Monday, 18 July 2011

गिरफ़्तारी एवं जब्ती

सुप्रीम कोर्ट ने वी.के. जैन बनाम भारत संघ (2000(1) एससीसी 709) में कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय ने व्यक्तिगत उपस्थिति से आपराधिक प्रकरण में छूट के लिए निम्नांकित शर्तें लगायी है:-
1.    जब भी मामला न्यायालय में लगेगा एक पैरोकार उसकी ओर से उपस्थित होगा।
2.    वह प्रकरण में अभियुक्त के रूप में पहचान पर विवाद नहीं करेगा।
3.    जब आवsश्यक हो वह न्यायालय में उपस्थित होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र  राज्य बनाम तपस डी नियोगी (1999 (7) एससीसी 685) में कहा है कि अभियुक्त या उसके सम्बन्धी का बैंक खाता या दं.प्र.सं. की धारा 102 के अर्थ में सम्पति, यदि पुलिस अनुसंधान के दौरान ऐसी सम्पति का प्रत्यक्ष सम्बन्ध अपराध कारित करने से पाया जाता है तो पुलिस अधिकारी उसे जब्त कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने आर.डी. उपाध्याय बनाम आन्ध्र प्रदेश  राज्य (1999(1) स्केल 139) में कहा है कि जिन अन्वीक्षणाधीन कैदियों को जमानत पर रिहा नहीं किया गया और 6 माह से अधिक जेल में रहे के अन्वीक्षण में विलम्ब के कारण छोड़ना उचित ठहराया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने गोपालाचारी बनाम केरल राज्य (1981 सु.को.रि. 338) में कहा है कि न्यायालय के पास विशिष्ट तथ्य होने चाहिए और संतुष्ट  होना चाहिए कि यदि विपक्षी को अभिरक्षा में नहीं रखा गया तो वह अपराध करेगा।
उड़ीसा उच्च न्यायालय ने दिवाकर नायक बनाम पुष्पलता पटेल (1997 3 क्राइम्स 107 (उड़ीसा)) में स्पष्ट  किया है कि मजिस्ट्रेट को गिरफ्तारी का कदम उठाने से पूर्व शांतिभंग होंगे के अंदेशे  के लिए समुचित कारण होने चाहिए और उसे यह दिखाई देना चाहिए कि आरोपित व्यक्ति की तुरन्त गिरफ्तारी के अतिरिक्त अपराध को रोका नहीं जा सकता। यह मजिस्ट्रेट का दायित्व है कि वह दं.प्र.संहिता धारा 111 के तहत संतुष्टि  दिखाने वाला आदेश लिखित में दर्ज करे ।

Sunday, 17 July 2011

कंटेम्प्ट की घ..ब..रा..ह..ट...!


जनतंत्र में वाक् स्वतंत्रता एवं अवमान कानून के दायरे

स्वतंत्र विचार प्रकटन जनतंत्र का  मूल आधार है| भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) में सभी नागरिकों को वाक् स्वातंत्र्य एवं अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य का अधिकार दिया गया है वहीँ न्यायालयों की गरिमा की रक्षा के लिए न्यायालय अवमान अधिनयम, 1971 बना कर इस स्वतंत्रता पर अंकुश भी लगाया गया है| किन्तु अनुच्छेद 13 के अनुसार ऐसा कोई कानून जो संविधान के इस भाग से विरोधाभास रखता है विरोधाभास की सीमा तक शून्य होगा| आइये हम प्रासंगिक कानून का विवेचन करते हैं| न्यायालय अवमान अधिनयम, 1971 की धारा 5 के अनुसार न्यायालय द्वारा सुने गए और अंतिम रूप से निर्णित किये गए मामले के गुणावगुणों  पर उचित टिप्पणियां प्रकाशित करने पर एक व्यक्ति अवमान का दोषी नहीं होगा| धारा 6 में यह प्रावधान है कि किसी न्यायालय के पीठासीन अधिकारी के विषय में  किसी अन्य अधीनस्थ न्यायालय या उच्च न्यायालय में सद्भाविक कथन के लिए अवमान का दोषी नहीं होगा| धारा 10 में यद्यपि उच्च न्यायालय को दण्ड का अधिकार दिया गया है किन्तु परंतुक में कहा गया है कि यदि ऐसा अवमान यदि भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत दंडनीय हो तो उच्च न्यायालय प्रसंज्ञान नहीं लेगा| भारतीय दण्ड संहिता की धारा 193 में झूठी गवाही बनाना, 196 में झूठी गवाही देना, 228 में न्यायिक अधिकारी का साशय अपमान, डराना आदि अपराध आते हैं|
व्यवहार में देखा जाये तो स्थिति बिलकुल भिन्न है| न्यायाधीशों के साथ पक्षकारों या वकीलों की गरमागरमी होती  है जिसमें गाली गलोज, अपशब्दों का प्रयोग, जूते फेंकना, मारपीट करना आदि कृत्य शामिल होते हैं| न्यायधीशों द्वारा प्रायः यह आरोप लगाया जाता है कि अपने पक्ष में निर्णय प्राप्त करने के लिए उन्हें डराया गया जबकि संभवतः उन्हें याद नहीं रहता कि वे सेवा ग्रहण करते समय शपथ पत्र दे चुके हैं कि वे बिना भय और पक्षपात के कार्य करेंगे| इस प्रकार भयभीत करने सम्बंधित उनका आरोप कानूनन  पूर्णतः निराधार है| भारतीय दण्ड संहिता में उपरोक्त समस्त कृत्यों को अपराध बताया गया है व उनके लिए अभियोजन के प्रावधान हैं| मानहानि के लिए भी संहिता की धारा ५०० में प्रावधान है| इतिहास के पन्नों से पुष्टि होती है कि भारत में संहिता के उक्त प्रावधानों का न्यूनतम प्रयोग किया जाता है और न्यायाधीशों के अहम की संतुष्टि के लिए अवमान कानून का  ही सहारा लिया जाता है| इसके दूसरे पहलू को देखें तो स्थिति और बदतर है| मात्र नागरिकों द्वारा ही नहीं अपितु पुलिस द्वारा झूठी गवाही बनाने व झूठी गवाही देने के अनेकों मामले प्रकाश में आते हैं किन्तु उनमें सम्यक कार्यवाही नहीं होती है| इन अपराधों का निर्बाध जारी रहना स्वयं इस तथ्य का प्रमाण है| इस प्रकार भारत में अवमान कानून न्यायधीशों के अहम की तुष्टि का साधन अधिक एवं न्यायिक गरिमा की रक्षा का साधन कम है| अवमान कानून की धारा 13 (क) में यह भी प्रावधान है की कोई भी न्यायालय जब तक संतुष्ट नहीं हो जाये कि अवमानकारी कृत्य से न्यायिक प्रक्रिया में मौलिक रूप से हस्तक्षेप हुआ है या ऐसी प्रवृति रखता है तो दण्डित नहीं करेगा| धारा 13 (ख) में यह भी प्रावधान है कि यदि न्यायालय संतुष्ट हो तो जनहित में सत्य को वैध बचाव अनुमत कर सकता है |
स्वतंत्रता के विषय में उल्लेखनीय है कि माननीय  न्यायाधिपति कृपाल ने वर्ष 1991 में नग्न कैबरे चलाने  के लिए, दिल्ली पुलिस की प्रार्थना के विरुद्ध, यह कहते हुए अनुमति दे दी थी कि लोग वहाँ अपने आप जाते हैं और ऐसे शो बिना उपयुक्त  लाइसेंस चलाना महत्वहीन है| माननीय  न्यायाधिपति कृपाल द्वारा दी गयी यह निषेधाज्ञा 9 वर्ष तक जारी रही| इलाहाबाद उच्च न्यायलय के न्यायाधीशों क्रमशः बी चौहान एवं डी गुप्ता की पीठ ने सुखदेव स्टील कटर्स( 2006 (2) ए डब्लू सी 1119) के मामले में याची पर टिप्पणियां करते हुए कहा है कि उसका  तोते जैसा जवाब आया नहीं| न्यायाधिपतिगण का  उक्त आचरण सर्वथा न्यायिक गरिमा के प्रतिकूल रहा है| उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि न्यायाधीश लोकतंत्र में जनता के सेवक हैं उनके स्वामी नहीं  तथा वे भी सामान्य नागरिकों की ही तरह हाड़ मांस के मनुष्य नस्ल के ही पुतले हैं कोई अवतार या श्रेष्ठ पुरुष अथवा भिन्न नस्ल से नहीं हैं |

न्यायाधिपति काटजू के शब्दों में जब यह मान लिया जाये कि भारत में लोकतंत्र है तो लोक ही श्रेष्ठ हैं और उसका समाधान यही है कि लोगों के वाक् स्वातंत्र्य एवं अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य का अधिकार प्राथमिक और अवमान की शक्तियां गौण हैं| दूसरे शब्दों में लोग स्वतंत्र हैं और न्यायधीशों की आलोचना करने का उन्हें अधिकार है किन्तु उन्हें न्यायपालिका के कृत्यों  को मुश्किल अथवा असंभव नहीं बनाना चाहिये| अवमान की शक्तियां ब्रहमास्त्र हैं और उनका प्रयोग पात्र पर ही किया जाना चाहिए| राजतन्त्र में राजा श्रेष्ठ होता है और जनता चूँकि उसकी प्रजा होती है अतः वह निम्न होती है| न्यायपालिका चूँकि राजा की शक्तियों का प्रयोग करती है उन्हें अपनी प्रजा से आज्ञा पालन करवाने के लिए इक़बाल की आवश्यकता होती है| दूसरी और प्रजातंत्र में प्रजा ही श्रेष्ठ है और न्यायाधीशों सहित समस्त राज्य अधिकारी उनके सेवक होने से वे निम्न हैं| इसलिए लोकतंत्र में न्यायाधीशों को अपनी शक्ति प्रदर्शन की आवश्यकता नहीं है|
इंग्लॅण्ड का एक रोचक मामला इस प्रकार है कि एक भूतपूर्व जासूस पीटर राइट ने अपने अनुभवों पर आधारित पुस्तक लिखी| ब्रिटिश सरकार  ने इसके प्रकाशन को प्रतिबंधित करने के लिए याचिका दायर की कि पुस्तक गोपनीय है और इसका  प्रकाशन राष्ट्र हित के प्रतिकूल है| हॉउस ऑफ लोर्ड्स ने 3-2  के बहुमत से रोक लगा दी| प्रेस इससे क्रुद्ध हुई और डेली मिरर ने न्यायाधीशों के उलटे चित्र प्रकाशित करते हुए ये मूर्ख शीर्षक दिया| किन्तु इंग्लॅण्ड में न्यायाधीश व्यक्तिगत अपमान पर ध्यान नहीं देते हैं| न्यायाधीशों का विचार था कि उन्हें विश्वास है वे मूर्ख नहीं हैं किन्तु अन्य लोगों को अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार है|
भारत में भी अवमान कानून का एक रोचक उदाहरण इस प्रकार है कि केन्द्रीय उत्पाद शुल्क एवं सेवा कर अपीलीय ट्रिबुनल बंगलौर में काफी गंभीर गडबडियां चल रही थीं जिसे एक्साइज ला टाइम्स के संपादक आर के जैन ने समय समय पर साहसिक संपादकीय के माध्यम से उजागर किया था| श्री जैन ने इस प्रसंग में उच्चाधिकारियों व सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधिपति को पत्र भी लिखे थे| इस प्रसंग में इंडायरेकट टैक्स प्रैक्टिसनर संघ द्वारा सम्पादकीय के विरुद्ध शिकायत में जाँच भी प्रारंभ हो गयी थी | किन्तु संघ के सदस्य स्वयं जाँच में उपस्थित नहीं हुए और उन्होंने अनुपस्थित रहकर मामला शांत करवाना बेहतर समझा क्योंकि उन्हें अंदेशा था कि जाँच से सत्य उजागर हो सकता है जो कि ट्रिबुनल और संघ के कुछ सदस्यों के लिए प्रतिकूल हो सकता है| अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने भारत के महाधिवक्ता से इस प्रसंग में अवमान याचिका दायर करने के लिए सहमति हेतु पत्र लिखे तथा सुप्रीम कोर्ट में अवमान याचिका दायर कर दी|

याचिका के निर्णय दिनांक 13.08.2010 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह स्मरणीय है कि वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मनुष्य का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अधिकार माना गया है| गौतम बुद्ध, महावीर और महात्मा गाँधी के इस देश में वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हमेशा सम्मान किया गया है| एक बार महात्मा गाँधी से प्रश्न किया गया कि आपको सत्य और अभय में से यदि एक का चयन करना पड़े तो आप किसका चयन करेंगे| गांधीजी का जवाब अभय के पक्ष में था| उनका कहना  था कि जो भय मुक्त नहीं है वह सत्य नहीं बोल सकता अतः सत्य की रक्षा के लिए अभय होना प्राथमिक आवश्यकता है| स्वतंत्रता के बाद न्यायालयों ने मनुष्य के इस अधिकार की उत्साहपूर्वक रक्षा की है| किसी भी निकाय की स्वस्थ आलोचना उसमें सुधार का मार्ग प्रशस्त करती है| सामान्यतया न्यायालय अनुच्छेद 19 में दिए गए अधिकार को प्रतिबंधित करने हेतु अवमान के लिए दण्डित करने की शक्ति का प्रयोग नहीं करते हैं| जब आलोचना शालीनता की सीमाओं को पार  कर जाये तब ही न्यायालय इस शक्ति का प्रयोग करते हैं |

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा है कि हमें खुले और उचित रूप में स्वीकार करना चाहिए कि न्यायालयों की गरिमा और कानून की महिमा में विश्वास में कमी आई है और यह सब राजनेताओं की टिप्पणियों से नहीं अपितु न्यायालयों द्वारा जरूरतमंद को मौलिक और शीघ्र न्याय देने में विफलता से हुआ है| आज कई उपचारहीन बुराइयां हैं जिनका समाधान करने में न्यायपलिका असमर्थ है | (लेखकीय टिपण्णी :यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने रूपा हुर्रा (ए आई आर 2002 सु को 1771) के मामले में कहा है कि  यह न्यायालय देश में प्रत्येक शिकायत के लिए मंच है|) न्याय लंबे समय से चुपचाप चिल्ला रहा है जिसके लिए वकिलों एवं न्यायधीशों को अपना दायित्व समझना चाहिए| हमें रोशनी का  रुख भीतर की ओर  करना चाहिए| प्रतिवादी ने जो कुछ उजागर किया वह प्रशासनिक पक्ष और कुछ सीमा तक न्यायिक पक्ष के कार्य करने की सचाई थी| ऐसे करने में उसने मात्र अनुच्छेद 51 क (ज) {सुधार की भावना का विकास} के अपने कर्तव्यों की पूर्ति की है| प्रतिवादी ने अपने किन्हीं छिपे उद्देश्यों के लिए नहीं किया है| इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि प्रतिवादी ने यह कलंकित करने के उद्देश्य के लिए किया हो| हम प्रतिवादी के पैरोकार से सहमत हैं  कि प्रस्तुत याचिका में सद्भावना का  अभाव है और न्यायालय की प्रक्रिया का  दुरूपयोग है| वादी ने महाधिवक्ता से जाँच समिति के तथ्य को छिपाकर सहमति प्राप्त की है| हमें खेद है कि एक पेशेवर निकाय ने कानून के गलत रास्ते का  चयन किया| परिणामतः याचिका निरस्त की जाती है और तुच्छ याचिका दायर करने के लिए वादी रूपये 200000 खर्चे के देगा जिसमें से रु 100000 विधिक सेवा समिति  में जमा किये जायेंगे और रु 100000 प्रतिवादी को दिए जायेंगे |

