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Saturday, 11 January 2014

भारत में सूचना की आजादी मिलना अभी बाकी है

सूचना का अधिकार अधिनियम,2005 के प्रावधानों के अंतर्गत केंद्र व राज्यों में  आयोगों की स्थापना की गयी है और केन्द्रीय प्रतिष्ठानों में अधिकार की प्रोन्नति का दायित्व केन्द्रीय सूचना आयोग को सौंपा गया है| केन्द्रीय आयोग की स्थापना से अब तक लगभग 170,000 अपीलें व परिवाद याचिकाएं आयोग में दायर हुई हैं और लगभग 140,000 याचिकाएं निस्तारित की जा चुकी हैं| किन्तु विडंबना यह है कि लोक प्राधिकारियों द्वारा 80-90प्रतिशत  मामलों में देय सूचना से अभी भी इन्कार ही किया जाता है और शासन व्यवस्था व लोक प्राधिकारियों के कार्यकरण में अभी भी अपार  अस्वच्छता-भ्रष्टाचार-अपारदर्शिता कायम है| ऐसा नहीं है कि यह कोई नवीन प्रवृति हो अपितु संचार व विचार अभिव्यक्ति पर प्रतिबन्ध के माध्यम से सरकारों के अस्वच्छ कार्यकरण पर पर्दा डालने यह मनोवृति हमें अंग्रेजों से विरासत में मिली थी जिसे हमने संजोकर बरकरार रखा है| वायरलेस का आविष्कार पर्याप्त पहले हो गया था और सरकारी तंत्र के पास यह सुविधा उपलब्ध थी किन्तु आम जनता तक इसकी पहुँच प्रतिबंधित रही है| यहाँ तक कि 1947 में मिली नाम की आजादी के पर्याप्त बाद तक भी जनता को रेडियो सुनने के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था| भारत सरकार के दूरसंचार विभाग के पास 1970 से ही इन्टरनेट सेवा उपलब्ध थी जो आम जनता  को 1990 के बाद ही सुलभ हो सकी है|   
जहां प्रथम वर्ष में आयोग में मात्र 7000 याचिकाएं प्राप्त हुई वहीं आठवें वर्ष में 40000 याचिकाएं प्राप्त हुई हैं व औसत याचिका की सुनवाई में एक वर्ष से अधिक का समय लग रहा है जो आयोग के गठन के उद्देश्य को ही मिथ्या साबित कर रहा है| यह स्थिति एक भयावह चित्र प्रस्तुत करती है| सूचना हेतु मना करने पर नागरिक आयोग में याचिका दायर करते हैं और इस संख्या में सुपरसोनिक जेट की गति से वृद्धि हो रही है| यह वृद्धि  इस कारण नहीं है कि नागरिकों में जागरूकता का संचार हो रहा है अपितु आयोग दोषी जन सूचना अधिकारियों के साथ मित्रवत व्यवहार कर रहा  है और आम लोक प्राधिकारी में यह विश्वास गहरा रहा है कि वे चाहे किसी भी सूचना के लिए मना करें उनका कुछ भी बिगड़नेवाला नहीं| अधिक से अधिक यह हो सकता है कि आयोग द्वारा एक आवेदक को दो वर्ष संघर्ष करने के बाद सूचना देने के आदेश हो जाएँ व उसकी अनुपालना तो फिर भी संदिग्ध है| आयोग द्वारा दोषी अधिकारियों का अनुचित बचाव करने से जनतंत्र के इस औजार की धार लगभग कुंद हो चुकी है व जनता की नजर में आयोग स्वामिभक्त रहे सेवानिवृत अधिकारियों को रोज़गार देकर उपकृत करने का एक संस्थान मात्र रह गया है| कुछ आयुक्तों द्वारा किन्हीं अपवित्र कारणों या सस्ती लोकप्रियता के लिए अतिउत्साहित होकर कुछेक जनानुकूल दिखाई देने वाले निर्णय देने मात्र से 125 करोड़ भारतवासियों का हित नहीं सध सकता| यद्यपि, आपवादिक मामलों को छोड़ते हुए, अधिकाँश मामलों में आयोग ने सूचना प्रदानगी  के  आदेश दिये हैं किन्तु फिर भी दिए गये अधिकाँश निर्णय कानून व न्याय की कसौटी पर खरे नहीं हैं| ऐसे भी मामले हैं जहां समाजसेवा के कुछ थोक व्यापारियों पर आयुक्तों ने उपकार किया हो और उनके मामलों को दर्ज होने से पहले ही निर्णित कर दिया हो| मीडिया की सुर्ख़ियों में रहने को लालायित ऐसे स्वामिभक्त लोग आयोग और आयुक्तों का यशोगान करने वालों की अग्रिम पंक्ति में दुधिया प्रकाश में खड़े नजर आते हैं और आयोग को अयोग्य बना रहे हैं|

