Thursday, 26 September 2013

अवैध गिरफ्तारी व हिरासत में रखना आई ए एस, तहसीलदार और पुलिस अधिकारी को भारी पडा

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने सुरेशकुमार शर्मा को अवैध हिरासत में रखने के प्रकरण में राज्य सरकार को 2 लाख रुपये मुआवजा देने और घटना में संलिप्त आई ए एस अधिकारी के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही को 3 माह की अवधि में निपटाने के निर्देश दिए हैं| न्यायाधिपति राजीव शर्मा ने सुरेश कुमार शर्मा की रिट याचिका पर हिमाचल राज्य  को दिनांक 2.9.13 को  यह आदेश दिया है| स्मरण रहे कि न्यायालय ने पूर्व में ही दिनांक  23.05.13 को सुनवाई कर अंतरिम आदेश दिया था कि चूँकि आई ए एस - बी आर कमल और तहसीलदार सिद्धार्थ आचार्य ने याची की स्वतंत्रता का हनन विधि विरुद्ध रूप से किया है अत: उनके विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही की जाये और उन्हें निलंबित कर दिया जाए| साथ ही न्यायालय ने यह भी आदेश दिया था कि सरकार हर्जाने के लिए रुपये दो लाख न्यायालय में अग्रिम जमा करवाएं |
  याची सुरेश कुमार शर्मा ने उपखंड मजिस्ट्रेट के दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107 और 151 ( जिसका आम तौर पर दुरूपयोग किया जाता है) के अंतर्गत उसकी गिरफ्तारी के आदेश को चुनौती देते हुए आरोप लगाया था कि उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अनुचित हनन हुआ है व उसे 72 घंटे से अधिक अवधि के लिए हिरासत में रखा गया और जमानत मुचलका स्वीकार नहीं किया गया| याचिका में आरोप लगाए गए हैं कि याची ने उसके गाँव के दो व्यक्तियों द्वारा 60 बीघा सरकारी भूमि पर अतिक्रमण के विषय में उसने कई शिकायतें की थी| यद्यपि अतिक्रमण हटा दिया गया किन्तु अप्रसन्न होकर उसे झूठे मामले में फंसा दिया गया|  नतीजन रोहरू के उपखंड मजिस्ट्रेट बी आर कमल ने अतिक्रमियों की झूठी शिकायत पर दिनांक 7.7.09 को याची की गिरफ्तारी के आदेश जारी किये और उसे तीन बाद गिरफ्तार किया गया और तत्कालीन कार्यवाहक उपखंड मजिस्ट्रेट तहसीलदार जुब्बल सिद्धार्थ आचार्य ने उसका जमानत मुचलका स्वीकार नहीं किया| याची को दिनांक 13.07.09 को मुक्त किया गया और बाद में कार्यवाही बंद कर दी गयी |

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107  में यह प्रावधान है कि पर्याप्त आधार होने पर मजिस्ट्रेट सम्बद्ध व्यक्ति से शांति बनाए रखने के लिए मुचलका प्रस्तुत करने की अपेक्षा कर सकता है| धारा 109 में मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति को प्राप्त सूचना का सार, मुचलका की रकम, प्रतिभुओं  की संख्या, प्रकार और वर्ग बताते हुए  कारण दर्शित करने  की अपेक्षा करेगा| न्यायालय में ऐसा व्यक्ति उपस्थित होने की दशा में उसे यह सार बताया जाएगा| धारा 113 के अनुसार ऐसे व्यक्ति की उपस्थति के लिए समन जारी किया जाएगा और गिरफ्तारी का वारंट केवल अत्यावश्यक परिस्थितियों में ही जारी किया जाएगा | समन या वारंट के साथ ऐसे आदेश की प्रति गिरफ्तार व्यक्ति को दी  जायेगी| धारा 116(1) के  अनुसार ऐसे व्यक्ति के उपस्थित होने पर शिकायत की सत्यता की जांच  की जाएगी और उचित होने पर अतिरिक्त साक्ष्य लिया जाएगा| धारा 116 (3) के परंतुक के अनुसार, धारा 108, 109 या 110 के अलावा,  जांच किये बिना अंतरिम अवधि के लिए मुचलका के लिए निर्देश नहीं दिए जा सकते| जबकि प्रकरण में पुलिस अधिकारी के बुलाये जाने पर याची उपस्थित हुआ और उसे गिरफ्तार कर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया गया| उसके द्वारा प्रस्तुत व्यक्तिगत मुचलका और उसके पिता द्वारा प्रस्तुत मुचलका को  भी इस बनावटी आधार पर अस्वीकार कर दिया गया कि उसमें सम्पति के विवरण नहीं हैं| बाद में सम्पति के विवरण सहित आवेदन प्रस्तुत करने पर ही उसे रिहा किया गया|
याची को कानूनन एक बार में 24 घंटे से अधिक अवधि के लिए हिरासत में नहीं भेजा जा सकता था  किन्तु उसे दिनांक 10.07.09 से 13.07.09 तक 72 घंटे हिरासत में भेजने का अवैध आदेश दिया गया| यदि याची द्वारा प्रस्तुत मुचलका में सम्पति का पूर्ण विवरण नहीं था तो उसे तीन दिन बाद के स्थान पर उसी दिन विवरण प्रस्तुत करने की अपेक्षा की जा सकती थी| लेखक का विनम्र मत है कि मजिस्ट्रेट 24 घंटे ड्यूटी पर होता है तथा बिना अनुमति व वैकल्पिक व्यवस्था के वह मुख्यालय भी नहीं छोड़ सकता| इसी दृष्टिकोण से दंड प्रक्रिया संहिता में मजिस्ट्रेट न्यायालय शब्द के स्थान पर मात्र मजिस्ट्रेट शब्द का प्रयोग किया गया है अर्थात मजिस्ट्रेट द्वारा कार्यवाही करने के लिए न्यायालय लगा होना आवश्यक नहीं है क्योंकि न्यायालय का निर्धारित समय और छुट्टियां होती हैं जबकि ये मजिस्ट्रेट पर लागू नहीं होती| जब मजिस्ट्रेट छुट्टी के समय या दिन शांति रखने के लिए आदेश दे सकता है तो फिर वह जनता का सेवक होते होते हुए जमानत के लिए मना कैसे कर सकता है|

याचिका की सुनवाई के समय न्यायालय ने पाया कि याची की गिरफ्तारी की सम्पूर्ण प्रक्रिया में निर्धारित आवश्यक कानून की अनुपालना नहीं की गयी है और इसमें दुर्भावाना की बू आती है| यह सम्पूर्ण कार्यवाही सरकारी भूमि पर अतिक्रमियों की सह पर की गयी है| याची के विरुद्ध उक्त अनुचित कार्यवाही को निरस्त करते हुए न्यायालय ने आगे आदेश दिया कि सरकार याची को दो लाख रूपये का हर्जाना दे व सरकार चाहे तो हर्जाने की राशि की वसूली आई ए एस और तहसीलदार से कर सकती है तथा उनके विरुद्ध प्रारंभ की गयी अनुशासनिक कार्यवाही को तीन माह की अवधि में निपटा दिया जाये| न्यायालय ने आगे यह भी आदिष्ट किया है कि  सरस्वतीनगर पुलिस चौकी के सहायक उप निरीक्षक ओम प्रकाश, जोकि उक्त गिरफ्तारी में संलिप्त रहा है, को भी समान रूप से निलंबित किया जाए और उसके विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही को भी 3 माह की अवधि में निपटाया जाय| सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वालों के विरुद्ध कार्यवाही की जाये|


रिजर्व बैंक का समाजवादीकरण

मनीराम शर्मा
अध्यक्ष, इंडियन नेशनल बार एसोसिएशन , चुरू प्रसंग
रोडवेज डिपो के पीछे
सरदारशहर  331403
दिनांक 21.09.13
माननीय अध्यक्ष महोदय,
कार्मिक, जनशिकायत, विधि एवं न्याय समिति,
राज्य सभा,
नई दिल्ली   
महोदय,
रिजर्व बैंक का समाजवादीकरण 
आपको ज्ञात ही है कि देश के संविधान में यद्यपि समाजवाद का समावेश अवश्य है किन्तु देश के सर्वोच्च वितीय संस्थान रिजर्व बैंक के केन्द्रीय बोर्ड में ऐसे सदस्यों के चयन में इस प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं है जिनकी समाजवादी चिंतन की पृष्ठभूमि अथवा कार्यों से कभी भी वास्ता रहा है| सर्व प्रथम तो बोर्ड के अधिकाँश सदस्य निजी उद्योगपति पूंजीपति हैं| जिन सदस्यों को उद्योगपतियों के लिए निर्धारित कोटे के अतिरिक्त -  समाज सेवा , पत्रकारिता आदि क्षेत्रों से चुना जाता है वे भी समाज सेवा, पत्रकारिता आदि का मात्र चोगा पहने हुए होते हैं व वास्तव में वे किसी न किसी  औद्योगिक घराने से जुड़े हुए हैं| एक उद्योगपति का स्पष्ट झुकाव स्वाभाविक रूप से व्यापार के हित में नीति निर्माण में होगा| इससे भी अधिक दुखदायी तथ्य यह है कि  केन्द्रीय बोर्ड के 80% से अधिक सदस्य विदेशों से शिक्षा प्राप्त हैं फलत: उन्हें जमीनी स्तर की भारतीय परिस्थितियों का कोई व्यवहारिक ज्ञान नहीं है अपितु उन्होंने तो इंडिया को मात्र पुस्तकों  में पढ़ा है| ऐसी स्थिति में रिजर्व बैंक बोर्ड द्वारा नीति निर्माण में संविधान सम्मत और जनोन्मुख नीतियों की अपेक्षा करना ही निरर्थक है| रिजर्व बैंक, स्वतन्त्रता पूर्व 1934 के अधिनियम से स्थापित एक बैंक है अत: उसकी स्थापना में संवैधानिक समाजवाद के स्थान पर औपनिवेशिक साम्राज्यवाद की बू आना स्वाभाविक  है| देश के 65% गरीब, वंचित और अशिक्षित वर्ग का रिजर्व बैंक के केन्द्रीय बोर्ड में वास्तव में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है और देश आयातित नीतियों पर चल रहा है| दूसरी ओर भारत से 14 वर्ष बाद 1961 में स्वतंत्र हुए दक्षिण अफ्रिका के रिजर्व बैंक के निदेशकों में से एक कृषि व एक श्रम क्षेत्र से होता है| हमारे पडौसी देश पाकिस्तान के केन्द्रीय बैंक में निदेशक मंडल में प्रत्येक राज्य से न्यूनतम एक निदेशक अवश्य होता है जबकि हमारे देश में ऐसे  प्रावधान का नितांत अभाव है|
अत: रिजर्व बैंक अधिनियम में संशोधन कर इसे समाजवादी बनाया जाये और यह सुनिश्चित किया जाए कि उसके निदेशक/शासकीय मंडल में  कृषक, मजदूर वर्ग तथा समस्त राज्यों का समुचित प्रतिनिधित्व हो| इस प्रसंग में आप द्वारा की गयी कार्यवाही का मुझे उत्सुकता से इंतज़ार रहेगा|
भवनिष्ठ
मनीराम शर्मा 


