Saturday, 9 November 2013

भारत में पुलिस और नागरिक सम्बन्ध-कल और आज

पुलिस सुधार के लिए भारत में समय समय पर स्वर उठते रहे हैं और जनता के उबाल पर ठन्डे छींटे मारने के लिए विभिन्न कमेटियों/आयोगों/बोर्डों का गठन किया जाता रहा है किन्तु पुलिस के कर्कश स्वर में अभी तक कोई कमी नहीं आई है| प्राय: आरोप लगते रहते हैं कि पुलिस अपराधियों के साथ अपवित्र गठबंधन रखती है| आम जनता पुलिस से दूर ही रहना चाहती है चाहे उसे कोई वहनीय नुक्सान ही क्यों न हो जाए क्योंकि पुलिस के पास जाने पर हानि निश्चित है लाभ हो या न हो| मद्रास उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने भी कहा है कि जिन लोगों के आपसी विवाद हैं उनमें से मात्र 10 प्रतिशत ही न्यायालयों तक आते हैं| यह कथन भारत की न्यायिक प्रणाली पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह लगाता है जिस पर न्यायिक जगत को मंथन और आत्मावलोकन करने की आवश्यकता है| देश में न्यायपालिका अपने आपको सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च होने का दम  भरती  है अत: जो कुछ पुलिस, प्रशासन और  राजनीति में अवांछनीय हो रहा है उसमें न्यायपालिका  का सक्रिय नहीं तो कम से निष्क्रिय योगदान से इंकार नहीं किया जा सकता|  

स्वतंत्रता के बाद, अंग्रेजी शासन की ही भांति तुष्टिकरण के एक कदम के रूप में,  दिनांक 10.11.1971 को पुलिस सुधार के लिए गोरे कमिटी का आज से 42 पूर्व गठन किया गया था जिसने अपनी रिपोर्ट सरकार को प्रस्तुत की थी किन्तु संभवतया इसकी सिफारिशें आजतक धूल चाट रही हैं| इस रिपोर्ट में कहा गया है कि  पुलिस को अब उनके विभिन्न कार्यों के निर्वहन में सेवा उन्मुख होना होगा | यह रिपोर्ट पुलिस और लोगों के बीच एक सार्थक संबंध की जरूरत और महत्व को रेखांकित करती है| पुलिस की अपने सभी कामों में सफलता  समुदाय से उपलब्ध स्वैच्छिक सहयोग पर निर्भर है| पुलिस और जनता के बीच संवाद की बिल्कुल कमी इसकी नैतिकता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है जो बेख़बर आलोचना का कारण बनती है|  किसी भी पुलिस बल की शक्ति  का आधार, एक लोकतांत्रिक देश में, `जनता का विश्वास'  ही है | एक विकासशील समाज में पुलिस अधिकारी का जनता की अपेक्षाओं का ध्यान रखने में विफल रहना बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए| संविधान और एक समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष समाज की अवधारणा में पुलिस की भूमिका, पुलिस और समुदाय के बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों की पृष्ठभूमि पर निर्भर है| दरअसल पुलिस के सभी विकास कार्यक्रमों की सफलता, शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए लोगों के समर्थन की जरूरत है| पुलिस आचरण के आदर्श सिद्धांतों, जिसे 1960 में पुलिस के महानिरीक्षकों के सम्मेलन द्वारा अपनाया गया था, में जनता के सहयोग और लोकप्रिय समर्थन के लिए आवश्यकता पर बल दिया गया था| इसमें विकसित तीन मुख्य सिद्धांतों में, पुलिस भी जिन कर्तव्यों का पालन करती है हर नागरिक को भी करना है और  वे केवल इस अंतर के साथ नागरिक हैं कि पुलिस एक पूर्णकालिक आधार पर नियोजित संगठन हैं| पुलिस अपने कृत्यों द्वारा जब तक  कुशल प्रदर्शन व  सम्मान के साथ लोगों का विश्वास हासिल करने और प्रयास करने के लिए खुद के आचरण को जनानुकूल नहीं बनाएगी जनता उनसे दूरी बनाए रखेगी|
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि पुलिस का कर्तव्य है कि बल के इस्तेमाल के बिना स्थितियों से निपटने, और सहानुभूति व समाज के सभी वर्गों के कल्याण के प्रति जागरूक और उनके सामाजिक संबंध के बिना व्यक्तिगत सेवा, दोस्ती और जरूरत में लोगों को सहायता देने के लिए हमेशा तैयार खड़ी रहे| यह सुनिश्चित करने के लिए वरिष्ठ के पुलिस अधिकारियों को पुलिस के सिद्धांतों को व्यवहार में अपनाकर एक अनुकरणीय उदाहरण स्थापित करने का  प्रयास करना चाहिए| राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने में आजादी के बाद से चाहे पुलिस ने अच्छा काम किया है, लेकिन आम आदमी थाना पुलिस के आचरण से सबसे अधिक चिंतित   है | हमारे सामने उपस्थित सबूत से पता चलता है कि थाना पुलिस की सार्वजनिक छवि असंतोषजनक है | पुलिस के नजरिए में परिवर्तन के अलावा पुलिस के प्रति लोगों के नजरिए को नई दिशा भी जरूरी हैं| हिंसक और असामाजिक तत्वों के साथ लगातार संपर्क में रहना  पुलिसकर्मियों के सभी प्रकार के व्यवहार और दृष्टिकोण को प्रभावित करता है| लोगों की नजर  में यह पुलिस के काम से जुडा होने से यह  निश्चितरूप से एक कलंक है| वार्षिक पुलिस परेड, खेल , आदि जैसे पुलिस के विभिन्न कार्यों में और उपयुक्त अवसरों पर पुलिस संस्थाओं का दौरा करने से  जनता को भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए | ग्राम रक्षा समितियों  आदि  सार्वजनिक आयोजन से पुलिस को करीब लाने में मदद मिलेगी जो नागरिकों की भागीदारी कार्यक्रम का एक उपयोगी हिस्सा हो सकता है |
भ्रष्टाचार एक बदनुमा दाग  है जो पुलिस बल को सार्वजनिक सम्मान और सहयोग से वंचित करता है| एक बेईमान व्यक्ति का सेवा में बने रहना असंभव बनाने के लिए के लिए एक ठोस अभियान की शुरुआत होनी चाहिए| भ्रष्टाचार की सभी शिकायतों की तुरंत जांच की जानी चाहिए और दोषी के खिलाफ जो कुछ भी कार्रवाई अपने स्तर से हो वह कठोर होनी  चाहिए| भ्रष्टाचार निवारण  के लिए एक अथक अभियान के लिए राजपत्रित पुलिस अधिकारियों को नेतृत्व के लिए आगे आना चाहिए|अपराध की  रोकथाम और पता लगाने में पुलिस की पेशेवर दक्षता से जनता के साथ उनके संबंधों पर सीधा असर पड़ता है | अपराधों के पंजीकरण से मनाही से  अपराध में कमी करने के दिखावटी तरीके के संबंध में प्रचलित छवि, अंडर-वर्ल्ड के साथ मिलीभगत, अंधाधुंध गिरफ्तारी और निहितार्थ के साथ जांच के अनुचित तरीकों को बंद किया जाना है | प्रशिक्षण के अलावा कानूनी प्रक्रियाओं, काम करने के तरीकोंउपकरणों, वैज्ञानिक उपकरणों का प्रयोग , विशेषज्ञता  व  कार्य भार की अधिकता , स्टाफ की संख्या  और संगठन के रूप में कई कारक इसमें शामिल है| सुसज्जित स्वागत कक्षों और शिकायतकर्ताओं और गवाहों के लिए पुलिस स्टेशनों पर अन्य सुविधाओं की कमी को जितनी जल्दी संभव हो दुरुस्त करने के प्रयास किए जाने चाहिए| पुलिस स्टेशन में तैनात पुलिस अधिकारियों पर  कार्य भार भी अत्यधिक है| किन्तु इन पंक्तियों के लेखक का स्वतंत्र मत है कि पुलिस यह भार भी बिना किसी अतिरिक्त आकर्षण या लालच के वहन नहीं कर रही है जैसे रोडवेज में ड्राइवर व कंडक्टर गत 20 वर्षों से बिना ओवरटाइम के कार्य कर रहे हैं| एक दूसरा पहलू यह भी है कि उचित कार्य दशाएं, सीमित कार्य घंटे और नियमित विश्राम पुलिस वालों के भी मानवाधिकार हैं और उल्लंघन होने पर वे भी आम नागरिकों के समान ही कानूनी उपचार प्राप्त कर सकते हैं| किन्तु मानवाधिकार तंत्र को तो पुलिस वाले अपना प्रतिद्वंद्वी और शत्रु मानते हैं अत: वे ऐसे उपचार के विषय में सोच भी नहीं पाते हैं|  
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि अपने सरकारी कार्यों को तुरंत पूरा करने और अपनी निजी जरूरतों और मनोरंजन के लिए कभी - कभी रचनात्मक गतिविधियों के लिए कुछ अतिरिक्त समय निकालने के लिए पुलिस स्टेशन के कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि को तर्कसंगत बनाया जाना चाहिए| पुलिस से जल्दी जानकारी प्राप्त होना बहुधा व्यथित पक्षकार की भावनाओं को चोट लगने में कमी लाने और पुलिस को जनता के करीब लाने में मददगार है| एक उचित संचार प्रणाली और पर्याप्त परिवहन के साथ सुसज्जित पुलिस के माध्यम से जवाब देने के समय  को कम किया जाना चाहिए | इसके अलावा , वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को विशेष रूप से , पुलिस स्टेशनों पर तैनात अपने सभी अधीनस्थ कर्मचारियों से पुलिस कार्रवाई में ` जवाब देने के समय ' में कटौती की आवश्यकता पर बल देना चाहिए|