केन्द्रीय आयोग ने अपनी स्थापना से लेकर अब तक 1000 से भी कम प्रकरणों में अर्थदंड लगाया गया है और उसका भी लगभग 40प्रतिशत  भाग वसूली होना शेष है| इतना ही नहीं अर्थदंड के कुल मामलों में से 60% तो दिल्ली सरकार के विभाग और स्थानीय निकाय के हैं| अन्य प्रमुख मामले बैंकों व बीमा कंपनियों के हैं| इनमें से भारत सरकार के विभागों या मंत्रालयों पर अर्थदंड के मामले तो 5% से भी कम हैं| देश की नौकरशाही जिम्मेदारी व पारदर्शिता से कार्य नहीं कर रही थी और इस पवित्र उद्देश्य को ध्यान में रखकर अधिनियम बनाया गया| किन्तु आयोगों में उन्हीं सेवानिवृत नौकरशाहों को नियुक्त कर दिया गया है जो इस अंग्रेजी शासन से चली आ रही गैर-जिम्मेदार, अस्वच्छ, हठधर्मी, राजतान्त्रिक, निरंकुश व अपारदर्शी व्यवस्था का कल तक अंग रहे हैं और इसी के लिए उपयुक्त रहे हैं| तभी तो वे अपना सेवाकाल सहर्ष पूर्ण कर पाए अन्यथा ये लोग यदि अंत:करण, विचारों, कार्यशैली  व मन से इस मलिन व्यवस्था को अंगीकार नहीं करते तो निश्चित रूप से अपना सेवाकाल सहर्ष पूर्ण नहीं कर पाते| इनसे कुछ सुधार की आशा करना दिन में स्वप्न देखने से अधिक कुछ भी नहीं है| अर्थात सरकारों ने बिल्ली को दूध की रखवाली की जिम्मेदारी देने की कहावत चरितारार्थ कर दी है| सेवा निवृति के बाद पुन:नियुक्त ये नौकरशाह अपनी बिरादरी के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्यवाही नहीं कर सके हैं यह तथ्य आंकड़ों से साबित है| केन्द्रीय आयोग में अब तक लगभग 20 आयुक्त नियुक्त हो चुके हैं जिसमें से आपवादिक तौर पर मात्र एक ही गैर-नौकरशाह रहे हैं| ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि केन्द्रीय आयोग द्वारा अर्थदंड लगाने के कुल 1000 मामलों में से आधे से ज्यादा तो अकेले इस गैर-नौकरशाह आयुक्त के हैं अर्थात शेष 19 आयुक्तों ने मिलकर अपने सम्पूर्ण कार्यकाल में मात्र 300 मामलों में अर्थदंड लगाया है जोकि प्रति आयुक्त 15 मामले आते हैं| उक्त विश्लेष्ण से यह भी निष्कर्ष निकलता है कि आयोग में एक औसत नौकरशाह आयुक्त ने एक वर्ष में मात्र 3 मामलों में अर्थदंड लगाया है और दोषी अधिकारियों का पर्याप्त पक्षपोषण व बचाव कर जनतंत्र के इस प्रभावी उपकरण को भी नकारा साबित कर दिया है| व्यथित नागरिकों को हर्जाना दिलाने के मामले तो ढूंढने से भी मिलना कठिन है|  