Sunday, 1 September 2013

कहने को देश में लोकतंत्र है किन्तु इसमें आम नागरिक की कोई सक्रीय भागीदारी नहीं रह गयी है

श्री मनमोहन सिंह जी,
प्रधान मंत्री,
भारत सरकार,
नई दिल्ली

मान्यवर, 
नीतिगत मामले : अधिकारों का प्रत्यायोजन एवं जन शिकायतों का निवारण

मैं आपको यह स्मरण करवाने की आवश्यकता नहीं समझता कि आपकी लोकप्रिय सरकार ने शिकायत निवारण तंत्र लोक शिकायत निवारण 2010 हेतु दिशा-निर्देश जारी किये हैं और इसकी अनुपालना में शिकायत निवारण अधिकारी भी नियुक्त कर रखें हैं जो प्रशासनिक शिकायतों का निवारण करने के लिए अधिकृत हैं| किन्तु नीतिगत मामलों की शिकायतें इसकी परिधि में नहीं आती हैं क्योंकि राष्ट्र द्वारा अपनाई गयी लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में नीतिगत मामले मात्र जनप्रतिनिधियों के ही दायरे में आते हैं|अत: नीतिगत मामलों की शिकायतें इस पोर्टल पर दायरे से बाहर बताते हुए निरस्त कर दी जाती हैं| दूसरी ओर नीतिगत मामलों के सामान्य जन प्रतिवेदनों को जन प्रतिनिधियों के ध्यान में लाये बिना ही सचिवालय स्तर पर निरस्त कर लोकतंत्र को विफल किया जा रहा है|यह स्थिति अत्यंत दुखदायी है जहां सरकार द्वारा दोहरे मानदंड अपनाए जा रहे हैं|इस प्रकार नीतिगत मामलों में जनता को अपनी व्यथा जन प्रतिनिधियों तक पहुँचाने का कोई विकल्प ही उपलब्ध नहीं है और कहने को देश में लोकतंत्र है किन्तु इसमें आम नागरिक की कोई सक्रीय भागीदारी नहीं रह गयी है|

     
लोकतंत्र में सरकारी अधिकारी अपने विभाग प्रमुख के प्रति जवाबदेह हैं और जनप्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह हैं| किसी भी नीतिगत मामले में हस्तक्षेप करने, संशोधन करने या स्वीकार करने का अधिकार मात्र जनप्रतिनिधियों को ही है| निश्चित रूप से जब किसी नीतिगत मामले को स्वीकार करने का किसी अधिकारी को कोई अधिकार नहीं है तो फिर उसे अस्वीकार करने का भी कोई अधिकार नहीं हो सकता| यदि अस्वीकार करने का अधिकार ही नीचे के स्तर पर दे दिया जाए या प्रयोग किया जाए तो फिर उच्च स्तर पर ऐसा कोई अधिकार अर्थहीन रह जाएगा| अतेव कृपया व्यवस्था करें कि समस्त अधिकारियों की शक्तियां सहज दृश्य रूप में प्रकाशित की जाती हैं और नीतिगत मामलों में कोई भी निर्णय, यथा स्थिति, सशक्त सम्बंधित मंत्री, समिति या अध्यक्ष की अनुमति के बिना नहीं लिया जाये ताकि देश में वास्तव में लोकतंत्र स्थापित हो सके| आप द्वारा इस प्रसंग में की गयी कार्यवाही का मुझे उत्सुकता से इन्तजार रहेगा|  

सादर,

 भवनिष्ठ

मनीराम शर्मा                                       दिनांक: 01.09.2013
एडवोकेट
नकुल निवास, रोडवेज डिपो के पीछे
सरदारशहर-331403
जिला-चुरू(राज)


Wednesday, 28 August 2013

भारत के सम्पूर्ण संविधान में ढूंढने से भी “मानव अधिकार” शब्द मिलना तक संभव नहीं है

ओंटारियो की एक कृषि फर्म को अपने एक कर्मचारी को बंदर कहना महँगा पडा जबकि वहां के मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ने चर्चित प्रकरण एड्रिअन मोंरोसे बनाम डबल डायमंड एकड़ लिमिटेड (2013 एच आर टी ओ 1273)  में दोषी पर भारी जुर्माना लगाया| किंग्सविले की एक टमाटर उत्पादक कंपनी डबल डायमंड एकड़ लिमिटेड  को मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ओंटारियो (कनाडा)  ने शिकायतकर्ता एड्रिअन मोंरोसे को बकाया वेतन और गरिमा हनन के लिए कुल 23,500 पौंड क्षतिपूर्ति देने के आदेश दिया है| 
तथ्य इस प्रकार हैं कि शिकायतकर्ता ने प्रतिवादी संस्थान में प्रवासी मौसमी कृषि मजदूर के रूप में दिनांक 9.1.09 से कार्य प्रारंभ किया था| शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि प्रतिवादी संस्थान के एक कर्मचारी करिरो ने चिल्लाते हुए मुझे कहा कि तुम पेड़ शाखा पर बंदर जैसे लगते हो और वह चला गया| मौसमी मजदूरों के करार के अनुसार उनके वेतन का पच्चीस प्रतिशत वेतन उन्हें बाद में भेजे जाने के लिए काटा जाता है किन्तु उसे समय पर भुगतान नहीं किया गया| आवेदक –शिकायतकर्ता-एड्रिअन मोंरोसे के अनुसार उसने यह मामला प्रतिवादी के समक्ष माह जनवरी व फरवरी 2009 में उठाया था| किन्तु उसकी  शिकायत के फलस्वरूप बदले की भावना से उसे नौकरी से ही निकाल दिया जिससे वह 5500 पौंड मजदूरी से वंचित हो गया| मामला जब ट्रिब्यूनल के सामने निर्णय हेतु आया तो ट्रिब्यूनल का यह विचार रहा कि क्षतिपूर्ति के उचित मूल्याङ्कन के लिए बदले की भावना से प्रेरित कार्यवाही से उसकी गरिमा, भावना और स्व-सम्मान को पहुंची ठेस के लिए प्रार्थी क्षतिपूर्ति का पात्र है| प्रार्थी  ने अपने देश वापिस भेज दिए जाने सहित मजदूरी के नुक्सान आदि इन सबके लिए कुल 30000 पौंड के हर्जाने की मांग की है| ओंटारियो मानवाधिकार संहिता की धारा 46.3 के अनुसार किसी संगठन के कर्मचारियों, अधिकारियों या एजेंटों द्वारा भेदभाव पूर्ण आचरण करने पर संस्था का प्रतिनिधित्मक दायित्व है, तदनुसार करेरो और मस्टरोनारडी के कृत्यों के लिए डबल डायमंड एकड़ लिमिटेड जिम्मेदार हैट्रिब्यूनल ने आवेदक को 15000 पौंड का हर्जाना बदले के भावना से हुए मानवाधिकार हनन के लिए स्वीकृत किया और मजदूरी के नुक्सान की भरपाई के लिए 5000 पौंड मय ब्याज के देने के आदेश दिए|
आवेदक ने यह भी मांग की कि प्रत्यर्थी अपने यहाँ मानवाधिकार नीति को लागू करने के लिए ओंटारियो मानवाधिकार आयोग से अनुमोदन करवाकर एक निश्चित प्रक्रिया लागू करे| इस पर ट्रिब्यूनल ने आदेश दिया कि प्रत्यर्थी 120 दिन के भीतर मानवाधिकार कानून विशेषज्ञ की सहायता से एक व्यापक मानवाधिकार और भेदभाव विरोधी नीति विकसित करे व प्रत्यर्थी के सभी अधिकारीकर्मचारी, जिन पर किसी भी प्रकार के पर्यवेक्षण का दयित्व हो वे, 101 मानवाधिकारों के विषय में 120  दिन के भीतर ऑनलाइन प्रशिक्षण प्राप्त करें |
वहीं भारतीय परिपेक्ष्य में मानवाधिकारों पर नजर डालें तो स्थिति अत्यंत दुखद कहानी कहती है| भारत के सम्पूर्ण संविधान में ढूंढने से भी मानव अधिकार शब्द मिलना तक संभव नहीं है|  ओड़िसा में जुलाई 2008 में संजय दास को पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की निस्संकोच अवहेलना करते हुए गिरफ्तार कर लिया था अत: पुलिस की इस अनुचित कार्यवाही से व्यथित होकर पीड़ित ने वर्ष 2009 में उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल की| खेद का विषय है कि इस याचिका पर उच्च न्यायालय ने 4 वर्ष बाद अब वर्ष  2013 में सरकार से जवाबी हलफनामा दायर करने को कहा हैप्रकरण में जवाब देते हुए राज्य के पुलिस महानिदेशक ने कहा है कि अब दोषी की पहचान करना कठिन है| वास्तव में देखा जाए तो भारत भूमि के अधिकाँश लोगों, चाहे वे कोई भी पद धारण करते हों, के चिंतन से लोकतंत्र का मूल दर्शन ही गायब है| विधायिकाएं आधे-अधूरे और जनविरोधी कानून बनाती हैं, न्यायपालिका उन्हें लागू करते हुए और भोंथरा बना देती परिणामत: पुलिस का मनोबल और दुस्साहस-दोनों इस वातावरण में मुक्त रूप से पनपते  रहते  है|   पुलिस द्वारा न केवल आम नागरिक के साथ अभद्र व्यवहार करने और सरे आम गाली गलोज करने के  मामले मानवाधिकार तंत्र के सक्रिय या निष्क्रिय सहयोग और सानिद्य में जारी हैं बल्कि हिंसा तक  बेहिचक की जाती है| देश की सवा अरब की आबादी  में ढूंढने से भी उदाहरण मिलना मुश्किल है जहां बीस लाख में से एक भी पुलिस वाले को अपशब्दों के लिए या मानव गरिमा हनन के लिए दण्डित किया गया हो|