इन पंक्तियों के लेखक का विचार है कि जब वादी ने महाधिवक्ता से जाँच समिति के तथ्य को छिपाकर सहमति प्राप्त की और यह याचिका प्रस्तुत की तो इसमें न्याय को कलंकित करने का  प्रयास किया गया जोकि अवमान के स्पष्ट दायरे में आता है| पूर्ण न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट को याची के विरुद्ध अवमान की कार्यवाही प्रारम्भ करनी चाहिए थी| आछेपित ट्रिबुनल आदेशों में करोड़ों रुपये की हेराफेरी (जिससे याची संस्था के सदस्य निश्चित रूप से लाभान्वित हुए हैं) सामने आयी है जिसे देखते हुए मामले में लगाया  गया खर्चा तो प्रत्यर्थी के लिए नगण्य है| घावों पर मात्र शाब्दिक मरहम लगाने वाले सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को भी पूर्ण न्याय का दर्जा नहीं दिया जा सकता है| सम्यक न्याय के लिए आवश्यक है कि दोषी को कम से कम इतना दण्ड अवश्य मिलना चाहिए की वह पुनः अपराध करने का विचार मानस में नहीं लावे| जहाँ तक प्रतिवादी को दी गयी प्रतिपूर्ति का प्रश्न है इतनी राशि तो सुप्रीम कोर्ट में वकिलों को ही देनी पड़ जाती है तो प्रतिवादी का इस कार्यवाही में बेवजह उत्पीडन, मानसिक संताप,कार्य से वंचित, आवागमन आदि पर व्यय/नुकसान  हुआ उसके लिए वस्तुतः उसे कोई क्षतिपूर्ति नहीं मिली है| 

Saturday, 16 July 2011

गिरफ़्तारी एवं जब्ती

सुप्रीम कोर्ट ने दीपक बजाज बनाम महाsराष्ट्र राज्य के निर्णय दिनांक 12.11.08 में स्पष्ट किया है कि यह सुनिश्चित है कि न्यायालय के निर्णय को मशीन की तरह नहीं पढ़ना है और न ही ऐसे मानो कि वह कानून हो। यदि एक व्यक्ति जिसके विरूद्ध निवारक नजरबन्दी आदेश पारित किया है वह न्यायालय को यह दर्शित कर सके कि उक्त निरूद्धीकरण आदेश स्पष्टतया अवैध है तो उसे जेल जाने के लिए क्यों विवश किया जावे। ऐसे व्यक्ति को यह कहना कि यद्यपि विरूद्धीकरण आदेश अवैध है उसे जेल जाना चाहिए और उसे बाद में छोड़ दिया जावेगा यह अर्थहीन एवं व्यर्थ का अभ्यास है।
सुप्रीम कोर्ट ने इंजी के.के. जेराठ बनाम संघ शासित प्रदेश चण्डीगढ़ (1998 एआईआर 1934) में कहा है कि उच्च न्यायालय का यह दृष्टिकोण की याची ने विश्वास दिलाया है कि वह अनुसंधान एजेन्सी को पूछताछ में सहयोग करेगा यह मात्र रस्म अदायगी है और ऐसे मामलों में अभिरक्षा में पूछताछ ही अच्छा है। उच्च न्यायालय ने ध्यान दिया है कि दो एफआईआरों - एक सी.बी.आई. तथा दूसरी चण्डीगढ प्रशासन द्वारा- दोनों का क्षेत्र अलग-अलग है। इसलिए दूसरी एफ.आई.आर अलग से दर्ज करने का कोई अवरोध नहीं है और इस आधार पर प्रार्थी द्वारा दिया गया तर्क कि तथ्यों के एक ही समूह पर दो विभिन्न एजेन्सियों द्वारा समानन्तर अनुसंधान नहीं की जा सकती, निरस्त कर दिया गया।
लेखकीय टिप्पणी:-सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब राज्य बनाम बलवीर सिंह (1994 एआईआर 1872) में कहा है कि अभियुक्त को चुप रहने का अधिकार है अर्थात् वह पुलिस को कुछ भी न बताये तो ऐसी स्थिति में रिमाण्ड का औचित्य नहीं रह जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुन्दर भाई अम्बालाल देसाई बनाम गुजरात राज्य (एआईआर 2003 एस सी 638) में कहा है कि किसी भी सूरत में ऐसी वस्तु जब्ती के एक सप्ताह के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत की जानी चाहिए। यदि आवश्यक हो तो ऐसी वस्तु न्यायालय अनुसंधान अधिकारी को आगे अनुसंधान करने या पहचान के लिए सौंप सकता है। फिर भी अनुसंधान अधिकारी को ऐसी वस्तु अनुसंधान एवं पहचान के लिए लम्बे समय तक अपने पास नहीं रखनी चाहिए। करेन्सी नोटों के लिए भी ऐसी ही प्रक्रिया अपनायी जा सकती है।

Friday, 15 July 2011

क्षतिपूर्ति

सुप्रीम कोर्ट ने हरदेव मोटर ट्रांसपोर्ट बनाम मध्यप्रदेश राज्य के निर्णय दिनांक 19.10.06 में कहा है कि ड्यूटी की दर तय करते समय कार्यपालक विधायी शक्ति को धारण करना अनुमत नहीं किया जा सकता और मूलभूत संविधि के प्रावधान से असंगत कोई प्रावधान नहीं कर सकते। अभिव्यक्ति तर्कसंगत क्षतिपूर्ति सुविधाजनक है किन्तु डावांडोल है। तर्कसंगतता का मानक अलगावमय ही हो सकता है। विचरण की स्वतन्त्रता के लिए आवश्यक है कि कोई भी आर्थिक भार राज्य में एक सीमा तक जाने के वास्तविक प्रयोग से सड़क के रूप में भौतिक सुविधायें के प्रारूप पर नहीं डाला जायेगा। यह महत्वपूर्ण है कि जहां कहीं भी निर्धारित हो तर्क संगतता की जांच प्रत्येक विच्छेपित कानून के हिसाब से होगा और कोई भी मामलों के लिए सामान्य सही तरीका नहीं बनाया जा सकता।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने दाण्डिक रिविजन संख्या 340/2008 धर्मवीर खट्टर बनाम केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरों में कहा है कि लिफ्ट मामले की चारों दाण्डिक पुनरीक्षण याचिकायें प्रत्येक याची द्वारा केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो को चार सप्ताह के भीतर रूपये 25000 खर्चा देने के आदेश सहित निरस्त की जाती है।
पंजाब हरियाणा उच्च न्यायालय ने दाण्डिक अपील सं0 332 डीबी /1998 नछत्रसिंह बनाम पंजाब राज्य में निर्धारित किया है कि हमारे गंभीर विचार हैं कि अपीलार्थी नछत्रसिंह, सिरा, अमरजीतसिंह, विकास सिंह, सुरजीत सिंह को क्षतिपूर्ति देने का पूर्णतः दायित्व पंजाब सरकार के कन्धों पर जाता है। इस सब परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अर्थात् पांच साल के कठोर कारावास जो कि अपीलार्थियों ने भुगता है, मानसिक संताप और उत्पीड़न और उनकी इज्जत की हानि जो उन्होंने अन्वीक्षण से लेकर आज तक तेरह वर्ष में भुगती है एक अपूर्तनीय क्षति हुई है जिससे उनको मानसिक, शारीरिक किसी भी मौद्रिक कीमत से पूर्ति नहीं की जा सकती। उन्होंने प्रत्येक ने बीस लाख रूपये क्षतिपूर्ति मांगी है जो कि वर्तमान परिस्थितियों में उचित है। हम प्रत्येक अपीलार्थी को बीस लाख रूपये देते हैं जो कि पंजाब राज्य द्वारा इस आदेश के पारण के तीस दिन के भीतर भुगतान की जायेगी। मुख्य सचिव तथा गृहसचिव पंजाब को इस उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार के पास एक करोड़ रूपया जमा कराने का निर्देश दिया जाता है। अन्वीक्षण न्यायालय को दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 340 के अन्तर्गत अमरसिंह, गुरूदेव सिंह, मुख्तारसिंह, करनैल सिंह, सुखदेव सिंह, सुरजीत कौर, बीकरसिंह, पुलिस निरीक्षक दर्शनसिंह, सर्वजीत राय, जीतसिंह, जगसिर सिंह के विरूद्ध कार्यवाही के निर्देश दिये जाते हैं।
ज्ञातव्य हो कि इस प्रकरण में पुलिस तथा परिवादियों की षडयन्त्रपूर्वक मिलीभगत से ऐसे व्यक्ति की हत्या के आक्षेप में अभियुक्तगण को मिथ्या रूप से दोष सिद्ध कर दिया गया था जो वास्तव में जीवित था।
अध्यक्ष रेल्वे मण्डल बनाम चंद्रिमा दास 2002 एस.सी.सी 465 में सुप्रीम कोर्ट ने धारित किया है कि एक गरीब औरत का रेल्वे यात्री निवास में रेल्वे कर्मचारियों द्वारा ले जाया गया तथा बलात्कार किया गया। भारत संघ को प्रतिनिधिक रूप में जिम्मेदार ठहराते हुये रेल्वे अधिकारियों के कर्त्तव्य के लिए पीड़ित को क्षतिपूर्ति के निर्देश दिये और तद्नुसार क्षतिपूर्ति दी गई। यदि ऐसा कोई कर्मचारी दुष्कृतिपूर्ण कार्य करता है तो भारत संघ जिसके वे कर्मचारी है अन्य कानूनी आवश्यकताओं के संतुष्ट होने पर प्रतिनिधिक रूप में उसके कर्मचारियों द्वारा किये गये गलत काम के लिए प्रतिनिधिक रूप में जिम्मेदार है।
गोहाटी उच्च न्यायालय ने मणीपुर मानवाधिकार आयोग बनाम मणीपुर राज्य के निर्णय दिनांक 23.01.07 में कहा है कि इस न्यायालय ने विभिन्न मामलों में संविधान के अनुच्छेद 32 के अन्तर्गत याचिकाऐं स्वीकार की हैं और सरकारी अधिकारियों के हाथो पीड़ित होने वाले याचियों को क्षतिपूर्ति प्रदान की है। रूदलशाह बनाम बिहार राज्य से लेकर इस न्यायालय द्वारा क्षतिकारित करने जो कि दुष्कृतिपूर्ण कार्य था के लिए क्षतिपूर्ति दिलवायी है। यदि कोई निजी निकाय भी लोक कृत्यों का निर्वहन करता है और वह लोक कृत्यों द्वारा डाले गये किसी अधिकार से मना करता है तो सार्वजनिक कानून या इस प्रकार की शक्ति का स्रोत महत्वहीन है ।फिर भी सार्वजनिक कानून और व्यक्तिगत कानून में उपचार होने चाहिए।

Thursday, 14 July 2011

रिश्वत देने में अग्रणी संगठन

अक्सर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश में गरमागरम बहस चलती रहती है किन्तु मैं अनुभव करता हूँ कि भ्रष्टाचार की बहस में से मौलिक बात गायब है | सोम प्रकाश के मामले में हमारे सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि रिश्वत मात्र अनुचित काम को करने के लिए ही नहीं दी जाती है अपितु उचित कम को जल्दी करवाने के लिए भी दी जाती है क्योंकि समय ही धन है| विवेकाधिकार भ्रष्टाचार को जन्म देती है|इससे निष्कर्ष निकलता है कि भ्रष्टाचार को कम करने के लिए समय सारिणी निर्धारित कर व विवेकाधिकार समाप्त कर इस बुराई पर नियंत्रण पाया जा सकता है|




दूसरी ओर देखें तो हमें ज्ञात होगा कि व्यापारी एवं उद्योगपति वर्ग ने अपने हितों की रक्षा के लिए संगठन बना रखें हैं| विभिन्न प्रकार की कर चोरी , बिजली चोरी आदि के मामलों में भी ये संगठन अपने सदस्यों का बचाव करते हैं| सदस्यों से मासिक या वार्षिक वसूली की जाती है जो संगठन के पदाधिकारियों द्वारा वाणिज्यिककर , आयकर , उत्पाद शुल्क ,चुंगी , बिजली विभाग, खाद्य सुरक्षा आदि के अधिकारियों को भेंट स्वरूप दे दी जाती है और एवज में इन अपराधियों को अभयदान दे दिया जाता है| किसी वस्तु विशेष पर कर आदि में मंत्रालय या सचिवालय स्तर से राहत के लिए भी यही सुगम मार्ग अपनाया जाता है| रिश्वत के इस खेल में लेने देने वाले दोनों पक्षकार सुरक्षित रहते हैं| सदस्यों को व्यक्तिगत मोलभाव नहीं करना पडता और अधिकारियों को वसूली के लिए जगह जगह नहीं जाना पडता है| व्यापारी एवं उद्योगपति वर्ग द्वारा दी गयी इन भेंटों को वस्तु/सेवा की कीमत में जोड़कर आम जनता से वसूल कर लिया जाता है|इस प्रकार रिश्वत का अंतिम भार जनता पर ही पडता है |
इसी प्रकार परिवहन के मामलों में भी ऑटो चालक अपने संगठनों के माध्यम से स्थानीय ट्रेफिक पुलिस को हफ्ता देते हैं| बड़े परिवहन संचालक संगठन भी परिवहन एवं पुलिस को एक मुस्त अभयदान शुल्क देते हैं|ट्रक ड्राईवर अपने पास डायरी रखते हैं जिसमें समय समय पर पुलिस को रास्ते में दी जाने वाली रकम का पुलिस के हाथ से ही इंद्राज करवाकर हिसाब मालिक को सौंप देते हैं| ऐसा नहीं है कि भ्रष्ट लोक सेवक पकडे ही नहीं जाते हों किन्तु सशक्त व प्रभावी न्यायिक व्यवस्था के अभाव में वे दण्ड से बच जाते हैं |


चूँकि अपराधियों को दण्ड देना न्याय तंत्र का कार्य है और वह अभी तक इसमें अपेक्षा तक सफल नहीं है| अतः देश के गुणीजनों व प्रबुद्ध वर्ग से मेरा प्रश्न है कि जब तक देश में यह विकलांग न्याय प्रणाली है और रिश्वत देने वाले संगठन कार्यरत हैं तब तक भ्रष्टाचार पर नियंत्रण का कौनसा मार्ग है और कोई भी लोकपाल कानून कितना कारगर होगा इसका भी सहज अनुमान लगाया जा सकता है|भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए मात्र लोकपाल ही नहीं अपितु देश की न्यायिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन से मौलिक सुधार कर इसे ब्रिटिश काल से निकालकर विश्व स्तरीय बनाने की महती आवश्कता है |