Monday, 14 October 2013

संवेदनहीन पुलिस के दिए जख्मों पर न्यायालय की मानवीय मरहम

यह शर्मिला शर्मा के बच्चों का दुर्भाग्य था या पंचकुला पुलिस की घोर लापरवाही कि अक्टूबर 2012 में एक सडक दुर्घटना में शर्मिला के पति की मृत्यु हो गयी थी| हरियाणा सरकार ने कहने को तो ऐसे मामलों में मुआवजा देने की घोषणा कर रखी है किन्तु पीड़ितों को अभी तक कोई मुआवजा नहीं दिया गया| शर्मिला अपने बच्चों का येन केन प्रकारेण पालन पोषण कर रही थी और अपने पति की मृत्यु के लिए मुआवजे हेतु संघर्ष कर रही थी कि 6 माह बाद दिनांक 07.05.13 को उसके परिवार पर दुखों का एक और पहाड़ टूट पडा| चंडीगढ़ के सेक्टर 10 में चंडीगढ़ परिवहन उपक्रम की एक बस उसे कुचलते हुए निकल गयी| शर्मिला के सिर में गहरी चोट आयी थी| जिस स्थान पर यह दुर्घटना हुई वहां से मल्टी स्पेसीलिटी अस्पताल मात्र 100 मीटर की दूरी पर ही है| किन्तु अपने आचरण के लिए ख्यात लापरवाह और अमानवीय पुलिस अधिकारी वहां 2 घंटे बाद पहुंचे जिससे शर्मिला को बचाया नहीं जा सका| सेक्टर 3 पुलिस थाने के प्रभारी श्री प्रकाश जब 2 घंटे बाद घटना स्थल पर पहुंचे तो शर्मिला सडक पर खून से लथपथ पड़ी थी यद्यपि अधीनस्थ पुलिस उस स्थान पर पहले से ही उसकी प्रतीक्षा करते रहे| इस घटना से शर्मिला के दो किशोरवय बच्चे पूरी तरह से अनाथ हो गये| यह भी ध्यान देने योग्य है कि शहरी क्षेत्र में परिवहन के लिए अधिकतम 10 मीटर तक लम्बाई की बसें ही उपयुक्त हैं जबकि 13.5 मीटर तक लम्बी असुरक्षित बसों को प्रयोग किया जा रहा है|   

उक्त तथ्य पंजाब हरियाणा उच्च न्यायालय के ध्यान में आने पर दिनांक 10.05.13 को स्व-प्रेरणा से संज्ञान लिया गया और अग्रिम कार्यवाही की गयी| उच्च न्यायालय ने अपने हाल ही के आदेश दिनांक 25.09.13 में कहा और आदेश दिया है कि पुलिस के संवेदनहीन आचरण से दो बच्चे अनाथ हो गये| किसी सामाजिक सुरक्षा की योजना के अभाव में इन दुखान्तिकाओं से नाबालिग बच्चे और अधिक पीड़ित हैं| न्यायालय ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए आदेश दिया कि हरियाणा सरकार की योजनानुसार 15 दिन के भीतर एक लाख रुपये की राशि भुगतान की जाए| न्यायालय की टिप्पणी थी कि संघ राज्य क्षेत्र चंडीगढ़ की संवेदनहीन पुलिस पीड़ित को मदद करने की बजाय क्षेत्राधिकार के मुद्दे को उलझाने में अधिक रुचिबद्ध रही है| न्यायालय के हस्तक्षेप से पहले तक तो दोषी अधिकारियों का अनुचित बचाव किया जाता रहा| सुनवाई के दौरान यह बताया गया है कि अब कई अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही प्रारंभ की गयी है जिसका अभी तक निष्कर्ष नहीं निकला है किन्तु इससे अवयस्क अनाथ बच्चों को कोई सांत्वना प्राप्त नहीं होती है| कम से कम, बच्चों को आर्थिक मदद तो दी ही जा सकती है| अत: चंडीगढ़ प्रशासन को आदिष्ट किया जाता है कि दोनों बच्चों के नाम से 1-1 लाख रूपये की राशि अंतरिम राहत के तौर पर 15 दिन के भीतर जमा करवाए| सत्यापन के बाद बच्चों को प्रतिमाह शिक्षा व पालन पोषण खर्चे के लिए 14200 रूपये भुगतान किये जाएँ| यह राशि सितम्बर माह से प्रारंभ होगी जोकि 7 अक्तूबर या इससे पूर्व देय होगी| न्यायमित्र की सहायता से तदनुसार आवेदन का निपटान किया गया|
फिर भी चंडीगढ़ प्रशासन और पंजाब सरकार से हरियाणा की तर्ज पर ऐसे मामलों में एक सम्यक नीति बनाने की अपेक्षा की गयी| इस प्रकार की घटनाओं को टालने के उपाय करने और दोषी पुलिस अधिकारियों पर अधिकतम एक माह की अवधि में कार्यवाही करने की रिपोर्ट के लिए मामले को पुन: दिनांक 19.11.13 को सूचीबद्ध करने के आदेश दिए गए व आदेश की दस्ती प्रति पक्षकारों को दी गयी|   