एक बार जब भारत ने मानवाधिकार संधि का अनुमोदन कर दिया तो उसके बाद सम्पूर्ण देश में मानवाधिकार की रक्षा करना, प्रोन्नति करना और उसका उल्लंघन रोकना सरकार का दायित्व हो जाता है ऐसा उल्लंघन चाहे किसी सरकारी सेवक द्वारा किया जा रहा हो या किसी नीजि व्यक्ति द्वारा| सरकार मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में ऐसा कोई भेदभाव नहीं बरत सकती किन्तु भारत के मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 12 में मात्र लोक सेवकों द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में ही आयोग द्वारा जांच का प्रावधान रखा गया है और इस प्रकार नीजि व्यक्तियों को मानवाधिकार उल्लंघन की खुली छूट दे दी गयी है कि उनके विरुद्ध शिकायतों पर आयोग कोई कार्यवाही नहीं करेगा| वहीं ओंटारियो राज्य ने अपने लिए एक विस्तृत और व्यापक मानवाधिकार संहिता बना रखी है| संहिता की धारा 29 में मानवाधिकार संरक्षण और प्रोन्नति के व्यापक प्रावधान है और यह कहा गया है कि आयोग का कार्य मानवाधिकारों (न केवल रक्षा करना बल्कि) के सम्मान को आगे बढ़ाना और प्रोन्नत करना आयोग का कार्य है तथा इसमें नीजि या सरकारी उल्लंघन के मध्य किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया गया है| मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ओंटारियो न केवल अपने मुख्यालय पर बल्कि कैम्प लगाकर घटना स्थल के नजदीक सुनवाई का अवसर देता है ताकि पीड़ित पक्ष अपना दावा आसानी से प्रभावी ढंग प्रस्तुत कर सके| उक्त मामले से यह भी स्पष्ट है कि वर्ष 2009  के मामले में ओंटारियो के ट्रिब्यूनल ने अपना निर्णय सुना दिया है जबकि समान अवधि के मामले में ओड़िसा उच्च न्यायालय ने अभी सरकार से जवाब ही मांगा है, निर्णय  में लगने वाले समय और मिलने वाली राहत के विषय में कोई सुन्दर पूर्वानुमान  नहीं लगाया  जा सकता| उल्लेखनीय है कि भारत जब मानवप्राणी  के रूप में प्राप्त अधिकारों के विषय में कनाडा से इतना पीछे है तो नागरिक के तौर पर उपलब्ध मूल अधिकारों के विषय में अभी चर्चा करना ही अपरिपक्व होगा, चाहे कागजी तौर पर वे संविधान में सम्मिलित हों| यह भी ध्यान देने योग्य है कि कनाडा, ब्रिटिश संसद के नियंत्रण से वर्ष 1982 में ही अर्थात भारत से 35 वर्ष बाद पूरी तरह से मुक्त हुआ है| अब देश की जनता कर्णधारों से जवाब मांगती है कि इस अवधि में इन्होंने आम भारतीय के लिए अब तक क्या किया और भविष्य में जो करने जा रहे हैं उसकी रूप रेखा क्या है|   

Tuesday, 23 July 2013

भारत में लगभग सभी सरकारी संगठन पुलिस थाने के समान ही हैं

प्राय: अखबारों की सुर्ख़ियों में ख़बरें रहती हैं कि अमुक अपराध में पुलिस ने ऍफ़ आई आर नहीं लिखी  और अपराधियों को बचाया है| पुलिस का कहना होता है कि लोग व्यक्तिगत रंजिशवश झूठी ऍफ़ आई आर लिखवाते हैं और इससे उनके इलाके में अपराध के आंकड़े अनावश्यक ही बढ़ जाते हैं जिससे उनकी रिपोर्ट खराब होती है और कई बार तो विधान-सभाओं तक में सवाल-जवाब होते हैं| इस कारण चुनिन्दा मामलों में (सभी में नहीं) पुलिस बहाना बनाती है कि वे मामले की पहले जांच करके ही रिपोर्ट लिखेगी| आम नागरिक के मन में यह धारणा गहरी बैठ जाती है कि पुलिस निक्कमी और भ्रष्ट है अत: कानून की पालना नहीं करती व जनता की रक्षा नहीं करती| किन्तु वास्तविक स्थिति क्या है यह तो गहराई में जाकर शासन के विभिन्न अंगों का चरित्र-पुराण खंगालने से ही पता लगेगा कि इस महान भारत भूमि पर कौन भ्रष्ट व निक्कमा नहीं |  

सर्वप्रथम उच्चतम न्यायालय को ही परखते हैं जिसने इफ आई आर के विषय में विभिन्न विरोधाभासी निर्णय देकर पुलिस को ऍफ़ आई आर लिखने से मना करने के लिए बल प्रदान किया है| कहानी मात्र यहीं पूर्ण नहीं होती अपितु उच्चतम न्यायालय ने अपने कार्यकरण के विषय में ऐ हैण्ड बुक ऑफ़ इनफोर्मेसन नामक एक पुस्तिका जारी की है जिसके पृष्ट 52 पर यह उल्लेख है कि ऍफ़ आई आर से मनाही के शिकायती पत्र को लेटर पिटीशन मानकर रिट दर्ज की जावेगी किन्तु वास्तव में उच्चतम न्यायालय में इस परिधि में आने वाले पत्रों को भी रिट की तरह दर्ज नहीं किया जाता है अपितु डाकघर की भांति ऐसी शिकायत को उसी आरोपित पुलिस अधिकारी को अग्रेषित मात्र कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर दी जाती है| जबकि ऐसा कोई प्रावधान इस पुस्तिका में नहीं है| यह मात्र साधारण मामलों में ही नहीं अपितु भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में भी होता है जिसे देखकर कई बार यह  लगता है कि देश में न्याय और कानून तो एक सपना मात्र है और देश की न्याय व्यवस्था बेरोजगारी दूर करने के लिए संचालित एक विशुद्ध वाणिज्यिक उपक्रम है| अब निचले स्तर पर कोई मजिस्ट्रेट यदि उच्चतम न्यायालय का अनुसरण  करते हुए कानून का उल्लंघन कर यही सुगम मार्ग अपनाए तो उसे दोष किस प्रकार दिया जा सकता है|
हमारी न्याय प्रणाली मूलत: इंग्लॅण्ड की व्यवस्था पर आधारित है किन्तु हमने  इसे समसामयिक नहीं बनाया है और देश की जनता को गलत पाठ पढ़ाया जा रहा है कि न्यायपालिका सर्वोच्च है| इसके विपरीत इंग्लॅण्ड में न्यायिक पुनरीक्षा आयोग कार्यरत है जो किसी भी न्यायालय में विचाराधीन अथवा निर्णित मामले में हस्तक्षेप कर सकता है और अन्याय होने का उसे विश्वास होने पर उचित राहत भी दे सकता है|  ऐसी व्यवस्था भारत में भी लागू की जा सकती है, विशेषकर तब जब न्यायपालिका को संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा हो| अभी हाल ही में यह कहा गया है कि तेजाब के लिए लाइसेंस लागू कर दिया जाये किन्तु लाइसेंस तो हथियारों और विस्फोटकों के लिए भी आवश्यक  है, क्या इससे रक्तपात रुक गया है अथवा स्वयं पुलिस और सेना ये वस्तुएं अपराधियों को उपलब्ध नहीं करवा रही हैं| वास्तव में भारत में कड़े कानून बनाने का अर्थ भ्रष्ट लोकसेवकों की अपराधियों के साथ मोलभाव की शक्ति को बढ़ाना मात्र है, किसी अपराध पर नियंत्रण करना नहीं है|  

