनता, न्याय प्रदानगी में असामान्य देरी, अपर्याप्त दंड, जेल प्रशासन में कमियाँ,  दिखावटी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा अनुचित व झूठा  प्रचार –प्रसार व दिखावटी मानवाधिकार संगठन, प्रतिस्पर्धी और धन लोलुप दृश्य-मीडिया शामिल हैं| उचित रूप  से लागू किया गया दंड अपराधों की रोकथाम में निश्चित रूप से सहायक है|
इस प्रसंग में राजस्थान का एक उदाहरण उल्लेखनीय है जिसमें अभियुक्त ने दिनांक- 19.7.82  को समूह में प्राणघातक हमला करके एक व्यक्ति की बांये हाथ की कोहनी व दूसरे के हाथ की  हथेली  तलवार से काट दी| अभियुक्त मात्र 7 दिन जेल में रहा और जमानत पर बाहर आ गया| सत्र न्यायालय ने अपने निर्णय दिनांक- 11.10.1984  से मुख्य अभियुक्त को पाँच वर्ष  के  कठोर कारावास एवं 3000/-रूपये अथर्दण्ड से दण्डित किया| अभियुक्त ने उच्च न्यायालय में अपील कर सजा पर स्थगन ले लिया और स्वतंत्र घूमता रहा| अभियुक्त राज्य सेवा में था अत: उसने नौकरी भी निर्बाध पूरी कर ली|  आखिर 25 वर्ष बाद उच्च न्यायालय ने दिनांक  02,  जुलाई 2009 को दिए गए निर्णय में भुगती हुई 7 दिन की सजा को पर्याप्त समझा एवं 50,000/-रूपये (अक्षरे पचास हजार) अथर्दण्ड से दण्डित किया और आदेश दिया कि यह जुर्माना राशि पीड़ित को क्षतिपूर्ति स्वरुप दी जायेगी|  यक्ष प्रश्न यह है कि संगीन अपराध के लिए जब देश के संवैधानिक न्यायालय इतनी सजा को ही पर्याप्त मान लेते हैं तो ऐसे अपराधों में फिर पुलिस द्वारा गिफ्तारी या रिमांड का क्या औचित्य है|  इतनी अल्प सजा के बावजूद सरकार ने आगे कोई अपील नहीं की और स्वयं पीड़ित ने ही उच्चतम न्यायालय में अपील की जिसमें दिनांक 5 मई 2014 को निर्णय  सुनाकर उच्चतम न्यायालय ने सजा को 2 वर्ष के कठोर कारावास तक बढ़ा दिया और क्षति पूर्ति की राशि को बरकरार रखा| देश के ही गैर इरादतन वाहन व औद्योगिक दुर्घटना कानून में अंग भंग के लिए उचित क्षतिपूर्ति का प्रावधान है| किन्तु देश के आम नागरिक की समझ से यह बाहर है कि जो न्यायपालिका किसी घोटाले से सम्बन्धित समाचार में एक न्यायाधीश के  चित्र  को गलती से दिखा दिए जाने पर मानहानि के बदले 100 करोड़ रूपये  की क्षतिपूर्ति  उचित समझती है वह एक हाथ काटे जाने के मामले में निस्संकोच होकर मात्र 50000 रूपये की क्षतिपूर्ति को किस प्रकार पर्याप्त समझती है| जहां एक ओर भीड़ द्वारा पुलिस पर पथराव करने या मजिस्ट्रेट की गाडी से किसी अन्य की गाडी के टकरा जाने मात्र को ही जानलेवा हमला मान लिया जाता है और निचले न्यायालय जमानत से मना कर देते हैं वहीं हाथ काट देने को भी जानलेवा नहीं माना जाता| संभव है कि पीड़ित ने क्षतिपूर्ति राशि बढाने की मांग न की हो किन्तु जब न्यायपालिका मिडिया में प्रकट किसी मामले में स्वप्रेरणा से संज्ञान लेकर न्याय देने का बीड़ा उठाने को तैयार है तो फिर एक पीड़ित को समुचित न्याय क्यों नहीं दे सकती| उच्च न्यायालय द्वारा लम्बी अवधि तक सुनवाई न करना किस प्रकार कानून के समक्ष समानता है?  एक अन्य पहलू यह भी है कि जब एक अभियुक्त को संगीन अपराध का दोषी पा लिया जाए और फिर भी उसे मात्र प्रतीकात्मक दंड  दिया जाए तो मनोवैज्ञानिक रूप से पुलिस व अधीनस्थ न्यायाधीश भी हतोत्साहित होते हैं तथा उनका मनोबल गिरता है| उक्त प्रकरण में मात्र 7 दिन की सजा देने की वजह भारत का दोषपूर्ण दंड कानून है जिसमें न्यूनतम सजा का प्रावधान नहीं है अत: न्यायाधीश जो मर्जी सजा दे सकते हैं जबकि  अमेरिका के दंड कानून में अधिकतम सजा का प्रावधान  होने के साथ साथ न्यूनतम सजा भी परिभाषित है जोकि अक्सर अधिकतम सजा की 90 प्रतिशत है यानी न्यायाधीश मात्र 10 प्रतिशत सजा में ही कटौती कर सकते हैं जिससे भ्रष्टाचार की संभावनाएं भी कम हो जाती हैं| कहा भी गया है लक्ष्मी व्यापार में निवास करती है अत: निश्चित रूप से जिन लोगों ने नौकरी करते हुए अकूत सम्पति संचित कर रखी है वे नौकरी को भी व्यापार की तरह कर रहे हैं| स्मरण रहे बेईमानी व्यापार का एक घटक है| 
  जेल के निरीक्षण पर आये पंजाब उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने भ्रष्टाचार के आरोपी से जेल में आवेदन लेकर तत्काल ही जमानत मंजूर करने के निर्देश दे दिए !  किन्तु बहुत से लोग वास्तविक कारणों की ओर आँख मूँद लेते हैं और दंड प्रणाली को दोष देते हैं | आज कानूनी प्रणाली और आपराधिक प्रक्रिया अपराधियों के लिए मददगार है| मानवाधिकार के ज्यादातर पैरोकार और सत्ता में शामिल लोग कानून में विश्वास  रखने वाले और पीड़ित लोगों के अधिकारों के प्रति बेखबर हैं | ऐसे कितने मामले हैं जहां अपराधी मात्र अपराध करने के लिए ही जमानत पर बाहर आये हों? तर्कसंगत दंड देने में विफलता के कारण प्रभावित लोग सरकार में विश्वास खो देते हैं| कई मामलों में तो वे हिसाब चुकता  करने के लिए कार्य करते हैं | स्थानीय गैंग के नेता और भाड़े के बदमाश अच्छा कारोबार करते हैं और बेईमान राजनेताओं व अधिकारियों की मदद से जड़ें जमा लेते  हैं|  इससे समाज में संगठित अपराध पनपते  हैं | वास्तव में भारतीय न्यायतंत्र तो संगठित अपराधियों, राजनेताओं, विधिज्ञों, कार्यपालक व पुलिस   अधिकारियों का एक रासायनिक योगिक है जिसको पारखी रसायन शास्त्री ही जान सकता है| किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के यहाँ समारोह में इन सभी को एक मंच साझा करते हुए देखा जा सकता है|
सत्य तो यह है कि जिस प्रकार की गंभीरता और संजीदगी एक सभ्य राष्ट्र में अपराधों की रोकथाम के लिए होनी चाहिए वह भारत में बिलकुल नहीं है| इस विषय पर आंकड़ों को देखकर सत्ता में शामिल लोगों को शर्म आनी चाहिए किन्तु उन्हें तो व्यक्तिगत कार्यों से ही फुरसत नहीं है और प्रशासन उनके हाथों की मात्र कठपुतली है| एक कहावत है, “यदि तुम पेड़ पर बैठी चिड़िया को मारना चाहते हो तो लक्ष्य आकाश पर होना चाहिए|” जबकि इस देश में तो जनता को धोखा देने के लिए सत्तासीन लोग अपराध दर्ज करने का जिक्र करते हैं और एक युवा नेता कहता है कि भारत में भ्रष्टाचार के निर्मूलन में 20 वर्ष लग जायेंगे| लोगों को शून्य अपराध और शून्य भ्रष्टाचार में जीने का अधिकार है| यदि राजनैतिक इच्छशक्ति हो तो यह असंभव नहीं है |


Sunday, 20 April 2014

सरकार से जानमाल की रक्षा पाना मूल अधिकार है और इसके हनन पर नागरिक सरकार से मुआवजा पाने के अधिकारी हैं

देश में समय समय पर होने वाले साम्प्रदायिक और जातिगत दंगे सौहार्द और समरसता पर गंभीर आक्रमण कर देश की सामासिक संस्कृति, अखंडता और एकता को चुनौती देते रहे हैं| समय समय  पर होनेवाले इन दंगों के मामलों में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने समय समय पर हस्तक्षेप कर पीड़ित लोगों को राहत दी है| गत वर्ष उत्तरप्रदेश राज्य के मुज़फरनगर जिले में भी  साम्प्रदायिक दंगों के वीभत्स रूप से देश का सामना हुआ जिसमें मुस्लिम समाज के बड़ी संख्या में लोगों को मृत्यु के घाट उतार दिया गया, उन्हें अपना निवास छोड़ने के लिए विवश कर दिया गया और महिलाओं को यौन हिंसा का शिकार बना लिया गया | इस घटनाक्रम के प्रसंग में इलाहाबाद उच्च न्यायालय व  उच्चतम न्यायालय में कई याचिकाएं दायर हुई | उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका मोहमद हारुन बनाम भारत संघ के मामले में न्यायालय ने पाया की यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना दिनांक 7 सितम्बर 2013 को हुई| उत्तरप्रदेश के मुज़फरनगर जिले में सांप्रदायिक तनाव के कारण दंगे भड़के जिस कारण बहुत से लोगों को जान से हाथ धोना पडा और बहुत से लोग चिंता व भय के कारण घरबार छोड़कर जान बचाकर भाग गए|
याचिका में यह कहा गया कि  दंगे मुजफरनगर , शामली और इसके आसपास के ग्रामीण इलाकों में महापंचायत, जोकि नागला मन्दौर में जाट समुदाय दारा आयोजित की गयी थी, के बाद भड़के| इस महापंचायत में दिल्ली, हरियाणा व उत्तरप्रदेश से डेढ़ लाख से अधिक लोग दिनांक 27  अगस्त 2013 की घटना के विरोध में भाग लेने आये थे| उक्त घटना मुज़फरनगर जिले की जानसठ तहसील के कवल गाँव में दिनांक 27 अगस्त को घटित हुई थी जिसमें दो समुदायों के बीच हिंसा भड़की और मामूली घटना के कारण दोनों पक्षों के तीन युवक मारे गए तथा बाद में इस घटना को साम्प्रदायिक रंग दे दिया गया| याचिकाकर्ता का आरोप रहा कि स्थानीय प्रशासन ने कानून लागू करने के स्थान पर न  केवल इन लोगों को संगठित होने की अनुमति दी बल्कि उपेक्षापूर्वक व संभवत: मिलीभगत से इस कार्यवाही पर निगरानी रखने में विफल रहा| यह भी आरोप लगाया गया कि  इस तिथि से लेकर अब तक 200 से अधिक मुस्लिम लोगों की नृशंस हत्या की गयी और लगभग 500 लोग, इन 50 जाट बाहुल्य   गाँवों में  जहां मुस्लिम  समुदाय अल्पसंख्या  में हैं, अभी भी गायब हैं| कई हजार शिशु, बच्चे, औरतें और बूढ़े विभिन्न गांवों में बिना भोजन और आश्रय के रह गए हैं और प्रशासन द्वारा उन्हें कोई सुविधा मुहैया नहीं करवाई गयी है| इसके अतिरिक्त बड़ी मात्रा में मुज़फरनगर के आसपास अवैध और अनाधिकृत गोला –बारूद, हथियार बरामद हुए हैं| सभी समुदायों के विस्थापित लोगों को आश्रय कैम्पों में रहने के लिए विवश किया जा रहा है जहां पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं | इन सबके परिणाम स्वरुप विभिन्न व्यक्तियों, सुप्रीम कोर्ट बार संघ, गैर सरकारी संगठनों ने दंगा पीड़ितों के मूल अधिकारों की रक्षा के लिए कई याचिकाएं दायर की | इन याचिकाओं में  विस्थापित लोगों के पुनर्वास , संरक्षण, और बचाव के लिए केंद्र व राज सरकार को निर्देश देने की प्रार्थना की गयी| जो बच्चे हिंसा या कैम्पों में सर्दी के कारण मर गए उसके लिए उनके माता-पिता को हर्जाना देने की प्रार्थना भी शामिल थी| समस्त तथ्यों व तर्कों पर गौर करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने निम्नानुसार निर्देश दिए :