अधिनियम की धारा 19(5) व 20(1) में समय पर सूचना नहीं देने का औचित्य स्थापित करने का भार सूचना अधिकारी पर है और इसमें विफल रहने पर सूचना अधिकारी पर कानून के अनुसार अर्थदंड निरपवाद स्वरूप लगाया जाना चाहिए| अधिनियम में आयुक्तों को कोई विवेकाधिकार नहीं दिया गया है| यहाँ तक कि  सम्पूर्ण अधिनियम में विवेकाधिकार शब्द तक का प्रयोग नहीं किया गया है जिससे विधायिका का मंतव्य स्पष्ट है| समाज में व्यवस्था बनाये रखने के लिए कानून में दंड का प्रावधान रखा जाता है किन्तु प्राय:आयोग के निर्णयों में न ही तो सूचना नहीं देने का औचित्य स्थापित माना जाता है और न ही दोषी पर अर्थदंड लगाया जाता जिससे सूचना अधिकारियों को यह सन्देश जाता है कि आयोग एक दंतविहीन, रस्मी व दोषियों का मैत्रीपूर्ण संस्थान है और आयोग की कार्यवाहियां मैत्रीपूर्ण मैच हैं| दोषी लोगों को दंड नहीं देने से अन्य बचेखुचे अधिकारी भी कानून का उल्लंघन करने को लालायित व प्रेरित होते हैं जिससे सम्पूर्ण वातावरण अपदूषित होता है| इस मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए आयोग को न्यूनतम 10 प्रतिशत मामलों में अर्थदंड लगाना चाहिए था| आयोग ने शक्तिसंपन्न विभागों के विरुद्ध यद्यपि कई मामले निर्णित किये हैं किन्तु आश्चर्य का विषय है कि आज तक उनमें से एक भी मामले में अर्थदंड नहीं लगाया है इससे आयोग की निष्पक्षता पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लगता| आयोग ने गृह मंत्रालय व न्याय विभाग के विरुद्ध कई हजार मामले निर्णित किये हैं जहां आवेदकों को अनुचित रूप से सूचना हेतु मना किया गया किन्तु आयोग ने इन विभागों के अधिकारियों पर किसी मामले में मुश्किल से ही कोई अर्थदंड लगाया हो| न्यायालय, सतर्कता, पुलिस  आदि ऐसे ही अन्य सशक्त विभाग हैं जिन पर स्वयम आयोग ने अर्थदंड लगाने से परहेज़ कर अपनी कर्तव्य विमुखता का परिचय दिया है और अपनी विश्वसनीयता व निष्पक्षता पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा दिया है| एक मामले में तो आयोग ने न्यायालय द्वारा सुनवाई में समय मांगने पर न्यायालय की बजाय स्वयम अपने खजाने से याची को क्षतिपूर्ति दी है| आयोग द्वारा अर्थदंड लगाए जाने के मामलों का विश्लेष्ण करने पर ज्ञात होता है कि मात्र स्थानीय निकाय, शिक्षा विभाग, बिजली, पानी, परिवहन, निर्माण विभाग जैसे निरीह व शक्तिहीन लोक प्राधिकारी ही अर्थदंड चुकाने के लिए विवश किये गए हैं