    

Wednesday, 2 October 2013

सांसदों का वेतन छ: लाख रुपये प्रतिमाह करने की साजिश

देश के सांसदों का प्रतिमाह वेतन, वर्ष जो 2005 तक 4000 रूपये था, को दिनांक 12.09.2006 से 16000  और शीघ्र ही दिनांक 18.05.09 से बढाकर 50000 रूपये कर दिया गया है! दूसरी ओर न्यूनतम मजदूरी की ओर देखें तो यह वर्ष 2005  में रुपये 2500 रूपये थी जो 2009  में बढ़कर मात्र 4000 रूपये ही हो पायी है| इस प्रकार हमारे माननीय जन प्रतिनिधियों की परिलब्धियों में 4 वर्ष में 1100% से अधिक बढ़ोतरी हुई और महंगाई की मार से त्राहीत्राही करते आम मेहनतकश मजदूर की मजदूरी में समान अवधि में मात्र 60% वृद्धि हुई है| ठीक इसी प्रकार कृषि उत्पादों के मूल्यों की तुलना में औद्योगिक उत्पादों की कीमतों में वृद्धि भी 50% अधिक हुई है और देश के अन्न उत्पादक आत्म हत्याएं कर रहे हैं| देश का संविधान कहता है कि इस प्रकार की आर्थिक नीतियाँ अपनायी जाएँगी कि क्षेत्रीय और वर्गवार विषमता में कमी आये| आम नागरिक यह समझने में असमर्थ है कि इन नीतियों से किस प्रकार विषमता दूर हो रही है| जहां आम आदमी के लिए 30 रुपये रोजना पर्याप्त बताये जाते हैं वहीं एक दिन के समारोह पर करोड़ों फूंक दिये जाते हैं और जनता के धन से खुद पर रोजाना 10000 रुपये से भी ज्यादा खर्च किये जाते हैं| यदि 30 रूपये प्रतिदिन पर्याप्त हों तो, कार्य करने के बदले वेतन को छोड़ भी दिया जाए,  कम से कम सरकारी कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों को बिना कार्य किये  मिलने  वाली पेंशन तो 900 रूपये प्रतिमाह किया जाना  उचित ही है|
सरकार जनता को विभन्न प्रलोभन देकर सब्ज बाग़ दिखाकर बना रही है|  एक ओर यह वक्तव्य दिये जाते हैं कि देश में मात्र 20% लोग गरीब हैं, वहीं दूसरी ओर दो तिहाई जनता को अन्न उपलब्ध करवाने के लिए खाद्य सुरक्षा कानून बनाकर सच्चाई की अनूठी बानगी प्रस्तुत की जाती है| केंद्र सरकार के कर्मचारियों की परिलब्धियों में वृद्धि के अध्ययन के लिए वेतन आयोग ने पूर्व में विदेशी दौरे भी किये और वहां की वेतन सम्बंधित स्थिति का जायजा लिया| किन्तु इस दल ने विदेशी कार्मिकों के कार्य निष्पादन, जवाबदेही, आचरण के नियम, भूमिका, कार्यप्रणाली आदि के विषय में कोई जानोपयोगी जानकरी नहीं ली है| न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण हेतु देश से कोई दल शायद ही विदेशों में अध्ययन हेतु भेजा गया हो| दिल्ली उच्च न्यायालय अनुसार निचले तबकों में तो शादियाँ टूटने का एक कारण मुद्रास्फीति/महंगाई की मार भी है जिसके चलते वे इस महंगे शहर में जीवन निर्वाह करना मुश्किल पाते हैं| हमारे वित्तमंत्री इस उपलब्धि और सुन्दर (शोषणकारी)  नियोजन के लिए धन्यवाद के पात्र हैं|

आज से 16 वर्ष पूर्व भारत में सेवा कर नाम का कोई कर नहीं था और आज इस नाम से 100000 करोड़ रुपयों की जनता की जेब प्रतिवर्ष काटी जाती है| लगभग सभी सेवाओं पर कर लगा दिया गया है तथा आज सेवा कर न लगने वाली सेवाओं की (नकारात्मक) सूची है व इन सेवाओं को छोड़कर सभी सेवाओं पर सेवा कर देय है| देश के अपरिपक्व या अस्वच्छ बुद्धि वाले नागरिक इसे अच्छा नियोजन भी कह सकते हैं| एक तरफ देश की आम आदमी से प्रत्येक सेवा और वस्तु पर कर वसूलो और बाद में दो तिहाई लोगों को गरीबी के नाम पर नरेगा, अनुदान आदि के नाम पर बांटो| पहले करों की वसूली में भ्रष्टाचार और बाद में जनता का ही धन जनता को बांटने में| नौकरशाही और जनप्रतिनिधियों की पौ बारह है| सरकार का कुतर्क हो सकता है कि इससे राजस्व में वृद्धि हो रही है किन्तु राजस्व और भ्रष्टाचार में क्या अनुपात है शायद सरकार को ज्ञान नहीं है| भारत आज भ्रष्टाचार के मामले में मात्र चौथे पायदान पर है| जब देशी बंदूक के लाइसेंस का शुल्क एक रुपया पचास पैसा था तब नवीनीकरण के लिए पांच रूपये रिश्वत ली जाती थी| जमीन के एक कारोबारी से बातचीत में उसने बताया कि जमीन के उपयोग परिवर्तन के लिए जितना शुल्क जमा करवाया उससे दुगुना पैसा कलेक्टर को देना पडा| नगर नियोजक, राजस्व विभाग, स्थानीय निकाय, पटवारी आदि को दी जाने वाली भेंटे अलग हैं| सरकार कर संग्रहण के आंकड़ों से भी बड़ी खुश होती है और राजस्व विभाग के अधिकारियों की पीठ थपथपाती है| किन्तु देश में 2% प्रतिवर्ष जनसंख्या वृद्धि से सेवाओं और वस्तुओं के उपभोग में वृद्धि हो रही है तथा गत दशकों से 10% से ऊपर महंगाई दर में वृद्धि हो रही है| अत: 12% तक कर संग्रहण में वृद्धि तो स्वाभाविक है और इससे कितनी अधिक वृद्धि हो रही है, यह सरकार और जनता दोनों जानते हैं| 12% तक जनहित के किसी मद में बजट में प्रतिवर्ष वृद्धि का अभिप्राय तो मात्र स्थिरता है और वास्तव में कोई वृद्धि नहीं है|

