Wednesday, 26 November 2014

जवाबदेही के अभाव में वर्तमान शासन प्रणाली में राजनैतिक पार्टियों के घोषणा-पत्रों, नीतियों, कार्यक्रमों का अभिप्रायः समाप्त हो गया है

तमिलनाडू राज्य में जब भ्रष्टाचार की दोषी पायी गयी जे. जयललिता को अनिर्वाचित मुख्यमन्त्री बना दिया गया तब  सुप्रीम कोर्ट  में बी. आर. कपूर द्वारा दायर जनहित याचिका बी. आर. कपूर बनाम तमिलनाडू राज्य में निर्णय दि. 21.09.01 में कहा है कि जब एक निचले न्यायालय द्वारा अभियुक्त को दोषसिद्ध किया जाता है और दण्डित किया जाता है तो अभियुक्त निर्दोष  है यह मान्यता समाप्त हो जाती है। दोषसिद्धि प्रभावी हो जाती है और अभियुक्त को सजा काटनी होती है। अपील न्यायालय द्वारा सजा स्थगित की जा सकती है और अभियुक्त को जमानत पर छोड़ा जा सकता है। भारतीय संवैधानिक व्यवस्था द्वारा न्यायिक पुनरीक्षण का मौलिक एवं आवश्यक विशेष कृत्य  न्यायपालिका को सौंपा गया है। विधि शासन का सारतत्व यह है कि राज्य द्वारा शक्ति का प्रयोग, चाहे विधायिका या कार्यपालिका या अन्य प्राधिकारी द्वारा हो ,संवैधानिक सीमाओं के भीतर ही किया जाना चाहिए और यदि किसी कार्यपालक द्वारा अपनायी गयी कार्यप्रणाली संवैधानिक मर्यादा के उल्लंघन में है तब उसकी न्यायालयों द्वारा परीक्षा की जा सकती है।   
       पायोनियर पत्रिका में श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा प्रकाशित(1996), ‘‘जवाबदेही किधर’’ में हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली की वर्तमान अशुद्धता की सफाई के लिए समस्त संभव प्रक्रियागत बदलावों पर राष्ट्रीय  बहस का आह्वान किया था। उन्होंने असंतोष व्यक्त किया है कि विधायी कार्य को जिस सीमा तक सक्षमता या प्रतिबद्धता से करना चाहिए  न तो संसद, न ही राज्य विधान सभाएं कर रहीं है। उनके अनुसार, कुछ अपवादों को छोड़कर जो लोग इन लोकतान्त्रिक संस्थानों के लिए चुने जाते है, वे औपचारिक या अनौपचारिक रूप से विधि-निर्माण में न तो प्रशिक्षित हैं और न ही अपने पेशे में सक्षमता और आवश्यक ज्ञान का विकास करने में प्रवृत प्रतीत होते हैं। समाज के वे लोग जो मतदाताओं की सेवा में सामान्यतः रूचि रखते हैं और विधायी कार्य कर रहे हैं, आज की मतदान प्रणाली में सफलता प्राप्त करना कठिन पाते हैं और मतदान प्रणाली धन-बल, भुज-बल और जाति व समुदाय आधारित वोट बैंक द्वारा लगभग विध्वंस की जा चुकी है। शासन के ढांचे में भ्रष्टाचार ने लोकतंत्र के सार-मताधिकार- को ही जंग लगा दिया है, उनके अनुसार शासन -ढांचे में भ्रष्टाचार की सुनिश्चित संभावना के कारण राजनैतिक पार्टियों में अवसरवाद व बेशर्मी बढ़ी है जिससे बिना लोकप्रिय जनादेश  के प्रायः अवसरवादी गठबन्धन व समूहीकरण हुआ है। प्रणाली में कमियों के कारण वे सत्ता पर फिर भी काबिज हो जाते है तथा बने रहते हैं। जातिवाद, भ्रष्टाचार तथा राजनीतिकरण ने हमारी सिविल सेवाओं की दक्षता व निष्ठा में भी कमी की है। जवाबदेही के अभाव में वर्तमान शासन प्रणाली में राजनैतिक पार्टियों के घोषणा-पत्रों, नीतियों, कार्यक्रमों का अभिप्रायः समाप्त हो गया है।  जे. जयललिता की मुख्यमन्त्री पद पर नियुक्ति निरस्त कर दी गयी ।