आयोगों को यह चाहिए कि जहां सूचना हेतु याची के पक्ष में आदिष्ट करे उस प्रत्येक निर्णय में या तो धारा 19(5) व 20(1) के अंतर्गत दोषी अधिकारी द्वारा स्थापित औचित्य को अपने निर्णय में साबित समझे अन्यथा दोषी अधिकारी पर अर्थदंड अवश्य लगाए ताकि अधिनियम कारगर साबित हो सके और यह एक कागजी व कोरी औचारिकता नहीं रह जाए|  
राज्य आयोगों की स्थिति भी लगभग समान ही है क्योंकि वहां पर भी किसी न किसी स्वामिभक्त सेवानिवृत नौकरशाह को देव मूर्ति की तरह स्थापित कर उपकृत किया गया है और दोषी अधिकारियों का भरपूर बचाव किया जा रहा है| सरकार का यह कुतर्क हो सकता है कि सेवानिवृत लोगों को नियुक्त करने पर उन्हें आधा ही वेतन (आधा भाग तो वे पेंशन के रूप में पहले से ही प्राप्त कर रहे होते हैं) देना पड़ता है अत: यह सस्ता है किन्तु इस सस्तेपन की जनता को वास्तव में कितनी कीमत चुकानी पडती है इसका आकलन नहीं किया जा रहा है| इससे भी अधिक आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि कई बार तो पुलिस विभाग के अधिकारियों को आयुक्त नियुक्त कर दिया जाता है जिनके सम्पूर्ण सेवाकाल में मूल अधिकारों का तो क्या मानव-अधिकारों की रक्षा करने का कोई वातावरण आसपास तक नहीं रहा हो| स्वयम पुलिस अधिकारी जानते हैं कि सेवानिवृति के बाद उनका जनता में कितना सम्मान होता है| इस डर से कई पुलिस अधिकारी तो फेसबुक जैसे  सामाजिक माध्यमों पर अपना खाता तो खोल लेते हैं किन्तु अपना पूर्व सेवाकाल तक प्रकट नहीं करते हैं| देश की जनता को सूचना की स्वतंत्रता के लिए अभी मीलों का सफर व काफी संघर्ष करना बाकी है क्योंकि अधिनियम अभी तक तो एक कोरी औपचारिकता है– जनता को भुलावे व सस्ती लोकप्रियता का एक साधन मात्र है|
केंद्र सरकार व राज्य सरकारों को यह नीति बनानी चाहिए कि किसी भी आयोग या बोर्ड में 20 प्रतिशत से अधिक सेवानिवृत नौकरशाह नियुक्त नहीं किये जाएंगे तभी इस देश की जनता का हित सध सकता है- वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा| प्रजातंत्र, प्रजा के सशक्तिकरण व सता के विकेन्द्रीकरण का का दूसरा नाम है जिसके संचालन में आम जनता की सक्रिय सहभागिता होती है और जनता किसी भी जनप्रतिनिधि के बंधक नहीं होती है| समस्त कार्यपालक, न्यायपालक व जनप्रतिनिधि लोकतंत्र के सेवक तथा जनता के ट्रस्टी होते हैं और जनता ही लोकतंत्र की वास्तविक स्वामी होती है| प्रजातंत्र में नौकरशाहों की नियुक्ति मात्र परामर्श के लिए ही उचित है किसी भी निर्णय करने के लिए नहीं| सरकार में भी किसी भी स्तर के सचिव को नीतिगत निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है अपितु वे मंत्री के मात्र सलाहकार हैं| इसी सिद्धांत का यहाँ भी अनुसरण किया जाना चाहिए क्योंकि जिन्होंने अपने सम्पूर्ण सेवाकाल में मात्र परामर्श दिया हो और वे निर्णय लेने में अनुभवहीन हों उन्हें निर्णय करने का पद आखिर क्योंकर दिया जाए|     