विदेशों में समान प्रकृति के कार्य के लिए सरकारी क्षेत्र में निजी क्षेत्र से 2-3 गुणा वेतन दिया जाता है जबकि भारत में समान कार्य के लिए सरकारी सेवा में 6-8 गुणा वेतन दिया जा रहा है| भारत में सरकारी कार्यालय डाक घर की भांति मात्र पत्रों को इधर-उधर भेजने का कार्य कर रहे हैं और प्रतिमाह लाखों रुपये जनता के खजाने से लेने वाले कई आई ए एस तो पूरे महीने में जनता से सम्बन्धित 10 निर्णय लेने/टिपण्णी हस्ताक्षर करने का कार्य भी नहीं करते हैं| वे मात्र ऊँचे अधिकारियों से आने वाले पत्रों का जवाब देना आवश्यक समझते हैं | सरकारी क्षेत्र के लगभग 4 करोड़ संगठित कर्मचारियों के 20 करोड़ परिजनों के लिए भी छठा वेतन आयोग वरदान साबित हुआ था और उनकी परिलब्धियों में पूर्व में वर्ष 2006  में 150% से अधिक की वृद्धि कर हमारे जन प्रतिनिधियों ने अपने लिए वेतन और सुख- सुविधा वृद्धि का मार्ग सुगम, निर्विघ्न और निष्कंटक बना लिया| केंद्र सरकार के वेतन आयोग के बाद सभी राज्य सरकारों, सार्वजनिक उपक्रमों और शासन के अन्य अंगों में वेतन वृद्धियां आवश्यक हो जाती है| अभी हाल ही में केंद्र सरकार ने सातवें वेतन आयोग की स्वीकृति दे दी है| आखिर दे भी क्यों नहीं चुनावी वर्ष है और करों के रूप में वसूली गयी जनता की गाढे पसीने की कमाई को ये लोग अपनी पैत्रिक सम्पति समझते आये हैं| अब जनता को समझ लेना चाहिए कि वेतन आयोग के गठन से जनप्रतिनिधियों के वेतन में न केवल बढ़ोतरी का मार्ग पुन: निष्कंटक होगा बल्कि सत्तासीन  दल अपने पक्ष में अधिक मतों की भी अपेक्षा रखता है| मंहगाई में वृद्धि होगी जिससे सांसदों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा और व्यापारियों, जमाखोरों  व उद्योगपतियों के मुनाफे में वृद्धि होने से वे अच्छा चुनावी चन्दा दे सकेंगे| पसीने तो आम जनता के छूटने हैं| इस प्रकार सातवें वेतन आयोग के गठन से सरकार ने एक ही ढेले में कई चिड़िया मारने की योजना बनाई है| अब जनता को सावधान हो जाना चाहिए कि जन प्रतिनिधियों के नापाक मंसूबों को सिरे न चढ़ने दें और मांग करें कि वेतन आयोग में बहुमत में सिविल सोसायटी के लोग सदस्य हों जो जनहित पहलू पर विचार कर सकें क्योंकि नौकरशाह और जन प्रतिनिधि तो अपना हित त्याग नहीं सकते| नौकरशाहों और जन प्रतिनिधियों का  स्पष्ट हित तो जनता की जेब से अधिकतम दोहन करने में है| हमारे माननीय प्रधान मंत्री और वित्तमंत्री दोनों ही विदेशों में अंग्रेजी वातावरण में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त हैं| भारत पूर्व में भी अंग्रेजों  की कुटिल नीतियों का लम्बे समय तक शिकार रह चुका है| छठे वेतन वेतन आयोग के बाद सांसदों के वेतन में 4 वर्षों में 16 गुणी वृद्धि कर उसे 50000 रुपये प्रतिमाह कर दिया था और अब इसमें यदि इसी दर से वृद्धि की गयी तो अगली लोकसभा में सांसदों का वेतन 600000 रुपये प्रतिमाह हो जाएगा| अत: मेरे प्रिय भारतवासियों जागो समय आ गया है, सरकार की संविधान विरोधी और जन विरोधी नीतियों का एकजुट होकर पुरजोर विरोध करने का – याद रहे|     

Tuesday, 1 October 2013

बंदर कहना महँगा पड़ा ...

ओंटारियो की एक कृषि फर्म को अपने एक कर्मचारी को बंदर कहना महँगा पडा जबकि वहां के मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ने चर्चित प्रकरण एड्रिअन मोंरोसे बनाम डबल डायमंड एकड़ लिमिटेड (2013 एच आर टी ओ 1273)  में दोषी पर भारी जुर्माना लगाया| किंग्सविले की एक टमाटर उत्पादक कंपनी डबल डायमंड एकड़ लिमिटेड  को मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ओंटारियो (कनाडा)  ने शिकायतकर्ता एड्रिअन मोंरोसे को बकाया वेतन और गरिमा हनन के लिए कुल 23,500 पौंड क्षतिपूर्ति देने के आदेश दिया है| 
तथ्य इस प्रकार हैं कि शिकायतकर्ता ने प्रतिवादी संस्थान में प्रवासी मौसमी कृषि मजदूर के रूप में दिनांक 9.1.09 से कार्य प्रारंभ किया था| शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि प्रतिवादी संस्थान के एक कर्मचारी करिरो ने चिल्लाते हुए मुझे कहा कि तुम पेड़ शाखा पर बंदर जैसे लगते हो और वह चला गया| मौसमी मजदूरों के करार के अनुसार उनके वेतन का पच्चीस प्रतिशत वेतन उन्हें बाद में भेजे जाने के लिए काटा जाता है किन्तु उसे समय पर भुगतान नहीं किया गया| आवेदक –शिकायतकर्ता-एड्रिअन मोंरोसे के अनुसार उसने यह मामला प्रतिवादी के समक्ष माह जनवरी व फरवरी 2009 में उठाया था| किन्तु उसकी  शिकायत के फलस्वरूप बदले की भावना से उसे नौकरी से ही निकाल दिया जिससे वह 5500 पौंड मजदूरी से वंचित हो गया| मामला जब ट्रिब्यूनल के सामने निर्णय हेतु आया तो ट्रिब्यूनल का यह विचार रहा कि क्षतिपूर्ति के उचित मूल्याङ्कन के लिए बदले की भावना से प्रेरित कार्यवाही से उसकी गरिमा, भावना और स्व-सम्मान को पहुंची ठेस के लिए प्रार्थी क्षतिपूर्ति का पात्र है| प्रार्थी  ने अपने देश वापिस भेज दिए जाने सहित मजदूरी के नुक्सान आदि इन सबके लिए कुल 30000 पौंड के हर्जाने की मांग की है| ओंटारियो मानवाधिकार संहिता की धारा 46.3 के अनुसार किसी संगठन के कर्मचारियों, अधिकारियों या एजेंटों द्वारा भेदभाव पूर्ण आचरण करने पर संस्था का प्रतिनिधित्मक दायित्व है, तदनुसार करेरो और मस्टरोनारडी के कृत्यों के लिए डबल डायमंड एकड़ लिमिटेड जिम्मेदार हैट्रिब्यूनल ने आवेदक को 15000 पौंड का हर्जाना बदले के भावना से हुए मानवाधिकार हनन के लिए स्वीकृत किया और मजदूरी के नुक्सान की भरपाई के लिए 5000 पौंड मय ब्याज के देने के आदेश दिए|
आवेदक ने यह भी मांग की कि प्रत्यर्थी अपने यहाँ मानवाधिकार नीति को लागू करने के लिए ओंटारियो मानवाधिकार आयोग से अनुमोदन करवाकर एक निश्चित प्रक्रिया लागू करे| इस पर ट्रिब्यूनल ने आदेश दिया कि प्रत्यर्थी 120 दिन के भीतर मानवाधिकार कानून विशेषज्ञ की सहायता से एक व्यापक मानवाधिकार और भेदभाव विरोधी नीति विकसित करे व प्रत्यर्थी के सभी अधिकारीकर्मचारी, जिन पर किसी भी प्रकार के पर्यवेक्षण का दयित्व हो वे, 101 मानवाधिकारों के विषय में 120  दिन के भीतर ऑनलाइन प्रशिक्षण प्राप्त करें |
वहीं भारतीय परिपेक्ष्य में मानवाधिकारों पर नजर डालें तो स्थिति अत्यंत दुखद कहानी कहती है| ओड़िसा में जुलाई 2008 में संजय दास को पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की निस्संकोच अवहेलना करते हुए गिरफ्तार कर लिया था अत: पुलिस की इस अनुचित कार्यवाही से व्यथित होकर पीड़ित ने वर्ष 2009 में उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल की| खेद का विषय है कि इस याचिका पर उच्च न्यायालय ने 4 वर्ष बाद अब वर्ष  2013 में सरकार से जवाबी हलफनामा दायर करने को कहा हैप्रकरण में जवाब देते हुए राज्य के पुलिस महानिदेशक ने कहा है कि अब दोषी की पहचान करना कठिन है| वास्तव में देखा जाए तो भारत भूमि के अधिकाँश लोगों, चाहे वे कोई भी पद धारण करते हों, के चिंतन से लोकतंत्र का मूल दर्शन ही गायब है| विधायिकाएं आधे-अधूरे और जनविरोधी कानून बनाती हैं, न्यायपालिका उन्हें लागू करते हुए और भोंथरा बना देती परिणामत: पुलिस का मनोबल और दुस्साहस-दोनों इस वातावरण में मुक्त रूप से पनपते  रहते  है|   पुलिस द्वारा न केवल आम नागरिक के साथ अभद्र व्यवहार करने और सरे आम गाली गलोज करने के  मामले मानवाधिकार तंत्र के सक्रिय या निष्क्रिय सहयोग और सानिद्य में जारी हैं बल्कि हिंसा तक  बेहिचक की जाती है| देश की सवा अरब की आबादी  में ढूंढने से भी उदाहरण मिलना मुश्किल है जहां बीस लाख में से एक भी पुलिस वाले को अपशब्दों के लिए या मानव गरिमा हनन के लिए दण्डित किया गया हो|