Sunday, 23 November 2014

सरकारी बैंकों में डूबते ऋणों की समस्या व सुरक्षा

गत वर्षों से बैंकों के डूबत ऋणों में  भारी वृद्धि हो रही है  किन्तु सरकार को इनकी कोई विशेष चिंता नहीं है| बैंकों में ऊँचे पदों पर नियुक्तियां तो राजनैतिक हस्तक्षेप से होती ही हैं किन्तु निचले स्तर पर भी हस्तक्षेप से इनकार नहीं किया जा सकता| बड़े उद्योगपतियों को ऋण देना ऊँचे अधिकारियों की शक्तियों में आता है जिन पर राजनेताओं के उपकार होते हैं अत: उनमें कायदे कानून गुणवता सब ताक पर रख दी जाती है और ये ऋण कालांतर में डूबते हैं, मूल धन और ब्याज माफ़ कर दिए जाते हैं| दूसरी ओर बैंकों द्वारा इन ऋणियों की सम्पतियों का निर्धारित निरीक्षण  भी नहीं किया जाता| बैंकों को यह निर्देश हैं कि  वे एक लाख से बड़े ऋणों  का मासिक अंतराल से निरीक्षण  करें और इससे छोटे ऋणों का त्रैमासिक निरीक्षण  करें| जहां संदेह हो वहां  कम अवधि में निरीक्षण करें किन्तु वास्तविक स्थिति बहुत भिन्न है| बैंक ऋणों के अधिकाँश मामलों में ऋण देने के बाद कोई निरीक्षण किया ही नहीं जता है किन्तु फिर भी ऋणियों से निरीक्षण  व्यय नियमित वसूल किये जाते हैं| निरीक्षण  व्यय एक खर्चे की पूर्ति है जो लगे हुए खर्चे  की भरपाई के लिए होते हैंऐसी  स्थिति में बिना निरीक्षण  किये इनकी  वसूली बिलकुल अवैध और अनुचित है| इस स्थिति को जानते हुए भी  रिजर्व बैंक, भारत सरकार और ऑडिटर  मौन हैं |

बैंकों की वार्षिक विवरणी में बीमा के समान ऋणीवार निरीक्षण  का कोई ब्यौरा नहीं दिया जता है बल्कि अंत में एक साथ यह सामान्य और झूठी पुष्टि प्रबंधक द्वारा कर दी जाती है कि ऋणों का निर्धारित निरीक्षण  किया जाता रहा है वे सब ठीक हैं| इस प्रकार बैंक प्रबंधकों द्वारा अपने कर्तव्यों की उपेक्षा कर एक और ऋणों को डूबत बना दिया जता है वहीं ऋणियों से ऐसे खर्चे की वसूली की जा रही जो बैंकों  ने उठाये ही नहीं |

Sunday, 16 November 2014

न्यायपालिका को अपने गिरेबान में जनता की नजर से झांककर देखना चाहिए के स्वयं किस श्रेणी में आते हैं

राजस्थान पत्रिका में आज राजस्थान उच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश का लेख पढ़ने का सौभाग्य मिला जिसमें माननीय न्यायाधिपति ने अन्य बातों के साथ यह कहा है कि यह आवश्यक  कर दिया जाए कि यदि थाने  में रिपोर्ट दर्ज नहीं की  जाए तो सम्बंधित अधिकारी के विरुद्ध कार्यवाही की जाएगी| किन्तु माननीय को शायद यह ज्ञान नहीं है कि राजस्थान पुलिस अधिनियम, 2007  की धारा 31 में यह प्रावधान पहले से ही मौजूद है परन्तु यक्ष  प्रश्न यह है कि इसे लागू कौन और क्यों करेगा| किसी भी कार्य करने के लिए कोई कारण होना आवश्यक है |बिना प्रेरणा के कोई कार्य नहीं होता यह कानून की भी धारणा है|  सरकारी अधिकारी, पुलिस और न्यायिक अधिकारियों का  मानना है कि वेतन तो वे पद का लेते हैं, जनता को काम करवाना है तो पैसे देने पड़ेंगे | और तरक्की तो अपने बड़े अधिकारियों और जन प्रतिनिधियों  को खुश करने, सेवा करने मात्र से मिलती है, कर्तव्य पालन से नहीं | इनके लिए कोई आचार संहिता भी नहीं है | इन्हें दण्डित करने के लिए कोई मंच भी  नहीं है|  सेवा से हटाने के लिए उन्हें संविधान का पूर्ण संरक्षण प्राप्त है और न्यायालय से दण्डित होने पूर्व उन्हें दंड प्रक्रिया संहिता की धरा 197 का पूर्ण संरक्षण प्राप्त है|  जब कर्तव्य पालन में विफलता पर पुलिस को स्वतंत्र कहे जाने वाले न्यायाधीश भी दण्डित नहीं करते तो फिर उनके वरिष्ठ उनको दंड क्यों और कैसे दे सकते हैं जिनकी वे दिन रात सेवा करते हैं| न्यायिक अधिकारियों को पुलिस विभिन्न  सेवाएं और सुविधाएं उपलब्ध करवाती है और न्यायिक  अधिकारियों के घर जाकर मिलती रहती है व  फोन, मोबाइल से निरंतर संपर्क में रहती है तो फिर यह तो एक सपना ही हुआ कि उन्हें कोई दण्डित कर सकता है | पुलिस अधिकारी के पद पर एक बार 5 साल सेवा कर ली जाए तो इतना कमा लिया जता है कि वह अपना सम्पूर्ण  जीवन निर्वाह कर सकता है | और यदि संयोग या दुर्भाग्यवश उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया जाए तो भी पुलिस की दलाली करने का काम तो फिर भी बचा रहेगा|  
वैसे भी देश के निकम्मे और भ्रष्ट  जन प्रतिनिधि मुश्किल से ही कोई ऐसा कानून बनाते हैं जिसमें जनता के हाथों में कोई शक्ति दी  गयी हो | शक्तियां तो अधिकारियों को ही दी जाती हैं जबकि उन्हें शक्ति न दें तो भी वे धक्केशाही से झूठी शक्तियां प्राप्त कर लेते हैं |  फिर भी यदि चूक  से  कोई जन प्रिय कानून बन भी जाए तो उसकी धार को न्यायिक, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी भोंथरा कर देते हैं और वह भी निष्प्रभावी हो जाता है | सूचना का अधिकार कानून इसका जीवंत उदाहरण है |
देश और राज्य में ऐसे न्यायिक अधिकारी भी हैं जो जनता से आवेदन नहीं लेते –रजिस्टर्ड डाक को भी  लेने ही मना कर देते हैं और उनका कुछ नहीं बिगड़ता| जहां कानून में मौखिक बात कहने का प्रावधान है वहां न्यायिक अधिकारी लिखित  के लिए आदेश देते हैं और जहां लिखित का प्रावधान हैं वहां मौखिक के लिए |  देश में शायद ही कोई न्यायालय, न्यायिक, पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी होगा जो संविधान या कानून के अनुसार चलता है | जनोन्मुखी प्रावधानों  की तो 10% भी अनुपालना नहीं होती है | पुलिस पर अंगुली उठाने से पूर्व न्यायपालिका को अपने गिरेबान में जनता की नजर से  झांककर  देखना चाहिए के स्वयं किस श्रेणी में आते हैं |