जय भारत !

Thursday, 19 January 2012

अपीलार्थिया क्षतिपूर्ति पाने के लिये हकदार है

राजस्थान सूचना आयोग ने  अपील संख्या  1497/2010 प्रतिभा कुमारी बनाम लोक सेवा आयोग  में कहा है कि अपीलार्थिया ने अपने स्वयं की परीक्षा के सन्दर्भ में 3 बिन्दूओं की सूचना चाहीं थी। सूचना ऐसी नहीं हैं जिन्हें सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8, 9, 11 के परिप्रेक्ष्य में अदयेता की श्रेणी में रखा जावे। आयोग ने एक से अधिक विभिन्न मामलों में यह अभिनिर्धारित किया है कि समान प्रकृति की सूचनाओं को अदयेता की श्रेणी में न रखते हुए निःशुल्क सूचना अपीलार्थीयो को प्रदान कर दी जावे परन्तु प्रत्यर्थी पक्ष की यह केवल हठधर्मिता ही है कि वह जानबूझ कर ऐसी सूचनाओं से अपीलार्थिया को वंचित रखना चाहते हैं। अपीलार्थिया ने उनके पत्र दिनांक 08/09/10 में यह विशेषकर उल्लेख किया है कि वह बहुत मानसिक पीडा से गुजर रही है, एवं सूचना प्रदान कर दिये जाने से उसके हितों में वृद्धि होगी। सुस्पष्ट है कि सूचना के अभाव में अपीलार्थिया को मानसिक सन्ताप हुआ है, जिसकी क्षतिपूर्ति की जाना भी उचित होगा।मैं चाहूंगा कि प्रत्यर्थी इस आदेश प्राप्ति के 21 दिवस में अवशेष दोनों बिन्दूओं की सूचना निःशुल्क जरिये पंजीकृत डाक भिजवाना सुनिश्चित करेंगे। साथ ही यह प्रकरण ऐसा है जिसमें अपीलार्थिया क्षतिपूर्ति पाने के लिये हकदार है, अतः मैं सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 19(8)ख) के आलोक में प्रत्यर्थी को एतद्द्वारा निर्दिष्ट करता हूं कि वह अपीलार्थिया को 2,000- रूपये (दो हजार रूपये) की क्षतिपूर्ति राशि का भुगतान भी जरिये डिमान्ड ड्राफ्ट अपीलार्थिया को सीधे ही भिजवाते हुए आयोग को एक माह की अवधि में अवगत कराये।

Wednesday, 18 January 2012

प्रत्यर्थी सिद्ध नहीं कर सके कि वांछित सूचना के प्रकटीकरण से अनुसंधान/अभियोजन की प्रक्रिया में किस प्रकार से बाधा होगी तो सूचना दे

राजस्थान सूचना आयोग ने अपील संख्या: 3035/2009 श्री मधुसुदन पालीवाल, बनाम  भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो  में कहा है कि  प्रत्यर्थी पक्ष का यह भी तर्क था कि अभी तक अभियोजन की प्रक्रिया बाकी है और धारा 8(1) यह भी अपेक्षा करता है कि ऐसी सूचना जो अभियोजन की प्रक्रिया में किसी प्रकार से बाधक है, को भी प्रकटन नहीं करना चाहिए। उनके तर्क में एक प्रकार से बल है। परन्तु वे यह भी स्पष्ट नहीं कर सके कि यदि वांछित सूचना का प्रकटीकरण किया जाता है तो अभियोजन में किसी प्रकार व्यवधान आऐगा। फिर यह भी अपेक्षित नहीं है कि किसी भी प्रकार से प्रत्यर्थी पक्ष अनावश्यक रूप से प्रकरण लटका कर विचाराधीन रखे और कोई भी आवेदक इस कारण से ही सूचना को वंचित रहे। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 नागरिक को सूचना से वंचित रखने की किस भी प्रक्रिया को उचित नहीं मानता। यह अधिनियम नागरिक के अधिकारों को सर्वोपरि रूप से रक्षित करता है और यह अपेक्षा करता है कि लोक प्राधिकारी के नियंत्रण के अधीन सूचना नागरिक की पहुंच में हो और इसके लिए लोक प्राधिकारी को व्यवहारिक व्यवस्था करने की भी अपेक्षा करता है। वर्तमान प्रकरण में प्राथमिकी वर्ष 2007 की है, अनुसंधान पूर्ण हुए भी डेढ वर्ष का समय हो चुका है। ऐसी स्थिति में एक लम्बे अन्तराल तक मेरी दृष्टि से अपीलार्थी को सूचना से वंचित नहीं रखा जा सकता। विशेषतया इस तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए कि प्रत्यर्थी पक्ष यह सिद्ध नहीं कर सके कि वांछित सूचना के प्रकटीकरण से अनुसंधान/अभियोजन की प्रक्रिया में किस प्रकार से बाधा होगी। इस दृष्टि से वर्तमान अपीले स्वीकार योग्य हैं|