एक बार जब भारत ने मानवाधिकार संधि का अनुमोदन कर दिया तो उसके बाद सम्पूर्ण देश में मानवाधिकार की रक्षा करना, प्रोन्नति करना और उसका उल्लंघन रोकना सरकार का दायित्व हो जाता है ऐसा उल्लंघन चाहे किसी सरकारी सेवक द्वारा किया जा रहा हो या किसी नीजि व्यक्ति द्वारा| सरकार मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में ऐसा कोई भेदभाव नहीं बरत सकती किन्तु भारत के मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 12 में मात्र लोक सेवकों द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में ही आयोग द्वारा जांच का प्रावधान रखा गया है और इस प्रकार नीजि व्यक्तियों को मानवाधिकार उल्लंघन की खुली छूट दे दी गयी है कि उनके विरुद्ध शिकायतों पर आयोग कोई कार्यवाही नहीं करेगा| वहीं ओंटारियो राज्य ने अपने लिए एक विस्तृत और व्यापक मानवाधिकार संहिता बना रखी है| संहिता की धारा 29 में मानवाधिकार संरक्षण और प्रोन्नति के व्यापक प्रावधान है और यह कहा गया है कि आयोग का कार्य मानवाधिकारों (न केवल रक्षा करना बल्कि) के सम्मान को आगे बढ़ाना और प्रोन्नत करना आयोग का कार्य है तथा इसमें नीजि या सरकारी उल्लंघन के मध्य किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया गया है| मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ओंटारियो न केवल अपने मुख्यालय पर बल्कि कैम्प लगाकर घटना स्थल के नजदीक सुनवाई का अवसर देता है ताकि पीड़ित पक्ष अपना दावा आसानी से प्रभावी ढंग प्रस्तुत कर सके| उक्त मामले से यह भी स्पष्ट है कि वर्ष 2009  के मामले में ओंटारियो के ट्रिब्यूनल ने अपना निर्णय सुना दिया है जबकि समान अवधि के मामले में ओड़िसा उच्च न्यायालय ने अभी सरकार से जवाब ही मांगा है, निर्णय  में लगने वाले समय और मिलने वाली राहत के विषय में कोई सुन्दर पूर्वानुमान  नहीं लगाया  जा सकता| उल्लेखनीय है कि भारत जब मानवप्राणी  के रूप में प्राप्त अधिकारों के विषय में कनाडा से इतना पीछे है तो नागरिक के तौर पर उपलब्ध मूल अधिकारों के विषय में अभी चर्चा करना ही अपरिपक्व होगा, चाहे कागजी तौर पर वे संविधान में सम्मिलित हों| यह भी ध्यान देने योग्य है कि कनाडा, ब्रिटिश संसद के नियंत्रण से वर्ष 1982 में ही अर्थात भारत से 35 वर्ष बाद पूरी तरह से मुक्त हुआ है| अब देश की जनता कर्णधारों से जवाब मांगती है कि इस अवधि में इन्होंने आम भारतीय के लिए अब तक क्या किया और भविष्य में जो करने जा रहे हैं उसकी रूप रेखा क्या है|  


Thursday, 26 September 2013

अवैध गिरफ्तारी व हिरासत में रखना आई ए एस, तहसीलदार और पुलिस अधिकारी को भारी पडा

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने सुरेशकुमार शर्मा को अवैध हिरासत में रखने के प्रकरण में राज्य सरकार को 2 लाख रुपये मुआवजा देने और घटना में संलिप्त आई ए एस अधिकारी के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही को 3 माह की अवधि में निपटाने के निर्देश दिए हैं| न्यायाधिपति राजीव शर्मा ने सुरेश कुमार शर्मा की रिट याचिका पर हिमाचल राज्य  को दिनांक 2.9.13 को  यह आदेश दिया है| स्मरण रहे कि न्यायालय ने पूर्व में ही दिनांक  23.05.13 को सुनवाई कर अंतरिम आदेश दिया था कि चूँकि आई ए एस - बी आर कमल और तहसीलदार सिद्धार्थ आचार्य ने याची की स्वतंत्रता का हनन विधि विरुद्ध रूप से किया है अत: उनके विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही की जाये और उन्हें निलंबित कर दिया जाए| साथ ही न्यायालय ने यह भी आदेश दिया था कि सरकार हर्जाने के लिए रुपये दो लाख न्यायालय में अग्रिम जमा करवाएं |
  याची सुरेश कुमार शर्मा ने उपखंड मजिस्ट्रेट के दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107 और 151 ( जिसका आम तौर पर दुरूपयोग किया जाता है) के अंतर्गत उसकी गिरफ्तारी के आदेश को चुनौती देते हुए आरोप लगाया था कि उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अनुचित हनन हुआ है व उसे 72 घंटे से अधिक अवधि के लिए हिरासत में रखा गया और जमानत मुचलका स्वीकार नहीं किया गया| याचिका में आरोप लगाए गए हैं कि याची ने उसके गाँव के दो व्यक्तियों द्वारा 60 बीघा सरकारी भूमि पर अतिक्रमण के विषय में उसने कई शिकायतें की थी| यद्यपि अतिक्रमण हटा दिया गया किन्तु अप्रसन्न होकर उसे झूठे मामले में फंसा दिया गया|  नतीजन रोहरू के उपखंड मजिस्ट्रेट बी आर कमल ने अतिक्रमियों की झूठी शिकायत पर दिनांक 7.7.09 को याची की गिरफ्तारी के आदेश जारी किये और उसे तीन बाद गिरफ्तार किया गया और तत्कालीन कार्यवाहक उपखंड मजिस्ट्रेट तहसीलदार जुब्बल सिद्धार्थ आचार्य ने उसका जमानत मुचलका स्वीकार नहीं किया| याची को दिनांक 13.07.09 को मुक्त किया गया और बाद में कार्यवाही बंद कर दी गयी |