http://epaper.patrika.com/c/3836949

Saturday, 15 November 2014

गिरफ्तारी और जमानत – एक दुधारू गाय

   गिरफ्तारी  और जमानत – एक दुधारू गाय
वैसे तो संविधान में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को एक अमूल्य मूल अधिकार माना गया है और भारत के सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट ने गिरफ्तारी के विषय में काफी दिशानिर्देश दे रखें हैं किन्तु मुश्किल से ही इनकी अनुपालना पुलिस द्वारा की जाती है| सात साल तक की सजा वाले अपराधों के अभियुक्तों को गिरफ्तार करने की कानूनन भी कोई आवश्यकता नहीं है किन्तु छिपे हुए उद्देश्यों के लिए पुलिस तो असंज्ञेय और छिटपुट अपराधों में भी गिरफ्तार कर लेती है और जमानत भी नहीं देती| निचले न्यायालयों द्वारा जमानत नहीं लेने के पीछे यह जन चर्चा का विषय होना स्वाभाविक है कि जिन कानूनों और परिस्थितियों में शीर्ष न्यायालय जमानत ले सकता है उन्हीं परिस्थितियों में निचले न्यायालय अथवा पुलिस जमानत क्यों नहीं लेते| देश का पुलिस आयोग भी कह चुका है कि 60 % गिरफ्तारियां अनावश्यक होती हैं तो आखिर ये गिरफ्तारियां होती क्यों हैं और जमानत क्यों नहीं मिलती? इस प्रकार अनावश्यक रूप से गिरफ्तार किये गए व्यक्ति को मजिस्ट्रेट द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 59 के अंतर्गत बिना जमानत छोड़ दिया जाना चाहिए व पुलिस आचरण की भर्त्सना की जानी चाहिए  किन्तु न तो वकीलों द्वारा ऐसी प्रार्थना कभी की जाती है और न ही मजिस्ट्रेटों द्वारा ऐसा किया जाता है| ये यक्ष प्रश्न आम नागरिक को रात दिन कुरेदते हैं| दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437 में प्रावधान है कि किसी  गैर-जमानती अपराध के लिए  पहली बार गिरफ्तार किये गए व्यक्ति को पुलिस द्वारा भी जमानत दी सकती है यदि अपराध मृत्यु दंड अथवा आजीवन कारावास से दंडनीय न हो| किन्तु स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक भी ऐसा उदाहरण मिलना मुश्किल जहां पुलिस ने इस प्रावधान की  अपनी शक्तियों का कभी विवेकपूर्ण उपयोग किया हो और किसी व्यक्ति को जमानत दी  हो| पुलिस का बड़ा अजीब तर्क होता  है कि यदि वे इस प्रावधान में जमानत स्वीकार कर लेंगे तो उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगेंगे इसलिए वे जमानत नहीं लेते|   इस प्रकार जमानत जो भी अधिकारी लेगा उस पर भ्रष्टाचार के आरोप तो लगेंगे ही चाहे उसका स्तर कुछ भी क्यों न हो | आश्चर्य की बात है कि जो कार्य पुलिस को करना चाहिए वह कार्य देश के न्यायालय प्रसन्नतापूर्वक  करते हैं और वे पुलिस से जमानत नहीं लेने का कारण तक नहीं पूछते, न ही वकील निवेदन करते कि पुलिस ने जमानत लेने से इन्कार  कर दिया इसलिए उन्हें न्यायालय आना पडा | क्या यह स्पष्ट दुर्भि संधि नहीं है ? न ही कभी सुप्रीम कोर्ट ने अपने इतिहास में इस हेतु किसी पुलिस अधिकारी से जवाब पूछा है कि उसने जमानत क्यों नहीं ली|

हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की स्थापना संवैधानिक प्रावधानों  कि व्याख्या करने के लिए की जाती है किन्तु राजस्थान उच्च न्यायालय में एक वर्ष में लगभग 18000 जमानत आवेदन आते हैं जिससे इस रहस्य को समझने में और आसानी होगी| अन्य हाई कोर्ट  की स्थिति भी लगभग समान ही है|  जमानत के बहुत से प्रकरण सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचते हैं | जमानत देने में निचले न्यायालयों और पुलिस द्वारा मनमानापन बरतने के अंदेशे के कारण प्रख्यात लेखिका तसलीमा नसरीन को सीधे ही सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दी थी | शायद विश्व में भारत ही ऐसा देश है जहां लोगो को जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट तक की यात्रा करनी पड़ती है  फिर  अंतिम न्याय किस मंच से मिलेगा ...विचारणीय प्रश्न है |
गिरफ्तारी का उद्देश्य यह होता है कि अभियुक्त न्यायिक प्रक्रिया से गायब न हो और न्याय निश्चित किया जा सके | किन्तु भारत में तो  मात्र 2% से भी कम मामलों में सजाएं होती हैं अत: 2% दोषी लोगों के लिए 98% निर्दोष लोगों की गिरफ्तारी करना अथवा उन्हें पुलिस, मजिस्ट्रेट, सत्र न्यायालय अथवा हाई कोर्ट द्वारा जमानत से इन्कार कर सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए विवश करने  का क्या औचित्य रह जाता है –समझ से बाहर है | बम्बई उच्च न्यायालय ने आपराधिक अपील संख्या  685/ 2013 के निर्णय में कहा है कि यदि एक मामले में दोषी सिद्ध होने की संभावना कम हो व अभियोजन से  कोई उद्देश्य पूर्ति न हो तो न्यायालय को मामले को प्रारम्भिक स्तर पर ही निरस्त कर देना चाहिए | मेरे विचार से जब भी किसी मामले में अनावश्यक गिरफ्तार किया जाए या जमानत से इन्कार  किया जाए तो अभियुक्त की ओर  से यह निवेदन भी  किया जाना चाहिए कि मामले में दोष सिद्धि की अत्यंत क्षीण संभावना है अत: उसकी गिरफ्तारी या जमानत से इन्कारी  अनुचित होगी और यदि अभियुक्त आरोपित अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया गया तो हिरासत की अवधि के लिए उसे उचित क्षति पूर्ति दी जाए | इस दृष्टि से तो भारत के अधिकाँश मामले, आपराधिक न्यायालय, अभियोजन  और पुलिस के कार्यालय ही बंद हो जाने चाहिए|   
इंग्लैंड में पुलिस एवं आपराधिक साक्ष्य अधिनियम की  धारा 44  के अंतर्गत  पुलिस द्वारा रिमांड की मांग करने पर उसे शपथपत्र देना पडता है| कहने के लिए भारत में कानून का राज है और देश का कानून सबके लिए समान है किन्तु अभियुक्त को तो जमानत के लिए विभिन्न प्रकार के वचन देने पड़ते हैं और न्यायालय भी जमानत देते समय कई अनुचित शर्तें थोपते हैं और दूसरी ओर पुलिस को रिमांड माँगते समय किसी प्रकार के वचन देने की कोई आवश्यकता नहीं है मात्र जबानी तौर मांगने पर ही रिमान्ड दे दिया जाता है| पुलिस द्वारा रिमांड मांगते समय न्यायालयों को पुलिस से अंडरटेकिंग लेनी चाहिए कि वे रिमांड के समय देश के संवैधानिक न्यायालयों द्वारा जारी समस्त निर्देशों और मानवाधिकार पर अंतर्राष्ट्रीय संधि की समस्त बातों की अनुपालना करेंगे|
यद्यपि देश का कानून गिरफ्तारी के पक्ष में नहीं है फिर भी  गिरफ्तारियां महज  इसलिए  की जाती हैं कि पुलिस एवं जेल अधिकारी गिरफ्तार व्यक्ति को यातना न देने और सुविधा देने, दोनों के लिए वसूली करते हैं तथा अभिरक्षा के दौरान व्यक्ति पर होने वाले भोजनादि व्यय में  कटौती का लाभ भी जेल एवं पुलिस अधिकारियों को मिलता है| इस प्रकार गिरफ्तारी में समाज का कम किन्तु न्याय तंत्र से जुड़े सभी लोगों का हित अधिक निहित है|

आस्ट्रेलिया में जमानत को व्यक्ति का अधिकार बताया गया है तथा जमानत के लिए अलग से एक कानून है  किन्तु हमारे यहाँ तो धन खर्च करके स्वतंत्रता खरीदनी पड़ती है | उत्तर प्रदेश में तो सत्र न्यायाधीशों द्वारा अग्रिम जमानत लेने का अधिकार ही दिनांक 01.05.1976   से छीन लिया गया है और इस लोक तंत्र में स्वतंत्रता के अधिकार को  एक फरेब व मजाक बनाकर रख दिया है | पुलिस को गिरफ्तारी का अधिकार मात्र तभी होना चाहिए जब कोई सात साल से अधिक अवधि की सजा वाला अपराध उसकी मौजूदगी में किया जाए अन्यथा जब मामला न्यायालय में चला जाए व  गिरफ्तारी उचित और वांछनीय हो तो सक्षम मजिस्ट्रेट  से वारंट प्राप्त किया जा सकता |  गिरफ्तारियों और जमानत का यह सिलसिला इसलिए जारी है क्योंकि यही भारतीय न्याय प्रणाली उर्फ़  मुकदमेबाजी उद्योग की रीढ़ है  और सम्बद्ध लोगों के लिए दुधारू गाय है | सत्तासीन लोग भी पुलिस क्रूरता और पुलिस की भय उत्पन्न करने वाली कर्कश आवाज़ के दम पर ही शासन कर रहे हैं | 