Monday, 16 January 2012

धारा 8 (1), 9 व 11 के अतिरिक्त किसी भी सूचना को देने से मना नहीं किया जा सकता

राजस्थान सूचना आयोग ने अपील संख्याः 3506/2009 श्री नरेन्द्र कुमार कौशिक बनाम  मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट में कहा है कि   अधिनियम में केवल उसी सूचना को प्रकटन से छूट दी गई है जिनका उल्लेख सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 की धारा 8 (1), 911 में अंकन है। इसके अतिरिक्त किसी भी सूचना को देने से मना नहीं किया जा सकता। अधिनियम-2005 की धारा 22 के अनुसार तो अधिनियम-2005 के अन्य सभी अधिनियमों एवं नियमों पर अध्यारोही प्रभाव घोषित किया गया है। अधिनियम में जन क्रिया-कलाप   के अभाव में सूचना को रोकने का कोई प्रावधान नहीं है। अधिनियम-2005 में जन क्रिया-कलाप   को कहीं परिभाषित नहीं किया गया है और ना ही राजस्थान सूचना का अधिकार (उच्च न्यायालय एवं अधिनस्थ न्यायालय) नियम-2006 में जन क्रिया-कलाप   को परिभाषित किया है। इन शब्दों का प्रयोग केवल अधिनियम-2005 की धारा 8 (1) में है। यदि उस प्रावधान को पढा जाये तो स्पष्ट होता है कि यह उस व्यक्तिगत सूचना से संबंधित है जिसका प्रकटन किसी लोक क्रिया कलाप से संबंध ना रखता हो। प्रत्यर्थी पक्ष - लोक सूचना अधिकारी तथा विद्वान अपीलीय प्राधिकारी - ने अपने आदेशों में यह कहीं भी स्पष्ट नहीं किया है कि अपीलार्थी द्वारा वांछित सूचना अधिनियम-2005 की किस धारा या प्रावधान के तहत अदेय है। लोक क्रिया-कलाप से असम्बन्ध सूचना तो अधिनियम में कहीं भी रोकी नहीं गई है।