संविधान के अनुच्छेद 350 में जनता को अपने चुने गए प्रतिनिधियों और विधायिकाओं को अपनी व्यथा निवेदन करने का अधिकार है और यह अपेक्षित है कि जनप्रतिनिधि इन व्यथाओं पर गुणदोष के आधार पर निर्णय लें| जब जन प्रतिनिधि प्रश्न पूछने के लिए ही धन लेते हों तो फिर बिना धनवाली (अर्थहीन) जनव्यथा को सदन में उठाने की उनसे अपेक्षा नहीं की जा सकती| विधायिकाओं की स्थिति में इन व्यथाओं पर निर्णय का अधिकार अध्यक्ष को दिया गया है किन्तु इन व्यथाओं को विधायिकाओं में याचिकाओं के रूप में विधिवत दर्ज किये बिना निचले स्तर पर सचिव ही निरस्त कर देते हैं और इसी प्रकार मंत्रालयों में भी सम्बन्धित मंत्री के ध्यान में लाये बिना नीतिगत मामलों की जन परिवेदनाओं को भी रोजमर्रा के मामले की तरह सचिवों द्वारा ही निरस्त कर दिया जाता है|  इससे यह झूठी रंगीन छवि प्रस्तुत की जाती है कि मंत्रालय में कोई परिवेदना बकाया नहीं है अथवा शीघ्र निस्तारण कर दिया जाता है| इस प्रकार हमारा लोकतंत्र एक खाली डिब्बा-दिखावे से अधिक कुछ नहीं है| जब किसी मामले पर जनता उद्वेलित होती है तो तुष्टिकरण की कूटनीति अपनाते हुए किसी कमिटी या आयोग का गठन कर दिया जता है और उसके द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट कालान्तर में कूड़ेदान की शोभा बढ़ाती है| देश का अकेला विधि आयोग ही वर्ष में औसतन 4 रिपोर्टें दे रहा है और सरकार को एक रिपोर्ट पर कार्यवाही करने में औसतन 10 वर्ष लगे रहें हैं| इसी दर से अब तक प्रस्तुत 250 रिपोर्टों पर अगले 2500 वर्षों में कार्यवाही हो पाएगी और तब तक परिस्थितियाँ और परिदृश्य ही बदल चुका होगा तथा वे सभी रिपोर्टें अप्रासंगिक रह जाएँगी| यह हमारे लोकतंत्र की गति और प्रगति (अथवा दुर्गति) है जिसमें जब तक प्रत्येक लोक सेवक की स्पष्ट जिम्मेदारी तय करनेवाला कानून लागू नहीं होगा, संविधान सहित सभी अन्य कानून मात्र कागजी ही रहेंगे और जनता इस भूल-भूलैया में चक्कर खाती रहेगी |   


अभी सूचना का अधिकार अधिनियम के विषय में भी सरकार बड़ी वाही-वाही लूटने का प्रयास कर रही है और कुछ अपरिपक्व बुद्धिवाले नागरिक भी इस कानून को एक मील के पत्थर के रूप में महिमा मंडित कर रहे हैं| यह सही है कि इस अधिनियम के बाद सरकारी मशीनरी ने कागजों को संभालना शुरू कर दिया है किन्तु इससे अधिक कुछ नहीं हुआ है| लगभग एक हजार आवेदन के बाद मेरा विचार है कि आम नागरिक को मात्र पंद्रह प्रतिशत मामलों में ही वांछित सूचनाएं मिलती हैं और शेष मामलों में कोई सूचना नहीं मिलती चाहे किसी स्तर पर अपील दाखिल कर दें| प्रभावशाली लोग तो वैध या अवैध ढंग से पहले भी सूचनाएं लेते रहे हैं व आज भी ले रहे हैं| अधिनियम के प्रभाव से नागरिकों को कागज तो खूब मिलते हैं पर उनमें उपयोगी सूचनाएं अधिक नहीं होती हैं| अधिनियम में तीस दिन में सूचना देने की कल्पना की गयी थी किन्तु सूचना नहीं देने पर कई महीनों तक आयोगों में मामले दर्ज ही नहीं किये जाते हैं और निर्णय आने में वर्षों लग जाते हैं| पुलिस थानों की ही भांति सूचना आयोगों का भी विचार है कि मामले तुरंत दर्ज करने पर उनके पास बकाया का अम्बार दिखाई देगा अत: मामलों को दर्ज नहीं करके आयोग की झूठी सुन्दर और लोकलुभावन छवि पेश की जाये कि आयोग में बहुत कम मामले बकाया हैं और आयोग दक्षता पूर्वक कार्य कर रहा है| अब विद्वान् पाठकगण स्वयं निर्णय करें कि देश में विधायिका, न्यायपालिका अथवा कार्यपालिका में से कौनसा ऐसा तंत्र है जो मनमर्जी नहीं कर रहा अर्थात पुलिस थाने की तरह व्यवहार नहीं कर रहा है| मेरे विचार से तो सभी शक्तिसंपन्न लोग लोकतंत्र रुपी द्रोपदी का चीर हरने के लिए आतुर हैं|        

Sunday, 21 July 2013

भ्रष्ट शासन व्यवस्था की बुनियाद

ब्रिटिश साम्राज्य के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए गवर्नर जनरल ने भारतियों पर विभिन्न कानून थोपे थे| यह स्वस्प्ष्ट है कि भारत में राज्य पदों पर बैठे लोग तत्कालीन ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतिनिधि थे और उनका मकसद कानून बनाकर जनता को न्याय सुनिश्चित करना नहीं बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार करना, उसकी पकड को मजबूत बनाए रखना था और बदले में अच्छे वेतन-भत्ते, सुख-सुविधाएँ व वाही-वाही लूटना था| इसी कूटनीति के सहारे ब्रिटेन ने लगभग पूरे विश्व पर शासन स्थापित कर लिया था और एक समय ऐसा था जब ब्रिटिश साम्राज्य में कभी भी सूर्यास्त नहीं होता था अर्थात उत्तर से दक्षिण व पूर्व से पश्चिम तक उनका ही साम्राज्य दिखाई देता था| उनके साम्राज्य के पूर्वी भाग में यदि सूर्यास्त हो रहा होता तो पश्चिम में सूर्योदय हो रहा होता था| इसी क्रम में बेंजामिन फ्रेंक्लिन ने ब्रिटिश सम्राट व मंत्रियों को भी ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार हेतु कूटनीतिक मूल मन्त्र दिया था| बेंजामिन फ्रेंक्लिन ने ऐसा ही सुझाव देते हुए कहा था कि यदि प्रजाजन स्वतन्त्रता की मांग करें, परिवर्तनकारी विचारों का पोषण करें तो उन्हें दण्डित करें| वे चाहे कितना ही शांतिपूर्ण ढंग से जीवन यापन करें, शासन के प्रति अपना लगाव रखें, धैर्यपूर्वक आपके अत्याचारों को सहन करें तो भी उन्हें क्रांतिकारी ही समझें उनसे गोलियों और डंडे से निपटें और दबाये-कुचले रखें| यद्यपि शासन की शक्ति लोगों के विचारों पर निर्भर करती है किन्तु राजा की इच्छा को सर्वोपरि समझें| यदि आप अच्छे और बुद्धिमान लोगों को वहां गवर्नर बनाकर भेजेंगे तो वे समझेंगे कि उनका राजा अच्छा है और उनका भला चाहता है| यदि आप विद्वान और सही लोगों को वहां जज नियुक्त करोगे तो लोग समझेंगे कि राजा न्यायप्रिय है|इसलिए आप इन पदों पर नियुक्ति करने में सावधानी बरतें|
यदि आप कुछ हारे हुए जुआरियों, सटोरियों व फिजूलखर्ची लोगों को वहां गवर्नर बनकर भेजें तो वे इस पद के लिए बड़े उपयुक्त होंगे क्योंकि लोगों का शोषण कर वे उन्हें उद्वेलित करेंगे| झगडालू और अनावश्यक बहसबाजी  करने वाले वकीलों को भी न भूलें क्योंकि वे अपनी छोटी सी संसद में हमेशा विवाद खडा करते रहेंगे| अटोर्नी क्लर्क और नए वकील मुख्य न्यायाधीश के पद के लिए बड़े माफिक रहेंगे और वे आपके विचारों से प्रभावित रहेंगे| इन प्रभावों की पुष्टि और गहरे प्रभाव  के लिए, जब कभी भी कोई पीड़ित कुप्रबन्ध, उत्पीडन या अन्याय  की शिकायत लेकर आये तो ऐसे लोगों को भरपूर देरी, खर्चे से जेरबार कर और अंतत: पीड़ित करने वाले के पक्ष में निर्णय देकर शिकायतकर्ता को ही दण्डित करें| ऐसा करने का यह सुप्रभाव होगा कि भविष्य में होने वाली शिकायतों और मुकदमों पर स्वत: अंकुश लगेगा तथा स्वयम गवर्नर और जज, अन्याय व उत्पीडन करने के लिए आगे और प्रेरित होंगे जिससे लोग हताश होंगे| जब ऐसे गवर्नर यह महसूस करने लगें कि वे लोगों के बीच सुरक्षित नहीं रह सकते तो उन्हें वापिस बुला लिया जाये और उन्हें पेंशन से नवाजें | इससे नए गवर्नर भी यही मार्ग अपनाने को प्रेरित होंगे और सर्वोच्च सरकार को स्थायित्व प्रदान करेंगे|
जनता पर नए नए कर लगायें| जब जनता अपनी संसद को शिकायत करें कि उन पर ऐसी संस्था कर लगा रही है जहां उनका कोई प्रतिनिधित्व ही नहीं है और यह सामान्य अधिकारों के विपरीत है| वे अपनी शिकायतों के निवारण के लिए प्रार्थना करेंगे |संसद को उनके दावों को ख़ारिज करने दें और यहाँ तक कि उनकी प्रार्थनाओं को पढने से ही मना कर दें, और प्रार्थियों के साथ उल्लंघनकारी की तरह बर्ताव करें| इस सब को सुकर बनाने के लिए ऐसे जटिल और अंतहीन कानून बनायें कि उनकी पालना और याद रखना असंभव हो| जनता की प्रत्येक विफलता के लिए उनकी सम्पति जब्त करें| ऐसी सम्पति के दावों के मुकदमों को जूरी से वापिस लेलें और इसे ऐसे मनमाने जजों को सौंपें जिन्हें आपने नियुक्त किया हो तथा जो देश में निकृष्टतम चरित्र वाले हो व जिनके वेतन भत्ते इस सम्पति की कीमत से जुड़े हों व उनका कार्यकाल आपकी कृपा पर निर्भर हो|
बेंजामिन ने आगे यह परामर्श दिया कि तब यह भी घोषणा कर दें कि आपके आदेशों की अवहेलना देशद्रोह होगा और ऐसा करनेवाले संदिग्ध लोगों को पकड़कर सम्राट के न्यायालय में सुनवाई के लिए लन्दन भेज दें| सेना का एक नया न्यायालय बना दें जिसे निर्देश हों कि ऐसे लोग यदि अपनी निर्दोषिता की कोई गवाही देना चाहें तो उन्हें खर्चे से बर्बाद कर दें और यदि वे ऐसा न कर सकें तो उन्हें फांसी पर लटका दें| ऐसा करने से लोगों को यह विश्वास हो जाएगा कि यह कोई ऐसी शक्ति है जिसका धर्म ग्रंथों में उल्लेख हो जो न केवल उनके शरीर बल्कि उनकी आत्मा को ही मार देगी| लोगों पर कर लगाने के लिए, जहां तक संभव हो सबसे घटिया दर्जे के उपलब्ध निकृष्टतम लोगों का बोर्ड बनाकर भेजें| इन लोगों के वेतन-भत्ते, सुख-सुविधाएँ मेहनतकश जनता के खून पसीने  की कमाई के शोषण से उपजते हों क्योंकि राजा ने कोई खर्चा नहीं देना है | ऐसे  लोगों के सभी वेतन-भत्ते, सुख सुविधाओं पर कोई कर न लगे और इनकी सम्पति कानूनन सुरक्षित रहे| यदि किसी राजस्व अधिकारी पर जनता के प्रति नरमी का ज़रा भी संदेह हो तो उसे तुरंत निकाल फेंके| यदि अन्य राजस्व अधिकारियों के विरूद्ध कोई जायज शिकायत भी हो तो उसका संरक्षण करें| सबसे अच्छा तो यह रहेगा कि कि लोग असंतुष्ट रहें, उनका सम्मान-मनोबल घटे और उनमें पारस्परिक लगाव-प्रेम घटता जाए जिससे आपके लिए शासन करना आसान हो जाएगा|