Wednesday, 13 July 2011

स्टाम्प मूल्यांकन व क्षतिपूर्ति

सुप्रीम कोर्ट ने चतुर्भुज मोदी बनाम उड़ीसा राज्य के निर्णय दिनांक 12.08.10 में कहा है कि पंजीकृत विक्रय विलेख की प्रति मात्र प्रमाण समझी जा सकती और उस पर निर्भर हुआ जा सकता है। यद्यपि विक्रय विलेख कोई उत्कृष्ट तुलना नहीं है ,क्षेत्र एवं जमीन जिसका विक्रय विलेख प्रमाणित करता है कि विक्रय संव्यवहार लगभग भूमि अधिग्रहित करने के समय और लगभग उसी के समीप भौगोलिक स्थिति में हुआ। इसलिए क्षतिपूर्ति बढाई नहीं जा सकती। कुछ फेरफार और घटाने के साथ उच्च न्यायालय ने प्रति एकड़ दर रूपये 300000 तय किया है यह न्यायोचित एवं उचित लगता है।
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रस्ट जामा मस्जिद वक्फ बनाम लक्ष्मी टाकिज के निर्णय दिनांक 16.8.10 में कहा है कि स्टाम्प नियमों के अन्तर्गत निर्धारित दरें एक क्षेत्र विशेष की सामान्य दर है तथा एक संकेत दे सकती है लेकिन सम्बन्धित क्षेत्र में मौजूदा दर की निर्णायक नहीं हो सकती। किराये पर दी गई भूमि का बाजार मूल्य तय करने के लिए आसपास की भूमि का विक्रय उदाहरण हो सकता है किन्तु यहां ऐसा कोई उदाहरण नहीं है। मूल्यांकनकर्ता की रिपोर्ट दर्शाती है कि किराया भूमि होली गेट से कलेक्ट्रेट तथा रोडवेज बस स्टेण्ड तथा मथुरा केन्ट के पास सिविल लाईन्स के पास मुख्य सड़क पर स्थित है। उच्च न्यायालय ने मूल्यांकन कर्ता की रिपोर्ट तथा मकानमालिक द्वारा दी गई साक्ष्य को ध्यान नहीं रखा है। इस प्रकार हम संतुष्ट है कि उच्च न्यायालय कथित भूमि का किराया रूपये 2500 मात्र स्टाम्प नियमों के अन्तर्गत क्षेत्र के लिए निर्धारित दर पर आधारित के आधार पर निर्धारण में न्यायोचित नहीं है। उच्च न्यायालय का मामले का विचारण कानूनी कमी से ग्रसित है और टिक नहीं सकता।
माणकलाल बनाम महेन्द्रसिंह (एआईआर 1987 राज 14) में राजस्थान उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मात्र उपधारा 1 का पठन पर्याप्त स्पष्ट करता है कि अपील या पुनरीक्षण में खर्चे नहीं लगाये जा सकते। दूसरे शब्दों में अपील तथा पुनरीक्षण को क्षतिपूर्ति स्वरूप दिये जाने वाले खर्चों के दायरे से बाहर रखा गया है।
कलकता उच्च न्यायालय ने बोनस वाच कं. प्रा. लि. बनाम मैट्रो मेरिनस के निर्णय दिनांक 15.06.09 में कहा है कि इन कारणों से मैं दावा मुकाबले तथा खर्चे सहित अनुमत करता हूं। वाद पत्र के मद सं0 7 से 10 तक उल्लिखित राषि के लिए प्रार्थना सं (क) (ख) (घ) (च) तथा (ज) के अनुसार डिक्री किया जाता है। अंतरिम ब्याज सहित और निर्णय पर 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज अंतःकालीन लाभ, भूतकाल तथा भविष्य के लिए रूपये 2000 प्रतिदिन बोनस, रूपये 15000 प्रतिमाह शान्ति के लिए तथा रूपये 10000 प्रतिमाह नवरतन समस्त राशियों पर 10प्रतिशत वार्षिक ब्याज डिक्री एक पखवाड़े के भीतर बनाई, तैयार और पूर्ण की जावेगी।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने हरपालसिंह सांगवान बनाम दिल्ली विष्वविद्यालय के निर्णय दिनांक 15.07.08 में कहा है कि याचिका की सुनवाई प्रत्यर्थी के आचरण के कारण विलम्बित हुई यह भी इस मामले के रिकॉर्ड से प्रमाणित है दिनांक 12.12.07 को जबाबी शपथपत्र नहीं फाईल करने पर प्रत्यर्थी पर रूपये 3000 खर्चा लगाया गया था। तथ्यों तथा परिस्थितियों के संदर्भ में मेरे दृष्टिकोण से प्रतिपक्ष द्वारा धारित विलम्ब तथा याचिका के निर्धारण में लगे समय का भुगतभोगी याची नहीं होना चाहिए। जैसा कि याची का लगभग एक अकादमी वर्ष खराब हो चुका है। इन परिस्थितियों को देखते हुए विपक्षी को निर्देश देना उचित समझता हूं कि वर्ष 2008-09 के लिए 2007-08 में परीक्षा को चालू वर्ष के साक्षात्कार के लिए विचार करें। याची को लिखित में संदेश भेजकर दस दिन की सूचना पर इस निर्णय की प्राप्ति से साक्षात्कार के लिए बुलाया जायेगा। याची को पूर्णतः मनमानी और अवैध कृत्यों का लक्ष्य बनाया गया है जिससे वह विश्वविद्यालय में एक वर्ष तक अध्ययन करने के अधिकार से वंचित रहा है। मेरे इस दृष्टिकोण से यह उदाहरणात्मक क्षतिपूर्ति का पहला मामला है। विपक्षी पर पहले ही तीस हजार रूपये खर्चा लगाया जा चुका है तथ्य को देखते हुए मैं तीस हजार रूपये और खर्चा लगाता हूं जो कि विपक्षी द्वारा याची को दिये जायेंगे।

Tuesday, 12 July 2011

किराया

सुप्रीम कोर्ट ने इन्दर मोहन लाल बनाम रमेश खन्ना (1987 4 एसएससी (1 में कहा है कि समय बीत जाने से वाणिज्यिक भवनों में किराये पर लेकर व्यवसाय करने वाले अधिकांsशs किरायेदार जिन भवनों में वे व्यापार कर रहे हैं के मकान मालिको से आर्थिक रूप से अधिक सम्पन्न हैं।
केरल उच्च न्यायालय ने ईसाख निनाण बनाम केरल राज्य (1996 एआईएचसी 857) में कहा है कि किराया नियंत्रण अधिनियम जैसा कानून बनाने का उद्देश्य भवनों के पट्टो को विनियमित करना तथा किराये का नियंत्रण करना है न कि किराये को स्थिर बनाना।
सुप्रीम कोर्ट ने श्रीमती बसावा कोम दायमो गोडा पाटिल बनाम मैसूर राज्य (एआईआर 1977 एस सी 1749) में कहा है कि जब कोई सम्पति नष्ट हो जाती है या गुम हो जाती है और इस बात के प्रथम दृष्टया प्रमाण नहीं है कि राज्य या इसके अधिकारियों ने सम्पति की रक्षा करने में उचित सावधानी तथा ध्यान रखा तो उचित मामले में यदि न्याय के लक्ष्यों के अनुसार आवश्यक हो तो मजिस्ट्रेट सम्पति की कीमती अदायगी का आदेश दे सकता है। हम हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण से असहमत हैं कि एक बार यदि वह वस्तु न्यायालय में उपलब्ध नहीं है तो न्यायालय को उस मामले में कुछ भी करने का अधिकार नहीं है और पूरी तरह से असहाय है।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एण्ड जयपुर बनाम (न्यायाधिपति) भगवती प्रसाद शर्मा के निर्णय दिनांक 11.12.04 में कहा है कि निचले न्यायालयों ने वार्षिक के स्थान पर प्रतिवर्ग फुट के हिसाब से प्रत्येक पांच वर्ष बाद किराये की राशि में वृद्धि की अनुमति दी है, वह तरीका जो कि बैंको द्वारा भवन किराये पर लेने में काम में लिया जाता है जैसा कि गैर पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य से प्रकट होता है। निचले न्यायालयों ने पाया कि प्रत्यर्थी बैंक के साथ-साथ अन्य बैंको ने भवनो के लिए अधिक किराया प्रस्तावित किया जो कि केवल इसी स्थान विशेष में नहीं बल्कि जो भवन इस प्रश्नगत गत भवन के ठीक आसपास थे। एक भवन इलाहाबाद बैंक को वर्ष 1995 में 7 रूपये प्रति वर्ग फुट पर दिया गया। अन्वीक्षण न्यायालय के साथ-साथ अपील न्यायालय ने भी प्रार्थी द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य पर विचारण किया - भवन के तत्समय मूल्यांकन के विषय में और समस्त साक्ष्यों पर विचारण के पश्चात उपरोक्त किराया निर्धारित किया गया। स्मरणीय है कि प्रकरण में प्रारम्भ में तय किये गए किराये रूपये 500 प्रतिमाह को रूपये 15000 प्रतिमाह तक बढाना न्यायोचित पाया गया था।

Monday, 11 July 2011

आओ लोकतंत्र का नाटक खेलें .......

भारत में विगत कुछ समय से भ्रष्टाचार व काले धन के मुद्दे गरमा रहे हैं किन्तु मेरे विचार से जो बुनियादी प्रशासनिक एवं कानूनी ढांचा देश में उपलब्ध है उस ढांचे के भीतर इन समस्याओं के समाधान खोजना स्वयं को भ्रमित करने से अधिक नहीं है |संभवतया इन मुद्दों के लिए आगे आने वाले लोग इस बात को भूल रहे हैं कि देश की आज़ादी के बाद जो हमें सम्राज्यवादी ढांचा विरासत में मिला था हम अभी तक लोकतंत्र का स्वांग करते हुए उसी परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं जिसमें न तो लोक सेवकों पर कोई दायित्व डाला गया है और न ही उनके किसी अधिकार में कटौती कर नागिरकों के किसी अधिकार में कोई वृद्धि की गयी | सूचना के अधिकार जैसे कुछ कागजी अधिकार अवश्य मिले हैं जिसके अंतर्गत वर्ष भर से पहले सुनवाई नहीं होती और उसके बाद भी आपको कोई सूचना मिल जाये व लोक अधिकारी को कोई अर्थदण्ड मिल जाये और वह भुगतले तो आप उसे अपना सौभाग्य समझिए .मेरा निजी अनुभव है कि स्वयं सूचना आयोगों से समय पर व सटीक सूचनाएं और यहाँ तक कि दिए गए निर्णयों की फाइलें नहीं मिल पाती हैं. ऐसे सूचना आयोग अन्य लोक प्राधिकारियों की क्या जाँच कर सकते हैं जो अपना कार्यालय तक ढंग से संचालित नहीं कर पाते हैं .
वास्तव में भारत में तो न्याय की परिभाषा को खोजना ही मुश्किल है. मेरे मतानुसार (पूर्ण) न्याय का अर्थ यह होना चाहिए कि आपके साथ जो अन्यायपूर्ण घटना हुई आपको क्षतिपूर्ति आदि देकर ठीक उस स्थिति में पहुँचाया जाना चाहिए मानो कि आपके साथ वह दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं हुई होती तो आप होते और आपके (दीवानी या समाजिक) अधिकारों के हनन करने वाले दोषी को कम से कम इतना दण्ड अवश्य मिलना चाहिए की उसे देखने वाले वैसा कार्य करने को प्रेरित नहीं हों. इसी धारणा से समाज में स्थिरता और टिकाऊ व्यवस्था बनी रह सकती है .मैं इन पंक्तियों को किसी कल्पना के आधार पर नहीं लिख रहा हूँ बल्कि मैंने विदेशी कानूनों एवं वहाँ की न्यायिक व्यवस्था की जानकारी प्राप्त की है जिसके चयनित अंश मेरे ब्लॉग पर उपलब्ध हैं और उसके पश्चात ही उपरोक्त तथ्य उजागर करने का प्रयास कर रहा हूँ और आशा है वांछित शोध के उपरांत आप भी मेरी उक्त धारणा की पुष्टि करेंगे .

आपको ज्ञात होना चाहिए कि देश के आयकर अधिनियम की धारा १४२ में मात्र तीन वर्ष पुरानी आय के विषय में ही विवरण मांगे जा सकते हैं .अर्थात आपको येनकेन प्रकारेण अपने काले धन को तीन वर्ष तक छुपाये रखना है उसके पश्चात यदि उसका पता लग भी जाता है तो उसकी कोई जाँच नहीं हो सकती है. हमारे यहाँ काले धन को सफ़ेद बनाने के लिए समय समय पर बीयरर बोंड , स्वेच्छिक घोषणा जैसी कई योजनाएं निकलती रही हैं जिनमें बिना कोई कर चुकाए अथवा नाम मात्र का कर चुकाकर काले धन को सफ़ेद बनाने की सुविधा प्रदान की गयी .यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसी सरकारी योजनाओं को देश के न्यायालयों ने समर्थन देकर उन्हें वैध बताया है किन्तु नैतिकता के धरातल पर ये योजनायें कितनी खोखली हैं यह सब जानते हैं . समय पर ईमानदारी से कर भुगतान करने वाले नागरिक को यह सन्देश जाता है कि आपने कर नहीं बल्कि समय पर दण्ड का भुगतान किया और कर न भुगतान नहीं करने वाले आपसे ज्यादा मजे में है . इन योजनाओं से समय पर यह स्मरणीय है कि देश के कानूनों को राजनेताओं और धन्ना सेठों के अनुकूल बनाया जाता रहा है . ये लोग न केवल कानून को अपने अनुकूल बनवाने की कला में सिद्ध हस्त हैं बल्कि कानून को तोड़कर भी उससे बच निकलने के सभी गुप्त मार्ग जानते हैं और इन्हें दण्डित करवाने में सरकारी तंत्र कितना निष्ठावान है इस पर मैं टिप्पणी करना आवश्यक नहीं समझता- इतिहास साक्षी है .मात्र कुछ शक्ति संपन्न लोगों को दण्डित तो नाक मात्र बचाने के लिए किया जाता है .


दूसरा ज्वलंत मुद्दा भ्रष्टाचार से सम्बंधित है . इस प्रसंग में भी अहम बात यह है कि देश के कानून में अभी भ्रष्टाचार पद को परिभाषित तक नहीं किया गया है . वैसे शब्दकोष के अनुसार नैतिकता के रास्ते से भटकाव को भ्रष्टाचार कहा गया है .सामान्य जनता रिश्वत को भ्रष्टाचार का समानार्थी मानती है .पोलैंड के कानून में भ्रष्टाचार का दायरा बड़ा व्यापक है और इसमें निम्नांकित शामिल है :



“स्वयं या किसी अन्य व्यक्ति के लिए एक सार्वजनिक कार्य करने या कार्य करने में चूक के लिए बदले में या अपने दायित्व के उल्लंघन में कार्य करना जो सामजिक रूप से भर्त्सनीय हो के बदले में किन्हीं व्यक्तियों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी भी अनुचित लाभ देना, वादा करना या प्रस्ताव करना, स्वीकार करना.”