राज्य सभी चोटग्रस्त लोगों व हिंसा में मृतकों  को चिन्हित करे  और उनके आश्रितों को  कुल 15 लाख रूपये मुआवजा दे| हिंसा के कारण उनकी चल-अचल सम्पति को हुए नुक्सान के लिए भी, यदि उन्हें पहले प्राप्त नहीं हुई है तो, क्षतिपूर्ति दी जाए | उपरोक्त  में से जो भी हिंसा, बलात्कार आदि से पीड़ित जिन्हें कोई राशि नहीं मिली हो, उन्हें  भी स्थानीय प्रशासन को आज से एक माह के भीतर आवेदन करने की अनुमति दी जाती है| ऐसे आवेदन की जांच करने के बाद प्रशासन एक माह के भीतर उचित राहत राशि स्वीकृत करेगा|जिला प्रशासन पात्र लोगों के लिए रानी लक्ष्मीबाई पेंशन योजना भी लागू करेगा और  जो लोग विस्थापित हो गए हैं उनके मामलों पर भी विचार करेगा|
यदि कोई पीड़ित आवश्यक समझे तो वह जिला कानूनी सहायता प्राधिकारी से संपर्क कर सकता है जिसे सहायता करने के निर्देश दिए जाते हैं| जिन्हें 5 लाख रूपये की सहायता मिल चुकी है और वे घटना स्थल के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं बसने का मानस बना लिया हो अब यदि वे अपना व्यावसाय पूर्व स्थान पर करना चाहें व अपने सम्बन्धियों व मित्रों के साथ रहना चाहें तो राज्य को यह निर्देश दिया जाता है कि उनसे इस राशि की वसूली नहीं  की जाए| जिला प्रशासन  यह सुनिश्चित करे की वे लोग अपने पूर्व स्थान पर शांतिपूर्वक अपना व्यसाय कर सकें व अपने रिश्तेदारों और मित्रों के साथ रह सकें| जिन अधिकारियों को यह शिकायत है कि  इस घटना क्रम के कारण उन्हें बदले की भावना से अन्यत्र दूर स्थानांतरित कर दिया गया वे भी अपना प्रतिवेदन एक माह के भीतर सक्षम अधिकारी को प्रस्तुत कर सकते हैं| सक्षम अधिकारियों को निर्देश दिए जाते हैं कि  वे ऐसे प्रतिवेदनों पर नए सिरे से विचार करें| जिन किसानों ने अपनी आजीविका – ट्रेक्टर , मवेशी , गन्ने की फसल आदि खो दी हो उन्हें भी उचित मुआवजा दिया जाए| जिन किसानों को अभी तक कोई क्षतिपूर्ति प्राप्त  नहीं हुई हो वे एक माह के भीतर स्थानीय/ जिला प्रशासन से आवेदन कर सकते हैं जिनका निपटान एक माह के भीतर किया जाएगा|

न्यायालय ने आगे कहा कि पुन: बल दिया जाता है की यह राज्य प्रशासन का कर्तव्य होगा की वे केंद्र व राज्य की इंटेलिजेंस एजेंसियों के साथ मिलकर इस प्रकार की सांप्रदायिक घटनाओं की रोकथाम करें| यह भी स्पष्ट किया जाता है कि  कानून व व्यवस्था बनाए रखने के दायित्वाधीन अधिकारियों की यदि कोई लापरवाही हो तो उनके पद को ध्यान में रखे बिना उन्हें कानून के दायरे में लाया जाए|  समस्त पीड़ितों को उनके धर्म पर ध्यान दिए बिना सहायता दी  जाए | उक्त निर्देश देते हुए याचिका का दिनांक 26 मार्च 2014 को निपटान दिया गया| साथ ही यह भी निर्देश दिए गए की यदि कोई पीड़ित बाधा अनुभव करता हो और जिला प्रशासन से समाधान नहीं हुआ हो तो वह इस न्यायालय से संपर्क कर सकता है| इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जो मामले यहाँ स्थानांतिरत नहीं हुए हों उनमें उच्च न्यायालय  द्वारा  इसी अनुरूप आदेश पारित किये  जायेंगे|    

Tuesday, 28 January 2014

उचित विश्राम व समय पर भोजनादि भी मानवाधिकार हैं

आवेदक राजेंद्र सिंह ने दिनांक 08/09/2010 से 10/09/2010 के बीच अपने आवासीय परिसर में आयकर विभाग के अधिकारियों द्वारा की गयी खोज और जब्ती की कार्यवाही के दौरान अपने मानव अधिकारों के उल्लंघन की शिकायत को लेकर बिहार मानवाधिकार आयोग से निवेदन किया| आवेदक की शिकायत थी कि वह अल्पसंख्यक सिख समुदाय से संबंध रखता है| उसने कहा कि पटना शहर में मीठापुर में आरा मिल व  लकड़ी का व्यापार कर वह अपनी आजीविका अर्जित करता था|  दिनांक  08/09/2010 को  श्री सौरभ कुमार, श्री सुमन झा , श्री कनकजी  और श्री अचुतन नामक आयकर विभाग के अधिकारीगण छह अन्य सहयोगियों के साथ उसके  घर आये और मुख्य गेट बंद कर दिया जोकि प्रवेश और निकास का एक मात्र रास्ता है| उन्होंने आवेदक और उपस्थित दूसरे लोगों के मोबाइल फोन ले लिये और छापे के दौरान उन्हें बाहर के किसी भी व्यक्ति से संपर्क करने की अनुमति नहीं दी| यहाँ तक कि उन्हें खाना पकाने के लिए भी अनुमति नहीं दी गयी| उन्होंने  महिलाओं सहित परिवार के सदस्यों के साथ दुर्व्यवहार किया| उन्होंने निर्भय होकर वहां धूम्रपान किया है, शिकायतकर्ता की  धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाई है, तथा सिख गुरुओं और स्वर्ण मंदिर की तस्वीरों पर सिगरेट के टुकड़े  और सिगरेट के खाली पैकेट फेंक दिये| उन्हें शौचालय जाने की अनुमति भी नहीं दी गयी| आवेदक ने अपने वकील को बुलवाया किन्तु उसे वह  जगह छोड़ने के लिए विवश किया गया|  उन्होंने छापे के दौरान अन्य दंडात्मक कार्रवाई की धमकियों भी दी|
उक्त के आलोक में आयोग द्वारा मुख्य आयकर आयुक्त बिहार को नोटिस जारी किया गया जो आगे आयकर महानिदेशक (अनुसंधान ) को भेज दिया गया | अंततः विभाग द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में आवेदक द्वारा किए गए आरोपों का खंडन किया गया| कई बार स्थगन के बाद अंत में आवेदक अपने वकील के साथ उपस्थित हुए और श्री विजय कुमार, अपर आयकर आयुक्त की उपस्थिति में प्रकरण दिनांक को 18/04/2011 को सुना गया| 
आयोग के समक्ष कार्यवाही में आवेदक ने  शिकायत में वर्णित आरोपों  दोहराया| उसने खोज और जब्ती की कार्यवाही की वैधता और औचित्य पर सवाल उठाया|  शिकायतकर्ता ने कहा कि उक्त सम्पूर्ण कार्यवाही मात्र आवेदक को परेशान करने के लिए की गयी है और अधिकारियों के इस  वैमनस्यपूर्ण कार्यवाही से भी संतुष्ट नहीं होने पर यह खोज और जब्ती की कार्यवाही आज तक जारी है| शिकायतकर्ता द्वारा यह जानकारी भी दी गयी कि विभाग ने आवेदक के खिलाफ कार्रवाई के लिए राज्य सरकार के वन विभाग और पंजीकरण विभाग से  भी संपर्क किया है| श्री विजय कुमार , विभागीय प्रतिनिधि ने आवेदक के आरोपों का खंडन किया|
दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार के बाद आयोग ने महिला सदस्यों सहित अपीलार्थी की धार्मिक भावनाओं को आहत करने व परिवार के सदस्यों के साथ दुर्व्यवहार के संबंध में आरोप के तथ्यों के निर्धारण हेतु विचारण उचित समझा|   
सुनवाई के अनुक्रम में आयोग ने यह कहा कि खोज और जब्ती की कार्यवाही की वैधता की जांच का मामला आयकर अधिनियम के सुसंगत प्रावधानों के तहत उचित मंच पर उठाया  जा सकता है| आयोग ने माना कि आवेदक के यहाँ 8 से 10 सितंबर 2010 तक जिस ढंग से खोज और जब्ती की कार्रवाई की गयी उसका मूल्यांकन करने में आयोग सक्षम नहीं है| विभाग के प्रतिनिधियों ने कहा कि खोज और जब्ती की कार्यवाही तो इस प्रकरण में लगे समय से भी ज्यादा समय के लिए भी जारी रह सकती है| आयोग मोटे तौर पर इससे सहमत है कि खोज और जब्ती की कार्यवाही के लिए अवधि के रूप में कोई समय सीमा तय नहीं की  जा सकती  लेकिन आयोग की राय में खोज और जब्ती की कार्यवाही संबंधित व्यक्ति के मानवाधिकारों के अनुरूप होनी  चाहिए|
आयोग ने माना कि यह स्वीकृत तथ्य है कि खोज और जब्ती की कार्यवाही दिनांक 08/09/2010 को प्रात: 9:30 बजे  शुरू और दिनांक 10/09/2010 को  रात्रि 9.20 बजे  पर संपन्न हुई  है| आवेदक की शिकायत थी कि इस अवधि के दौरान उससे लगातार 30 घंटे के लिए पूछताछ की गयी| आयकर विभाग द्वारा  धारा 132 के तहत शपथ पर दर्ज आवेदक के बयान के प्रश्न संख्या 15 में अधिकारी  श्री सौरभ कुमार  ने दर्ज किया है कि उससे  खाताबहियाँ  आदि पेश  करने के लिए कहा जा रहा था लेकिन 36 से अधिक घंटे बीतने के बावजूद आवेदक ने एक भी प्रस्तुत नहीं की है| इससे कार्यवाही में लगे समय का अनुमान लगाया जा सकता है| 