आज भी भारत में एक सेवानिवृत न्यायाधीश का चित्र गलती से मीडिया द्वारा दिखा दिए जाने से मानहानि की कीमत 100 करोड़ रुपये आंकी जाती है किन्तु हिरासत में मरने वाले व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन का मूल्य ही 2 लाख रूपये आंककर न्यायिक कर्तव्य की बलि दे दी जाती है, वहीं हम कानून का राज होने और स्वतन्त्रता का झूठा दम भरते हैं जबकि समाजवाद व न्याय का सिद्धांत कहता है जिसे जीवन में कम मिला हो उसे कानून में अधिक मिलना चाहिए| क्या हमारे जज और वकील  इसे याद नहीं रख पाते हैं या कुछ अन्य गोपनीय कारण कार्य कर रहे हैं|  भारत की वर्तमान शासन व न्याय व्यवस्था भी हमें अंग्रेजी शासन से विरासत में मिली हुई है और उसका हमने आज तक प्रजातांत्रिकीकरण नहीं किया है- जजों को देवतुल्य मान लिया है- बल्कि पोषण कर इसे आगे बढाया है| अब विद्वान् पाठक स्वतंत्र चिन्तन और मूल्याङ्कन करें कि हमारी विद्यमान व्यवस्था में क्या बेंजामिन द्वारा सुझाई गयी उक्त व्यवस्था से कोई भिन्नता है`, और हमें इसमें कैसे परिवर्तन करने की आवश्यकता है जिससे वास्तविक अर्थों में लोकतंत्र स्थापित हो सके| 




Friday, 7 June 2013

बरामदगी दिखाने व गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी का नार्को टेस्ट व ब्रेन मैपिंग करवाया जाए



पुलिस हिंसा और भ्रष्टाचार की बुनियाद अंग्रेजी साक्ष्य कानून
ब्रिटिश साम्राज्य के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए गवर्नर जनरल ने भारतीय  साक्ष्य अधिनियम 1872 बनाया था| यह स्वस्प्ष्ट है कि राज सिंहासन पर बैठे लोग ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतिनिधि थे और उनका उद्देश्य कानून बनाकर जनता को न्याय सुनिश्चित करना नहीं बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार करना और उसकी पकड को मजबूत बनाए रखना था| आज भी हमारे देश में यही न्यायप्रणाली-परिपाटी  प्रचलित है जिसमें न्याय माँगने वाले को तारीखें मिलती हैं| आज भी देश के न्यायिक अधिकारी, अर्द्ध-पुलिस अधिकारी की तरह व्यवहार करते हैं और गिरफ्तारी का औचित्य ठहराने के लिए वे कहते हैं कि जहां अभियुक्त का न्यायिक प्रक्रिया से भागने का भय हो उसे गिरफ्तार करना उचित है किन्तु जो पुलिस उसे पहले गिरफ्तार कर सकती वह उसे बाद में भी तो ढूंढकर गिरफ्तार कर सकती है| इसी प्रकार न्यायाधीशों का यह भी कहना होता है कि जहां अभियुक्त द्वारा गवाहों या साक्ष्यों से छेड़छाड़ की संभावना हो तो उसकी गिरफ्तारी उचित है| दूसरी ओर राज्यों के पुलिस नियम यह कहते हैं कि अपराध का पता लगने पर पुलिस को तुरंत घटना स्थल पर जाना चाहिए और सम्बंधित दस्तावेजों को बरामद कर लेना चाहिए| ऐसी स्थिति में यदि पुलिस अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं करे उसका दंड अभियुक्त को नहीं मिलना चाहिए क्योंकि संविधान के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति तब तक निर्दोष है जब तक कि उसे उचित परीक्षण में दोषी नहीं ठहरा दिया जाता| ठीक उसी प्रकार जहां साक्ष्यों से छेड़छाड़ की संभावना हो वहां कलमबंद बयान करवाए जा सकते हैं|  किन्तु देश का तंत्र हार्दिक रूप से यह कभी  नहीं चाहता कि दोषी को दंड मिले, अपराधों पर नियंत्रण हो अपितु वे तो स्वयं शोषण करना चाहते हैं|  दूसरा, जहां तक साक्षियों या प्रलेखों के साथ छेड़छाड़ का प्रश्न है, अभियुक्त में हितबद्ध परिवारजन, मित्र आदि भी यह कार्य कर सकते हैं और यहाँ तक देखा गया है कि शक्तिशाली अभियुक्त होने परिवादी पर स्वयम पुलिस दबाव डालती है| तो फिर क्या प्रलेखों और साक्षियों के साथ छेड़छाड़ की संभावना के मद्देनजर इन लोगों को भी गिरफ्तार कर लिया जाए?    