देश में यदि लोकपाल का गठन हो भी गया तो यह कैसे सुनिश्चित होगा कि वह निष्पक्ष और निडर होगा, जाँच निष्पक्ष होगी और अंततोगत्वा दोषी दण्डित हो जायेगा. मेरा भारतवासियों से एक प्रश्न है कि हमें भारतीय क्रिकेट कोच की क्षमता या निष्ठा पर विश्वास नहीं और हम विदेशी कोच रखते हैं तो देश में विश्वसनीय लोकपाल कैसे मिल सकेगा .राजस्थान में एक वर्ष में भ्रष्टाचार निरोधक विभाग को ४१३ शिकायतें प्राप्त हुई जिनमें से मात्र ३ एफ आई आरें दर्ज हुई जिनमें से भी मात्र २ मामलों में आरोपपत्र प्रस्तुत किया गया और उसमें से भी एक मामले में स्थगन हो गया .भ्रष्टाचार देश के लिए इसलिए समस्या है कि समय पर और उचित जाँच नहीं होती व अपराधियों के अनुकूल, जटिल व विलम्बकारी न्यायिक प्रक्रिया के कारण दोषी दण्ड से बच जाते हैं . मैंने एक जिले के आंकड़ों का अध्ययन किया जिसमें सामने आया कि दोष सिद्ध हुए मामलों का पुलिस द्वारा वर्ष भर में दर्ज एफ आई आरों से मात्र १.५% का अनुपात था .मेरे विचार से शेष भारतवर्ष की औसत स्थिति भी ज्यादा भिन्न नहीं होगी .यह मान भी लिया जाय की लोकपाल निष्ठापूर्वक जाँच करेगा तो भी वर्तमान न्यायिक ढांचे में दोष सिद्धि की संभावनाओं का आकलन पाठक स्वयं कर सकते हैं .विद्यमान भ्रष्टाचार कानून की धारा १९ (३ )में प्रावधान है कि कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही को स्थगित नहीं करेगा और दिसंबर २०१० में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी प्रशासनिक आदेश जारी किया है कि भ्रष्टाचार सम्बंधित मामलों को ( हाई कोर्ट तक )फास्ट ट्रैक मामले समझा जावे . इनकी अनुपालना और अनुपालना न करने वालों पर की गयी कारवाही को आप सभी देख रहे हैं .
अतः मेरा स्पष्ट विचार है कि जब तक लोक सेवकों का दायित्व निर्धारित कर न्यायपालिका में मौलिक सुधार कर उसे अंतर्राष्ट्रीय मानकों तक नहीं लाया जाता तब तक ये सभी सुधार दिखावटी और सस्ती लोकप्रियता अर्जित करने वाले बने रहेंगे . मेरा समस्त भारतीयों से यह आह्वान है कि वे जागें, दिग्भ्रमित न हों और इस दिशा में स्वतंत्र चिंतन करें और मेरे चिंतन में कोई दोष प्रकट हो तो उसका सुधार कर भारत को आगे बढ़ाएँ .
जय हिंद

Sunday, 10 July 2011

पूर्ण न्याय के औजार

राजस्थान उच्च न्यायालय ने सुनील कुमार बनाम लादूराम सुनाणियां (2003 डीएनजे राज 1428) में कहा है कि दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के मामले में प्रार्थी ने 75700- रूपये की भरपाई का दावा दायर किया। यह साबित हुआ पाया गया कि प्रत्यर्थी ने गलत जानते हुए भी एफआईआर लिखाई थी तथा अपने आप को चश्मदीद गवाह बताया था। यद्यपि संभावित तथा तर्क संगत कारण का अभाव रिकॉर्ड पर साक्ष्य से स्थापित हो चुका है कि एफआईआर दुर्भावना से लिखाई गई थी तथा बिना तर्कसंगत कारण के प्रार्थी का अभियोजन हुआ। अन्वीक्षण जज द्वारा क्षतिपूर्ति के लिए दावा खारिज करना न्यायोचित नहीं था। अन्वीक्षण न्यायालय द्वारा पारित डिक्री तथा निर्णय को अपास्त कर मामले को क्षतिपूर्ति की राशि निर्धारण हेतु अन्वेक्षण न्यायालय को प्रतिप्रेषित किया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने शकुन्तला बाई बनाम नारायण दास के निर्णय दिनांक 05.05.04 में कहा है कि मकान मालिक की जायज आवश्कता को दावा दायरी के समय परखा जाना चाहिए। यह सुनिश्चित कानूनी स्थिति है और यदि खाली करने की डिक्री पारित कर दी जाती है तो भी अपील बकाया होने के दौरान मकान मालिक की मृत्यु से कोई अन्तर नहीं पड़ता क्योंकि उसके उत्तराधिकारियों को वाद रक्षा करने का पूर्ण अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने निलावती बहेड़ा उर्फ ललिता बहेड़ा बनाम उड़ीसा राज्य (1993 एआईआर एससी) में कहा है कि हमें इस बात में कोई संदेह नहीं है कि यदि याची अवैध बन्दी बनाने के विरूद्ध क्षतिपूर्ति के लिए दावा दायर करती है तो न्यायालय को हर्जाने का आदेश देना पड़ेगा। क्षतिपूर्ति का अधिकार एक प्रकार से उपकरणों द्वारा किये गये अवैध कृत्यों के लिए क्षमा याचना के रूप में है जो कि जनहित के नाम पर काम करते हैं जो कि उनमें अपनी शक्तियों के संरक्षण में राज्य की ढाल की तरह काम कर रहे हैं। उच्च न्यायालय द्वारा परीक्षणाधीन व्यक्तियों के अनुच्छेद 21 के उल्लंघन के लिए क्षतिपूर्ति की प्रदानगी जिसे कि हथकड़ी लगाकर अनुसंधान के दौरान गलियों में से गुजारा गया यह न्यायालय असहाय नहीं है। अनुच्छेद 32 के अन्तर्गत दी गई विस्तृत शक्तियों जो कि अपने आप में मूल अधिकार है इस न्यायालय पर नये औजार गढने का जो कि पूर्ण न्याय के लिए आवश्यक हो, संवैधानिक दायित्व डालते है। न्यायालय का दायित्व है कि वह नागरिकों की सामाजिक प्रेरणाओं को संतुष्ट करें क्योंकि न्यायालय तथा कानून लोगों के लिए है और उनसे अपेक्षा है कि वे उनकी भावनाओं का प्रत्युतर दे। उदाहरणात्मक क्षतिपूर्ति के लिए गलत काम करने वाले के खिलाफ दिया गया आदेश उसके लोक कर्त्तव्यों के उल्लंघन के लिए क्षतिपूर्ति है और यह व्यथित पक्षकार के द्वारा दुष्कृति के आधार पर सक्षम क्षेत्राधिकार वाले न्यायालय में और या अपराधी के विरूद्ध व्यक्तिगत कानून में उपलब्ध अधिकार से पूर्णतया स्वतन्त्र है।
सुप्रीम कोर्ट ने रतन आर्य बनाम तमिलनाडू राज्य (एआईआर 1986 एस सी 1444) में कहा है कि हम इस बात का न्यायिक संज्ञान लेने के लिए अधिकृत है कि देश में और विशेषकर शहरी क्षेत्रों में कई गुना वृद्धि हुई है। यह सर्वविदित है कि जो सुविधा 1973 में 400- रूपये प्रतिमाह में मिलती थी वह आज कम से कम 5 गुनी हो गई है। आज के युग में 1973 में धारा 30 (2) के अन्तर्गत अधिरोपित किराये बढोतरी की सीमा अब बिल्कुल कृत्रिम तथा असंगत हो गई है।

Saturday, 9 July 2011

न्यायिक शक्तियों की सीमाएं एवं उपयोग

सुप्रीम कोर्ट ने चिंतराम रामचन्द्र बनाम पंजाब राज्य (1996 एआईआर एससी 1406) में कहा है कि सिविल रिट दायर करना तथा पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा अपने निर्णय दिनांक 08.04.94 द्वारा अनुमत करना इस विषेश अनुमति याचिका में यहां प्रकट नहीं किया गया जबकि कुछ याची दोनों याचिकाओं में है। इस बात में गुण है कि यहां तक कि इस न्यायालय में भी पूर्ण विवरण प्रकट न करने का प्रयास किया गया है ताकि उन्हें पक्ष में निर्णय मिल सके। इस प्रकार का प्रयास हतोत्साहित किया जाना चाहिए न कि प्रोत्साहित। तद्नुसार इन अपीलों को निरस्त करते हुए प्रत्येक याची पर रूपये 5000- खर्चा लगाया जाता है। खर्चा पंजाब सरकार को देय होगा।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने (1998 क्रि.ला.रि.(राज.)240 बुपुलारी भिन्न ब्रलन्ना बनाम राज्य में कहा है कि यह अत्यन्त दुखद है कि एक सार्वजनिक परिवहन कम्पनी जो जनता के धन से चल रही है दूसरी सार्वजनिक कम्पनी पर बिना उचित कारण के झूठे व बनावटी आपराधिक अभियोजन कर इसे सौंपे गये धन को बर्बाद कर रही है। जिससे कि वह कम्पनी भी सार्वजनिक कम्पनी अपने बचाव में सार्वजनिक धन बर्बाद करने पर विवश है। मैंने परिवादी कम्पनी के पैरोकार से पूछा कि उन पर झूठे बनावटी पीड़ादायक अभियोजन तथा अधीनस्थ एवं इस न्यायालय का समय नष्ट करने के लिए उन पर खर्चा क्यों न लगाया जाये तो इसका कोई प्रत्युतर नहीं । प्रकरण के तथ्यों एवं परिस्थितियों को देखते हुए ध्यान दिया गया कि सार्वजनिक कं. तथा उसके अधिकारियों को पिछले 10 वर्षों से हैरान परेशान करने हेतु बिना उचित अधिकार के तथा दुराशयपूर्वक झूठी मुकदमेबाजी चल रही है तथा मजिस्ट्रेट न्यायालय व इस न्यायालय का समय बर्बाद किया जा रहा है जिसके लिए धारा 359 के अन्तर्गत उदाहरणात्मक क्षतिपूर्ति न्याय प्रशासन के हित में न्यायालय की प्रक्रिया का दुरूपयोग करने की बुराई का नियंत्रण के लिए आवश्क है। स्वतन्त्र रूप से दं.प्र.सं. की धारा 250, 357, 358 तथा 359 उचित प्रकरण में लागू करते हुए भी इस न्यायालय में धारा 482 सपठित धारा 483 दं.प्र.सं. में अन्तनिर्हित शक्तियों का प्रयोग करते हुए कानून/न्यायालय की प्रक्रिया का दुरूपयोग करते हैं की रोकथाम के लिए, न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करने के लिए इस प्रकरण के विशेष तथ्यों तथा परिस्थितियों के अनुसार इस प्रकार का रास्ता अपना सकता है ।
सुप्रीम कोर्ट ने मैरी एंजिला बनाम तमिलनाडू राज्य (1999 एआईआर एससी 2245) में कहा है कि इस न्यायालय ने पाया है कि उच्च न्यायालय द्वारा सत्र न्यायालय को यथा शीघ्र मामले का निपटान करने के लिए निर्देश के बावजूद अपीलार्थियों ने सत्र न्यायालय को उच्च न्यायालय के निर्देशों की अनुपालना नहीं करने दी। उक्त आचरण को देखते हुए उच्च न्यायालय ने प्रत्येक अपीलार्थी पर रूपये 10000- खर्चा लगाया है जो कि सूचितकर्ता (परिवादी) को दिया जाना है और सत्र न्यायालय को इस आदेश के संप्रेषण के 2 माह के भीतर निपटान का आदेश दिया है, यह आदेश हमारे समक्ष चुनौती अधीन है। न्यायालय धारा 482 के अन्तर्गत जहां प्रक्रिया का दुरूपयोग किया गया है जहां मामले को घसीटा गया है कोई दूसरा आदेश पारित कर सकता है किन्तु खर्चे का आदेश नहीं।

Friday, 8 July 2011

क्षतिपूर्ति

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय बार संघ बनाम पंजाब राज्य (1996 एससीसी (4) 742) में कहा है कि सिविल एवं राजनैतिक अधिकारों की अन्तर्राष्ट्रीय संधि 1966 के अनुच्छेद 19(5) के अन्तर्गत क्षतिपूर्ति हेतु अधिकार गारंटीकृत अधिकार से भिन्न नहीं है जो कि निम्नानुसार कहता है:-
जो कोई भी अवैध गिरफ्तारी या बन्दी बनाये जाने का शिकार होगा उसे क्षतिपूर्ति का प्रवर्तनीय अधिकार होगा हम गृह सविच के माध्यम से पंजाब सरकार को निर्देश देते हैं कि सम्बन्धित पुलिस अधिकारियों के अभियोजन के मामले की धारा 197 द0प्र0सं0 की स्वीकृति के प्रश्न को ले तथा इस आदेश प्राप्ति के एक माह के भीतर निर्णय ले।
सुप्रीम कोर्ट ने भीमसिंह बनाम जम्मू कश्मिर राज्य (1986 एआईआर एसी 494) में कहा है कि हमें इस बात में संदेह नहीं है कि भीमसिंह को या तो 11 तारीख को मजिस्ट्रेट या 13 तारीख को उप न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया। यद्यपि उसे 10 तारीख की सुबह ही गिरफ्तार कर लिया गया था। अनुच्छेद 21 तथा 22 (2) के अन्तर्गत भीमसिंह के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ। चूंकि अब वह निरूद्ध नहीं है अतः उसे मुक्त करने का आदेश देने की आवश्यकता नहीं है किन्तु उसे उचित एवं पर्याप्त रूप से क्षतिपूर्ति दी जानी चाहिए। हमें उदाहरणात्मक खर्चे के रूप में मौद्रिक क्षतिपूर्ति देने का अधिकार है। हम निर्देश देते हैं कि प्रथम प्रत्यर्थी जम्मू कश्मीर राज्य आज से 2 माह के भीतर भीमसिंह को रूपये 50000 देगा। यह राशि इस न्यायालय के रजिस्ट्रार के यहां जमा होगी तथा श्री भीम सिंह को भुगतान की जावेगी।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने अश्वीनी कुमार शर्मा बनाम ऑरियेन्टल बैंक ऑफ कॉमर्स (2003 (3) एस एल जे 405 देहली) में कहा है कि पेंशन कोई नियोक्ता की एक मात्र इच्छा पर सशर्त भुगतान अथवा दान नहीं है। यह लम्बी सेवा करने से अर्जित होती है और प्रायः लम्बी सेवा के लिए आस्थगित भुगतान कहलाती है। यह वास्तव में एक सामाजिक सुरक्षा की प्रकृति की है जो कि अधिवर्षिता पर सेवानिवृति पर लोक सेवक को देय है। यदि एक अस्थायी सरकारी सेवक ने भी 20 वर्ष की सेवा की है तो वह पेंशन का पात्र है। यदि वह स्वैच्छा से सेवानिवृति लेता है तो जब उसे सार्वजनिक हित में सेवानिवृत होने दिया जाता है तो भी उसे इस अधिकार से मना करने का कोई औचित्य नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने मलय कुमार गांगुली बनाम डॉ. सुकुमार मुखर्जी के निर्णय दिनांक 07.08.09 में कहा है कि तापमान, नाड़ी, रक्तचाप आदि परिमान का रिकॉर्ड नहीं रखा गया जो कि एक गंभीर लापरवाही है। रिकॉर्ड पर लाये गये टेलीफोन बिलों से स्पष्टतया दर्शित होता है कि प्रत्यर्थी सं. 3 के घर व उसके कार्यालय भी जब अनुराधा ए.एम.आर.आई. में थी, डॉ. कुणाल ने कई बार बात की जिससे स्पष्ट स्थापित होता है कि प्रत्यर्थी सं. 3 अनुराधा के इलाज में संलग्न था। एक विशेषज्ञ तथ्य का साक्षी नहीं है। उसकी साक्ष्य परामर्शी प्रकृति की है। एक विशेषज्ञ साक्षी का कर्त्तव्य है कि वह जांच की शुद्धता के बारे में न्यायाधीश को आवश्यक वैज्ञानिक उसूल बताये जिससे न्यायाधीश उसूलों को लागू कर स्वतन्त्र रूप से मामले के तथ्यों के साक्ष्यों तक पहुंच सके। लिए गए आधार पर हम एएमआरआई तथा डॉ0 मुखर्जी के आचरण को ध्यान में रखते हुए निर्देश देते हैं कि एएमआरआई तथा डॉ0 मुखर्जी द्वारा क्रमशः खर्चे के रूपये 500000 तथा 100000 भुगतान किये जायेंगे। हम आगे निर्देश देते हैं कि यदि किसी विदेशी विशेषज्ञ का परीक्षण करना हो तो यह वीडियो कॉन्फ्रेसिंग के जरिये और प्रत्यर्थीगण के खर्चे पर होगा । रोगी प्रायः दवाओं के प्रतिकूल प्रभाव व बीमारी से अनभिज्ञ होते हैं। सामान्यतया रोगियों को संभावित जोखिम सूचित की जानी चाहिए। यदि कुछ दवाओं के प्रतिकूल प्रभाव हो या प्रतिक्रिया संभावित हो तो वह उसके विषय में सूचित होना चाहिए। प्रस्तुत प्रकरण में ऐसा नहीं हुआ।