विभागीय प्रतिनिधि द्वारा यह बताया गया कि दिनांक 9.9.10 को रात्रि 10 बजे तक मात्र 15 प्रश्न पूछे गए थे जिससे यह स्पष्ट है कि पूछताछ में लिया गया समय किसी भी प्रकार से उचित नहीं था| आयोग का विचार है कि छापामार दल के सदस्यों को खोज और जब्ती कार्यवाही संपन्न करने में समय लग सकता है लेकिन इस तरह की कार्यवाहियों में व्यक्ति के  बुनियादी मानव अधिकार को ध्यान में रखा जाना चाहिए| उन्हें कार्यवाही करने के लिए शारीरिक और मानसिक यातना देने का कोई अधिकार नहीं है| प्रभारी अधिकारी यदि पूछताछ/बयान की रिकॉर्डिंग की प्रक्रिया जारी रखना चाहता  है तो वह दिन के उचित समय पर ही बंद कर दी जानी चाहिए  और अगली सुबह फिर से शुरू की जानी चाहिए था| लेकिन हस्तगत प्रकरण में किसी भी विश्राम या अंतराल के बिना प्रात: 03:30 बजे तक प्रक्रिया जारी रही है जबकि यह शयन का समय है और आवेदक तथा / या उनके परिवार के सदस्यों को ऐसे अनुचित समय तक जागते रहने के लिए के लिए मजबूर करना एक सभ्य समाज में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता| यह व्यक्ति की गरिमा से संबंधित अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है और इसलिए मानव अधिकारों का उल्लंघन था| यहां तक ​​कि दुर्दांत अपराधियों को भी मानवाधिकारों से वंचित  नहीं किया जा सकता| आवेदक की स्थिति तो इससे बदतर नहीं थी| आयोग की राय में आयकर विभाग को भविष्य में बड़े पैमाने पर खोज और जब्ती कार्यवाही में सुनिश्चित करना चाहिए कि  बुनियादी मानव अधिकारों का उल्लंघन न हो| आयोग ने आगे कहा कि वह प्रथम दृष्टया संतुष्ट है कि खोज और जब्ती कार्यवाही  जारी रखते  हुए आयकर विभाग के संबंधित अधिकारियों द्वारा आवेदक के मानव अधिकारों का उल्लंघन किया गया है जिसके लिए वह आर्थिक  मुआवजा पाने का अधिकारी  है|

लेखक का मत है कि किसी भी व्यक्ति से उसकी परिस्थितियों के विपरीत व्यवहार भी मानवाधिकारों का उल्लंघन है| यथा कश्मीर जैसे शीत प्रदेश के निवासी को भीषण गर्मी वाले मरुस्थल में या इसके विपरीत रखना या रहने के विवश करना मानवाधिकारों का हनन है| ठीक इसी प्रकार अशक्त या अस्वस्थ व्यक्ति को उसकी परिस्थति के अनुसार भोजन न उपलब्ध करवाना भी मानवाधिकारों का उल्लंघन है| पंजाब राज्य मानावाधिकार आयोग ने तो सेवा, न्याय आदि से सम्बंधित मामलों को भी मानवाधिकार हनन  माना है| भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार, “ किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं|”


हाल ही में सांसद धनञ्जय सिंह को एक अभियोग में पुलिस हिरासत में लिया गया था और हिरासत अवधि के दौरान उन्होंने अपने घर पर बने भोजन के लिए पुलिस से अपेक्षा की किन्तु पुलिस ने कहा कि न्यायालय की अनुमति के बाद ही ऐसा किया जा सकता है| जबकि कानून में ऐसा प्रावधान नहीं है कि एक परीक्षण के अधीन हिरासत में व्यक्ति को घर के भोजन से वंचित किया जाएगा अथवा इसके लिए कोई अनुमति की आवश्यकता है| लेखक स्वयम ने यह प्रकरण राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष उठाया और आयोग ने इस प्रकरण में गृह मंत्रालय को आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश जारी किये हैं| ठीक इसी प्रकार तरुण तेजपाल के मामले में भी हाल ही में तहलका की  एक संपादिका को गोवा पुलिस ने गवाही हेतु पूछताछ के लिए उसके निवास से भिन्न स्थान पर बुलाया और रात्रि 2 बजे तक उससे पूछताछ की गयी| जबकि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 160 के अनुसार एक महिला और 15 वर्ष तक के बालक गवाह से मात्र उसके निवास पर ही पूछताछ की जा सकती है| लेखक द्वारा यह मामला भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष उठाये जाने पर गोवा पुलिस को आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश जारी किये गए हैं| अत: जागरूक पाठकों से आग्रह है कि जहां भी वे मानवाधिकार उल्लंघन का कोई मामला देखें उसकी रिपोर्ट मानवाधिकार आयोग को आवश्यक कार्यवाही हेतु भेजें ताकि मानव गरिमा का रक्षा हो सके|   

Saturday, 11 January 2014

भारत में सूचना की आजादी मिलना अभी बाकी है

सूचना का अधिकार अधिनियम,2005 के प्रावधानों के अंतर्गत केंद्र व राज्यों में  आयोगों की स्थापना की गयी है और केन्द्रीय प्रतिष्ठानों में “अधिकार” की प्रोन्नति का दायित्व केन्द्रीय सूचना आयोग को सौंपा गया है| केन्द्रीय आयोग की स्थापना से अब तक लगभग 170,000 अपीलें व परिवाद याचिकाएं आयोग में दायर हुई हैं और लगभग 140,000 याचिकाएं निस्तारित की जा चुकी हैं| किन्तु विडंबना यह है कि लोक प्राधिकारियों द्वारा 80-90प्रतिशत  मामलों में देय सूचना से अभी भी इन्कार ही किया जाता है और शासन व्यवस्था व लोक प्राधिकारियों के कार्यकरण में अभी भी अपार  अस्वच्छता-भ्रष्टाचार-अपारदर्शिता कायम है| ऐसा नहीं है कि यह कोई नवीन प्रवृति हो अपितु संचार व विचार अभिव्यक्ति पर प्रतिबन्ध के माध्यम से सरकारों के अस्वच्छ कार्यकरण पर पर्दा डालने यह मनोवृति हमें अंग्रेजों से विरासत में मिली थी जिसे हमने संजोकर बरकरार रखा है| वायरलेस का आविष्कार पर्याप्त पहले हो गया था और सरकारी तंत्र के पास यह सुविधा उपलब्ध थी किन्तु आम जनता तक इसकी पहुँच प्रतिबंधित रही है| यहाँ तक कि 1947 में मिली नाम की आजादी के पर्याप्त बाद तक भी जनता को रेडियो सुनने के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था| भारत सरकार के दूरसंचार विभाग के पास 1970 से ही इन्टरनेट सेवा उपलब्ध थी जो आम जनता  को 1990 के बाद ही सुलभ हो सकी है|   
जहां प्रथम वर्ष में आयोग में मात्र 7000 याचिकाएं प्राप्त हुई वहीं आठवें वर्ष में 40000 याचिकाएं प्राप्त हुई हैं व औसत याचिका की सुनवाई में एक वर्ष से अधिक का समय लग रहा है जो आयोग के गठन के उद्देश्य को ही मिथ्या साबित कर रहा है| यह स्थिति एक भयावह चित्र प्रस्तुत करती है| सूचना हेतु मना करने पर नागरिक आयोग में याचिका दायर करते हैं और इस संख्या में सुपरसोनिक जेट की गति से वृद्धि हो रही है| यह वृद्धि  इस कारण नहीं है कि नागरिकों में जागरूकता का संचार हो रहा है अपितु आयोग दोषी जन सूचना अधिकारियों के साथ मित्रवत व्यवहार कर रहा  है और आम लोक प्राधिकारी में यह विश्वास गहरा रहा है कि वे चाहे किसी भी सूचना के लिए मना करें उनका कुछ भी बिगड़नेवाला नहीं| अधिक से अधिक यह हो सकता है कि आयोग द्वारा एक आवेदक को दो वर्ष संघर्ष करने के बाद सूचना देने के आदेश हो जाएँ व उसकी अनुपालना तो फिर भी संदिग्ध है| आयोग द्वारा दोषी अधिकारियों का अनुचित बचाव करने से जनतंत्र के इस औजार की धार लगभग कुंद हो चुकी है व जनता की नजर में आयोग स्वामिभक्त रहे सेवानिवृत अधिकारियों को रोज़गार देकर उपकृत करने का एक संस्थान मात्र रह गया है| कुछ आयुक्तों द्वारा किन्हीं अपवित्र कारणों या सस्ती लोकप्रियता के लिए अतिउत्साहित होकर कुछेक जनानुकूल दिखाई देने वाले निर्णय देने मात्र से 125 करोड़ भारतवासियों का हित नहीं सध सकता| यद्यपि, आपवादिक मामलों को छोड़ते हुए, अधिकाँश मामलों में आयोग ने सूचना प्रदानगी  के  आदेश दिये हैं किन्तु फिर भी दिए गये अधिकाँश निर्णय कानून व न्याय की कसौटी पर खरे नहीं हैं| ऐसे भी मामले हैं जहां समाजसेवा के कुछ थोक व्यापारियों पर आयुक्तों ने उपकार किया हो और उनके मामलों को दर्ज होने से पहले ही निर्णित कर दिया हो| मीडिया की सुर्ख़ियों में रहने को लालायित ऐसे स्वामिभक्त लोग आयोग और आयुक्तों का यशोगान करने वालों की अग्रिम पंक्ति में दुधिया प्रकाश में खड़े नजर आते हैं और आयोग को अयोग्य बना रहे हैं|