Thursday, 6 November 2014

भारत में पुलिस राज के पद सोपान और शासन तंत्र पर मजबूत पकड़

सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दे रखी है कि किसी भी व्यक्ति पर उसकी सहमति के बिना नार्को या पॉलीग्राफ टेस्ट नहीं किया जाए| किन्तु यह आदेश कितना प्रभावी है कहना आसान नहीं होगा| हिरासत में व्यक्ति से पूछताछ के लिए पुलिस द्वारा थर्ड डिग्री इस्तेमाल किया जाना कोई नया नहीं है| फिर भी जब हिरासती व्यक्ति किसी प्रकार के नशे का आदी हो तो पुलिस के लिए यह कार्य और आसान है| नशीले पदार्थ और अवैध हथियार तो पुलिस के पास उपलब्ध रहते ही हैं| उसे मित्रतापूर्वक नशा करवाके पूछताछ की जाती है| यदि सामन्य नशे से बात न बने तो फिर बहुत ज्यादा नशा दिया जाता है और होश खोने पर उससे पूछताछ की जाती है|     

हिरासती व्यक्ति पर प्रयुक्त यातनाओं के मामले समय समय पर मिडिया के माध्यम से उजागर होते  रहते  है और पुलिस द्वारा नए–नए तथा अमानवीय  तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि मानवाधिकार पर 1955 में अंतर्राष्ट्रीय संधि के बावजूद इन्हें रोकने के लिए भारत में कोई कानून नहीं है और न ही हमारे संविधान में कहीं मानव अधिकार शब्द का उपयोग तक किया गया है| 6 करोड़ की आबादी वाले फिलीपींस ने इस सम्बन्ध में एक व्यापक कानून बना दिया है और भारत सरकार को इसके अनुसरण के लिए मैंने काफी समय पहले परामर्श भी दिया है| मारपीट तो पुलिस अपना अधिकार समझती है| गुप्तांगों में मिर्ची, पेट्रोल, केरोसिन, कंकड़, डंडे आदि का इस्तेमाल तो सर्व विदित हैं और ये तरीके अब पुराने पड़ गए हैं| छत्तीसगढ़ में सोनी सोरी के साथ की गयी अमानवीय बर्बरता से पूरा देश परिचित है| संवेदनशील अंगों को बिजली के नंगे तार से स्पर्श भी पुलिस द्वारा प्रयोग किया जाता है| हवालात में बंद व्यक्ति को सिर्फ अधो वस्त्रो में रखा जाता है और उसे न पेशाब के लिए बाहर लाया जाता और न ही उसे पीने के लिए पानी दिया जाता बल्कि एक घडा हवालात में ही रख दिया जता है और हिरासती व्यक्ति को यह कहा जाता है कि वह उस घड़े में पेशाब कर ले और प्यास लगने पर वही पी ले| कई बार तो हिरासती व्यक्ति को एक दम निर्वस्त्र करके रखा जाता है और साथ में उसकी माँ, बहन, सास आदि को भी उसी हवालात में निर्वस्त्र रखा जाता है तथा हिरासती व्यक्ति को दुष्कर्म के लिए विवश किया जाता है| पुलिस को जब लगे कि हिरासती व्यक्ति साधारण यातना से जुबान नहीं खोलेगा या अपराध (चाहे किया हो या नहीं ) कबूल नहीं करेगा और शिकायतकर्ता ने पुलिस को खुश कर दिया हो तो यातना के और उन्नत व बर्बर तरीके अपना सकती है| हिरासती व्यक्ति के मुंह पर मजबूत टेप चिपका दी जाती है, टेबल पर सीधा लेटा दिया जाता है, हाथ पीछे की ओर बाँध दिए जाते हैं| अब उसकी नाक में पाइप से पानी चढ़ाया जाता है, व्यक्ति का दम घुटने लगता है और कई बार तो सांस भी चढ़ जाती है जो काफी देर बाद लौटती है| मल-मूत्र का बलपूर्वक सेवन करवाना, गर्म तेल या ठन्डे पानी, सिगरेट के  टुकडे, तेजाब,  पानी में डुबोना, दुष्कर्म, खींचकर नाख़ून-दांत-केश निकालना, धूप या तेज रोशनी, प्लास्टिक की थेली से सर ढककर दम घोटना, नींद और विश्राम के बिना लम्बी पूछताछ, सार्वजानिक स्थल पर बदनामी, परिवार के सदस्यों को हानि की धमकी, गांधी कटिंग आदि पुलिस बर्बरता की कहानी के कुछ प्रचलित नमूने हैं|   
बर्बर पुलिस टांगों के बीच में चारपाई फंसाने व गुप्तांगों पर तेज चोट पहुंचाकर नपुंसक बनाने का कृत्य भी निस्संकोच कर देती है और चुनौती देकर हिरासती व्यक्ति को यह कहती है कि अब तुम्हारी बीबी किसी और की ही प्रतीक्षा करेगी| स्मरणीय है कि पुलिस बर्बरता से निपटने के लिए देश में कोई प्रभावी कानून नहीं है| मानवाधिकार आयोगों में भी जांच के लिए पुलिस अधिकारी ही हैं और वे भाई चारे के मजबूत बंधन में बंधे हुए अपनी बिरादरी के विरुद्ध कोई न्यायोचित व सही रिपोर्ट नहीं करते| हमारी पुलिस वैसे भी तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने में सिद्धहस्त और भ्रष्ट है| इस कारण आपराधिक मामलों में मात्र 2% को ही सजाएं होती हैं| जेल  में बंद हिरासती व्यक्तियों को पैसे के बदले सभी सुविधाएं उपलब्ध करवाना तो समय समय पर मिडिया में उजागर होता रहता है और यदि कोई कैदी जेल से इस बीच भाग जाए तो जेल के सरियों को बाद में लोहे की आरी से काटकर जेल तोड़ने के मामले का रूप दे दिया जाता है| यह भारतीय लोकतंत्र की रक्षक की पुलिस की कहानी का एक अंश मात्र है जोकि अंग्रेजी शासन काल से भी ज्यादा शर्मनाक है| आम नागरिक की तो हैसियत ही क्या है जब नडियाद (सुशासन वाले गुजरात राज्य) में एक मजिस्ट्रेट को जबरदस्ती शराब पिलाकर पुलिस ने उसका सरे बाज़ार आम जुलूस निकाल दिया था व डॉक्टरों से फर्जी प्रमाण पत्र हासिल कर लिया और सुप्रीम कोर्ट ने मामले में कहा कि गुजरात प्रशासन पुलिस से डरता है| किन्तु किसी भी सरकार ने गत 67 वर्षों से इसमें सुधार का कोई निष्ठापूर्वक प्रयास नहीं किया है क्योंकि भारत में सभी सरकारें पुलिस की बर्बरता और भय उत्पन्न करने वाली कर्कश आवाज की ताकत पर ही चल रही हैं –पार्टी या लेबल चाहे कुछ भी रहा हो|