Thursday, 7 July 2011

सूचना के अधिकार का छिपा हुआ सच

गुजरात राज्य में एक गैर सरकारी संगठन ने सूचना के अधिकार की क्रियान्विति के विषय में एक सर्वेक्षण किया था . सर्वेक्षण के कुछ महत्व्पूर्ण व रोचक तथ्य इस प्रकार है .इस सर्वेक्षण का उद्देश्य यह जानना था कि सामान्यतया अधिकारीगण प्रार्थीगण से किस प्रकार का व्यवहार करते हैं | तहसील स्तर पर स्थिति यह रही कि ७६ % लोक सूचना अधिकारियों ने व ८० % अपील अधिकारियों ने नोटिस बोर्ड पर अपने नाम प्रदर्शित नहीं कर रखे थे जबकि २० % से भी कम कार्यालयों में लोक सूचना अधिकारियों व अपील अधिकारियों के नोटिस बोर्ड पर नाम प्रदर्शित कर रखे थे |मात्र ८ % कार्यालयों ने लोक सूचना अधिकारी नामांकित करने की अधिसूचना की प्रति उपलब्ध करवाई |कई कार्यालयों ने इसे आतंरिक प्रलेख बताते हुए दिखाने से मना कर दिया |६५ % लोक सूचना अधिकारी अपने स्थान पर नहीं पाए गए जबकि दल ने कई बार उनका दौरा किया |४२ % कार्यालयों में सहायक सूचना अधिकारी थे जो लगभग अपने स्थान पर पाए गए | पुलिस थानों और डाक घरों में मात्र सहायक सूचना अधिकारी नियुक्त थे जो कार्यालय से बाहर बताये गए |विधिक सेवा प्राधिकरण में लोक सूचना अधिकारी से मिलने का समय मात्र आधा घंटा प्रति दिन तक ही सीमित था |

जिला स्तर पर ७५ % कार्यालयों में लोक सूचना अधिकारियों व अपील अधिकारियों ने नोटिस बोर्ड पर नाम प्रदर्शित कर रखे थे व ६२ % ने ये नोटिस बोर्ड सहज दृश्य स्थान पर लगा रखे थे | मात्र २५ % कार्यालयों ने लोक सूचना अधिकारी नामांकित करने की अधिसूचना की प्रति उपलब्ध करवाई | ७५ % लोक सूचना अधिकारी अपने स्थान पर पाए गए |८३ % कार्यालयों में सहायक सूचना अधिकारी अपने स्थान पर पाए गए |दल को जिला पुलिस अधीक्षक से मिलने नहीं दिया गया जो कि बहुत अधिक व्यस्त बताये गए |तहसील स्तर पर ४०% से भी कम कार्यालयों में धारा ४ की अपेक्षानुसार स्वतः प्रदर्शनीय सूचना संकलित होने की पुष्टि की गयी जबकि किसी भी कार्यालय ने इस संकलित सूचना को नोटिस बोर्ड पर प्रदर्शित नहीं कर रखा था |९४ % कार्यालयों ने दल से स्वतः प्रदर्शनीय सूचना के लिए आवेदन की अपेक्षा की |८५ % कार्यालयों ने दल से स्वतः प्रदर्शनीय सूचना के लिए फीस की अपेक्षा की | वास्तव में ३० % से भी कम कार्यालयों ने स्वतः प्रदर्शनीय सूचना उपलब्ध करवाई | २२% कार्यालयों ने १० से ३० दिन में दल को स्वतः प्रदर्शनीय सूचना उपलब्ध करवाई |विधिक सेवा प्राधिकरण ने तो इस आशय का आवेदन ही निरस्त कर दिया कि उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार यह सूचना धारा ८ द्वारा प्रतिबंधित श्रेणी में आती है | ७० % से अधिक कार्यालयों ने सशुल्क आवेदन के उपरांत भी दल को स्वतः प्रदर्शनीय सूचना उपलब्ध नहीं करवाई | इन कार्यालयों ने सर्वेक्षण दल से रुपये १००० आवेदन शुल्क ले लिया किन्तु कोई सूचना उपलब्ध नहीं करवाई | दल ने इन आवेदनों पर रूपये १२५० रजिस्ट्री डाक शुल्क भी व्यय किया क्योंकि कई कार्यालयों ने व्यक्तिशः आवेदन लेने से मना कर दिया था |


जिला स्तर पर अनुपालना का स्तर ठीक पाया गया |७९ % कार्यालयों ने स्वतः प्रदर्शनीय सूचना संकलित होने की पुष्टि कर दी जबकि अधिकांश कार्यालयों ने इस संकलित सूचना को नोटिस बोर्ड पर प्रदर्शित नहीं कर रखा था | ५४ % कार्यालयों ने स्वतः प्रदर्शनीय सूचना की प्रति उपलब्ध करवाई | १० कार्यालयों ने ५ से ३० दिन में दल को स्वतः प्रदर्शनीय सूचना उपलब्ध करवाई | ४६ % कार्यालयों ने सशुल्क आवेदन के उपरांत भी दल को स्वतः प्रदर्शनीय सूचना उपलब्ध नहीं करवाई | इन कार्यालयों ने सर्वेक्षण दल से रुपये २२० आवेदन शुल्क ले लिया किन्तु कोई सूचना उपलब्ध नहीं करवाई | दल ने इन आवेदनों पर रूपये २७५ रजिस्ट्री डाक शुल्क भी व्यय किया क्योंकि कई कार्यालयों ने व्यक्तिशः आवेदन लेने से मना कर दिया था |

अधिनियम की धारा २५ में यद्यपि प्रत्येक लोक प्राधिकारी को वार्षिक प्रतिवेदन फाइल करना होता है किन्तु तहसील स्तर पर मात्र ६० % कार्यालयों ने अलग से रजिस्टर बना रखा था और कुछ ने डाक रजिस्टर में ही सीमित आंकडे रखे हुए थे |मात्र ४० % कार्यालयों ने दल को सूचना के अधिकार रजिस्टर का निरीक्षण करने दिया |५६ % कार्यालयों ने दल से लिखित आवेदन व शुल्क के उपरांत भी उक्त रजिस्टर का निरीक्षण नहीं करने दिया |इन कार्यालयों को रुपये ८४० शुल्क का भुगतान किया गया था | दल ने इन आवेदनों पर रूपये १०५०रजिस्ट्री डाक शुल्क भी व्यय किया क्योंकि कई कार्यालयों ने व्यक्तिशः आवेदन लेने से मना कर दिया था | जिला स्तर पर ९२% कार्यालयों ने अलग से रजिस्टर बनाना बताया |६२% कार्यालयों ने दल को सूचना के अधिकार रजिस्टर का निरीक्षण करने दिया |४८% कार्यालयों ने दल से लिखित आवेदन व शुल्क के उपरांत भी उक्त रजिस्टर का निरीक्षण नहीं करने दिया |इन कार्यालयों को रुपये १८० शुल्क का भुगतान किया गया था | दल ने इन आवेदनों पर रूपये २२५ रजिस्ट्री डाक शुल्क भी व्यय किया क्योंकि कई कार्यालयों ने बार बार चक्कर लगाने के बावजूद व्यक्तिशः आवेदन लेने से मना कर दिया था |जिला स्तर पर अधिकत्तम १६.१६ आवेदन प्रति माह व तहसील स्तर पर अधिकत्तम २.७५ आवेदन प्रतिमाह कार्यालयों में प्राप्त होना पाया गया |इससे यह स्पष्ट है कि सूचना के अधिकार के अंतर्गत प्राप्त आवेदनों की दैनिक संख्या लगभग नगण्य है और ऐसा कोई कार्य भार नहीं है जिसका लोगों को विश्वास है |


दल द्वारा किये गए सर्वेक्षण से स्पष्ट है कि अधिनियम की अनुपालना में नौकरशाही न्यूनतम रुचिबद्ध है और नागरिकों को अपेक्षित लाभ नहीं हुआ है |दल के सर्वेक्षण से यह भी स्पष्ट हुआ है कि अधिनियम की अनुपालना में पुलिस एवं न्याय विभाग( जो जन अधिकारों के हनन के लिए पहले से ही अग्रणी मने जाते हैं ) सबसे पीछे हैं तथा नागरिकों को कम से कम सूचनाएँ उपलब्ध करवाना चाहते हैं | जब आवेदन पत्र लेने तक से मना किया जा रहा हो तो सूचना प्रदानगी की स्थिति का सहज अनुमान लगाया जा सकता है | इससे यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रदत सूचनाएँ किस सीमा तक संतोषप्रद हो सकती हैं |इस प्रकार राज्यों के संचालन में अभी भी पारदर्शिता का अभाव है और राजतन्त्रिक कार्यशैली कार्य संस्कृति का अभिन्न अंग बनी हुई है तथा अनुमान है कि अन्य राज्यों में भी स्थिति ज्यादा भिन्न नहीं होनी चाहिए |अधिनियम के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अभी नागरिकों के स्तर पर और संघर्षपूर्ण प्रयासों की आवश्यकता अनुभव की जा रही है |

Wednesday, 6 July 2011

न्यायपालिका की अच्छी सेहत के लिए

जब सवा अरब की आबादी में हमें एक भी योग्य क्रिकेट कोच नहीं मिलता और हम विदेशी कोच नियुक्त करते हैं तो न्यायपालिका के गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए हाई कोर्टों व सुप्रीम कोर्ट में विदेशी आयातित न्यायाधीशों की नियुक्ति पर सक्रिय विचार करना चाहिए. अमेरिका में पूर्णकालिक न्यायाधीशों की नियुक्ति 8 वर्ष के लिए व अंशकालिक न्यायधीशों की नियुक्तियां 4 वर्ष के लिए की जाती हैं .हमें भी ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ने के विषय में चिंतन करना चाहिए .इंग्लॅण्ड में न्यायिक नियुक्तियों के लिए अलग से न्यायिक नियुक्ति आयोग कार्यरत है तथा न्यायिक विभिन्नता पर सलाहकार मंडल की फरवरी 2010 की रिपोर्ट में कहा गया है कि न्यायधीशों के चयन पैनल में सेवारत न्यायाधीशों की संख्या घटाई जानी चाहिए जबकि हमारे यहाँ न्यायाधीशों के चयन का मामला न्यायपालिका पूर्णतया एक मात्र अपना क्षेत्राधिकार समझती है और कहा जाता है कि न्यायधीशों की नियुक्ति में मुख्य न्यायधीश की अनुशंसा राष्ट्रपति पर बाध्यकारी है .यह भी कहा जाता है कि निचले स्तर के न्यायाधीशों के चयन के लिए न्यायपालिका ही सर्वोतम है .इस प्रकार भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका न केवल स्वतंत्र बल्कि स्वछन्द और लोक पर हावी दिखाई देती है. इंग्लॅण्ड एवं अमेरिका जैसे देशों में न्यायाधीशों को संरक्षण के लिए भारत के न्यायिक अधिकारी संरक्षण अधिनियम ,1850 या न्यायाधीश संरक्षण अधिनयम 1985 के समान अलग से कोई कानून नहीं है .



हमारी वर्तमान न्यायिक व्यवस्था में मात्र व्यावहारिक वकील जो न्यायाधीश , पुलिस, सरकारी वकील व न्यायालय के मंत्रालयिक कर्मचारियों से बेहतर तालमेल बनाये रख सके, उनकी मांगों की पूर्ति करता रहे और उनकी किसी बात का विरोध नहीं करे वही सफल वकील कहलाता है तथा वांच्छित निर्णय प्राप्त कर अच्छी आमदनी करने के साथ साथ कालांतर में वही उच्च न्यायिक पद प्राप्त कर सकता है . बी एम डब्लू मामले में प्रसिद्ध वकीलों क्रमशः आर के आनंद तथा आई यू खान द्वारा अपने मुवक्किल के लिए गवाह की खरीद फरोख्त के प्रकरण से यह तथ्य पुष्ट होता है कि नामी व सफल वकील कैसे बनते हैं, उनके ग्राहक किस स्तर के होते हैं और उनके आचरण के क्या गुणधर्म होते हैं .
सुप्रीम कोर्ट ने भी राजा खान के मामले में रातोंरात अमीर बनने वाले वकीलों का प्रासंगिक जिक्र किया है .उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरलों तथा राज्यों के विधि सचिवों की संगोष्ठी दिनांक 23.10.06 में भी अन्य बातों के साथ साथ कहा गया है कि सतर्कता प्रकोष्ठ न्यायालय के स्टाफ पर प्रभावी निगरानी रखेगा और उनकी गतिविधियों पर निगरानी रखेगा ताकि आम जनता की दृष्टि में न्यायालयों की छवि कलंकित न हो .आगे यह भी कहा है कि मामलों में तारीखें निरपवाद रूप से मात्र पीठासीन अधिकारी द्वारा ही दी जानी चाहिए और प्रक्रिया तथा परम्पराओं को इस प्रकार ढाला जाना चाहिए जिससे मुक़दमे के पक्षकारों का स्टाफ सदस्यों के साथ न्यूनतम संपर्क हो .जनता के समक्ष यह यक्ष प्रश्न उभरता है कि जिस स्टाफ की अस्वस्थ कार्यशैली के आगे उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल तथा राज्यों के विधि सचिव बेबस हों उनसे बेचारी आम जनता किस प्रकार निपट सकती है .