केन्द्रीय आयोग ने अपनी स्थापना से लेकर अब तक 1000 से भी कम प्रकरणों में अर्थदंड लगाया गया है और उसका भी लगभग 40प्रतिशत  भाग वसूली होना शेष है| इतना ही नहीं अर्थदंड के कुल मामलों में से 60% तो दिल्ली सरकार के विभाग और स्थानीय निकाय के हैं| अन्य प्रमुख मामले बैंकों व बीमा कंपनियों के हैं| इनमें से भारत सरकार के विभागों या मंत्रालयों पर अर्थदंड के मामले तो 5% से भी कम हैं| देश की नौकरशाही जिम्मेदारी व पारदर्शिता से कार्य नहीं कर रही थी और इस पवित्र उद्देश्य को ध्यान में रखकर अधिनियम बनाया गया| किन्तु आयोगों में उन्हीं सेवानिवृत नौकरशाहों को नियुक्त कर दिया गया है जो इस अंग्रेजी शासन से चली आ रही गैर-जिम्मेदार, अस्वच्छ, हठधर्मी, राजतान्त्रिक, निरंकुश व अपारदर्शी व्यवस्था का कल तक अंग रहे हैं और इसी के लिए उपयुक्त रहे हैं| तभी तो वे अपना सेवाकाल सहर्ष पूर्ण कर पाए अन्यथा ये लोग यदि अंत:करण, विचारों, कार्यशैली  व मन से इस मलिन व्यवस्था को अंगीकार नहीं करते तो निश्चित रूप से अपना सेवाकाल सहर्ष पूर्ण नहीं कर पाते| इनसे कुछ सुधार की आशा करना दिन में स्वप्न देखने से अधिक कुछ भी नहीं है| अर्थात सरकारों ने बिल्ली को दूध की रखवाली की जिम्मेदारी देने की कहावत चरितारार्थ कर दी है| सेवा निवृति के बाद पुन:नियुक्त ये नौकरशाह अपनी बिरादरी के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्यवाही नहीं कर सके हैं यह तथ्य आंकड़ों से साबित है| केन्द्रीय आयोग में अब तक लगभग 20 आयुक्त नियुक्त हो चुके हैं जिसमें से आपवादिक तौर पर मात्र एक ही गैर-नौकरशाह रहे हैं| ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि केन्द्रीय आयोग द्वारा अर्थदंड लगाने के कुल 1000 मामलों में से आधे से ज्यादा तो अकेले इस गैर-नौकरशाह आयुक्त के हैं अर्थात शेष 19 आयुक्तों ने मिलकर अपने सम्पूर्ण कार्यकाल में मात्र 300 मामलों में अर्थदंड लगाया है जोकि प्रति आयुक्त 15 मामले आते हैं| उक्त विश्लेष्ण से यह भी निष्कर्ष निकलता है कि आयोग में एक औसत नौकरशाह आयुक्त ने एक वर्ष में मात्र 3 मामलों में अर्थदंड लगाया है और दोषी अधिकारियों का पर्याप्त पक्षपोषण व बचाव कर जनतंत्र के इस प्रभावी उपकरण को भी नकारा साबित कर दिया है| व्यथित नागरिकों को हर्जाना दिलाने के मामले तो ढूंढने से भी मिलना कठिन है|  
अधिनियम की धारा 19(5) व 20(1) में समय पर सूचना नहीं देने का औचित्य स्थापित करने का भार सूचना अधिकारी पर है और इसमें विफल रहने पर सूचना अधिकारी पर कानून के अनुसार अर्थदंड निरपवाद स्वरूप लगाया जाना चाहिए| अधिनियम में आयुक्तों को कोई विवेकाधिकार नहीं दिया गया है| यहाँ तक कि  सम्पूर्ण अधिनियम में विवेकाधिकार शब्द तक का प्रयोग नहीं किया गया है जिससे विधायिका का मंतव्य स्पष्ट है| समाज में व्यवस्था बनाये रखने के लिए कानून में दंड का प्रावधान रखा जाता है किन्तु प्राय:आयोग के निर्णयों में न ही तो सूचना नहीं देने का औचित्य स्थापित माना जाता है और न ही दोषी पर अर्थदंड लगाया जाता जिससे सूचना अधिकारियों को यह सन्देश जाता है कि आयोग एक दंतविहीन, रस्मी व दोषियों का मैत्रीपूर्ण संस्थान है और आयोग की कार्यवाहियां मैत्रीपूर्ण मैच हैं| दोषी लोगों को दंड नहीं देने से अन्य बचेखुचे अधिकारी भी कानून का उल्लंघन करने को लालायित व प्रेरित होते हैं जिससे सम्पूर्ण वातावरण अपदूषित होता है| इस मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए आयोग को न्यूनतम 10 प्रतिशत मामलों में अर्थदंड लगाना चाहिए था| आयोग ने शक्तिसंपन्न विभागों के विरुद्ध यद्यपि कई मामले निर्णित किये हैं किन्तु आश्चर्य का विषय है कि आज तक उनमें से एक भी मामले में अर्थदंड नहीं लगाया है इससे आयोग की निष्पक्षता पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लगता| आयोग ने गृह मंत्रालय व न्याय विभाग के विरुद्ध कई हजार मामले निर्णित किये हैं जहां आवेदकों को अनुचित रूप से सूचना हेतु मना किया गया किन्तु आयोग ने इन विभागों के अधिकारियों पर किसी मामले में मुश्किल से ही कोई अर्थदंड लगाया हो| न्यायालय, सतर्कता, पुलिस  आदि ऐसे ही अन्य सशक्त विभाग हैं जिन पर स्वयम आयोग ने अर्थदंड लगाने से परहेज़ कर अपनी कर्तव्य विमुखता का परिचय दिया है और अपनी विश्वसनीयता व निष्पक्षता पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा दिया है| एक मामले में तो आयोग ने न्यायालय द्वारा सुनवाई में समय मांगने पर न्यायालय की बजाय स्वयम अपने खजाने से याची को क्षतिपूर्ति दी है| आयोग द्वारा अर्थदंड लगाए जाने के मामलों का विश्लेष्ण करने पर ज्ञात होता है कि मात्र स्थानीय निकाय, शिक्षा विभाग, बिजली, पानी, परिवहन, निर्माण विभाग जैसे निरीह व शक्तिहीन लोक प्राधिकारी ही अर्थदंड चुकाने के लिए विवश किये गए हैं| 

आयोगों को यह चाहिए कि जहां सूचना हेतु याची के पक्ष में आदिष्ट करे उस प्रत्येक निर्णय में या तो धारा 19(5) व 20(1) के अंतर्गत दोषी अधिकारी द्वारा स्थापित औचित्य को अपने निर्णय में साबित समझे अन्यथा दोषी अधिकारी पर अर्थदंड अवश्य लगाए ताकि अधिनियम कारगर साबित हो सके और यह एक कागजी व कोरी औचारिकता नहीं रह जाए|  
राज्य आयोगों की स्थिति भी लगभग समान ही है क्योंकि वहां पर भी किसी न किसी स्वामिभक्त सेवानिवृत नौकरशाह को देव मूर्ति की तरह स्थापित कर उपकृत किया गया है और दोषी अधिकारियों का भरपूर बचाव किया जा रहा है| सरकार का यह कुतर्क हो सकता है कि सेवानिवृत लोगों को नियुक्त करने पर उन्हें आधा ही वेतन (आधा भाग तो वे पेंशन के रूप में पहले से ही प्राप्त कर रहे होते हैं) देना पड़ता है अत: यह सस्ता है किन्तु इस सस्तेपन की जनता को वास्तव में कितनी कीमत चुकानी पडती है इसका आकलन नहीं किया जा रहा है| इससे भी अधिक आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि कई बार तो पुलिस विभाग के अधिकारियों को आयुक्त नियुक्त कर दिया जाता है जिनके सम्पूर्ण सेवाकाल में मूल अधिकारों का तो क्या मानव-अधिकारों की रक्षा करने का कोई वातावरण आसपास तक नहीं रहा हो| स्वयम पुलिस अधिकारी जानते हैं कि सेवानिवृति के बाद उनका जनता में कितना सम्मान होता है| इस डर से कई पुलिस अधिकारी तो फेसबुक जैसे  सामाजिक माध्यमों पर अपना खाता तो खोल लेते हैं किन्तु अपना पूर्व सेवाकाल तक प्रकट नहीं करते हैं| देश की जनता को सूचना की स्वतंत्रता के लिए अभी मीलों का सफर व काफी संघर्ष करना बाकी है क्योंकि अधिनियम अभी तक तो एक कोरी औपचारिकता है– जनता को भुलावे व सस्ती लोकप्रियता का एक साधन मात्र है|
केंद्र सरकार व राज्य सरकारों को यह नीति बनानी चाहिए कि किसी भी आयोग या बोर्ड में 20 प्रतिशत से अधिक सेवानिवृत नौकरशाह नियुक्त नहीं किये जाएंगे तभी इस देश की जनता का हित सध सकता है- वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा| प्रजातंत्र, प्रजा के सशक्तिकरण व सता के विकेन्द्रीकरण का का दूसरा नाम है जिसके संचालन में आम जनता की सक्रिय सहभागिता होती है और जनता किसी भी जनप्रतिनिधि के बंधक नहीं होती है| समस्त कार्यपालक, न्यायपालक व जनप्रतिनिधि लोकतंत्र के सेवक तथा जनता के ट्रस्टी होते हैं और जनता ही लोकतंत्र की वास्तविक स्वामी होती है| प्रजातंत्र में नौकरशाहों की नियुक्ति मात्र परामर्श के लिए ही उचित है किसी भी निर्णय करने के लिए नहीं| सरकार में भी किसी भी स्तर के सचिव को नीतिगत निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है अपितु वे मंत्री के मात्र सलाहकार हैं| इसी सिद्धांत का यहाँ भी अनुसरण किया जाना चाहिए क्योंकि जिन्होंने अपने सम्पूर्ण सेवाकाल में मात्र परामर्श दिया हो और वे निर्णय लेने में अनुभवहीन हों उन्हें निर्णय करने का पद आखिर क्योंकर दिया जाए|     

जय भारत !