Sunday, 2 November 2014

दुर्जनों का बल सज्जनों को सताने के लिए होता है

दुर्जनों का बल सज्जनों को सताने के लिए होता है   

फेसबुक पर एक मित्र ने कहा कि जब पुलिस एक आम नागरिक को यातना देकर सब कुछ उगलवा सकती है तो फिर इन काले धन वालों के लिए यही सब कुछ क्यों नहीं करती| किन्तु पुलिस की क्या औकात है शायद उन्हें ज्ञात नहीं है| नीतिशास्त्र में कहा गया है दुर्जनों का बल सज्जनों को सताने के लिए होता है| एक पुलिस वाले से बातचीत में किसी अपराधी के भाग जाने का जिक्र किया तो पुलिस वाले ने कहा कि भागकर वह कहाँ जायेगा पुलिस पूरे खानदान को बुला लेगी| जनाब यह है पुलिसिया अंदाज और रोब|
किन्तु क्या पुलिस सभी के साथ ऐसा कर पाती है? आपात स्थिति के समय सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी का युवा बेटा और बेटी रात को सिनेमा देखकर आ रहे थे और उनको पुलिस वालों ने रोक लिया तथा थाने ले गए| पुलिस वालों के देखने में वे बच्चे किसी संभ्रांत और कुलीन परिवार के लगे इसलिए सोचा मुर्गा फंस गया आज अच्छी बरकत होगी| उस समय मोबाइल नहीं थे इसलिए बच्चों को उनके पिताजी से फोन पर बात करवाई गई ताकि माल मिल सके| सेना के अधिकारी अपने दल बल के साथ थाने आये  और पूरे थाने के स्टाफ को ही ट्रक में डालकर मिलिट्री एरिया में ले गए| राज्य के मुख्य सचिव को फ़ोन किया और कहा कि ये लोग मिलिट्री एरिया में रात को घुसपेठ करते पकडे गए हैं इन्हें गोली से उड़ा देंगे | आखिर समझाईश से मामला शांत हुआ|  
इसी तरह एक अति उत्साही थानेदार के पास वार्ता करने आये एक नगरपालिका के भूतपूर्व अध्यक्ष के उन्होंने  थप्पड़ रसीद कर दिया जोकि उनकी भाषा और संस्कृति है| उन नेताजी ने वहीं कह दिया कि इस थप्पड़ का बदला 3 दिन के भीतर ही ले लेंगे, याद रखना| एक रात को थानेदार महोदय गश्त पर निकले और उनके चारों और गाड़ियां लगाकर बिलकुल फ़िल्मी अंदाज में अपहरण कर लिया गया| उनके साथ वाले सब पुलिस वाले अलग हो गये| सात दिन तक उन्हें गुप्त स्थान पर रखा गया और पैरों के तलवों को पीट पीट कर चलने योग्य भी नहीं छोड़ा| आखिर में उन्हें यह कहते हुए छोड़ा गया कि हम चाहते तो तुम्हें मार भी सकते थे किन्तु हम चाहते हैं कि तुम्हें यह जीवन भर याद रहे इसलिए जीवित छोड़ रहे हैं| उन्होंने कोई रिपोर्ट तक दर्ज नहीं करवाई और बाद में जिला पुलिस अधीक्षक को पता चला तो उन्होंने थानेदार महोदय से कहा कि तुमने मुझे बताया ही नहीं| थानेदार महोदय ने जवाब दिया -साहेब बताकर क्या करता पुलिस की बदनामी होती| बाद में वही थानेदार महोदय एक जगह शराब की भट्टी पर दबिश देने जीप लेकर पहुँच गये|  वहां उपस्थित लोगों ने उन्हें समझाया कि आप अपनी गाडी को स्टार्ट करके उलटी ही वापिस ले जाएँ वरना भट्टी में लकड़ियों की जगह आपको झोंक देंगे| थानेदार महोदय बड़े आज्ञाकारी निकले और कहना मानके जीप को बेक करके लौट आये|   