जब तक वकीलों एवं न्यायाधीशों के मध्य दुरभि संधि है इन संस्थानों में भ्रष्टाचार को नहीं रोका जा सकता . हाल ही में उभरा न्यायाधीश निर्मल यादव प्रकरण व मुख्य न्यायाधिपति बालाकृष्णन के विरुद्ध जांच दुखदायी उदाहरण हैं .वैसे विडम्बना यह है कि देश के कानून में भ्रष्टाचार को कहीं परिभाषित नहीं किया गया है जबकि पोलैंड के कानून में भ्रष्टाचार की व्यापक व्याख्या की गयी है और निजी क्षेत्र के सार्वजनिक जीवन को प्रभावित करने वाली बातों को भी भ्रष्टाचार के दायरे में लिया गया है | पोलैंड में इस विभाग के मुखिया के लिए अन्य बातों के साथ साथ देश भक्त व निष्कलंक छवि वाला नागरिक होना योग्यता माना गया जबकि महान भारत भूमि में ऐसी योग्यता की आवश्यकता किसी भी महत्वपूर्ण पद के लिए नहीं बताई गयी है |
भारत भूमि में व्यावहारिक रूप में उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होने के लिए प्रभावशाली राजनीतिज्ञों तथा न्यायाधीशों के साथ अच्छे संपर्क होना नितांत आवश्यक हैं. कई परिवारों से पीढ़ियों से हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश चल रहें हैं मानो कि यह कोई आनुवंशिक पारितोषिक का पद हो व इस प्रकार की पक्षपात और भाई भतीजावाद आधारित नीति पर पर्याप्त विषय वस्तु इन्टरनेट पर पहले से ही अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध है .

हमारे कानून में न्याय के नाम पर अनावश्यक शोषण व उत्पीडन, अथवा अपराध के शिकार व्यक्ति को राहत के लिए कोई कानून नहीं है फलतः न्यायालय कई बार मूल मामले की सुनवाई से पहले ही क्षतिपूर्ति देने की कृपा कर देते हैं व कई बार क्षतिपूर्ति का मामला मूल मुकदमे के परिणाम पर छोड़कर पीड़ित व्यक्ति के साथ क्रूर उपहास करते हैं. संहिताबद्ध कानून के अभाव में न्यायालयों के रुख एवं मत में परिवर्तन से अनिश्चितता बनी रहती है . हमारे राष्ट्रीय पुलिस आयोग की नवंबर 1980 में प्रस्तुत पांचवीं रिपोर्ट में भी क्षतिपूर्ति के लिए अनुशंषा की गयी है .हमारे सुप्रीम कोर्ट ने निलाब्ती बेहेरा के मामले में सत्र न्यायाधीश द्वारा प्रशासनिक जांच के आधार पर पुलिस को दायीं मानते हुए क्षतिपूर्ति प्रदान कर दी थीं किन्तु हाल ही में तुलसी प्रजापति मुठभेड़ प्रकरण में क्षति पूर्ति से मना कर दिया गया . दूसरी ओर यदि एक लोक सेवक को संदेह के आधार पर निलंबित कर जाँच की जाती है और वह दोषी सिद्ध नहीं हो पाता तो उसे पूर्व अवधि के समस्त सेवा लाभ देकर बहाल कर दिया जाता है . यह विधि के समक्ष समानता का स्पष्ट उल्लंघन है . इसी परिपाटी के अनुसार गिरफ्तारी एवं अभियोजन की अनुचित पीडा से पीड़ित व्यक्ति को क्षतिपूर्ति दी जानी चाहिए .गंभीर अपराधियों के मुठभेड़ में मारे जाने के प्रकरणों में भी यह जाँच का विषय होना चाहिए कि वह गंभीर अपराधी किसके सहयोग से बना क्योंकि अपराध की दुनियां में कदम रखते ही कोई व्यक्ति रातोंरात गंभीर अपराधी नहीं बन जाता है .अधिकांश खतरनाक अपराधियों को पुलिस व राजनेताओं का संरक्षण प्राप्त होता है .दूसरी ओर इंग्लॅण्ड में आपराधिक मामले पुनरीक्षा आयोग कार्यरत है जोकि किसी भी आपराधिक मामले की पुनरीक्षा कर सकता है तथा न्याय के विफल होने पर उचित क्षतिपूर्ति दिलवा सकता है . इंग्लॅण्ड में पुलिस अधिनयम ,1997 कि धारा 86 के अनुसार पुलिस द्वारा यातना के लिए महानिदेशक राष्ट्रीय अपराध दस्ता जिम्मेदार है तथा यातना के लिए कार्यवाही के मामलों में राष्ट्रीय अपराध दस्ता कोष में से क्षतिपूर्ति दी जाती है . हमारे यहाँ तो पुलिस पूछताछ में एक गवाह से ऐसा व्यवहार किया जाता है मानो कि वही अपराधी हो .इसीलिए लोग गवाही नहीं देना चाहते हैं.

उपरोक्त परिस्थितियों के मद्देनजर वकील समुदाय को भी विद्यमान भारतीय न्यायप्रणाली से न्याय प्राप्त होने का अधिक विश्वास नहीं है तथा वे अपने मुद्दों के लिए न्यायिक प्रक्रिया का सहारा लेने के बजाय धरना , प्रदर्शन , हड़ताल और राज्यपाल अथवा राष्ट्रपति को प्रतिवेदन देना ही श्रेयस्कर समझते हैं. अब तक किये गए दिखावटी न्यायिक सुधार लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपर्याप्त हैं और जब लोकतंत्र के सभी स्तंभ अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर रहे हैं तो देश की कानूनी एवं न्याय प्रणाली में वास्तविक सुधार हेतु आज आम जन की भागीदारी आवश्यक है. स्वतंत्रता के बाद हमारी लोकतान्त्रिक सरकारों के कमजोर प्रदर्शन को देखते हुए विश्वास नहीं होता कि वे बिना जन दबाव के कोई सार्थक कार्य करेंगी .

Tuesday, 5 July 2011

आवश्यकता है भारतीय लोकतंत्र को मजबूत प्रहरी की

आपवादिक तौर पर हमारे न्यायालयों द्वारा प्रकाशित रिपोर्टों में उनके कार्यनिष्पादन के बारे में कम एवं न्यायालय भवन, तथा न्यायालय भवनों व न्यायधीशों के रंगीन लुभावने चित्र और उनका गुणगान अधिक होता है . वैसे भी पर्यटन के अतिरिक्त अन्य विभागों की रिपोर्टें सूचना परक अधिक व चित्रमय कम से कम होनी चाहिए .इन रिपोर्टों में न्यायालयों द्वारा व्यय किये गए जनता के धन का कोई उल्लेख नहीं होता है अर्थात इन रिपोर्टों से जनता यह भी नहीं जान सकती कि प्रति मामले के निर्णय पर क्या लागत आ रही है और धन का कितना युक्तियुक्त उपयोग हो रहा है . लाखों करोड रुपये के दूरसंचार, चारा, राष्ट्रमंडल, कोलतार, पाम तेल, स्टांप आदि घोटाले सहन कर राजनेताओं को लाभ पहुँचाने वाली हमारी लोकप्रिय सरकारों के पास न्यायिक एवं पुलिस सुधार के लिए बजट का अभाव बताया जाता है .

न्यायिक स्वतंत्रता का कदापि अभिप्राय न्यायिक स्वछंदता या अकर्मण्यता, व भ्रष्टाचार को पनपानेवाली गोपनीयता नहीं है .देश के न्यायविदों औए जन प्रतिनिधियों की क्षमता और निष्ठा के प्रश्न का निर्धारण पाठकों पर छोड़ते हुए ज्ञातव्य है कि इन पंक्तियों के लेखक ने वर्ष 2010 में कानून की डिग्री प्राप्त कर अपने स्वल्प ज्ञान व अनुभव से सामाजिक न्याय की अवधारणा के आधार पर यह विषय वस्तु प्रस्तुत की है किन्तु यह दुखदायी है कि सवा अरब की आबादी वाले इस देश में कभी भी उपरोक्त समग्र मुद्दों को जनता के सामने नहीं उठाया गया है . जब कभी न्यायिक सुधारों का जिक्र हुआ तो मात्र कुछ न्यायाधीशों पर व्यक्तिगत लांछन लगाने को प्राथमिकता दी गयी और समग्र न्याय प्रणाली में मौलिक परिवर्तन कर पारदर्शिता लाने का कभी भी हार्दिक प्रयास नहीं किया गया है . इंग्लॅण्ड में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के साथ साथ प्रेस के लिए सार और जारी किया जाता है और अपनी वेबसाइट पर 6 विदेशी भाषाओं में भी गाइड प्रकाशित कर रखी है .

हमारे न्यायालयों द्वारा सामान्यतया डाक से प्राप्त प्रलेख पर कोई कार्यवाही नहीं की जाती है तथा हमारे सुप्रीम कोर्ट नियम ,1966 के आदेश 10 नियम 6 (1) में कहा गया है कि सभी प्रलेख, याचिकाएं, अपील आदि काउंटर पर ही फाइल किये जाने चाहिए जबकि इंग्लॅण्ड एवं अमेरिका में डाक द्वारा फाइल करना भी अनुमत है. इंग्लॅण्ड में सुप्रीम कोर्ट नियम 2009 के नियम 7(1)(ख) में प्रावधान है कि एक प्रलेख को प्रथम श्रेणी (रजिस्टर्ड ) डाक द्वारा फाइल किया जा सकता है . हमारे न्यायालयों की जन विरोधी एवं अलोकतांत्रिक परम्परा है कि पक्षकार की अनुपस्थिति में प्रायः मामला ख़ारिज कर दिया जाता है जबकि इंग्लॅण्ड में सुप्रीम कोर्ट नियम 2009 के नियम 9 में प्रावधान है कि निश्चित प्रकार के प्रक्रियागत मामलों में बिना मौखिक सुनवाई के कार्यवाही की जा सकती है व नियम 8 में यह भी प्रावधान है कि इन नियमों की अनुपालना नहीं करने पर भी कार्यवाही अवैध नहीं होगी . लोकप्रियता के लिए, स्थापित परम्परा को छोड़कर आपवादिक मामलों में, हमारे न्यायालय पत्र याचिका पर अथवा स्वप्रेरणा से भी संज्ञान लेते हैं किन्तु दूसरी ओर नगण्य कमियों वाली याचिकाओं को भी न्यायाधीशों के आदेशों के बिना रजिस्ट्रारों द्वारा मनमाने प्रशासनिक आदेश से ख़ारिज अथवा फाइल कर दिया जाता है .कई बार पत्र याचिका के योग्य प्रकरणों में भी न्यायिक आदेश के स्थान पर सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार प्रशासनिक पत्र लिखते हैं तथा इस पत्र को भी साधारण डाक से भेजना दिखाकर प्रकरण का असामयिक पटाक्षेप कर देते हैं ताकि पक्षकार को वास्तव में कोई राहत न मिल सके .जिस प्रकार पुलिस थानों में एफ आई आर दर्ज करने में आनाकानी की जाती ठीक उसी प्रकार पक्षकार द्वारा न्यायालय में व्यक्तिशः याचिका प्रस्तुत करने पर सुविदित कारणों से उसे रजिस्टर करने में परहेज किया जाता है .इस दृष्टि से न्यायालयों एवं पुलिस थानों की कार्यशैली में कोई अंतर नहीं रह जाता है .मुख्य न्यायाधिपति को प्रेषित इस आशय की प्रशासनिक शिकायत को भी बिना समुचित कार्यवाही के निरस्त कर दिया जाता है जिससे आम जनता को विश्वास नहीं होता कि जो न्यायालय प्रशासनिक हैसियत में न्याय नहीं दे रहा है वह न्यायिक हैसियत में न्याय दे सकता है |स्पष्ट है इनमें विधि के शासन का अभाव है तथा न्यायालयों द्वारा इस प्रकार अनुच्छेद 14 द्वारा गारंटीकृत विधि के समक्ष समानता के अधिकार का खुला उल्लंघन किया जाता है और पुनः ऊपरी न्यायालय इसके साक्षी बनते हैं.जब देश का कानून , याचिकाएं व उनके जवाब तथा आदेश सभी लिखित में हों तो व्यक्तिगत उपस्थिति की उपयोगिता एवं आवश्यकता दोनों संदिग्ध हो जाती हैं.
ब्रिटिश शासन से लेकर नडियाद (गुजरात) में 25.09.89 तक मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट( पीटकर जबरदस्ती शराब पिलाना) व जन सामान्य के साथ आज भी जारी पुलिस बर्बरता से भारतीय गणराज्य में आमजन ही नहीं अपितु न्यायाधीश भी भयभीत हैं . ब्रिटिश भारत में सरकार की जन विरोधी नीतियों के विरुद्ध जनता को धरने ,प्रदर्शन सत्याग्रह आदि का सहारा लेना पड़ता था और सरकार उसे कुचलने के लिए पुलिस की कर्कश आवाज़ के भय का प्रयोग करती थीं .भारतीय गणराज्य में आज भी स्वयं जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की सरकार में जन विरोधी नीतियों के विरुद्ध जनता को धरने ,प्रदर्शन ,सत्याग्रह आदि का सहारा लेना पड़ता है . आज भी भारतीय गणराज्य की पुलिस को आधी रात रामलीला मैदान में सोते बच्चों व महिलाओं पर लाठियां बरसाकर रावणलीला खेलने से रोकने वाला कोई कानून नहीं है .जहाँ किसी मामले में लंबे समय तक समन या वारंट तामिल नहीं होने से वह बकाया रहता है तो न्यायाधीश दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत अपने अधिकारों का प्रयोग कर कोई न्यायिक आदेश पारित करने के स्थान पर डी ओ लेटर लिखकर उच्च पुलिस अधिकारियों से गवाह या अभियुक्त की शीघ्र तलबी की विनती करते हैं .


हमारे न्यायालयों द्वारा प्रायः निचले स्तर के न्यायालय द्वारा चूक रहने पर मामले को लंबी अवधि के बाद भी उसे निचले न्यायालय द्वारा पुनः सुनवाई के लिए रिमांड किया जाता है जबकि इंग्लॅण्ड में सुप्रीम कोर्ट नियम 2009 के नियम 29 में प्रावधान है कि सुप्रीम कोर्ट को निचले न्यायालय के सभी अधिकार हैं . विदेशों में जिला न्यायालयों को रिट क्षेत्राधिकार प्राप्त है तथा हमारे संविधान के अनुच्छेद 32 (3) में भी ऐसा ही प्रावधान है अतः हमारी संसद को चाहिए कि जिला न्यायालयों को रिट क्षेत्राधिकार प्रदान करे ताकि लोगों को सस्ता व सुलभ न्याय मिल सके और ऊपरी न्यायलयों में कार्यभार कम हो .