तत्कालीन गवर्नर जनरल का स्थान आज के राष्ट्रपति के समकक्ष था और ये कानून जनता के चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा बनाए गए नहीं बल्कि जनता पर थोपे गए एक तरफ़ा अनुबंध की प्रकृति के हैं| जिस प्रकार राष्ट्रपति द्वारा जारी कोई भी अध्यादेश संसद की पुष्टि के बिना मात्र 6 माह तक ही वैध है उसी सिद्धांत पर ये कानून मात्र 6 माह की सीमित अवधि के लिए लागू रहने चाहिए थे और देश की संसद को चाहिए था कि इन सबकी बारीबारी से समीक्षा करे कि क्या ये कानून जनतांत्रिक मूल्यों को प्रोत्साहित करते हैं|  खेद का विषय है कि आज स्वतंत्र भारत में भी उन्हीं कानूनों को ढोया जा रहा है और उनकी समसामयिक प्रासंगिकता पर देश के संकीर्ण सोचवाले जन प्रतिनिधि और न्यायविद कभी भी प्रश्न तक नहीं उठा रहे हैं| अभी हाल ही यशवंत सिन्हा ने राजस्थान पत्रिका को दिए एक साक्षात्कार में कहा है कि दंड संहिता के आधार पर तो अंग्रेज देश में सौ साल तक शासन कर गए किन्तु विद्वान् श्री सिन्हा यह भूल रहे हैं कि शासन करने और सफल प्रजातंत्र के कार्य में जमीन-आसमान  का अंतर होता है| शासन चलाने में जनता का हित-अहित नहीं देखा जाता बल्कि कुर्सी पर अपनी पकड़ मात्र मजबूत करनी होती है| इससे हमारे जन प्रतिनिधियों की दिवालिया और गुलाम मानसिकता का संकेत मिलता है|

सिद्धांतत: संविधान लागू होने के बाद देश के नागरिक ही इस प्रजातंत्र के स्वामी हैं और सभी सरकारी सेवक जनता के नौकर हैं किन्तु इन नौकरों को नागरिक आज भी रेत में रेंगनेवाले कीड़े-मकौड़े जैसे नजर आते हैं| देश का शासन आज भी कानून से नहीं बल्कि इनके आशीर्वाद से चलता है| यह आशीर्वाद स्वामीभक्तों  और प्रसाद चढाने वालों को  सुलभ है| इसी कूटनीति के सहारे ब्रिटेन ने लगभग पूरे विश्व पर शासन किया है और एक समय ऐसा था जब ब्रिटिश साम्राज्य में कभी भी सूर्यास्त नहीं होता था अर्थात उत्तर से दक्षिण व पूर्व से पश्चिम तक उनका साम्राज्य विस्तृत था| उनके साम्राज्य में यदि पूर्व में सूर्यास्त हो रहा होता तो पश्चिम में सूर्योदय होता था| यह बात अलग है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सम्पूर्ण विश्व स्तर पर ही स्वतंत्रता की मांग बलवती होने लगी तो उन्हें धीरे- धीरे सभी राष्ट्रों को मुक्त करना पड़ा जिसमें 1947 में संयोग से भारत की भी बारी आ गयी| किन्तु भारत की शासन प्रणाली में आज तक कोई परिवर्तन नहीं आया है क्योंकि आज भी 80 प्रतिशत से ज्यादा वही कानून लागू हैं जो ब्रिटिश सरकार ने अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए बनाए थे| ये कानून जनतंत्र के दर्शन पर आधारित नहीं हैं और न ही हमारे सामाजिक ताने-बाने और मर्यादाओं से निकले हैं| प्रजातंत्र में कानून समाज के लिए बनाए जाते हैं जबकि राजतन्त्र में समाज कानून मानने के लिए बाध्य होता है| सभ्य समाज में कानून सामाजिक नियंत्रण का साधन है और यह आचरण की लक्ष्मण रेखा है| कानून का उद्देश्य प्रत्येक को उसका वाजिब हक़ देना है| जब भी समाज या व्यक्ति के विरुद्ध कोई अनुचित कार्य किया जाए तो कानून हरकत में आता है| राज्य का यह कर्तव्य है कि वह अपराधियों से समाज की रक्षा करे| इस प्रकार अपराधों को राज्य के विरुद्ध माना जाता है और राज्य द्वारा अभियोजक की नियुक्ति की जाती है|     

दूसरा, एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि यदि यही कानून जनतंत्र के लिए उपयुक्त होते तो ब्रिटेन में यही मौलिक कानून दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता, दीवानी प्रक्रिया संहिता और साक्ष्य कानून आज भी लागू होते| किन्तु ब्रिटेन में समस्याओं को अविलम्ब निराकरण किया जाता है और वहां इस बात की प्रतीक्षा नहीं की जाती कि चलती बस में दुष्कर्म होने के बाद कानून बनाया जाएगा| कानून निर्माण का उद्देश्य समग्र और व्यापक होता है तथा उसमें दूरदर्शिता होनी चाहिए व  उनमें विद्यमान धरातल स्तर की सभी परिस्थितियों का समावेश होना चाहिए| कानून मात्र आज की तात्कालिक समस्याओं का ही नहीं बल्कि संभावित भावी और आने वाली पीढ़ियों की चुनौतियों से निपटने को ध्यान में रखते हुए बनाए जाने चाहिए| इनमें  सभी पक्षकारों के हितों का ध्यान रखते हुए संतुलन के साथ दुरूपयोग की समस्या से निपटने की भी समुचित व्यवस्था होनी चाहिए| किसी भी कानून का दुरूपयोग पाए जाने पर बिना मांग किये दुरूपयोग से पीड़ित व्यक्ति को उचित और वास्तविक क्षतिपूर्ति और दुरुपयोगकर्ता को समुचित दंड ही न्याय व्यवस्था में वास्तविक सुधार और संतुलन ला सकता है|  अब तो सरकार को कोई भी कानून बनाने से पहले इस कटु सत्य को ध्यान रखना चाहिए कि न्यायपालिका सहित उसकी  सम्पूर्ण व्यवस्था ही भ्रष्ट और चौपट है|

भारत के विधि आयोग ने हिरासती हिंसा विषय पर दी गयी अपनी 152 वीं रिपोर्ट दिनांक 26.08.1994 में यह चिंता व्यक्त की है कि इसकी जड़ साक्ष्य कानून की विसंगतिपूर्ण धारा 27 में निहित है| साक्ष्य कानून में यद्यपि यह प्रावधान है कि  हिरासत में किसी व्यक्ति द्वारा की गयी कबुलियत स्वीकार्य नहीं है| यह प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20 के अनुरूप है किन्तु उक्त धारा में इससे विपरीत प्रावधान है कि यदि हिरासत में कोई व्यक्ति किसी बरामदगी से सम्बंधित कोई बयान देता है तो यह स्वीकार्य होगा | कूटनीतिक शब्दजाल से बनायी गयी इस धारा को चाहे देश के न्यायालय शब्दश: असंवैधानिक न ठहराते हों किन्तु यह मौलिक भावना और संविधान की आत्मा के विपरीत है|
पुलिस अधिकारी अपने अनुभव, ज्ञान, कौशल से इस बात को भलीभांति जानते हैं कि इस प्रावधान के उपयोग से वे अनुचित तरीकों का प्रयोग करके ऐसा बयान प्राप्त कर सकते हैं या बनावटी कथन गढ़ सकते हैं जो स्वयं अभियुक्त के विरुद्ध प्रभाव रखता हो| यह एक बड़ी अप्रिय स्थिति है कि इस धारा के प्रभाव से शरारत की जा सकती है और इसके बल पर कबुलियत की रचना की जा सकती है| यदि हमें ईमानदार कानून की अवधारणा को आगे बढ़ाना हो तो इस कानून में आमूलचूल परिवर्तन करना पडेगा| भारतीय न्याय प्रणाली का यह सिद्धांत रहा है कि चाहे हजार दोषी छूट जाएँ लेकिन एक भी निर्दोष को को दंड नहीं मिलना चाहिए जबकि यह धारा इस सुस्थापित सिद्धांत के ठीक विपरीत प्रभाव रखती है|  भारत यू एन ओ का सदस्य है और उसने उत्पीडन पर अंतर्राष्ट्रीय संधि पर काफी पहले ही दिनांक 14.10.1997 को हस्ताक्षर कर दिये हैं और यह संधि भारत सरकार पर कानूनी रूप से बाध्यकारी प्रभाव रखती है तथा साक्ष्य कानून की धारा 27 इस संधि के प्रावधानों के विपरीत होने के कारण भी अविलम्ब निरस्त की जानी चाहिए| किन्तु इतिहास साक्षी है कि देश के नेता कोई ठोस रचनात्मक और टिकाऊ मौलिक परिवर्तनकारी कार्य करने के स्थान पर किसी मार्ग, भवन, विश्वविद्यालय, नहर, नगर या प्रान्त का नाम बदल कर सीधी साधी जनता से सस्ती लोकप्रियता लूटने का प्रयास करते हैं|

स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने डी के बासु के प्रसिद्ध मामले में कहा है कि मानवाधिकारों का सबसे बड़ा उल्लंघन अनुसंधान में उस समय होता है जब पुलिस कबूलियत के लिए या साक्ष्य प्राप्त करने के लिए थर्ड डिग्री तरीकों का इस्तेमाल करती है| हिरासत में उत्पीडन और मृत्यु इस सीमा तक बढ़ गए हैं कि कानून के राज और आपराधिक न्याय प्रशासन की विश्वसनीयता दांव पर लग गयी है| विधि आयोग ने आगे भी अपनी रिपोर्ट संख्या 185 में इस प्रावधान पर प्रतिकूल दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है| यद्यपि पुलिस के इन अत्याचारों को किसी भी कानून में कोई स्थान प्राप्त नहीं है और स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने  रामफल कुंडू बनाम कमल शर्मा के मामले में कहा है कि कानून में यह सुनिश्चित है जब किसी कार्य के लिए कोई शक्ति दी जाती है तो वह ठीक उसी प्रकार प्रयोग की जानी चाहिए अन्यथा बिलकुल नहीं और अन्य तरीके आवश्यक रूप से निषिद्ध हैं|