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107  में यह प्रावधान है कि पर्याप्त आधार होने पर मजिस्ट्रेट सम्बद्ध व्यक्ति से शांति बनाए रखने के लिए मुचलका प्रस्तुत करने की अपेक्षा कर सकता है| धारा 109 में मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति को प्राप्त सूचना का सार, मुचलका की रकम, प्रतिभुओं  की संख्या, प्रकार और वर्ग बताते हुए  कारण दर्शित करने  की अपेक्षा करेगा| न्यायालय में ऐसा व्यक्ति उपस्थित होने की दशा में उसे यह सार बताया जाएगा| धारा 113 के अनुसार ऐसे व्यक्ति की उपस्थति के लिए समन जारी किया जाएगा और गिरफ्तारी का वारंट केवल अत्यावश्यक परिस्थितियों में ही जारी किया जाएगा | समन या वारंट के साथ ऐसे आदेश की प्रति गिरफ्तार व्यक्ति को दी  जायेगी| धारा 116(1) के  अनुसार ऐसे व्यक्ति के उपस्थित होने पर शिकायत की सत्यता की जांच  की जाएगी और उचित होने पर अतिरिक्त साक्ष्य लिया जाएगा| धारा 116 (3) के परंतुक के अनुसार, धारा 108, 109 या 110 के अलावा,  जांच किये बिना अंतरिम अवधि के लिए मुचलका के लिए निर्देश नहीं दिए जा सकते| जबकि प्रकरण में पुलिस अधिकारी के बुलाये जाने पर याची उपस्थित हुआ और उसे गिरफ्तार कर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया गया| उसके द्वारा प्रस्तुत व्यक्तिगत मुचलका और उसके पिता द्वारा प्रस्तुत मुचलका को  भी इस बनावटी आधार पर अस्वीकार कर दिया गया कि उसमें सम्पति के विवरण नहीं हैं| बाद में सम्पति के विवरण सहित आवेदन प्रस्तुत करने पर ही उसे रिहा किया गया|
याची को कानूनन एक बार में 24 घंटे से अधिक अवधि के लिए हिरासत में नहीं भेजा जा सकता था  किन्तु उसे दिनांक 10.07.09 से 13.07.09 तक 72 घंटे हिरासत में भेजने का अवैध आदेश दिया गया| यदि याची द्वारा प्रस्तुत मुचलका में सम्पति का पूर्ण विवरण नहीं था तो उसे तीन दिन बाद के स्थान पर उसी दिन विवरण प्रस्तुत करने की अपेक्षा की जा सकती थी| लेखक का विनम्र मत है कि मजिस्ट्रेट 24 घंटे ड्यूटी पर होता है तथा बिना अनुमति व वैकल्पिक व्यवस्था के वह मुख्यालय भी नहीं छोड़ सकता| इसी दृष्टिकोण से दंड प्रक्रिया संहिता में मजिस्ट्रेट न्यायालय शब्द के स्थान पर मात्र मजिस्ट्रेट शब्द का प्रयोग किया गया है अर्थात मजिस्ट्रेट द्वारा कार्यवाही करने के लिए न्यायालय लगा होना आवश्यक नहीं है क्योंकि न्यायालय का निर्धारित समय और छुट्टियां होती हैं जबकि ये मजिस्ट्रेट पर लागू नहीं होती| जब मजिस्ट्रेट छुट्टी के समय या दिन शांति रखने के लिए आदेश दे सकता है तो फिर वह जनता का सेवक होते होते हुए जमानत के लिए मना कैसे कर सकता है|

याचिका की सुनवाई के समय न्यायालय ने पाया कि याची की गिरफ्तारी की सम्पूर्ण प्रक्रिया में निर्धारित आवश्यक कानून की अनुपालना नहीं की गयी है और इसमें दुर्भावाना की बू आती है| यह सम्पूर्ण कार्यवाही सरकारी भूमि पर अतिक्रमियों की सह पर की गयी है| याची के विरुद्ध उक्त अनुचित कार्यवाही को निरस्त करते हुए न्यायालय ने आगे आदेश दिया कि सरकार याची को दो लाख रूपये का हर्जाना दे व सरकार चाहे तो हर्जाने की राशि की वसूली आई ए एस और तहसीलदार से कर सकती है तथा उनके विरुद्ध प्रारंभ की गयी अनुशासनिक कार्यवाही को तीन माह की अवधि में निपटा दिया जाये| न्यायालय ने आगे यह भी आदिष्ट किया है कि  सरस्वतीनगर पुलिस चौकी के सहायक उप निरीक्षक ओम प्रकाश, जोकि उक्त गिरफ्तारी में संलिप्त रहा है, को भी समान रूप से निलंबित किया जाए और उसके विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही को भी 3 माह की अवधि में निपटाया जाय| सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वालों के विरुद्ध कार्यवाही की जाये|


रिजर्व बैंक का समाजवादीकरण

मनीराम शर्मा
अध्यक्ष, इंडियन नेशनल बार एसोसिएशन , चुरू प्रसंग
रोडवेज डिपो के पीछे
सरदारशहर  331403
दिनांक 21.09.13
माननीय अध्यक्ष महोदय,
कार्मिक, जनशिकायत, विधि एवं न्याय समिति,
राज्य सभा,
नई दिल्ली   
महोदय,
रिजर्व बैंक का समाजवादीकरण 
आपको ज्ञात ही है कि देश के संविधान में यद्यपि समाजवाद का समावेश अवश्य है किन्तु देश के सर्वोच्च वितीय संस्थान रिजर्व बैंक के केन्द्रीय बोर्ड में ऐसे सदस्यों के चयन में इस प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं है जिनकी समाजवादी चिंतन की पृष्ठभूमि अथवा कार्यों से कभी भी वास्ता रहा है| सर्व प्रथम तो बोर्ड के अधिकाँश सदस्य निजी उद्योगपति पूंजीपति हैं| जिन सदस्यों को उद्योगपतियों के लिए निर्धारित कोटे के अतिरिक्त -  समाज सेवा , पत्रकारिता आदि क्षेत्रों से चुना जाता है वे भी समाज सेवा, पत्रकारिता आदि का मात्र चोगा पहने हुए होते हैं व वास्तव में वे किसी न किसी  औद्योगिक घराने से जुड़े हुए हैं| एक उद्योगपति का स्पष्ट झुकाव स्वाभाविक रूप से व्यापार के हित में नीति निर्माण में होगा| इससे भी अधिक दुखदायी तथ्य यह है कि  केन्द्रीय बोर्ड के 80% से अधिक सदस्य विदेशों से शिक्षा प्राप्त हैं फलत: उन्हें जमीनी स्तर की भारतीय परिस्थितियों का कोई व्यवहारिक ज्ञान नहीं है अपितु उन्होंने तो इंडिया को मात्र पुस्तकों  में पढ़ा है| ऐसी स्थिति में रिजर्व बैंक बोर्ड द्वारा नीति निर्माण में संविधान सम्मत और जनोन्मुख नीतियों की अपेक्षा करना ही निरर्थक है| रिजर्व बैंक, स्वतन्त्रता पूर्व 1934 के अधिनियम से स्थापित एक बैंक है अत: उसकी स्थापना में संवैधानिक समाजवाद के स्थान पर औपनिवेशिक साम्राज्यवाद की बू आना स्वाभाविक  है| देश के 65% गरीब, वंचित और अशिक्षित वर्ग का रिजर्व बैंक के केन्द्रीय बोर्ड में वास्तव में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है और देश आयातित नीतियों पर चल रहा है| दूसरी ओर भारत से 14 वर्ष बाद 1961 में स्वतंत्र हुए दक्षिण अफ्रिका के रिजर्व बैंक के निदेशकों में से एक कृषि व एक श्रम क्षेत्र से होता है| हमारे पडौसी देश पाकिस्तान के केन्द्रीय बैंक में निदेशक मंडल में प्रत्येक राज्य से न्यूनतम एक निदेशक अवश्य होता है जबकि हमारे देश में ऐसे  प्रावधान का नितांत अभाव है|
अत: रिजर्व बैंक अधिनियम में संशोधन कर इसे समाजवादी बनाया जाये और यह सुनिश्चित किया जाए कि उसके निदेशक/शासकीय मंडल में  कृषक, मजदूर वर्ग तथा समस्त राज्यों का समुचित प्रतिनिधित्व हो| इस प्रसंग में आप द्वारा की गयी कार्यवाही का मुझे उत्सुकता से इंतज़ार रहेगा|
भवनिष्ठ
मनीराम शर्मा 