न्यायाधीशों के चयन की हमारी प्रक्रिया भी बड़ी दोषपूर्ण है . हमारे यहाँ मात्र एक वकील ही न्यायाधीश बन सकता है जबकि इंग्लॅण्ड के संवैधानिक सुधार अधिनयम,2005 की धारा 1 में विधि के शासन पर बल दिया गया है तथा धारा 2 के अनुसार वहाँ के लोर्ड चांसलर की योग्यता के लिए सदन के सदस्य या मंत्री या विश्वविद्यालय में कानून के अध्यापक का अनुभव भी शामिल है . हमारे सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के न्यायाधीश के लिए कोई योग्यता परीक्षा पास करने की आवश्यकता नहीं है किन्तु सुप्रीम कोर्ट नियम ,1966 के आदेश 4 नियम 6 (ख) में कहा गया है कि कोई भी वकील एडवोकेट ओन रिकोर्ड के बिना किसी पक्षकार की ओर से कार्यवाही करने और उपस्थित होने के लिए अधिकृत नहीं होगा व कोई भी वकील जब तक नियम के अनुसार एडवोकेट ओन रिकोर्ड की परीक्षा पास नहीं कर लेता एडवोकेट ओन रिकोर्ड के रूप में रजिस्टर्ड नहीं हो सकता . यद्यपि राज्य सभा की समिति ने अपनी 44 वीं रिपोर्ट दिनांक 9.12.10 में उच्च न्यायालयों में न्यायधीशों की भर्ती हेतु लिखित परीक्षा की अनुशंषा की है

Monday, 4 July 2011

गोरे लोगों के काले कानूनों की मजबूत बेडियाँ

कानून और न्याय व्यवस्था का वैश्वीकरण
हमारे देश में विभिन्न सेवाओं के मानकीकरण व वैश्वीकरण की बात समय समय पर उठती रही है . किन्तु शताब्दियों पुराने अंग्रेजी कानूनों तथा उनके अधीन स्थापित न्याय व्यवस्था में कोई मौलिक परिवर्तन करने की इच्छाशक्ति का हमारे नेतृत्व में अभाव रहा है . नए मौलिक कानून नहीं बना कर शताब्दियों पुराने कानूनों में बार बार संशोधन करना समयातीत जीर्णशीर्ण कपडे की मरम्मत कर काम चलाने के समान है .जो कानून जिस देश , काल ,परिस्थितियों और शासन प्रणाली के लिए उपयुक्त थे वे सदैव उपयुक्त नहीं हो सकते . वैसे भी साम्राज्यवाद एकचक्रिय व विस्तारवादी धारणा पर आधारित है जबकि लोकतंत्र इसके विपरीत जनकल्याण के दर्शन की उपज है .आम व्यक्ति को प्रभावित करने वाले हमारे विद्यमान कानूनों की समसामयिक विदेशी कानूनों से तुलना करें तो हमें ज्ञात होगा कि हम सामान्य कानून तथा न्याय व्यवस्था में अंतर्राष्ट्रीय स्तर से बहुत पीछे हैं .फिर भी पूंजीपति वर्ग को प्रभावित करने वाले आयकर व कंपनी अधिनयम जैसे कानूनों में प्रतिवर्ष अनेक परिवर्तन किये जाते रहते हैं. हमारे लोक सेवक तथा न्यायालय आज भी साम्राज्यवादी अधिकारों का प्रयोग करते हैं जबकि जनता अभी भी जनतांत्रिक अधिकारों से वंचित है .यह सब इसलिए संभव है कि हमने अभी तक नए कानून बनाकर लोक सेवकों को दायित्व बोध नहीं कराया है तथा उनकी मनमानी स्वयंभू प्रक्रियाएं जारी हैं.
आज स्वतंत्रता के 64 वर्ष बाद भी राजपुरुष लोक सेवकों के अधिकारों में कोई कटौती अथवा दायित्वों में कोई बढ़ोतरी नहीं की गयी है जिससे यह सन्देश मिलता है कि हमारा लोकतंत्र अभी भी लोकसेवकों के बंधक है .विधि निर्माण में अत्यंत चतुराईपूर्वक कूटनीतिक शब्दजाल का प्रयोग किया जाता है ताकि किसी सरकारी सेवक की कोई जिम्मेदारी नहीं बने . यद्यपि मणिपुर राज्य की लोकप्रिय सरकार ने लोक सेवक दायित्व अधिनियम ,2006 बनाकर लोक सेवकों का दायित्व निर्धारित करने का प्रावधान किया है और अन्य सभी राज्य सरकारों व केन्द्र सरकार को ऐसा कानून बनाकर स्थित पर नियंत्रण पाना चाहिए .




हमारी व्यवस्था में किसी भी अधिकारी को दायित्वधीन बनाये जाने से परहेज किया गया है . हमारे यहाँ मुख्य न्यायाधिपति को कहीं भी जिम्मेदार नहीं बताया गया है . इंगलैंड में न्यायालय अधिनियम,2003 की प्रथम धारा में ही कहा गया है कि लोर्ड चांसलर (सुप्रीम कोर्ट का मुखिया) न्यायालयों के प्रभावी एवं दक्षतापूर्वक संचालन सुनिश्चित करने के कर्तव्याधीन है तथा वह अपने कर्तव्य निष्पादन की रिपोर्ट प्रतिवर्ष दोनों सदनों के समक्ष रखेगा व धारा 58 के अनुसार न्यायालयों के लिए वहाँ अलग से स्वतंत्र निरीक्षणालय स्थापित है . हमारी प्रणाली में उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को अधीनस्थ न्यायालयों पर न्यायिक एवं निरीक्षक दोनों वरिष्ठता प्राप्त है अतः निरीक्षण प्रणाली का कोई उपयोग व महत्व नहीं रह जाता है .किसी भी निकाय के सुचारू कार्यरत होने के लिए निरीक्षण एवं प्रशासनिक इकाई का अलग अलग होना आवश्यक है. निरीक्षण हमेशा अचानक होना चाहिए तथा पूर्व नियोजित निरीक्षण से स्वयं निरिक्षण का औचित्य समाप्त हो जाता है . न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए यह भी समान रूप से आवश्यक है कि इंग्लॅण्ड की भांति स्वयं न्यायपालिका का प्रशासनिक खंड, कम से कम हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट स्तर पर, न्यायिक कृत्यों से अलग एवं स्वतंत्र हो .यदि एक ही अधिकारी के पास न्यायिक एवं प्रशासनिक दोनों शक्तियां केंद्रित हों तो उनके प्रयोग पर प्रश्न चिन्ह लग सकता है .


इंग्लॅण्ड में आपराधिक प्रक्रिया नियम 2010 के नियम 3.2 के अंतर्गत अदालत के कर्तव्य का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि मामले की शीघ्र प्रगति के लिए एक समय सारिणी बनायीं जायेगी दूसरी ओर हमारे यहाँ स्वयम्भू प्रक्रिया अपनाकर मामले को अनिश्चित काल के लिए स्थगित करने हेतु “उचित समय पर” (Due Course) में डाल दिया जाता है जबकि ऐसे अस्पष्ट शब्दों का प्रयोग किसी नियम में नहीं है और संविधान के अनुसार किसी भी न्यायालय को सरकार की सहमति के बिना/कानून से असंगत प्रक्रियागत नियम बनाए का कोई अधिकार नहीं है .इस प्रकार संसद द्वारा बनाये गए कानूनों को भी प्रशासनिक आदेश की आड़ में निष्प्रभावी बनाना हमारे न्यायतंत्र के लिए बांयें हाथ का काम है . दूसरी ओर उस “उचित समय पर” में डाल दिये गए प्रकरण से बाद में दर्ज प्रकरणों में भी कुछ अपवित्र कारणों से पहले निर्णय दे दिए जाते हैं. न्यायालयों द्वारा इस प्रकार अनुच्छेद 14 द्वारा गारंटीकृत विधि के समक्ष समानता के अधिकार का खुला उल्लंघन किया जाता है और ऊपरी न्यायालय, जिन पर संविधान (अनुच्छेद 227)तथा दण्ड प्रक्रिया संहिता(धारा 483)के अंतर्गत पर्यवेक्षण का दायित्व डाला गया है, मूकदर्शक बने रहते हैं.
विधि का अच्छा शासन कहता है कि आपवादिक परिस्थितियों को छोड़कर प्रकरणों का निपटान उनके दर्ज होने के वरीयता क्रम में हो .हमारी न्यायिक व्यवस्था में जवाबदारी का पूर्णतया अभाव है व पुनरीक्षण तथा मूल मामले दोनों के निपटान में समान समय लिया जाता है जबकि दोनों के लिए वांछित समय व श्रम में 1 व 30 का अनुपात हाई कोर्ट द्वारा माना गया है . वकीलों द्वारा स्थगन की मांग इसके लिए कोई स्वीकार्य बहाना नहीं हो सकता क्योंकि न्याय प्रशासन न्यायाधीशों का कार्य है जिसके लिए उन्हें जनता के धन में से भुगतान किया जाता है ,न कि वकीलों का और वे इसके लिए जिम्मेदार हैं.


हमारे न्यायालयों की प्रक्रिया खुली होकर भी गुप्त है क्योंकि एक गैर पक्षकार को किसी मामले का निरीक्षण आपवादिक परिस्थितियों में ही अनुमत है जबकि अमेरिका में न्यायिक अभिलेख इन्टरनेट पर ही उपलब्ध है और इंग्लॅण्ड में सुप्रीम कोर्ट नियम 2009 के नियम 39 (3) में प्रावधान है कि रजिस्ट्री द्वारा धारित सभी प्रलेख प्रेस अथवा जन सामान्य द्वारा निरीक्षण किये जा सकेंगे किन्तु राष्ट्रीय सुरक्षा, जन हित अथवा वाणिज्यक गोपनीयता के कारणों से रजिस्ट्रार मना कर सकेगा . अर्थात हमारे यहाँ निरीक्षण अपवाद है जबकि इंग्लॅण्ड में मनाही आपवादिक मामलों में ही की जा सकती है . अमेरिका में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाहियों की साथ साथ इलेक्ट्रोनिक रिकॉर्डिंग होती है तथा वह इन्टरनेट पर भी उपलब्ध रहती है .इंगलैंड की न्यायप्रणाली में बड़ी पारदर्शिता है तथा वहाँ मात्र सरकारी रिपोर्टें ही नहीं अपितु निजी संगठनों द्वारा किये गए सम्बंधित सर्वेक्षणों के विवरण स्वयं न्याय मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध है. इंग्लॅण्ड में सूचना के अधिकार को पर्याप्त महत्व दिया गया है तथा यह न्याय मंत्रालय का विषय है . इंग्लॅण्ड में सुप्रीम कोर्ट नियम 2009 एक सरल 19 पृष्ठीय प्रलेख है जबकि हमारे सुप्रीम कोर्ट नियम ,1966 जटिल 200 पृष्ठीय प्रलेख है .
हमारे यहाँ विधि आयोग मात्र एक राजकीय आदेश से स्थापित निकाय है जिसके दायित्व , अधिकार या उपयोग किसी संसदीय अधिनियम द्वारा परिभाषित नहीं हैं .स्मरण रहे कि वर्ष 1964 में स्थापित हमारा केन्द्रीय सतर्कता आयोग भी वर्ष 2003 से पूर्व इसी प्रकार बिना संसदीय कानून के कार्यरत निकाय रहा है . हमारे यहाँ विधि आयोग, राष्ट्रीय पुलिस आयोग आदि अपनी रिपोर्टें सम्बंधित मंत्रालय को प्रस्तुत करके अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं . जब तक शासन में पारदर्शिता अपनाते हुए इन रिपोर्टों पर की गयी कार्यवाही , मानी अथवा न मानी गयी सिफारिशों से संसद के माध्यम से जनता को अवगत नहीं कराया जाता तब तक इन कमेटियों , आयोगों पर होने वाला व्यय जनता के दृष्टिकोण से अपव्यय है और ये रिपोर्टें रद्दी कागज के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकती .इसके विपरीत इंग्लॅण्ड में विधि आयोग 1965 के विधि आयोग अधिनियम द्वारा स्थापित एक निकाय है तथा धारा 3 क के अनुसार विधि आयोग के प्रस्तावों के मानने के सम्बन्ध में संसद के दोनों सदनों के समक्ष रिपोर्टें प्रस्तुत की जाती हैं. हमारे देश में भी संसदीय अधिनयम बनाकर विभिन्न कमेटियों एवं आयोगों की कार्यप्रणाली पर नियंत्रण रखने की आवश्यकता है .इनके द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों पर सम्बंधित मंत्रालय द्वारा30 दिन के भीतर प्रस्तावों के मानने के सम्बन्ध में संसद के दोनों सदनों के समक्ष रिपोर्टें प्रस्तुत की जानी चाहिए .

Sunday, 3 July 2011

पुलिस को पूर्ण अभयदान


यह बात इस देश की जनता ही नहीं जानती बल्कि एशियाई मानवाधिकार आयोग ने भी कहा है कि भारत में अधिकांश लोक अभियोजक कार्यालय ऐसी दलाली के कार्यालयों की तरह कार्य करते हैं जहाँ पुलिस , बचाव के वकील और लोक अभियोजक के बीच अपवित्र लेनदेन संपन्न होते हैं |जब एक लंबी खरीद फरोख्त के बाद भ्रष्ट राजनेताओं की इच्छा और पसंद के अनुसार राज्य द्वारा अभियोजक नियुक्त किये जाते हों तो इसे बुरा नहीं माना जा सकता | भारत में न्याय प्रदानगी निकाय की नींव को ही क्षति पहुँच चुकी है |यह निकाय भ्रष्टाचार और अक्षमता की बदबूदार नाली में रेंगता है . जो अधिकारी जन सामान्य के हितों की रक्षा करने के बहाने से कार्य ग्रहण करते हैं वे भी इस गंदी नाली में जहरीले साँपों की तरह जहर छोड़ते हुए और अपनी शैतानी पूंछ हिलाते हुए रेंगते हैं व आम नागरिक ,जो मात्र उनकी दया पर आश्रित होते हैं, का उपहास करते हैं |

पुलिस थानों में तो स्थिति और खराब है |पुलिस थाने राज्य द्वारा प्रायोजित यातना गृह हैं और पुलिस अधिकारी वर्दी में राज्य से वेतन लेने वाले अपराधी हैं |पुलिसीय कार्य एक वस्तु है मानो कि एक सड़ी हुई मछली को बाजार में सस्ते दामों पर ख़रीदा जा सकता हो |अनुसन्धान का तरीका वही है जो कि कुछ शताब्दियों पूर्व हुआ करता था,पूछताछ किये जाने वालों के साथ भी की जाने वाली बर्बरता से शर्म आती है | सम्पूर्ण अनुसन्धान बलपूर्वक कबूलाने पर आधारित है |संदिग्ध का भारत में एक ही अर्थ है –कि व्यक्ति को कानून लागू करने वाले अमानुषिक अधिकारियों की फौलादी मुठियों में पीसा जायेगा |इस प्रकार पुलिस थानों में दण्ड दिया जाता है |आपराधिक परिक्षण तो एक औपचारिकता मात्र है . वैसे भी दोषसिद्धि तो मात्र १.५ % मामलों में ही हो पाती है |आज भारत में इस पुलिस राज से छुटकारा दिलाने वाला कोई तंत्र नहीं है .