Sunday, 15 January 2012

लोक क्रिया-कलाप से असम्बन्ध सूचना तो अधिनियम में कहीं भी रोकी नहीं गई है

राजस्थान सूचना आयोग ने अपील संख्याः 3506/2009 श्री नरेन्द्र कुमार कौशिक बनाम  मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट में कहा है कि   अधिनियम में केवल उसी सूचना को प्रकटन से छूट दी गई है जिनका उल्लेख सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 की धारा 8 (1), 911 में अंकन है। इसके अतिरिक्त किसी भी सूचना को देने से मना नहीं किया जा सकता। अधिनियम-2005 की धारा 22 के अनुसार तो अधिनियम-2005 के अन्य सभी अधिनियमों एवं नियमों पर अध्यारोही प्रभाव घोषित किया गया है। अधिनियम में जन क्रिया-कलाप   के अभाव में सूचना को रोकने का कोई प्रावधान नहीं है। अधिनियम-2005 में जन क्रिया-कलाप   को कहीं परिभाषित नहीं किया गया है और ना ही राजस्थान सूचना का अधिकार (उच्च न्यायालय एवं अधिनस्थ न्यायालय) नियम-2006 में जन क्रिया-कलाप   को परिभाषित किया है। इन शब्दों का प्रयोग केवल अधिनियम-2005 की धारा 8 (1) में है। यदि उस प्रावधान को पढा जाये तो स्पष्ट होता है कि यह उस व्यक्तिगत सूचना से संबंधित है जिसका प्रकटन किसी लोक क्रिया कलाप से संबंध ना रखता हो। प्रत्यर्थी पक्ष - लोक सूचना अधिकारी तथा विद्वान अपीलीय प्राधिकारी - ने अपने आदेशों में यह कहीं भी स्पष्ट नहीं किया है कि अपीलार्थी द्वारा वांछित सूचना अधिनियम-2005 की किस धारा या प्रावधान के तहत अदेय है। लोक क्रिया-कलाप से असम्बन्ध सूचना तो अधिनियम में कहीं भी रोकी नहीं गई है।

Saturday, 14 January 2012

वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन तथा वार्षिक कार्य मूल्यांकन प्रतिवेदन संबंधित व्यक्ति को प्रकट किये जाने चाहिये

राजस्थान सूचना आयोग ने अपील संख्या 1154/2009 शासन सचिव कार्मिक विभाग  बनाम  श्री मधु सूदन शर्मा में कहा है कि सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 की धारा 22 में तो स्पष्ट रूप से यहां तक अंकित कर दिया गया है कि शासकीय गुप्त बात अधिनियम पर भी सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 भारी है तथा इस अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव है। इस प्रावधान में यह भी अंकित किया गया है कि ‘‘इस नियम से अन्यथा किसी विधि के आधार पर प्रभाव रखने वाली किसी लिखित में उससे असंगत बात के होते हुए भी सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 प्रभावी होगा। इसलिए अपीलकर्ता का यह तर्क कि वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन गोपनीय प्रकृति के हैं और अदेय है वर्तमान परिपेक्ष्य में निरर्थक है। इसी
तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए इस आयोग ने श्री के. के. माथुर बनाम रीको प्रकरण में दिनांकः 30-08-2006 को निर्णय देते हुए यह स्पष्ट कर दिया था कि तथाकथित वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन तथा वार्षिक कार्य मूल्यांकन प्रतिवेदन संबंधित व्यक्ति को प्रकट किये जाने चाहिये।

Friday, 13 January 2012

उत्तर पुस्तिका का अवलोकन करा दिया जाये

राजस्थान सूचना आयोग ने अपील संख्या  999/2010 सुश्री विनीता खाण्डल बनाम सचिव राजस्थान लोक सेवा आयोग में कहा है कि   अपीलार्थिया ने उत्तर पुस्तिका की छाया प्रति की अपेक्षा की है। सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 की धारा 8 (1) के उपबन्धों में ऐसी सूचना को प्रकटन से छूट नहीं दी गई है तथा उत्तर पुस्तिकाएं सूचना की परिभाषा में आती है। मैं यह उपयुक्त समझता हूँ  कि अपीलार्थिया को एक तिथि, समय सुनिश्चित कर आमंत्रित किया जाये और उन्हें संबंधित उत्तर पुस्तिका का अवलोकन करा दिया जाये।