Monday, 14 October 2013

संवेदनहीन पुलिस के दिए जख्मों पर न्यायालय की मानवीय मरहम

यह शर्मिला शर्मा के बच्चों का दुर्भाग्य था या पंचकुला पुलिस की घोर लापरवाही कि अक्टूबर 2012 में एक सडक दुर्घटना में शर्मिला के पति की मृत्यु हो गयी थी| हरियाणा सरकार ने कहने को तो ऐसे मामलों में मुआवजा देने की घोषणा कर रखी है किन्तु पीड़ितों को अभी तक कोई मुआवजा नहीं दिया गया| शर्मिला अपने बच्चों का येन केन प्रकारेण पालन पोषण कर रही थी और अपने पति की मृत्यु के लिए मुआवजे हेतु संघर्ष कर रही थी कि 6 माह बाद दिनांक 07.05.13 को उसके परिवार पर दुखों का एक और पहाड़ टूट पडा| चंडीगढ़ के सेक्टर 10 में चंडीगढ़ परिवहन उपक्रम की एक बस उसे कुचलते हुए निकल गयी| शर्मिला के सिर में गहरी चोट आयी थी| जिस स्थान पर यह दुर्घटना हुई वहां से मल्टी स्पेसीलिटी अस्पताल मात्र 100 मीटर की दूरी पर ही है| किन्तु अपने आचरण के लिए ख्यात लापरवाह और अमानवीय पुलिस अधिकारी वहां 2 घंटे बाद पहुंचे जिससे शर्मिला को बचाया नहीं जा सका| सेक्टर 3 पुलिस थाने के प्रभारी श्री प्रकाश जब 2 घंटे बाद घटना स्थल पर पहुंचे तो शर्मिला सडक पर खून से लथपथ पड़ी थी यद्यपि अधीनस्थ पुलिस उस स्थान पर पहले से ही उसकी प्रतीक्षा करते रहे| इस घटना से शर्मिला के दो किशोरवय बच्चे पूरी तरह से अनाथ हो गये| यह भी ध्यान देने योग्य है कि शहरी क्षेत्र में परिवहन के लिए अधिकतम 10 मीटर तक लम्बाई की बसें ही उपयुक्त हैं जबकि 13.5 मीटर तक लम्बी असुरक्षित बसों को प्रयोग किया जा रहा है|   

उक्त तथ्य पंजाब हरियाणा उच्च न्यायालय के ध्यान में आने पर दिनांक 10.05.13 को स्व-प्रेरणा से संज्ञान लिया गया और अग्रिम कार्यवाही की गयी| उच्च न्यायालय ने अपने हाल ही के आदेश दिनांक 25.09.13 में कहा और आदेश दिया है कि पुलिस के संवेदनहीन आचरण से दो बच्चे अनाथ हो गये| किसी सामाजिक सुरक्षा की योजना के अभाव में इन दुखान्तिकाओं से नाबालिग बच्चे और अधिक पीड़ित हैं| न्यायालय ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए आदेश दिया कि हरियाणा सरकार की योजनानुसार 15 दिन के भीतर एक लाख रुपये की राशि भुगतान की जाए| न्यायालय की टिप्पणी थी कि संघ राज्य क्षेत्र चंडीगढ़ की संवेदनहीन पुलिस पीड़ित को मदद करने की बजाय क्षेत्राधिकार के मुद्दे को उलझाने में अधिक रुचिबद्ध रही है| न्यायालय के हस्तक्षेप से पहले तक तो दोषी अधिकारियों का अनुचित बचाव किया जाता रहा| सुनवाई के दौरान यह बताया गया है कि अब कई अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही प्रारंभ की गयी है जिसका अभी तक निष्कर्ष नहीं निकला है किन्तु इससे अवयस्क अनाथ बच्चों को कोई सांत्वना प्राप्त नहीं होती है| कम से कम, बच्चों को आर्थिक मदद तो दी ही जा सकती है| अत: चंडीगढ़ प्रशासन को आदिष्ट किया जाता है कि दोनों बच्चों के नाम से 1-1 लाख रूपये की राशि अंतरिम राहत के तौर पर 15 दिन के भीतर जमा करवाए| सत्यापन के बाद बच्चों को प्रतिमाह शिक्षा व पालन पोषण खर्चे के लिए 14200 रूपये भुगतान किये जाएँ| यह राशि सितम्बर माह से प्रारंभ होगी जोकि 7 अक्तूबर या इससे पूर्व देय होगी| न्यायमित्र की सहायता से तदनुसार आवेदन का निपटान किया गया|
फिर भी चंडीगढ़ प्रशासन और पंजाब सरकार से हरियाणा की तर्ज पर ऐसे मामलों में एक सम्यक नीति बनाने की अपेक्षा की गयी| इस प्रकार की घटनाओं को टालने के उपाय करने और दोषी पुलिस अधिकारियों पर अधिकतम एक माह की अवधि में कार्यवाही करने की रिपोर्ट के लिए मामले को पुन: दिनांक 19.11.13 को सूचीबद्ध करने के आदेश दिए गए व आदेश की दस्ती प्रति पक्षकारों को दी गयी|   

    

Tuesday, 1 October 2013

बंदर कहना महँगा पड़ा ...

ओंटारियो की एक कृषि फर्म को अपने एक कर्मचारी को बंदर कहना महँगा पडा जबकि वहां के मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ने चर्चित प्रकरण एड्रिअन मोंरोसे बनाम डबल डायमंड एकड़ लिमिटेड (2013 एच आर टी ओ 1273)  में दोषी पर भारी जुर्माना लगाया| किंग्सविले की एक टमाटर उत्पादक कंपनी डबल डायमंड एकड़ लिमिटेड  को मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ओंटारियो (कनाडा)  ने शिकायतकर्ता एड्रिअन मोंरोसे को बकाया वेतन और गरिमा हनन के लिए कुल 23,500 पौंड क्षतिपूर्ति देने के आदेश दिया है| 
तथ्य इस प्रकार हैं कि शिकायतकर्ता ने प्रतिवादी संस्थान में प्रवासी मौसमी कृषि मजदूर के रूप में दिनांक 9.1.09 से कार्य प्रारंभ किया था| शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि प्रतिवादी संस्थान के एक कर्मचारी करिरो ने चिल्लाते हुए मुझे कहा कि तुम पेड़ शाखा पर बंदर जैसे लगते हो और वह चला गया| मौसमी मजदूरों के करार के अनुसार उनके वेतन का पच्चीस प्रतिशत वेतन उन्हें बाद में भेजे जाने के लिए काटा जाता है किन्तु उसे समय पर भुगतान नहीं किया गया| आवेदक –शिकायतकर्ता-एड्रिअन मोंरोसे के अनुसार उसने यह मामला प्रतिवादी के समक्ष माह जनवरी व फरवरी 2009 में उठाया था| किन्तु उसकी  शिकायत के फलस्वरूप बदले की भावना से उसे नौकरी से ही निकाल दिया जिससे वह 5500 पौंड मजदूरी से वंचित हो गया| मामला जब ट्रिब्यूनल के सामने निर्णय हेतु आया तो ट्रिब्यूनल का यह विचार रहा कि क्षतिपूर्ति के उचित मूल्याङ्कन के लिए बदले की भावना से प्रेरित कार्यवाही से उसकी गरिमा, भावना और स्व-सम्मान को पहुंची ठेस के लिए प्रार्थी क्षतिपूर्ति का पात्र है| प्रार्थी  ने अपने देश वापिस भेज दिए जाने सहित मजदूरी के नुक्सान आदि इन सबके लिए कुल 30000 पौंड के हर्जाने की मांग की है| ओंटारियो मानवाधिकार संहिता की धारा 46.3 के अनुसार किसी संगठन के कर्मचारियों, अधिकारियों या एजेंटों द्वारा भेदभाव पूर्ण आचरण करने पर संस्था का प्रतिनिधित्मक दायित्व है, तदनुसार करेरो और मस्टरोनारडी के कृत्यों के लिए डबल डायमंड एकड़ लिमिटेड जिम्मेदार है|  ट्रिब्यूनल ने आवेदक को 15000 पौंड का हर्जाना बदले के भावना से हुए मानवाधिकार हनन के लिए स्वीकृत किया और मजदूरी के नुक्सान की भरपाई के लिए 5000 पौंड मय ब्याज के देने के आदेश दिए|
आवेदक ने यह भी मांग की कि प्रत्यर्थी अपने यहाँ मानवाधिकार नीति को लागू करने के लिए ओंटारियो मानवाधिकार आयोग से अनुमोदन करवाकर एक निश्चित प्रक्रिया लागू करे| इस पर ट्रिब्यूनल ने आदेश दिया कि प्रत्यर्थी 120 दिन के भीतर मानवाधिकार कानून विशेषज्ञ की सहायता से एक व्यापक मानवाधिकार और भेदभाव विरोधी नीति विकसित करे व प्रत्यर्थी के सभी अधिकारी–कर्मचारी, जिन पर किसी भी प्रकार के पर्यवेक्षण का दयित्व हो वे, 101 मानवाधिकारों के विषय में 120  दिन के भीतर ऑनलाइन प्रशिक्षण प्राप्त करें |
वहीं भारतीय परिपेक्ष्य में मानवाधिकारों पर नजर डालें तो स्थिति अत्यंत दुखद कहानी कहती है| ओड़िसा में जुलाई 2008 में संजय दास को पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की निस्संकोच अवहेलना करते हुए गिरफ्तार कर लिया था अत: पुलिस की इस अनुचित कार्यवाही से व्यथित होकर पीड़ित ने वर्ष 2009 में उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल की| खेद का विषय है कि इस याचिका पर उच्च न्यायालय ने 4 वर्ष बाद अब वर्ष  2013 में सरकार से जवाबी हलफनामा दायर करने को कहा है|  प्रकरण में जवाब देते हुए राज्य के पुलिस महानिदेशक ने कहा है कि अब दोषी की पहचान करना कठिन है| वास्तव में देखा जाए तो भारत भूमि के अधिकाँश लोगों, चाहे वे कोई भी पद धारण करते हों, के चिंतन से लोकतंत्र का मूल दर्शन ही गायब है| विधायिकाएं आधे-अधूरे और जनविरोधी कानून बनाती हैं, न्यायपालिका उन्हें लागू करते हुए और भोंथरा बना देती परिणामत: पुलिस का मनोबल और दुस्साहस-दोनों इस वातावरण में मुक्त रूप से पनपते  रहते  है|   पुलिस द्वारा न केवल आम नागरिक के साथ अभद्र व्यवहार करने और सरे आम गाली गलोज करने के  मामले मानवाधिकार तंत्र के सक्रिय या निष्क्रिय सहयोग और सानिद्य में जारी हैं बल्कि हिंसा तक  बेहिचक की जाती है| देश की सवा अरब की आबादी  में ढूंढने से भी उदाहरण मिलना मुश्किल है जहां बीस लाख में से एक भी पुलिस वाले को अपशब्दों के लिए या मानव गरिमा हनन के लिए दण्डित किया गया हो|