यद्यपि पुलिस को हिरासत में अमानवीय कृत्य का सहारा लेने का कोई अधिकार नहीं है किन्तु उक्त धारा की आड़ में पुलिस वह सब कुछ कर रही है जिसकी करने की उन्हें कानून में कोई अनुमति नहीं है और पुलिस इसे अपना अधिकार मानती है| दूसरी ओर भारत में पशुओं पर निर्दयता के निवारण के लिए 1960 से ही कानून बना हुआ है किन्तु मनुष्य जाति पर निर्दयता के निवारण के लिए हमारी विधायिकाओं को कोई कानून बनाने के लिये आज तक फुरसत नहीं मिली है| यह भी सुस्थापित है कि कोई भी व्यक्ति किसी प्रेरणा या भय के बिना अपने विरुद्ध किसी भी तथ्य का रहस्योद्घाटन नहीं करेगा अत: पुलिस द्वारा अभियुक्त से प्राप्त की गयी सूचना मुश्किल से ही किसी बाहरी प्रभाव के बिना हो सकती है| सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब राज्य बनाम बलबीर सिंह (1994 एआईआर 1872) में कहा है कि यदि अभिरक्षा में एक व्यक्ति से पूछताछ की जाती है तो उसे सर्वप्रथम स्पष्ट एवं असंदिग्ध शब्दों में बताया जाना चाहिए उसे चुप रहने का अधिकार है। जो इस विशेषाधिकार से अनभिज्ञ हो उन्हें यह चेतावनी प्रारम्भिक स्तर पर ही दी जानी चाहिए। ऐसी चेतावनी की अन्तर्निहित आवश्यकता पूछताछ के दबावयुक्त वातावरण पर काबू पाने के लिए है। किन्तु इन निर्देशों की अनुपालना किस प्रकार सुनिश्चित की जा रही है कहने की आवश्यकता नहीं है|


साक्ष्य कानून के उक्त प्रावधान से पुलिस को बनावटी कहानी गढ़ने और फर्जी साक्ष्य बनाने के लिए खुला अवसर उपलब्ध होता है| कुछ वर्ष पहले ऐसा ही एक दुखदायी मामला नछत्र सिंह का सामने आया जिसमें पंजाब पुलिस ने फर्जीतौर पर खून से रंगे हथियार, कपडे और गवाह खड़े करके 5 अभियुक्तों को एक ऐसे व्यक्ति की ह्त्या के जुर्म में सजा करवा दी जो जीवित था और कालान्तर में पंजाब उच्च न्यायालय में उपस्थित था| पुलिस की बाजीगरी की कहानी यहीं समाप्त नहीं होती अपितु अन्य भी ऐसे बहुत से मामले हैं जहां बिलकुल निर्दोष व्यक्ति को फंसाकर दोषी ठहरा दिया जाता है और तथाकथित रक्त से रंगे कपड़ों  आदि की जांच में पाया जाता है कि वह मानव खून ही नहीं था अपितु किसी जानवर का खून था अथवा लोहे के जंग के निशान थे| इसी प्रकार पुलिस (जो सामान उनके पास उचंती तौर पर जब्ती से पडा रहता है) अन्य मामलों में भी अवैध हथियार, चोरी आदि के सामान की फर्जी बरामदगी दिखाकर अपनी करामत दिखाती है, वाही वाही लूटती है और पदोन्नति और प्रतिवर्ष पदक भी पाती है| नछत्र सिंह के उक्त मामले में पाँचों अभियुक्तों को रिहा करते हुए उन्हें एक करोड़ रुपये का मुआवजा दिया गया किन्तु इस धारा के दुरुपयोग को रोकने के लिए न ही तो यह कोई स्वीकार्य उपाय है और स्वतंत्रता के अमूल्य अधिकार को देखते हुए किसी भी मौद्रिक क्षतिपूर्ति से वास्तव में हुई हानि की पूर्ति नहीं हो सकती| इस प्रकरण में एक अभियुक्त ने तो  सामाजिक बदनामी के कारण आत्म ह्त्या भी कर ली थी| पुलिस के अनुचित कृत्यों से मात्र एक व्यक्ति के जीवन का महत्वपूर्ण भाग ही नहीं अपितु सम्पूर्ण परिवार इस प्रकार बर्बाद हो जाता है, व्यक्ति आर्थिक रूप से जेरबार हो जाता है, परिवार छिन्नभिन्न हो जता है, उसका भविष्य अन्धकार में लीन  हो जाता है और दोष मुक्त होने के बावजूद भी यह झूठा कलंक उसका जीवन भर पीछा नहीं छोड़ता है| समाज में उसे अपमान की दृष्टि से देखा जाता है महज इस कारण की कि साक्ष्य कानून के उक्त प्रावधान ने पुलिस के क्रूर हाथों में इसका दुरूपयोग करने का हथियार उपलब्ध करवाया|
वर्तमान कानून में परीक्षण पूर्ण होने पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के अंतर्गत न्यायाधीश अभियुक्त से स्पष्टीकरण माँगता है और अभियुक्त अपना पक्ष रख सकता है किन्तु उसकी यह परीक्षा न तो शपथ पर होती है और न ही उसकी प्रतिपरीक्षा की जा सकती | अत: यह बयान सामान्य बयान की तरह नहीं पढ़ा जाता और न ही बयान की तरह मान्य होता है | एक अभियुक्त भी सक्षम साक्षी होता है और जहां वह बिलकुल निर्दोष हो वहां स्वयं को साक्षी के तौर पर प्रस्तुत कर अपनी निर्दोषिता सिद्ध कर सकता है| चूँकि साक्षी के तौर पर दिए गए उसके बयान पर प्रतिपरीक्षण हो सकता है अत; यह बयान मान्य है| किन्तु भारत में इस प्रावधान का उपयोग करने के उदाहरण ढूढने से भी मिलने मुश्किल हैं |  धारा 27 का दुरूपयोग रोकने का एक अन्य विकल्प भी हो सकता| कानून सभी के लिए समान है अत: धारा 27 की आड़ में बरामदगी दिखाने व गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी और अभियुक्त दोनों का नार्को टेस्ट व ब्रेन मैपिंग  करवाया जाए ताकि वास्तविकता सामने आ सके कि  साक्ष्य किस प्रकार प्राप्त किया गया है| यदि पुलिस अधिकारी  इस हेतु सहमत नहीं हो तो इसे उसके विरुद्ध पढ़ा जाय|

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161  के अंतर्गत पुलिस को दिए गए बयानों को धारा 162 में न्यायालयों में मान्यता नहीं दी गयी है| देश की विधायिका को भी इस बात का ज्ञान है कि पुलिस थानों में नागरिकों के साथ किस प्रकार अभद्र व्यवहार किया जाता है इस कारण धारा 161 के बयानों के प्रयोजनार्थ महिलाओं और बच्चों के बयान लेने के लिए उन्हें थानों में बुलाने पर 1973 की संहिता में प्रतिबन्ध लगाया गया है जोकि 1898 की अंग्रेजी संहिता में नहीं था| प्रश्न यह है कि जिस पुलिस से महिलाओं और बच्चों के साथ सद्व्यवहार की आशा नहीं है वह अन्य नागरिकों के साथ कैसे सद्व्यवहार कर सकती है या उन्हें पुलिस के दुर्व्यवहार को झेलने के लिए क्यों विवश किया जाए|  इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश आनंद नारायण मुल्ला ने पुलिस को देश का सबसे बड़ा अपराधी समूह बताया था और हाल ही तरनतारन (पंजाब) में एक महिला के साथ सरेआम मारपीट के मामले में स्वयं सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने  टिपण्णी की थी कि पुलिस में सभी नियुक्तियां पैसे के दम पर होती हैं| सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली ज्युडीसियल  सर्विस के मामले में भी कहा है कि पुलिस अधिकारियों पर कोई कार्यवाही नहीं करने से यह संकेत मिलता है कि गुजरात राज्य में पुलिस हावी है अत: दोषी पुलिस कर्मियों पर कार्यवाही करने से प्रशासन हिचकिचाता है| कमोबेश यही स्थिति सम्पूर्ण भारत की है और इससे पुलिस की कार्यवाहियों की विश्वसनीयता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है| 


महानगरों में फुटपाथों, रेलवे  आदि पर मजदूरी करनेवाले, कचरा बीनने वाले गरीब बच्चे इस धारा के दुरूपयोग के सबसे ज्यादा शिकार होते हैं| अत: इस धारा को अविलम्ब निरस्त करने की आवश्यकता है जबकि पुलिस और अभियोजन यह कुतर्क दे सकते हैं कि एक अभियुक्त को दण्डित करने के लिए यह एक कारगर उपाय है| किन्तु वास्तविक स्थिति भिन्न है| आस्ट्रेलिया के साक्ष्य कानून में इस प्रकार  का कोई प्रावधान नहीं है फिर भी वहां दोष सिद्धि की दर- मजिस्ट्रेट मामलों में 6.1 प्रतिशत और जिला न्यायालयों के मामलों में 8.2 प्रतिशत है वहीँ भारतीय विधि आयोग अपनी 197 वीं रिपोर्ट में भारत में मात्र 2 प्रतिशत दोषसिद्धि की दर पर चिंता व्यक्त कर चुका है| इस प्रकार पुलिस और अभियोजन की यह अवधारणा भी पूर्णत: निराधार और बेबुनियाद है| पुलिस को अब उत्पीडन आधारित अन्ग्रेजी कालीन तरीकों का परित्याग कर साक्ष्य और अनुसन्धान के आधुनिक एवं उन्नत तरीकों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए| न्यायशास्त्र का यह भी सिद्धांत है कि साक्ष्यों को गिना नहीं अपितु उनकी गुणवता देखी जानी चाहिए| ऐसी स्थिति में पुलिस द्वारा इस प्रकार गढ़ी गयी साक्ष्यों का मूल्याङ्कन किया जाना चाहिए|  वर्तमान में 1872 का विद्यमान  भारतीय साक्ष्य कानून समयातीत हो गया है और यह समसामयिक चुनौतियों का सामना करने में विफल है|