Thursday, 12 January 2012

धारा ११ के अंतर्गत सूचना हेतु मना नहीं किया जा सकता

केंद्रीय सूचना आयोग ने प्रकरण सी आई सी/एसजी/ए/2010/01849 :ललित कुमार फूल बनाम उपभोक्ता मामले, खाद्य और नागरिक आपूर्ति विभाग के निर्णय में कहा है कि  यदि आवेदक ने अधिनियम के अंतर्गत सूचना मांगी है तो यदि धारा 8(1) के अंतर्गत छूट प्राप्त है तो ही मना की जा सकती है| धारा 11 में तो तीसरे पक्षकार से प्रक्रिया सम्बंधित आवश्यकताएँ हैं और प्रकटन से छूट नहीं देती है| धारा 11 में यह प्रावधान है कि जन सूचना अधिकारी आवेदन प्राप्त होने के पांच दिन के भीतर तीसरे पक्षकार को नोटिस देगा कि वह यदि वह सूचना तीसरे पक्षकार से सम्बंधित हो तो वह अपना पक्ष प्रस्तुत करे कि क्यों न वह सूचना आवेदक को दे दी जाय और सूचना प्रकटन के समय ऐसे प्रस्तुति को ध्यान रखा जायेगा|

Wednesday, 11 January 2012

जन सूचना अधिकारी अर्थदंड व खर्चा भुगतान करे

दिल्ली उच्च न्यायलय ने रिट संख्या/14017/2007: एम के त्यागी   बनाम के एल आहूजा (केन्द्रीय सतर्कता आयोग) के निर्णय में कहा है कि  90 दिन की अवधि का विलम्ब इस मान्यता पर सीमित है कि केन्द्रीय सतर्कता आयोग ने 27.02.06 को सूचना भेज दी थीं,  यद्यपि याची का कहना है कि उसे उक्त पत्र नहीं मिला है| इस बात में कोई संदेह नहीं है कि याची को सूचना देने में विलम्ब से गंभीर  हानि हुई है यहाँ तक कि वह अपनी दिसंबर 2005 में सेवानिवृति से पूर्व मना किये गए पदोन्नतियों को माँगने में असमर्थ रहा| तदनुसार विलम्ब के प्रत्येक  दिन के लिए धारा 20(1)  के अंतर्गत 250 रुपये  अर्थ दण्ड आज से 4 सप्ताह में अदा करेगा|
जहां तक अधिनियम की  धारा 19(8)(बी) के अंतर्गत क्षतिपूर्ति का प्रश्न है, इस न्यायालय का विचार है कि इस राशि की आसानी से गणना नहीं की जा सकती | न्यायहित की पूर्ति हो जायेगी यदि केन्द्रीय सतर्कता आयोग को याची को खर्चे के रुपये 30000 अदा करने की अपेक्षा की जाए| कथित राशि का के स आयोग याची को आज से 4 सप्ताह के भीतर भुगतान करेगा|

Tuesday, 10 January 2012

धारा 11 व 7(9) के आधार पर सूचना हेतु इन्कारी किसी कानूनी आधार के बिना है

 केंद्रीय सूचना आयोग ने प्रकरण सी आई सी/ओ के /ए/2008/001256:श्रीमती शेम   बनाम अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के निर्णय में कहा है कि  धारा 117(9) के आधार पर सूचना हेतु इन्कारी किसी कानूनी आधार के बिना है| सूचना से मना मात्र धारा 8(1) या 9 के अंतर्गत ही किया जा सकता है| धारा 11 तीसरे पक्षकार को  उसकी आपतियों के विषय में अवसर प्रदान करती है और धारा 7(9) मात्र यह बताने के लिए प्रयोज्य है कि सूचना अपीलार्थी द्वारा मांगे गए प्रारूप में देना संभव नहीं है| फिर भी जन सूचना अधिकारी धारा 7(9) के प्रयोजन में वैकल्पिक प्रारूप में सूचना प्रस्तावित कर सकता है| इसके अतिरिक्त पूछताछ अपने आप में धारा 11 या 7(9) को बिलकुल आमंत्रित नहीं करतीं| जन सूचना अधिकारी को अपीलार्थी को सूचना देने का आदेश दिया जाता है|उसे चेतावनी दी जाती है कि इस प्रकार सूचना देने से उपेक्षापूर्ण ढंग से मनाही में धारा 20 के दाण्डिक प्रावधान आकर्षित होते हैं|