एक बार जब भारत ने मानवाधिकार संधि का अनुमोदन कर दिया तो उसके बाद सम्पूर्ण देश में मानवाधिकार की रक्षा करना, प्रोन्नति करना और उसका उल्लंघन रोकना सरकार का दायित्व हो जाता है – ऐसा उल्लंघन चाहे किसी सरकारी सेवक द्वारा किया जा रहा हो या किसी नीजि व्यक्ति द्वारा| सरकार मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में ऐसा कोई भेदभाव नहीं बरत सकती किन्तु भारत के मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 12 में मात्र लोक सेवकों द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में ही आयोग द्वारा जांच का प्रावधान रखा गया है और इस प्रकार नीजि व्यक्तियों को मानवाधिकार उल्लंघन की खुली छूट दे दी गयी है कि उनके विरुद्ध शिकायतों पर आयोग कोई कार्यवाही नहीं करेगा| वहीं ओंटारियो राज्य ने अपने लिए एक विस्तृत और व्यापक मानवाधिकार संहिता बना रखी है| संहिता की धारा 29 में मानवाधिकार संरक्षण और प्रोन्नति के व्यापक प्रावधान है और यह कहा गया है कि आयोग का कार्य मानवाधिकारों (न केवल रक्षा करना बल्कि) के सम्मान को आगे बढ़ाना और प्रोन्नत करना आयोग का कार्य है तथा इसमें नीजि या सरकारी उल्लंघन के मध्य किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया गया है| मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ओंटारियो न केवल अपने मुख्यालय पर बल्कि कैम्प लगाकर घटना स्थल के नजदीक सुनवाई का अवसर देता है ताकि पीड़ित पक्ष अपना दावा आसानी से प्रभावी ढंग प्रस्तुत कर सके| उक्त मामले से यह भी स्पष्ट है कि वर्ष 2009  के मामले में ओंटारियो के ट्रिब्यूनल ने अपना निर्णय सुना दिया है जबकि समान अवधि के मामले में ओड़िसा उच्च न्यायालय ने अभी सरकार से जवाब ही मांगा है, निर्णय  में लगने वाले समय और मिलने वाली राहत के विषय में कोई सुन्दर पूर्वानुमान  नहीं लगाया  जा सकता| उल्लेखनीय है कि भारत जब मानवप्राणी  के रूप में प्राप्त अधिकारों के विषय में कनाडा से इतना पीछे है तो नागरिक के तौर पर उपलब्ध मूल अधिकारों के विषय में अभी चर्चा करना ही अपरिपक्व होगा, चाहे कागजी तौर पर वे संविधान में सम्मिलित हों| यह भी ध्यान देने योग्य है कि कनाडा, ब्रिटिश संसद के नियंत्रण से वर्ष 1982 में ही अर्थात भारत से 35 वर्ष बाद पूरी तरह से मुक्त हुआ है| अब देश की जनता कर्णधारों से जवाब मांगती है कि इस अवधि में इन्होंने आम भारतीय के लिए अब तक क्या किया और भविष्य में जो करने जा रहे हैं उसकी रूप रेखा क्या है|  


Thursday, 26 September 2013

अवैध गिरफ्तारी व हिरासत में रखना आई ए एस, तहसीलदार और पुलिस अधिकारी को भारी पडा

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने सुरेशकुमार शर्मा को अवैध हिरासत में रखने के प्रकरण में राज्य सरकार को 2 लाख रुपये मुआवजा देने और घटना में संलिप्त आई ए एस अधिकारी के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही को 3 माह की अवधि में निपटाने के निर्देश दिए हैं| न्यायाधिपति राजीव शर्मा ने सुरेश कुमार शर्मा की रिट याचिका पर हिमाचल राज्य  को दिनांक 2.9.13 को  यह आदेश दिया है| स्मरण रहे कि न्यायालय ने पूर्व में ही दिनांक  23.05.13 को सुनवाई कर अंतरिम आदेश दिया था कि चूँकि आई ए एस - बी आर कमल और तहसीलदार सिद्धार्थ आचार्य ने याची की स्वतंत्रता का हनन विधि विरुद्ध रूप से किया है अत: उनके विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही की जाये और उन्हें निलंबित कर दिया जाए| साथ ही न्यायालय ने यह भी आदेश दिया था कि सरकार हर्जाने के लिए रुपये दो लाख न्यायालय में अग्रिम जमा करवाएं |
  याची सुरेश कुमार शर्मा ने उपखंड मजिस्ट्रेट के दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107 और 151 ( जिसका आम तौर पर दुरूपयोग किया जाता है) के अंतर्गत उसकी गिरफ्तारी के आदेश को चुनौती देते हुए आरोप लगाया था कि उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अनुचित हनन हुआ है व उसे 72 घंटे से अधिक अवधि के लिए हिरासत में रखा गया और जमानत मुचलका स्वीकार नहीं किया गया| याचिका में आरोप लगाए गए हैं कि याची ने उसके गाँव के दो व्यक्तियों द्वारा 60 बीघा सरकारी भूमि पर अतिक्रमण के विषय में उसने कई शिकायतें की थी| यद्यपि अतिक्रमण हटा दिया गया किन्तु अप्रसन्न होकर उसे झूठे मामले में फंसा दिया गया|  नतीजन रोहरू के उपखंड मजिस्ट्रेट बी आर कमल ने अतिक्रमियों की झूठी शिकायत पर दिनांक 7.7.09 को याची की गिरफ्तारी के आदेश जारी किये और उसे तीन बाद गिरफ्तार किया गया और तत्कालीन कार्यवाहक उपखंड मजिस्ट्रेट तहसीलदार जुब्बल सिद्धार्थ आचार्य ने उसका जमानत मुचलका स्वीकार नहीं किया| याची को दिनांक 13.07.09 को मुक्त किया गया और बाद में कार्यवाही बंद कर दी गयी |

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107  में यह प्रावधान है कि पर्याप्त आधार होने पर मजिस्ट्रेट सम्बद्ध व्यक्ति से शांति बनाए रखने के लिए मुचलका प्रस्तुत करने की अपेक्षा कर सकता है| धारा 109 में मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति को प्राप्त सूचना का सार, मुचलका की रकम, प्रतिभुओं  की संख्या, प्रकार और वर्ग बताते हुए  कारण दर्शित करने  की अपेक्षा करेगा| न्यायालय में ऐसा व्यक्ति उपस्थित होने की दशा में उसे यह सार बताया जाएगा| धारा 113 के अनुसार ऐसे व्यक्ति की उपस्थति के लिए समन जारी किया जाएगा और गिरफ्तारी का वारंट केवल अत्यावश्यक परिस्थितियों में ही जारी किया जाएगा | समन या वारंट के साथ ऐसे आदेश की प्रति गिरफ्तार व्यक्ति को दी  जायेगी| धारा 116(1) के  अनुसार ऐसे व्यक्ति के उपस्थित होने पर शिकायत की सत्यता की जांच  की जाएगी और उचित होने पर अतिरिक्त साक्ष्य लिया जाएगा| धारा 116 (3) के परंतुक के अनुसार, धारा 108, 109 या 110 के अलावा,  जांच किये बिना अंतरिम अवधि के लिए मुचलका के लिए निर्देश नहीं दिए जा सकते| जबकि प्रकरण में पुलिस अधिकारी के बुलाये जाने पर याची उपस्थित हुआ और उसे गिरफ्तार कर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया गया| उसके द्वारा प्रस्तुत व्यक्तिगत मुचलका और उसके पिता द्वारा प्रस्तुत मुचलका को  भी इस बनावटी आधार पर अस्वीकार कर दिया गया कि उसमें सम्पति के विवरण नहीं हैं| बाद में सम्पति के विवरण सहित आवेदन प्रस्तुत करने पर ही उसे रिहा किया गया|
याची को कानूनन एक बार में 24 घंटे से अधिक अवधि के लिए हिरासत में नहीं भेजा जा सकता था  किन्तु उसे दिनांक 10.07.09 से 13.07.09 तक 72 घंटे हिरासत में भेजने का अवैध आदेश दिया गया| यदि याची द्वारा प्रस्तुत मुचलका में सम्पति का पूर्ण विवरण नहीं था तो उसे तीन दिन बाद के स्थान पर उसी दिन विवरण प्रस्तुत करने की अपेक्षा की जा सकती थी| लेखक का विनम्र मत है कि मजिस्ट्रेट 24 घंटे ड्यूटी पर होता है तथा बिना अनुमति व वैकल्पिक व्यवस्था के वह मुख्यालय भी नहीं छोड़ सकता| इसी दृष्टिकोण से दंड प्रक्रिया संहिता में “मजिस्ट्रेट न्यायालय” शब्द के स्थान पर मात्र “मजिस्ट्रेट” शब्द का प्रयोग किया गया है अर्थात मजिस्ट्रेट द्वारा कार्यवाही करने के लिए न्यायालय लगा होना आवश्यक नहीं है क्योंकि न्यायालय का निर्धारित समय और छुट्टियां होती हैं जबकि ये मजिस्ट्रेट पर लागू नहीं होती| जब मजिस्ट्रेट छुट्टी के समय या दिन शांति रखने के लिए आदेश दे सकता है तो फिर वह जनता का सेवक होते होते हुए जमानत के लिए मना कैसे कर सकता है|

याचिका की सुनवाई के समय न्यायालय ने पाया कि याची की गिरफ्तारी की सम्पूर्ण प्रक्रिया में निर्धारित आवश्यक कानून की अनुपालना नहीं की गयी है और इसमें दुर्भावाना की बू आती है| यह सम्पूर्ण कार्यवाही सरकारी भूमि पर अतिक्रमियों की सह पर की गयी है| याची के विरुद्ध उक्त अनुचित कार्यवाही को निरस्त करते हुए न्यायालय ने आगे आदेश दिया कि सरकार याची को दो लाख रूपये का हर्जाना दे व सरकार चाहे तो हर्जाने की राशि की वसूली आई ए एस और तहसीलदार से कर सकती है तथा उनके विरुद्ध प्रारंभ की गयी अनुशासनिक कार्यवाही को तीन माह की अवधि में निपटा दिया जाये| न्यायालय ने आगे यह भी आदिष्ट किया है कि  सरस्वतीनगर पुलिस चौकी के सहायक उप निरीक्षक ओम प्रकाश, जोकि उक्त गिरफ्तारी में संलिप्त रहा है, को भी समान रूप से निलंबित किया जाए और उसके विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही को भी 3 माह की अवधि में निपटाया जाय| सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वालों के विरुद्ध कार्यवाही की जाये|


Friday, 7 June 2013

बरामदगी दिखाने व गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी का नार्को टेस्ट व ब्रेन मैपिंग करवाया जाए