Tuesday, 14 May 2013

DISMAL DISPOSAL OF PUBLIC GRIEVANCES IN INDIA



PG PORTAL INDIA -Department Wise Report For Year     2012


AS ON 09/05/2013





r--
Brought Forward
Received
Disposed
Pending} as on
Pending as
Department Name
as on 01/01/ 2012
During
2012
During
2012
31/121 012
on now







09/05/2013
Ministry of Corporate Affairs
549
1,523

1,100

972
1,661
Department of Defence - Ex Servicemen
565
1,790

12

2,343
3,141
Welfare







Department of Defence Production
252
286

86

452
568
Department of Defence Research and
190
144

230

104
99
Development







Department of Justice
2,719
1,191

2,309

1,601
1,804
Department of Heavy Industry
105
208

227

86
46
Ministry of Health & Family Welfare
2,067
2,464

2,127

2,404
2,032
Department of Legal Affairs
90
379

329

140
161
Department of Agriculture and Cooperation
191
299

344

146
154
Department of Animal Husbandry and
291
103

222

172
111
Dairying







Department of Agriculture Research and
410
109

297

222
14
Education







Department of Consumer Affairs
799
2,584

1,736

1,647
2,002
Department of Commerce
251
438

582

107
93
Department of Chemicals and
26
150

160

16
23
Petrochemicals







Department of Drinking Water and Sanitation
11
271

254

28
108
Department of Food and Public Distribution
1,303
469

1,583

189
149
Ministry of Food Processing Industries
50
57

0

107
55
Department of Fertilizers
44
65

55

54
65
Department of Industrial Policy & Promotion
97
269

259

107
251


Department of Land Resources
41
101
2
140
23
~






Ministry of Development of North Eastern
0
24
24
0
0
Region






Department of Rural Development
108
603
512
199
309
Department of School Education and Literacy
431
760
1
1,190
2,035
Department of Telecommunications
3,155
31,086
30,690
3,551
3,596
Ministry of Urban Development
1,354
1,434
1,834
954
984
Ministry of Women and Child Development
43
364
332
75
118
Planning Commission
161
355
89
427,
667
Department of Posts
1,699
4,756
4,325
2,130
1,594
Department of Public Enterprises
5
219
219
5
43
Ministry of Human Resource Development
6,257
3,085
1,328
8,014
9,085
Department of Tourism
66
345
221
190
288
Department of Defence Finance
210
1,120
1,111
219
328
-






Legislative Department
20
85
55
50
96
Ministry of Coal
671
330
834
167
183
Ministry of External Affairs
6,278
5,402
2,251
9,429
10,390
Ministry Of External Affairs (South Block)
724
587
265
1,046
1,117
Ministry of Housing and Poverty Alleviation
36
102
114
24
52
Ministry of Home Affairs
3,629
4,166
3,007
4,788
5,631
Department of Information Technology
56
886
881
61
91
Ministry of Parliamentary Affairs
86
219
151
154
204


3

Ministry of Water Resources
227
278
307
198
188
~






Ministry of Micro Small and Medium
162
216
120
258
321
Enterprises






Ministry of Non-Conventional Energy
0
15
0
15
19
Sources






Ministry of Agro and Rural Industries
21
21
0
42
54
Ministry of Civil Aviation
609
1,516
561
1,564
1,659
Department of Defence
8,578
3,147
2,726
8,999
9,688
Ministry of Environment and Forests
777
447
186
1,038
1,144
Ministry of Information and Broadcasting
874
1,502
1,217
1,159
1,378
Ministry of Labour and Employment
3,269
2,872
3,576
2,565
2,961
Ministry of Overseas Indian Affairs
391
345
148
588
651
Ministry of Panchayati Raj
9
145
152
2
2
Ministry of Road Transport and Highways
2,274
1,041
1,733
1,582
1,509
Ministry of Statistics and Programme
159
106
165
100
96
Implementation






Ministry of Small Scale Industries
84
17
0
101
118
/






Ministry of Youth Affairs and Sports
378
191
321
248
208
Ministry of Planning
186
152
0
338
456
Ministry of Power
183
577
600
160
166
Ministry of Shipping
,534
254
216
572
663
Ministry of Tribal Affairs
80
91
67
104
127
National Human Rights Commission
3
0
0
3
6
Reserve Bank of India
749
2,093
1,431
1,411
645


Department Wise Report For Year


2012


09/05/2013





..---
Brought Forward
Received
Disposed
pending} as on
Pending as
Department Name
as on 01/01/ 2012
During
2012
During
2012
31/12/ 012
on now








09105/2013
Department of Administrative Reforms and
55
412

346

121
525
PG








BSES Rajdhani / Yamuna Power Ltd
43
13

~


52
53
Cabinet Secretariat
145
657

10

792
806
0/0 the Comptroller & Auditor General of
605
318

674

249
297
India








C.B.!.
48
1

0


49
60
Central Board of Direct Taxes (Income Tax)
3,018
7,603

5,733

4,888
5,503
(0/0 Revenue)








Central Board of Excise and Customs
620
1,926

2,078

468
360
Committee on Petitions Rajya Sabha
0
0

0

0
1
Department of Atomic Energy
162
294

369

87
122
Department of Bio Technology
12
41

45

8
13
Ministry of Culture
199
147

90

256
495
Delhi Development Authority
499
185

246

438
486
Department of Financial Services (Banking
8,036
7,831

10,896

4,971
5,776
Division)








Insurance Division
418
1,253

647

1,024
1,023
Delhi Transco Limited
4
1

0

5
5
Ministry of Earth Sciences
18
65

76

7
36
Department of Disinvestment(M/o Finance)
4
107

87

24
83
Department of Economic Affairs
478
408


560

326
359
Department of Expenditure
210
196


292

114
44




,








Department of Personnel and Training
1,476
1,520
1,997
999
1,204

r-







Department of Pension and Pensioners
32,653
7,012
20,782
18,883
16,270

Welfare







Department of Revenue
784
673
598
859
515

Department of Science and Technology
282
298
325
255
281

Department of Scientific & Industrial
145
79
44
180
161

Research







Delhi Police
643
363
580
426
482

Department of Pharmaceutical
12
138
105
45
50

Department of Space
149
90
155
84
96

Delhi Transport Corporation
1
6
3
4
6

Investment Grievance Redress Cell
20
0
0
20
20

Government of NCT of Delhi
4,367
2,477
2,111
4,733
5,637

Municipal Corporation of Delhi
1,804
604
1,019
1,389
1,420

Ministry of Mines
505
258
370
393
247

Ministry of Minority Affairs
43
123
79
87
105

Ministry of New and Renewable Energy
4
65
65
4
3

Ministry of Railways, ( Railway Board)
9,856
11,186
13,989
7,053
7,189

Ministry of Social Justice and Empowerment
714
656
545
825
662

Ministry of Steel
48
229
258
19
30

Ministry of Petroleum and Natural Gas
673
3,249
2,720
1,202
1,115

Ministry of Textiles
164
223
224
163
132

New Delhi Municipal Council
5
7
10
2
3







Department Wise Report For Year

2012

09/05/2013


Brought Forward
Received
Disposed
Pending} as on
Pending as
Department Name
as on 01/01/ 2012
During
2012
During
2012
31/12/ 012
on now







09/05/2013
Government of Andaman & Nicobar
141
55

19

177
217
Government of Andhra Pradesh
4,621
2,524

18

7,127
7,896
Government of Arunachal Pradesh
113
42

26

129
137
Government of Assam
500
261

16

745
833
Government of Bihar
1,409
767

26

2,150
2,469
Government of Union Territory of Chandigarh
323
83

6

400
436
Government of Chattisgarh
171
202

138

235
293
Government of Union Territory of Dadar&
32
9

5

36
40
Nagar Haveli







Government of Union Territory of Daman &
67
10

27

50
52
Diu







Government of Guiarat
2,351
1,229

1,877

1,703
2,082
Government of Goa
112
84

94

102
123 .
Government of Himachal Pradesh
382
172

5

549
603
Government of Haryana
3,061
1,108

25

4,144
4,486
Government of Jharkhand
859
339

20

1,178
1,297
Government of Jammu & Kashmir
607
327

27

907
1,010
Government of Kerala
2,153
515

6

2,662
2,777
Government of Karnataka
4,549
1,199

27

5,721
6,079
Government of Union Territory of
55
14

13

56
60
Lakshadweep







Government of Meghalaya
56
33

3

86
95








Government of Maharashtra
9,077
3,025
60
12,042
13,050
r-





GOvernment of Manipur
87
22
6
103
113
Government of Madhya Pradesh
2,046
1,085
380
2,751
3,068
Government of Mizoram
26
19
2
43
45
Government of Nagaland
48
26
8
66
69
Government of Odisha
1,125
694
10
1,809
2,010
Government of Punjab
1,857
1,118
18
2,957
3,323
Government of Puducherry
343
113
24
432
430
Government of Rajasthan
2,220
1,225
133
3,312
3,598
Government of Sikkim
51
24
0
75
80
Government of Tamil Nadu
8,738
3,933
275
12,396
4,274
Government of Tripura
103
52
2
153
178
Government of Utlarakhand
904
505
12
1,397
1,975
Government of Uttar Pradesh
7,049
3,198
121
10,126
11,424
Government of West Bengal
3,199
1,289
29
4,459
4,976

---- -----