एशियाई मानवाधिकार आयोग में भी भारत के कई भागों से मामले प्राप्त हुए हैं जो विभिन्न पुलिस थानों में बंदी व्यक्तियों के साथ हुए क्रूर व्यवहार का खुलासा करते हैं .नवीनतम मामला केरल के कोलम पुलिस थाने से है | ऐसा अभियोग है कि जिस पुलिस अधिकारी ने गिरफ्तार किया,पांच अन्य पुलिस सिपाहियों सहित पुलिस थाने में पीड़ित पर चढ गए ,जिससे गिरफ्तारव्यक्ति की घंटों के भीतर ही मृत्यु हो गयी |स्थानीय लोगों के अनुसार पुलिस थाना में “संग्रहालय” नाम का एक कमरा है जहाँ पुलिस अधिकारी यातना के उपकरण रखते हैं |इनमें से किसी भी मामले में उचित रूप से अनुसन्धान ,अभियोजन और अपराधियों को न्याय तक नहीं लाया गया है |यदि एक मामले में अनुसन्धान हो भी जाये तो , विद्यमान प्रणाली में उचित अनुसन्धान और अभियोजन सुनिश्चित करने का कोई तंत्र नहीं है | उदाहरणार्थ यदि एक मानव शारीर का विधि वैज्ञानिक परीक्षण करना हो तो भारत में ऐसी पर्याप्त सुविधाएँ नहीं है जहाँ से समय पर उचित रिपोर्ट प्राप्त हो सके |पश्चिम बंगाल में उपलब्ध विधि विज्ञान सुविधाओं पर किसी भी सरकार को शर्म आनी चाहिए | मानव शवों को फर्श पर सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है क्योंकि मुर्दाघर में उपयुक्त फ्रिज नहीं हैं , और यह बड़ा ही भयानक दृश्य होता है जब आवारा कुते व चूहे मानव अवशेषों को खाते हुए देखे जाते है |प्राय मुर्दाघरों के दरवाजा भी नहीं होता जिससे कुत्तों को दूर रखा जा सके |मानव अवशेषों के बारे में जिन्हें कोई अनुभव , प्रशिक्षण और योग्यता नहीं होती उनके द्वारा शवों का परीक्षण किया जाता है |जो लोग सफाई कर्मी नियुक्त होते हैं, के द्वारा ये रिपोर्टें तैयार की जाती हैं और इन कमरों में प्रवेश तक किये बिना डाक्टरों द्वारा इन पर हस्ताक्षर किये जाते हैं |प्राय ये रिपोर्टें भी पुलिस के निर्देशानुसार तैयार की जाती हैं |यह कहावत है कि अभिरक्षा में हुई मृत्यु की रिपोर्ट उसी पुलिस के निर्देश में तैयार की जाती है |वही पुलिस इस मामले में अनुसन्धान भी करती है| .
भारत में विद्यमान कानूनी ढांचा इस प्रणाली को ठीक करने में किसी प्रकार से मददगार नहीं है |पुलिस को पूर्ण अभयदान प्राप्त है , और राष्ट्रीय व राज्य मानवाधिकार आयोग इस नृशंस्ता को असहाय होकर देखते रहते हैं |उनके पास मामलों की जाँच के लिए स्वतंत्र तंत्र ही नहीं है |यह स्थानीय पुलिस या प्रतिनियुक्त पुलिस अधिकारी पर छोड़ दिया जाता है जो कि अंततोगत्वा स्थानीय पुलिस की दया पर निर्भर रहता है |आयोग के आदेश मात्र सिफारिश होते हैं जिन्हें सरकार द्वारा नजरंदाज कर दिया जाता है |भारत ने यद्यपि यातना और अन्य निर्दयता , अमानवीय व्यवहार या दण्ड के विरुद्ध संधि पर हस्ताक्षर किये थे किन्तु इस बहाने से इसकी पुष्टि नहीं की कि देश में संधि के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पहले से ही तंत्र विद्यमान है | यद्यपि यह तंत्र कौओं को भगाने के लिए भी पर्याप्त नहीं है | प्राय कहा जाता है कि लोगों को वेसी ही पुलिस प्राप्त होती है जैसी के वे लायक हैं |यदि ऐसा है तो भारतीय लोगो ने क्या बुरा किया है जो अपनी ही पुलिस के भय और यातना से शासित हो ? भारत को यातना के विरुद्ध संधि की यथा संभव शीघ्र पुष्टि की आवश्यकता है| .

यद्यपि श्रीलंका को अभी भी यातना से मुक्त होना है किन्तु यह अंतर है कि वहाँ यदि एक व्यक्ति को यातनाएं दी जाएँ तो एक कानून है जिसका उपयोग किया जा सकता है |वहाँ एक विशेष और स्वतंत्र इकाई है जो यातना के मामलों में अनुसन्धान करती है |वहाँ ऐसे मामले हैं जिनमें मात्र प्रभावी व्यक्तियों , सामाजिक कार्यकर्ताओं और गैर सरकारी संगठनों द्वारा ही नहीं अपितु आम नागरिकों द्वारा दोषियों को न्यायालय तक लाया गया है |भारत को इस सम्बन्ध में श्रीलंका के स्तर तक पहुँचने में निश्चित रूप से लंबा समय लगेगा |इस प्रक्रिया के लिए काफी साहस की आवश्यकता है , ऐसा साहस जो प्राथमिक तौर पर अपनी कमियों को स्वीकार कर सके और भारत में इसका नितांत अभाव है |
हमारी संस्कृति यह उपदेश देती है कि व्यक्ति का अंतिम संस्कार भी उसके धर्म के अनुसार ससम्मान होना चाहिये | हमारी समृद्ध संस्कृति का शर्मनाक संरक्षण आज सामने है |
सामग्री सौजन्य -   एशियाई मानवाधिकार आयोग 
  

Saturday, 2 July 2011

काले कानूनों में पिसती मानव गरिमा



भारत में मानवधिकारों की रक्षा के लिए औपचारिक तौर पर मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, १९९३ पारित कर मानवाधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय संधियों, जिन पर भारत ने हस्ताक्षर किये , के लागू करने की भी घोषणा कर दी गयी है. अधिनियम में राज्य आयोगों व राष्ट्रीय आयोग बनाए जाने का प्रावधान किया गया है. किन्तु बड़ी विडम्बना है कि उक्त अधिनियम की धारा ३० में यद्यपि विशेष न्यायालय स्थापित करने का प्रावधान रखा गया है किन्तु किसी भी मानवाधिकार के उल्लंघन को न तो अपराध घोषित किया गया और न ही क्षतिपूर्ति या दण्ड के लिए कोई प्रावधान किया गया है. स्वस्पष्ट है कि अधिनियम में न्यायालय के लिए कोई कार्य ही नहीं जिसे वह करे अर्थात जनता को मानवधिकार संरक्षण के नाम पर गुमराह किया गया है , उसे न्यायालय से न तो कोई मुआवजा मिलनेवाला है और न ही किसी दोषी को कोई दण्ड मिलने वाला है.


दूसरी ओर आस्ट्रेलिया राजधानी क्षेत्र के मानवाधिकार अधिनियम ,२००४ का अवलोकन करें तो हमें ज्ञात होगा कि धारा १० में अमानवीय, क्रूर व्यवहार और यातना से सुरक्षा की व्यवस्था है. धारा ११ में परिवार और बच्चों के संरक्षण का प्रावधान किया गया है .अधिनियम की धारा १२ में आगे कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार है कि उसकी निजता, परिवार, घर या पत्राचार में कोई अवैध या मनमाना हस्तक्षेप नहीं हो और उसकी प्रतिष्ठा पर अवैध आक्रमण न हो. हमारे यहाँ एक व्यक्ति को गिरफ्तार करने पर पुलिस बड़े गर्व के साथ प्रेस विज्ञप्ति एवं फोटो प्रकाशित करती है जिससे व्यक्ति की प्रतिष्ठा को अनावश्यक आघात पहुंचाता है .
धारा १३ के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अधिकार है कि वह आस्ट्रेलिया राजधानी क्षेत्र में स्वतंत्र विचरण करे, प्रवेश करे, प्रस्थान करे और आस्ट्रेलिया राजधानी क्षेत्र में अपने निवास का चयन करे .आगे धारा १४ में धर्म , विचार और अंतःकरण की स्वतंत्रता बताई गयी है .धारा १५ में शांतिपूर्वक सम्मेलन और संगठन बनाना अधिकार बताया गया है जबकि हमारे यहाँ सरकार के विरोध में होने वाली गतिविधियों को पुलिस द्वारा रोक दिया जाता है अथवा बर्बरतापूर्वक कुचल कर ब्रिटिशकाल की यादों को हमारी अपनी चुनी गयी सरकारें तरोताजा करती रहती हैं .
आस्ट्रेलिया राजधानी क्षेत्र के मानवाधिकार अधिनियम ,२००४ की धारा १६ में बिना किसी हस्तक्षेप के अपने विचार धारित करने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है जिसमें मुद्रित ,लिखित या मोखिक रूप में बिना किसी राज्य सीमा के सूचना का आदान प्रदान शामिल है. प्रत्येक को लोक मामलों में प्रत्यक्ष या प्रतिनिधियों के माध्यम से भाग लेने का अधिकार है. मत देने और समय समय पर चुने जाने का, जो कि मतदाताओं की स्वतंत्र इच्छा की गारंटी है ,अधिकार है तथा लोक पदों पर समानता के आधार पर नियुक्ति का अधिकार है. जबकि भारत में मतदान के अधिकार को कानून में कहीं भी अधिकार के रूप में परिभाषित नहीं किया गया है. यहाँ तो निर्वाचन अधिकारी मनमाने ढंग से जब चाहे किसी का भी नाम मतदाता सूची से गायब कर देते हैं और मतदाता को नाम हटाने से पूर्व या पश्चात सूचित करने का देश के निर्वाचन कानून में कोई प्रावधान नहीं है .इस प्रकार देश की स्वयं निर्वाचन प्रक्रिया ही बेमानी है.
अधिनियम की धारा १८ में प्रावधान किया गया है कि प्रत्येक को शरीर की स्वतंत्रता और सुरक्षा का अधिकार होगा व विशेष रूप से किसी को भी मनमाने ढंग से गिरफ्तार अथवा निरुद्ध नहीं किया जायेगा. जिसे अपराधिक आरोपण में रोका जाता है उसे तुरंत मजिस्ट्रेट के समक्ष लाया जायेगा और तर्कसंगत समय सीमा के भीतर मुक्त किये जाने या अन्वीक्षा किये जाने का अधिकार है. सामान्य नियम के तौर पर जो अन्वीक्षण की प्रतीक्षा कर रहा है उसे अभिरक्षा में नहीं रोका जाना चाहिए. जिस किसी को गिरफ़्तारी या रोककर के स्वतंत्रता से वंचित किया गया है वह रोकने की वैधता न्यायालय से अविलम्ब निर्धारित करवाने और यदि रोकना अवैध पाया जाये तो व्यक्ति की विमुक्ति का आदेश का अधिकारी है. भारत में ऐसे किसी भी कानून का पूर्णतया अभाव है. इसी धारा में आगे यह भी कहा गया है कि जिसे अवैध रूप से गिरफ्तार किया गया या रोका गया हो को गिरफ़्तारी या रोकने के लिए क्षतिपूर्ति का अधिकार है. भारत में अवैध गिरफ़्तारी के लिए कोई क्षतिपूर्ति नहीं दी जाती है और इस प्रकार विधायिका द्वारा समुचित कानून नहीं बनाने के पाप का दण्ड, संविधान के विरुद्ध, नागरिकों को भुगतना पडता है .


धारा १९ में यह भी कहा गया है कि स्वतंत्रता से वंचित के साथ मानवीय और मानवोचित गरिमा व आदर का व्यवहार किया जायेगा. आपवादिक परिस्थितियों को छोड़कर एक अभियुक्त को दोषसिद्ध लोगों से अलग रखा जायेगा और एक अभियुक्त के साथ इस प्रकार का व्यवहार किया जायेगा जो कि दोषसिद्ध नहीं हुए व्यक्तियों के लिए उपयुक्त हो.
धारा २१ में उचित अन्वीक्षण पर बल देते हुए कहा गया है कि प्रत्येक को अपराधिक आरोपण , विधि द्वारा मान्य अधिकार और दायित्वों को प्राप्त करने और सक्षम, स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायालय द्वारा उचित व सार्वजनिक सुनवाई के पश्चात निर्णय करवाने का अधिकार है. आगे यह भी कहा गया है कि बिना अतर्कसंगत विलम्ब के सुनवाई ,अपने स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य नहीं देने या अपराध स्वीकार नहीं करने का अधिकार है. धारा २३ में बल देते हुए कहा गया है कि यदि एक व्यक्ति की दोष सिद्धि होने के पश्चात दण्ड भुगतता है और बाद में दोषसिद्धि उल्ट दी जाती है या क्षमादान दे दिया जाता है या नए तथ्य से न्याय की विफलता प्रकट होती है तो उसे कानून के अनुसार क्षतिपूर्ति का अधिकार होगा. अधिनियम की धारा ४० ख में स्पष्ट किया गया है कि एक लोक प्राधिकारी के लिए मानवाधिकारों के अनुपयुक्त ढंग से कार्य करना या मानवाधिकारों के उपयुक्त विचारण के बिना निर्णय देना अवैध होगा. इस प्रकार वहाँ न्यायालयों के लिए भी मानवाधिकार संरक्षण आवश्यक है जबकि हमारी व्यवस्था में तो न्यायपालिका अपने को सर्वोच्च मानती है, उसमें व्यावहारिकतः मानव तत्व का अभाव होने से मानव गरिमा का कोई मूल्य नहीं है.
इस प्रकार उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि आस्ट्रेलिया राजधानी क्षेत्र में मानवाधिकारों पर पर्याप्त बल दिया गया है और मानवाधिकार संधियों को लागू करने का निष्ठावान व व्यापक प्रयास किया गया है जबकि हमारे यहाँ मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम एक कोरी औपचारिकता मात्र है व मानवोचित गरिमा की रक्षा को हमारे कानून में कोई स्थान नहीं दिया गया है और पुलिस के तांडव नृत्य असामान्य बात नहीं है. हमारी लोकतान्त्रिक सरकार को चाहिए की वह एक व्यापक कानून बनाये जिसमें आस्ट्रेलिया राजधानी क्षेत्र की भांति समस्त लोक प्राधिकारियों पर मानवाधिकार संरक्षण का दायित्व हो.