Sunday, 1 September 2013

कहने को देश में लोकतंत्र है किन्तु इसमें आम नागरिक की कोई सक्रीय भागीदारी नहीं रह गयी है

श्री मनमोहन सिंह जी,
प्रधान मंत्री,
भारत सरकार,
नई दिल्ली

मान्यवर, 
नीतिगत मामले : अधिकारों का प्रत्यायोजन एवं जन शिकायतों का निवारण

मैं आपको यह स्मरण करवाने की आवश्यकता नहीं समझता कि आपकी लोकप्रिय सरकार ने शिकायत निवारण तंत्र लोक शिकायत निवारण 2010 हेतु दिशा-निर्देश जारी किये हैं और इसकी अनुपालना में शिकायत निवारण अधिकारी भी नियुक्त कर रखें हैं जो प्रशासनिक शिकायतों का निवारण करने के लिए अधिकृत हैं| किन्तु नीतिगत मामलों की शिकायतें इसकी परिधि में नहीं आती हैं क्योंकि राष्ट्र द्वारा अपनाई गयी लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में नीतिगत मामले मात्र जनप्रतिनिधियों के ही दायरे में आते हैं|अत: नीतिगत मामलों की शिकायतें इस पोर्टल पर दायरे से बाहर बताते हुए निरस्त कर दी जाती हैं| दूसरी ओर नीतिगत मामलों के सामान्य जन प्रतिवेदनों को जन प्रतिनिधियों के ध्यान में लाये बिना ही सचिवालय स्तर पर निरस्त कर लोकतंत्र को विफल किया जा रहा है|यह स्थिति अत्यंत दुखदायी है जहां सरकार द्वारा दोहरे मानदंड अपनाए जा रहे हैं|इस प्रकार नीतिगत मामलों में जनता को अपनी व्यथा जन प्रतिनिधियों तक पहुँचाने का कोई विकल्प ही उपलब्ध नहीं है और कहने को देश में लोकतंत्र है किन्तु इसमें आम नागरिक की कोई सक्रीय भागीदारी नहीं रह गयी है|

     
लोकतंत्र में सरकारी अधिकारी अपने विभाग प्रमुख के प्रति जवाबदेह हैं और जनप्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह हैं| किसी भी नीतिगत मामले में हस्तक्षेप करने, संशोधन करने या स्वीकार करने का अधिकार मात्र जनप्रतिनिधियों को ही है| निश्चित रूप से जब किसी नीतिगत मामले को स्वीकार करने का किसी अधिकारी को कोई अधिकार नहीं है तो फिर उसे अस्वीकार करने का भी कोई अधिकार नहीं हो सकता| यदि अस्वीकार करने का अधिकार ही नीचे के स्तर पर दे दिया जाए या प्रयोग किया जाए तो फिर उच्च स्तर पर ऐसा कोई अधिकार अर्थहीन रह जाएगा| अतेव कृपया व्यवस्था करें कि समस्त अधिकारियों की शक्तियां सहज दृश्य रूप में प्रकाशित की जाती हैं और नीतिगत मामलों में कोई भी निर्णय, यथा स्थिति, सशक्त सम्बंधित मंत्री, समिति या अध्यक्ष की अनुमति के बिना नहीं लिया जाये ताकि देश में वास्तव में लोकतंत्र स्थापित हो सके| आप द्वारा इस प्रसंग में की गयी कार्यवाही का मुझे उत्सुकता से इन्तजार रहेगा|  

सादर,

 भवनिष्ठ

मनीराम शर्मा                                       दिनांक: 01.09.2013
एडवोकेट
नकुल निवास, रोडवेज डिपो के पीछे
सरदारशहर-331403
जिला-चुरू(राज)


Wednesday, 28 August 2013

भारत के सम्पूर्ण संविधान में ढूंढने से भी “मानव अधिकार” शब्द मिलना तक संभव नहीं है