पुलिस हिंसा और भ्रष्टाचार की बुनियाद अंग्रेजी साक्ष्य कानून
ब्रिटिश साम्राज्य के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए गवर्नर जनरल ने भारतीय  साक्ष्य अधिनियम 1872 बनाया था| यह स्वस्प्ष्ट है कि राज सिंहासन पर बैठे लोग ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतिनिधि थे और उनका उद्देश्य कानून बनाकर जनता को न्याय सुनिश्चित करना नहीं बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार करना और उसकी पकड को मजबूत बनाए रखना था| आज भी हमारे देश में यही न्यायप्रणाली-परिपाटी  प्रचलित है जिसमें न्याय माँगने वाले को “तारीखें” मिलती हैं| आज भी देश के न्यायिक अधिकारी, अर्द्ध-पुलिस अधिकारी की तरह व्यवहार करते हैं और गिरफ्तारी का औचित्य ठहराने के लिए वे कहते हैं कि जहां अभियुक्त का न्यायिक प्रक्रिया से भागने का भय हो उसे गिरफ्तार करना उचित है किन्तु जो पुलिस उसे पहले गिरफ्तार कर सकती वह उसे बाद में भी तो ढूंढकर गिरफ्तार कर सकती है| इसी प्रकार न्यायाधीशों का यह भी कहना होता है कि जहां अभियुक्त द्वारा गवाहों या साक्ष्यों से छेड़छाड़ की संभावना हो तो उसकी गिरफ्तारी उचित है| दूसरी ओर राज्यों के पुलिस नियम यह कहते हैं कि अपराध का पता लगने पर पुलिस को तुरंत घटना स्थल पर जाना चाहिए और सम्बंधित दस्तावेजों को बरामद कर लेना चाहिए| ऐसी स्थिति में यदि पुलिस अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं करे उसका दंड अभियुक्त को नहीं मिलना चाहिए क्योंकि संविधान के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति तब तक निर्दोष है जब तक कि उसे उचित परीक्षण में दोषी नहीं ठहरा दिया जाता| ठीक उसी प्रकार जहां साक्ष्यों से छेड़छाड़ की संभावना हो वहां कलमबंद बयान करवाए जा सकते हैं|  किन्तु देश का तंत्र हार्दिक रूप से यह कभी  नहीं चाहता कि दोषी को दंड मिले, अपराधों पर नियंत्रण हो अपितु वे तो स्वयं शोषण करना चाहते हैं|  दूसरा, जहां तक साक्षियों या प्रलेखों के साथ छेड़छाड़ का प्रश्न है, अभियुक्त में हितबद्ध परिवारजन, मित्र आदि भी यह कार्य कर सकते हैं और यहाँ तक देखा गया है कि शक्तिशाली अभियुक्त होने परिवादी पर स्वयम पुलिस दबाव डालती है| तो फिर क्या प्रलेखों और साक्षियों के साथ छेड़छाड़ की संभावना के मद्देनजर इन लोगों को भी गिरफ्तार कर लिया जाए?    

तत्कालीन गवर्नर जनरल का स्थान आज के राष्ट्रपति के समकक्ष था और ये कानून जनता के चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा बनाए गए नहीं बल्कि जनता पर थोपे गए एक तरफ़ा अनुबंध की प्रकृति के हैं| जिस प्रकार राष्ट्रपति द्वारा जारी कोई भी अध्यादेश संसद की पुष्टि के बिना मात्र 6 माह तक ही वैध है उसी सिद्धांत पर ये कानून मात्र 6 माह की सीमित अवधि के लिए लागू रहने चाहिए थे और देश की संसद को चाहिए था कि इन सबकी बारीबारी से समीक्षा करे कि क्या ये कानून जनतांत्रिक मूल्यों को प्रोत्साहित करते हैं|  खेद का विषय है कि आज स्वतंत्र भारत में भी उन्हीं कानूनों को ढोया जा रहा है और उनकी समसामयिक प्रासंगिकता पर देश के संकीर्ण सोचवाले जन प्रतिनिधि और न्यायविद कभी भी प्रश्न तक नहीं उठा रहे हैं| अभी हाल ही यशवंत सिन्हा ने राजस्थान पत्रिका को दिए एक साक्षात्कार में कहा है कि दंड संहिता के आधार पर तो अंग्रेज देश में सौ साल तक शासन कर गए किन्तु विद्वान् श्री सिन्हा यह भूल रहे हैं कि शासन करने और सफल प्रजातंत्र के कार्य में जमीन-आसमान  का अंतर होता है| शासन चलाने में जनता का हित-अहित नहीं देखा जाता बल्कि कुर्सी पर अपनी पकड़ मात्र मजबूत करनी होती है| इससे हमारे जन प्रतिनिधियों की दिवालिया और गुलाम मानसिकता का संकेत मिलता है|

सिद्धांतत: संविधान लागू होने के बाद देश के नागरिक ही इस प्रजातंत्र के स्वामी हैं और सभी सरकारी सेवक जनता के नौकर हैं किन्तु इन नौकरों को नागरिक आज भी रेत में रेंगनेवाले कीड़े-मकौड़े जैसे नजर आते हैं| देश का शासन आज भी कानून से नहीं बल्कि इनके आशीर्वाद से चलता है| यह आशीर्वाद स्वामीभक्तों  और प्रसाद चढाने वालों को  सुलभ है| इसी कूटनीति के सहारे ब्रिटेन ने लगभग पूरे विश्व पर शासन किया है और एक समय ऐसा था जब ब्रिटिश साम्राज्य में कभी भी सूर्यास्त नहीं होता था अर्थात उत्तर से दक्षिण व पूर्व से पश्चिम तक उनका साम्राज्य विस्तृत था| उनके साम्राज्य में यदि पूर्व में सूर्यास्त हो रहा होता तो पश्चिम में सूर्योदय होता था| यह बात अलग है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सम्पूर्ण विश्व स्तर पर ही स्वतंत्रता की मांग बलवती होने लगी तो उन्हें धीरे- धीरे सभी राष्ट्रों को मुक्त करना पड़ा जिसमें 1947 में संयोग से भारत की भी बारी आ गयी| किन्तु भारत की शासन प्रणाली में आज तक कोई परिवर्तन नहीं आया है क्योंकि आज भी 80 प्रतिशत से ज्यादा वही कानून लागू हैं जो ब्रिटिश सरकार ने अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए बनाए थे| ये कानून जनतंत्र के दर्शन पर आधारित नहीं हैं और न ही हमारे सामाजिक ताने-बाने और मर्यादाओं से निकले हैं| प्रजातंत्र में कानून समाज के लिए बनाए जाते हैं जबकि राजतन्त्र में समाज कानून मानने के लिए बाध्य होता है| सभ्य समाज में कानून सामाजिक नियंत्रण का साधन है और यह आचरण की लक्ष्मण रेखा है| कानून का उद्देश्य प्रत्येक को उसका वाजिब हक़ देना है| जब भी समाज या व्यक्ति के विरुद्ध कोई अनुचित कार्य किया जाए तो कानून हरकत में आता है| राज्य का यह कर्तव्य है कि वह अपराधियों से समाज की रक्षा करे| इस प्रकार अपराधों को राज्य के विरुद्ध माना जाता है और राज्य द्वारा अभियोजक की नियुक्ति की जाती है|     

दूसरा, एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि यदि यही कानून जनतंत्र के लिए उपयुक्त होते तो ब्रिटेन में यही मौलिक कानून – दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता, दीवानी प्रक्रिया संहिता और साक्ष्य कानून आज भी लागू होते| किन्तु ब्रिटेन में समस्याओं को अविलम्ब निराकरण किया जाता है और वहां इस बात की प्रतीक्षा नहीं की जाती कि चलती बस में दुष्कर्म होने के बाद कानून बनाया जाएगा| कानून निर्माण का उद्देश्य समग्र और व्यापक होता है तथा उसमें दूरदर्शिता होनी चाहिए व  उनमें विद्यमान धरातल स्तर की सभी परिस्थितियों का समावेश होना चाहिए| कानून मात्र आज की तात्कालिक समस्याओं का ही नहीं बल्कि संभावित भावी और आने वाली पीढ़ियों की चुनौतियों से निपटने को ध्यान में रखते हुए बनाए जाने चाहिए| इनमें  सभी पक्षकारों के हितों का ध्यान रखते हुए संतुलन के साथ दुरूपयोग की समस्या से निपटने की भी समुचित व्यवस्था होनी चाहिए| किसी भी कानून का दुरूपयोग पाए जाने पर बिना मांग किये दुरूपयोग से पीड़ित व्यक्ति को उचित और वास्तविक क्षतिपूर्ति और दुरुपयोगकर्ता को समुचित दंड ही न्याय व्यवस्था में वास्तविक सुधार और संतुलन ला सकता है|  अब तो सरकार को कोई भी कानून बनाने से पहले इस कटु सत्य को ध्यान रखना चाहिए कि न्यायपालिका सहित उसकी  सम्पूर्ण व्यवस्था ही भ्रष्ट और चौपट है|

भारत के विधि आयोग ने हिरासती हिंसा विषय पर दी गयी अपनी 152 वीं रिपोर्ट दिनांक 26.08.1994 में यह चिंता व्यक्त की है कि इसकी जड़ साक्ष्य कानून की विसंगतिपूर्ण धारा 27 में निहित है| साक्ष्य कानून में यद्यपि यह प्रावधान है कि  हिरासत में किसी व्यक्ति द्वारा की गयी कबुलियत स्वीकार्य नहीं है| यह प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20 के अनुरूप है किन्तु उक्त धारा में इससे विपरीत प्रावधान है कि यदि हिरासत में कोई व्यक्ति किसी बरामदगी से सम्बंधित कोई बयान देता है तो यह स्वीकार्य होगा | कूटनीतिक शब्दजाल से बनायी गयी इस धारा को चाहे देश के न्यायालय शब्दश: असंवैधानिक न ठहराते हों किन्तु यह मौलिक भावना और संविधान की आत्मा के विपरीत है|
पुलिस अधिकारी अपने अनुभव, ज्ञान, कौशल से इस बात को भलीभांति जानते हैं कि इस प्रावधान के उपयोग से वे अनुचित तरीकों का प्रयोग करके ऐसा बयान प्राप्त कर सकते हैं या बनावटी कथन गढ़ सकते हैं जो स्वयं अभियुक्त के विरुद्ध प्रभाव रखता हो| यह एक बड़ी अप्रिय स्थिति है कि इस धारा के प्रभाव से शरारत की जा सकती है और इसके बल पर कबुलियत की रचना की जा सकती है| यदि हमें ईमानदार कानून की अवधारणा को आगे बढ़ाना हो तो इस कानून में आमूलचूल परिवर्तन करना पडेगा| भारतीय न्याय प्रणाली का यह सिद्धांत रहा है कि चाहे हजार दोषी छूट जाएँ लेकिन एक भी निर्दोष को को दंड नहीं मिलना चाहिए जबकि यह धारा इस सुस्थापित सिद्धांत के ठीक विपरीत प्रभाव रखती है|  भारत यू एन ओ का सदस्य है और उसने उत्पीडन पर अंतर्राष्ट्रीय संधि पर काफी पहले ही दिनांक 14.10.1997 को हस्ताक्षर कर दिये हैं और यह संधि भारत सरकार पर कानूनी रूप से बाध्यकारी प्रभाव रखती है तथा साक्ष्य कानून की धारा 27 इस संधि के प्रावधानों के विपरीत होने के कारण भी अविलम्ब निरस्त की जानी चाहिए| किन्तु इतिहास साक्षी है कि देश के नेता कोई ठोस रचनात्मक और टिकाऊ मौलिक परिवर्तनकारी कार्य करने के स्थान पर किसी मार्ग, भवन, विश्वविद्यालय, नहर, नगर या प्रान्त का नाम बदल कर सीधी साधी जनता से सस्ती लोकप्रियता लूटने का प्रयास करते हैं|

