सुप्रीम कोर्ट ने अखिल भारतीय उपभोक्ता कांग्रेस बनाम मध्य प्रदेश राज्य (मनु/सुको /०३४५/२०११) के निर्णय में कहा है कि राज्य या इसकी एजेंसियां राजनैतिक संस्थानों/या राज्याधिकारियों की इच्छानुसार किसी भी व्यक्ति को खैरात या लाभ नहीं दे सकती| ऐसा लाभ सशक्त, पारदर्शी , दृष्टव्य और निश्चित नीतिगत सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए |वर्तमान प्रकरण में भूमि के आरक्षण हेतु एक्स द्वारा मेमोरिअल ट्रस्ट के संयोजक की हैसियत में आवेदन किया गया किन्तु प्रत्यार्थिगण ने कोई भी ऐसा दस्तावेज़ प्रस्तुत नहीं किया जिससे यह स्थापित होता हो कि आवेदन की तिथि को यह ट्रस्ट पंजीकृत था| ३० एकड़ भूमि आरक्षित करने और २० एकड़ भूमि आवंटित करने से पूर्व अखबार में या अन्य किसी उपयुक्त माध्यम में उपयुक्त संस्थानों से आवेदनपत्र आमंत्रित करने हेतु कोई विज्ञापन नहीं दिया गया और प्रत्येक अर्थ में राजनैतिक और राज्य के गैरराजनैतिक कार्यकारियों ने इस प्रकार भूमि को आवंटित किया मानों कि वे मेमोरिअल ट्रस्ट को भूमि आवंटन के कर्ताव्यधीन हों| सभी ट्रस्टी राजनैतिक दल विशेष के सदस्य रहे हैं और भू आरक्षण व आवंटन की समस्त प्रक्रिया और अधिकांश प्रीमियम की छूट इसलिए दी गयी कि राज्य के राजनैतिक कार्यकारी प्रत्यर्थी संख्या का ५ का पक्षपोषण करना चाहते थे| अतः आक्षेपित भूमि का प्रत्यर्थी संख्या ५ को आवंटन संविधान के अनुच्छेद १४ और मध्य प्रदेश नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम ,१९७३ के प्रावधानों के विपरीत है|
वास्तविक लोकतंत्र की चिंगारी सुलगाने का एक अभियान - (स्थान एवं समय की सीमितता को देखते हुए कानूनी जानकारी संक्षिप्त में दी जा रही है | आवश्यक होने पर पाठकगण दिए गए सन्दर्भ से इंटरनेट से भी विस्तृत जानकारी ले सकते हैं|पाठकों के विशेष अनुरोध पर ईमेल से भी विस्तृत मूल पाठ उपलब्ध करवाया जा सकता है| इस ब्लॉग में प्रकाशित सामग्री का गैर वाणिज्यिक उद्देश्य के लिए पाठकों द्वारा साभार पुनः प्रकाशन किया जा सकता है| तार्किक असहमति वाली टिप्पणियों का स्वागत है| )
Tuesday, 21 February 2012
राज्य इच्छानुसार किसी भी व्यक्ति को खैरात या लाभ नहीं दे सकती
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