आम निहत्थे नागरिक को पुलिस फर्जी मुठभेड़ में मार देती है और पुलिस को खरोंच तक नहीं आती और जब असली मुठभेड़ होती है तो विकास दुबे जैसे लोग पुलिस को उसकी औकात बता देते हैं |    


Saturday, 1 November 2014

खाकी – चरितमानस

पुलिस तो एक रासायनिक यौगिक है जो पैसा +पॉलिटिक्स+प्रेशर से तैयार होता है |हम भ्रम में रहते हैं तो यह कसूर हमारा है| पुलिस और ईमानदार दो  विरोधा भाषी बातें हैं| मैंने सुना तो बहुत है पर आजतक एक भी ईमानदार पुलिसवाला नहीं देखा|अगर कोई ईमानदार है भी तो वह साहसी नहीं है| उसकी ईमानदारी किस काम की| पुलिस में रहकर जो ईमानदार दिखाई देते हैं समझिये वे ईमानदार तो नहीं किन्तु खुले रूप से भ्रष्ट नहीं हैं| पुलिस से ज्यादा डरपोक और कोई नहीं होता जोकि साल में  भारत में ही दस हज़ार से ज्यादा लोगों को फर्जी  मुठभेड़ और हिरासत में मारती है| पुलिस में ऐसा वातावरण ही नहीं होता कि वहां ईमानदारी  पनपे| गलती से यदि कोई ईमानदार पुलिस में भर्ती हो भी जाए तो वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकता| पुलिस में भर्ती  होने वाले भी परिस्थितियाँ जानते हैं और सोच  समझकर भर्ती होते हैं| जिस तरह तेज हवा से तालाब में तैरता कचरा एक तरफ इकठा हो जाता है उसी तरह का कचरा यह पुलिस है  जो एक तरफ इकठा हो जाता है| जो कुछ थोड़ा बहुत अच्छा दिखाई दे रहा है वह नाक बचाने के लिए  ईमानदारी का नाटक ही है| किरण बेदी जैसी साहसी कही जाने वाली महिला सेवानिवृति के 5 साल बाद कहती है कि उससे रिश्वत मांगी गयी -जो स्वयं के साथ हुए अन्याय  का विरोध नहीं कर सके वह दूसरों को क्या न्याय दिल देंगी| पुलिस का मतलब पुलिस है चाहे उसका पद, जाति या वर्ग कुछ भी हो| इन्हीं कारणों से बिहार और उत्तर प्रदेश में पुलिस को बड़े लोक प्रिय नामों से जाना जाता है| पुलिस वाले राजनेताओं से भी अधिक कूटनीतिज्ञ होते हैं | पुलिस वाला यदि किसी प्रभाव में है तो वह आपका स्वागत सत्कार तो कर देगा, चाय नाश्ता दे देगा किन्तु फिर भी वह आपका काम कभी नहीं करेगा| यह मेरा अनुभव है कोई कल्पना नहीं है| जमीन के फर्जी बेचान के मामले में जांच मेरे एक सहपाठी पुलिस निरीक्षक के पास थी और 3 साल तक उसमें कोई कार्यवाही नहीं हुई| बाद में वही फाइल मेरे एक सह कर्मी के बड़े भाई  के पास आ गयी किन्तु टस से मस नहीं हुई|  बाद में गियर लगाने पर ही गाड़ी आगे बढी| पुलिस  को ट्रेनिंग  में ही यह सब बताया जाता है – कैसे उत्पीडन करना है, किस प्रकार पैसा ऐंठना है,  कैसे गालियाँ बकनी हैं आदि आदि | वहां हवलदार होता है जो डी एस पी तक को गालियाँ बकता है और गलियां सुनते सुनते ये पुलिस वाले ढीठ हो जाते हैं | बाद में इन्हें बड़े अधिकारी या नेता गालियाँ बकें तो इन पर कोई ज्यादा असर नहीं होता है| यों तो पुलिस लोगों से हफ्ता लेती है किन्तु पत्रकार समुदाय को यह इस बात के लिए हफ्ता देती है कि वे उसके सराहनीय कार्यों को उजागर करें और बदनामी वालों को दबा दें| इसके लिए वे पत्रकारों तक समाचार स्वयम पहुंचा देते हैं अथवा छापा मरने के लिए जाते समय उन्हें सूचित कर देते हैं| तभी तो छापे के समाचार सचित्र आ जाते हैं |  
एक रिटायर्ड  पुलिस वाले ने बातचीत में बताया कि रिटायरमेंट के बाद सबसे ज्यादा दुर्गति उनकी ही होती है| समाज में उन्हें कोई सम्मान से नहीं देखता |यह पुलिस वालों को भी ज्ञान है | सी बी आई के एक भूतपूर्वक निदेशक फेसबुक पर हैं किन्तु उन्होंने अपनी पुलिस सेवा का खुलासा नहीं किया है| एक सेवानिवृत पुलिस महानिदेशक, जो पुलिस सुधार के नाम पर सुर्ख़ियों में हैं, से एक सेवा निवृत कनिष्ठ पुलिस अधिकारी ने पुलिस सुधार के प्रसंग में संपर्क करना चाहा किन्तु उन्होंने  समयाभाव बताकर मना कर दिया| किन्तु उन्ही महानिदेशक से जब 15 मिनट  बाद ही उसी कनिष्ठ ने एक विदेशी महिला के साथ जाकर भेंट की तो वे बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने न सिर्फ उन्हें चाय नाश्ते से स्वागत किया बल्कि दोपहर का भोजन भी करवाया!