स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने डी के बासु के प्रसिद्ध मामले में कहा है कि मानवाधिकारों का सबसे बड़ा उल्लंघन अनुसंधान में उस समय होता है जब पुलिस कबूलियत के लिए या साक्ष्य प्राप्त करने के लिए थर्ड डिग्री तरीकों का इस्तेमाल करती है| हिरासत में उत्पीडन और मृत्यु इस सीमा तक बढ़ गए हैं कि कानून के राज और आपराधिक न्याय प्रशासन की विश्वसनीयता दांव पर लग गयी है| विधि आयोग ने आगे भी अपनी रिपोर्ट संख्या 185 में इस प्रावधान पर प्रतिकूल दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है| यद्यपि पुलिस के इन अत्याचारों को किसी भी कानून में कोई स्थान प्राप्त नहीं है और स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने  रामफल कुंडू बनाम कमल शर्मा के मामले में कहा है कि कानून में यह सुनिश्चित है जब किसी कार्य के लिए कोई शक्ति दी जाती है तो वह ठीक उसी प्रकार प्रयोग की जानी चाहिए अन्यथा बिलकुल नहीं और अन्य तरीके आवश्यक रूप से निषिद्ध हैं|

यद्यपि पुलिस को हिरासत में अमानवीय कृत्य का सहारा लेने का कोई अधिकार नहीं है किन्तु उक्त धारा की आड़ में पुलिस वह सब कुछ कर रही है जिसकी करने की उन्हें कानून में कोई अनुमति नहीं है और पुलिस इसे अपना अधिकार मानती है| दूसरी ओर भारत में पशुओं पर निर्दयता के निवारण के लिए 1960 से ही कानून बना हुआ है किन्तु मनुष्य जाति पर निर्दयता के निवारण के लिए हमारी विधायिकाओं को कोई कानून बनाने के लिये आज तक फुरसत नहीं मिली है| यह भी सुस्थापित है कि कोई भी व्यक्ति किसी प्रेरणा या भय के बिना अपने विरुद्ध किसी भी तथ्य का रहस्योद्घाटन नहीं करेगा अत: पुलिस द्वारा अभियुक्त से प्राप्त की गयी सूचना मुश्किल से ही किसी बाहरी प्रभाव के बिना हो सकती है| सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब राज्य बनाम बलबीर सिंह (1994 एआईआर 1872) में कहा है कि यदि अभिरक्षा में एक व्यक्ति से पूछताछ की जाती है तो उसे सर्वप्रथम स्पष्ट एवं असंदिग्ध शब्दों में बताया जाना चाहिए उसे चुप रहने का अधिकार है। जो इस विशेषाधिकार से अनभिज्ञ हो उन्हें यह चेतावनी प्रारम्भिक स्तर पर ही दी जानी चाहिए। ऐसी चेतावनी की अन्तर्निहित आवश्यकता पूछताछ के दबावयुक्त वातावरण पर काबू पाने के लिए है। किन्तु इन निर्देशों की अनुपालना किस प्रकार सुनिश्चित की जा रही है कहने की आवश्यकता नहीं है|


साक्ष्य कानून के उक्त प्रावधान से पुलिस को बनावटी कहानी गढ़ने और फर्जी साक्ष्य बनाने के लिए खुला अवसर उपलब्ध होता है| कुछ वर्ष पहले ऐसा ही एक दुखदायी मामला नछत्र सिंह का सामने आया जिसमें पंजाब पुलिस ने फर्जीतौर पर खून से रंगे हथियार, कपडे और गवाह खड़े करके 5 अभियुक्तों को एक ऐसे व्यक्ति की ह्त्या के जुर्म में सजा करवा दी जो जीवित था और कालान्तर में पंजाब उच्च न्यायालय में उपस्थित था| पुलिस की बाजीगरी की कहानी यहीं समाप्त नहीं होती अपितु अन्य भी ऐसे बहुत से मामले हैं जहां बिलकुल निर्दोष व्यक्ति को फंसाकर दोषी ठहरा दिया जाता है और तथाकथित रक्त से रंगे कपड़ों  आदि की जांच में पाया जाता है कि वह मानव खून ही नहीं था अपितु किसी जानवर का खून था अथवा लोहे के जंग के निशान थे| इसी प्रकार पुलिस (जो सामान उनके पास उचंती तौर पर जब्ती से पडा रहता है) अन्य मामलों में भी अवैध हथियार, चोरी आदि के सामान की फर्जी बरामदगी दिखाकर अपनी करामत दिखाती है, वाही वाही लूटती है और पदोन्नति और प्रतिवर्ष पदक भी पाती है| नछत्र सिंह के उक्त मामले में पाँचों अभियुक्तों को रिहा करते हुए उन्हें एक करोड़ रुपये का मुआवजा दिया गया किन्तु इस धारा के दुरुपयोग को रोकने के लिए न ही तो यह कोई स्वीकार्य उपाय है और स्वतंत्रता के अमूल्य अधिकार को देखते हुए किसी भी मौद्रिक क्षतिपूर्ति से वास्तव में हुई हानि की पूर्ति नहीं हो सकती| इस प्रकरण में एक अभियुक्त ने तो  सामाजिक बदनामी के कारण आत्म ह्त्या भी कर ली थी| पुलिस के अनुचित कृत्यों से मात्र एक व्यक्ति के जीवन का महत्वपूर्ण भाग ही नहीं अपितु सम्पूर्ण परिवार इस प्रकार बर्बाद हो जाता है, व्यक्ति आर्थिक रूप से जेरबार हो जाता है, परिवार छिन्नभिन्न हो जता है, उसका भविष्य अन्धकार में लीन  हो जाता है और दोष मुक्त होने के बावजूद भी यह झूठा कलंक उसका जीवन भर पीछा नहीं छोड़ता है| समाज में उसे अपमान की दृष्टि से देखा जाता है महज इस कारण की कि साक्ष्य कानून के उक्त प्रावधान ने पुलिस के क्रूर हाथों में इसका दुरूपयोग करने का हथियार उपलब्ध करवाया|
वर्तमान कानून में परीक्षण पूर्ण होने पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के अंतर्गत न्यायाधीश अभियुक्त से स्पष्टीकरण माँगता है और अभियुक्त अपना पक्ष रख सकता है किन्तु उसकी यह परीक्षा न तो शपथ पर होती है और न ही उसकी प्रतिपरीक्षा की जा सकती | अत: यह बयान सामान्य बयान की तरह नहीं पढ़ा जाता और न ही बयान की तरह मान्य होता है | एक अभियुक्त भी सक्षम साक्षी होता है और जहां वह बिलकुल निर्दोष हो वहां स्वयं को साक्षी के तौर पर प्रस्तुत कर अपनी निर्दोषिता सिद्ध कर सकता है| चूँकि साक्षी के तौर पर दिए गए उसके बयान पर प्रतिपरीक्षण हो सकता है अत; यह बयान मान्य है| किन्तु भारत में इस प्रावधान का उपयोग करने के उदाहरण ढूढने से भी मिलने मुश्किल हैं |  धारा 27 का दुरूपयोग रोकने का एक अन्य विकल्प भी हो सकता| कानून सभी के लिए समान है अत: धारा 27 की आड़ में बरामदगी दिखाने व गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी और अभियुक्त दोनों का नार्को टेस्ट व ब्रेन मैपिंग  करवाया जाए ताकि वास्तविकता सामने आ सके कि  साक्ष्य किस प्रकार प्राप्त किया गया है| यदि पुलिस अधिकारी  इस हेतु सहमत नहीं हो तो इसे उसके विरुद्ध पढ़ा जाय|

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161  के अंतर्गत पुलिस को दिए गए बयानों को धारा 162 में न्यायालयों में मान्यता नहीं दी गयी है| देश की विधायिका को भी इस बात का ज्ञान है कि पुलिस थानों में नागरिकों के साथ किस प्रकार अभद्र व्यवहार किया जाता है इस कारण धारा 161 के बयानों के प्रयोजनार्थ महिलाओं और बच्चों के बयान लेने के लिए उन्हें थानों में बुलाने पर 1973 की संहिता में प्रतिबन्ध लगाया गया है जोकि 1898 की अंग्रेजी संहिता में नहीं था| प्रश्न यह है कि जिस पुलिस से महिलाओं और बच्चों के साथ सद्व्यवहार की आशा नहीं है वह अन्य नागरिकों के साथ कैसे सद्व्यवहार कर सकती है या उन्हें पुलिस के दुर्व्यवहार को झेलने के लिए क्यों विवश किया जाए|  इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश आनंद नारायण मुल्ला ने पुलिस को देश का सबसे बड़ा अपराधी समूह बताया था और हाल ही तरनतारन (पंजाब) में एक महिला के साथ सरेआम मारपीट के मामले में स्वयं सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने  टिपण्णी की थी कि पुलिस में सभी नियुक्तियां पैसे के दम पर होती हैं| सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली ज्युडीसियल  सर्विस के मामले में भी कहा है कि पुलिस अधिकारियों पर कोई कार्यवाही नहीं करने से यह संकेत मिलता है कि गुजरात राज्य में पुलिस हावी है अत: दोषी पुलिस कर्मियों पर कार्यवाही करने से प्रशासन हिचकिचाता है| कमोबेश यही स्थिति सम्पूर्ण भारत की है और इससे पुलिस की कार्यवाहियों की विश्वसनीयता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है| 


महानगरों में फुटपाथों, रेलवे  आदि पर मजदूरी करनेवाले, कचरा बीनने वाले गरीब बच्चे इस धारा के दुरूपयोग के सबसे ज्यादा शिकार होते हैं| अत: इस धारा को अविलम्ब निरस्त करने की आवश्यकता है जबकि पुलिस और अभियोजन यह कुतर्क दे सकते हैं कि एक अभियुक्त को दण्डित करने के लिए यह एक कारगर उपाय है| किन्तु वास्तविक स्थिति भिन्न है| आस्ट्रेलिया के साक्ष्य कानून में इस प्रकार  का कोई प्रावधान नहीं है फिर भी वहां दोष सिद्धि की दर- मजिस्ट्रेट मामलों में 6.1 प्रतिशत और जिला न्यायालयों के मामलों में 8.2 प्रतिशत है वहीँ भारतीय विधि आयोग अपनी 197 वीं रिपोर्ट में भारत में मात्र 2 प्रतिशत दोषसिद्धि की दर पर चिंता व्यक्त कर चुका है| इस प्रकार पुलिस और अभियोजन की यह अवधारणा भी पूर्णत: निराधार और बेबुनियाद है| पुलिस को अब उत्पीडन आधारित अन्ग्रेजी कालीन तरीकों का परित्याग कर साक्ष्य और अनुसन्धान के आधुनिक एवं उन्नत तरीकों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए| न्यायशास्त्र का यह भी सिद्धांत है कि साक्ष्यों को गिना नहीं अपितु उनकी गुणवता देखी जानी चाहिए| ऐसी स्थिति में पुलिस द्वारा इस प्रकार गढ़ी गयी साक्ष्यों का मूल्याङ्कन किया जाना चाहिए|  वर्तमान में 1872 का विद्यमान  भारतीय साक्ष्य कानून समयातीत हो गया है और यह समसामयिक चुनौतियों का सामना करने में विफल है|