ओंटारियो की एक कृषि फर्म को अपने एक कर्मचारी को बंदर कहना महँगा पडा जबकि वहां के मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ने चर्चित प्रकरण एड्रिअन मोंरोसे बनाम डबल डायमंड एकड़ लिमिटेड (2013 एच आर टी ओ 1273)  में दोषी पर भारी जुर्माना लगाया| किंग्सविले की एक टमाटर उत्पादक कंपनी डबल डायमंड एकड़ लिमिटेड  को मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ओंटारियो (कनाडा)  ने शिकायतकर्ता एड्रिअन मोंरोसे को बकाया वेतन और गरिमा हनन के लिए कुल 23,500 पौंड क्षतिपूर्ति देने के आदेश दिया है| 
तथ्य इस प्रकार हैं कि शिकायतकर्ता ने प्रतिवादी संस्थान में प्रवासी मौसमी कृषि मजदूर के रूप में दिनांक 9.1.09 से कार्य प्रारंभ किया था| शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि प्रतिवादी संस्थान के एक कर्मचारी करिरो ने चिल्लाते हुए मुझे कहा कि तुम पेड़ शाखा पर बंदर जैसे लगते हो और वह चला गया| मौसमी मजदूरों के करार के अनुसार उनके वेतन का पच्चीस प्रतिशत वेतन उन्हें बाद में भेजे जाने के लिए काटा जाता है किन्तु उसे समय पर भुगतान नहीं किया गया| आवेदक –शिकायतकर्ता-एड्रिअन मोंरोसे के अनुसार उसने यह मामला प्रतिवादी के समक्ष माह जनवरी व फरवरी 2009 में उठाया था| किन्तु उसकी  शिकायत के फलस्वरूप बदले की भावना से उसे नौकरी से ही निकाल दिया जिससे वह 5500 पौंड मजदूरी से वंचित हो गया| मामला जब ट्रिब्यूनल के सामने निर्णय हेतु आया तो ट्रिब्यूनल का यह विचार रहा कि क्षतिपूर्ति के उचित मूल्याङ्कन के लिए बदले की भावना से प्रेरित कार्यवाही से उसकी गरिमा, भावना और स्व-सम्मान को पहुंची ठेस के लिए प्रार्थी क्षतिपूर्ति का पात्र है| प्रार्थी  ने अपने देश वापिस भेज दिए जाने सहित मजदूरी के नुक्सान आदि इन सबके लिए कुल 30000 पौंड के हर्जाने की मांग की है| ओंटारियो मानवाधिकार संहिता की धारा 46.3 के अनुसार किसी संगठन के कर्मचारियों, अधिकारियों या एजेंटों द्वारा भेदभाव पूर्ण आचरण करने पर संस्था का प्रतिनिधित्मक दायित्व है, तदनुसार करेरो और मस्टरोनारडी के कृत्यों के लिए डबल डायमंड एकड़ लिमिटेड जिम्मेदार हैट्रिब्यूनल ने आवेदक को 15000 पौंड का हर्जाना बदले के भावना से हुए मानवाधिकार हनन के लिए स्वीकृत किया और मजदूरी के नुक्सान की भरपाई के लिए 5000 पौंड मय ब्याज के देने के आदेश दिए|
आवेदक ने यह भी मांग की कि प्रत्यर्थी अपने यहाँ मानवाधिकार नीति को लागू करने के लिए ओंटारियो मानवाधिकार आयोग से अनुमोदन करवाकर एक निश्चित प्रक्रिया लागू करे| इस पर ट्रिब्यूनल ने आदेश दिया कि प्रत्यर्थी 120 दिन के भीतर मानवाधिकार कानून विशेषज्ञ की सहायता से एक व्यापक मानवाधिकार और भेदभाव विरोधी नीति विकसित करे व प्रत्यर्थी के सभी अधिकारीकर्मचारी, जिन पर किसी भी प्रकार के पर्यवेक्षण का दयित्व हो वे, 101 मानवाधिकारों के विषय में 120  दिन के भीतर ऑनलाइन प्रशिक्षण प्राप्त करें |
वहीं भारतीय परिपेक्ष्य में मानवाधिकारों पर नजर डालें तो स्थिति अत्यंत दुखद कहानी कहती है| भारत के सम्पूर्ण संविधान में ढूंढने से भी मानव अधिकार शब्द मिलना तक संभव नहीं है|  ओड़िसा में जुलाई 2008 में संजय दास को पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की निस्संकोच अवहेलना करते हुए गिरफ्तार कर लिया था अत: पुलिस की इस अनुचित कार्यवाही से व्यथित होकर पीड़ित ने वर्ष 2009 में उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल की| खेद का विषय है कि इस याचिका पर उच्च न्यायालय ने 4 वर्ष बाद अब वर्ष  2013 में सरकार से जवाबी हलफनामा दायर करने को कहा हैप्रकरण में जवाब देते हुए राज्य के पुलिस महानिदेशक ने कहा है कि अब दोषी की पहचान करना कठिन है| वास्तव में देखा जाए तो भारत भूमि के अधिकाँश लोगों, चाहे वे कोई भी पद धारण करते हों, के चिंतन से लोकतंत्र का मूल दर्शन ही गायब है| विधायिकाएं आधे-अधूरे और जनविरोधी कानून बनाती हैं, न्यायपालिका उन्हें लागू करते हुए और भोंथरा बना देती परिणामत: पुलिस का मनोबल और दुस्साहस-दोनों इस वातावरण में मुक्त रूप से पनपते  रहते  है|   पुलिस द्वारा न केवल आम नागरिक के साथ अभद्र व्यवहार करने और सरे आम गाली गलोज करने के  मामले मानवाधिकार तंत्र के सक्रिय या निष्क्रिय सहयोग और सानिद्य में जारी हैं बल्कि हिंसा तक  बेहिचक की जाती है| देश की सवा अरब की आबादी  में ढूंढने से भी उदाहरण मिलना मुश्किल है जहां बीस लाख में से एक भी पुलिस वाले को अपशब्दों के लिए या मानव गरिमा हनन के लिए दण्डित किया गया हो|


एक बार जब भारत ने मानवाधिकार संधि का अनुमोदन कर दिया तो उसके बाद सम्पूर्ण देश में मानवाधिकार की रक्षा करना, प्रोन्नति करना और उसका उल्लंघन रोकना सरकार का दायित्व हो जाता है ऐसा उल्लंघन चाहे किसी सरकारी सेवक द्वारा किया जा रहा हो या किसी नीजि व्यक्ति द्वारा| सरकार मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में ऐसा कोई भेदभाव नहीं बरत सकती किन्तु भारत के मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 12 में मात्र लोक सेवकों द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में ही आयोग द्वारा जांच का प्रावधान रखा गया है और इस प्रकार नीजि व्यक्तियों को मानवाधिकार उल्लंघन की खुली छूट दे दी गयी है कि उनके विरुद्ध शिकायतों पर आयोग कोई कार्यवाही नहीं करेगा| वहीं ओंटारियो राज्य ने अपने लिए एक विस्तृत और व्यापक मानवाधिकार संहिता बना रखी है| संहिता की धारा 29 में मानवाधिकार संरक्षण और प्रोन्नति के व्यापक प्रावधान है और यह कहा गया है कि आयोग का कार्य मानवाधिकारों (न केवल रक्षा करना बल्कि) के सम्मान को आगे बढ़ाना और प्रोन्नत करना आयोग का कार्य है तथा इसमें नीजि या सरकारी उल्लंघन के मध्य किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया गया है| मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ओंटारियो न केवल अपने मुख्यालय पर बल्कि कैम्प लगाकर घटना स्थल के नजदीक सुनवाई का अवसर देता है ताकि पीड़ित पक्ष अपना दावा आसानी से प्रभावी ढंग प्रस्तुत कर सके| उक्त मामले से यह भी स्पष्ट है कि वर्ष 2009  के मामले में ओंटारियो के ट्रिब्यूनल ने अपना निर्णय सुना दिया है जबकि समान अवधि के मामले में ओड़िसा उच्च न्यायालय ने अभी सरकार से जवाब ही मांगा है, निर्णय  में लगने वाले समय और मिलने वाली राहत के विषय में कोई सुन्दर पूर्वानुमान  नहीं लगाया  जा सकता| उल्लेखनीय है कि भारत जब मानवप्राणी  के रूप में प्राप्त अधिकारों के विषय में कनाडा से इतना पीछे है तो नागरिक के तौर पर उपलब्ध मूल अधिकारों के विषय में अभी चर्चा करना ही अपरिपक्व होगा, चाहे कागजी तौर पर वे संविधान में सम्मिलित हों| यह भी ध्यान देने योग्य है कि कनाडा, ब्रिटिश संसद के नियंत्रण से वर्ष 1982 में ही अर्थात भारत से 35 वर्ष बाद पूरी तरह से मुक्त हुआ है| अब देश की जनता कर्णधारों से जवाब मांगती है कि इस अवधि में इन्होंने आम भारतीय के लिए अब तक क्या किया और भविष्य में जो करने जा रहे हैं उसकी रूप रेखा क्या है|