Wednesday, 22 October 2014

जयललिता को जमानत देने और निर्णय पर रोक लगाने पर प्रश्न चिन्ह ...

न्यायिक शक्तियों के प्रयोग पर प्रश्न  चिन्ह ...

समय समय पर भारत की न्यायपालिका द्वारा शक्तियों के प्रयोग पर प्रश्न चिन्ह उठते रहे हैं | यद्यपि समय समय पर देश की न्यायपालिका और उसके पैरोकार न्यायिक गरिमा का दम भरते हैं किन्तु हाल ही में जयललिता को जमानत देने और निर्णय पर रोक लगाने का मामला एक ताज़ा और ज्वलंत उदाहरण है| सोनी सोरी के मामले में न्यायपालिका की रक्षक भूमिका को भी जनता भूली नहीं है| एक  साध्वी को हिरासत में दी गयी यातनाएं के जख्म और जमानत से इंकारी  भी ज्यादा पुराने नहीं हैं |  अहमदाबाद के मजिस्ट्रेट द्वारा मुख्य न्यायाधीश के वारंट जारी करने का मामला भी 7 दिन के भीतर रिपोर्ट प्राप्त होने के बावजूद 10 वर्ष से विचाराधीन है| गंभीर बीमारियों से पीड़ित संसारचन्द्र  को जमानत से इन्कारी और तत्पश्चात उसकी मृत्यु भी एक बड़ा प्रश्न चिन्ह उपस्थित करते हैं जबकि संजय दत्त को उसकी बहन की प्रसव काल में मदद के लिए जमानत स्वीकार करना गले नहीं उतरता| तरुण तेजपाल के विरुद्ध बिना शिकायत के मामला दर्ज करना और जमानत से तब तक इंकार करना जब तक उसकी माँ की मृत्यु नहीं हो जाती और दूसरी ओर आम नागरिक की फ़रियाद पर भी रिपोर्ट दर्ज न होना किस प्रकार न्यायानुकूल कहा जा सकता है |   विकसित  देशों को छोड़ भी दिया जाए तो भी भारत की न्यायपालिका उसके पडौसी पाकिस्तान और श्रीलंका के समकक्ष भी नहीं मानी जा सकती |

एक टी वी द्वारा जयललिता मामले में बहस का प्रसारण भी वकील समुदाय द्वारा प्रतिकूल मानकर अवमान कार्यवाही की मांग दुर्भाग्यपूर्ण और लोकतंत्र व  विचार अभिव्यक्ति के अधिकार पर गंभीर कुठाराघात है|  जबकि अमेरिकी न्यायालयों की बहस ऑनलाइन इन्टरनेट पर सार्वजनिक रूप से भी उपलब्ध है| इंग्लॅण्ड का एक रोचक मामला इस प्रकार है कि एक भूतपूर्व जासूस पीटर राइट ने अपने अनुभवों पर आधारित पुस्तक लिखी| ब्रिटिश सरकार  ने इसके प्रकाशन को प्रतिबंधित करने के लिए याचिका दायर की कि पुस्तक गोपनीय है और इसका  प्रकाशन राष्ट्र हित के प्रतिकूल है| हॉउस ऑफ लोर्ड्स ने 3-2  के बहुमत से पुस्तक के प्रकाशन पर रोक लगा दी| प्रेस इससे क्रुद्ध हुई और डेली मिरर ने न्यायाधीशों के उलटे चित्र प्रकाशित करते हुए ये मूर्खशीर्षक दिया| किन्तु इंग्लॅण्ड में न्यायाधीश व्यक्तिगत अपमान पर ध्यान नहीं देते हैं| न्यायाधीशों का विचार था कि उन्हें विश्वास है वे मूर्ख नहीं हैं किन्तु अन्य लोगों को अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार है| ठीक इसी प्रकार यदि न्यायाधीश वास्तव में ईमानदार हैं तो उनकी ईमानदारी पर लांछन मात्र से तथ्य मिट नहीं जायेगा और यदि ऐसा प्रकाशन तथ्यों से परे हो तो एक आम नागरिक की भांति न्यायालय या न्यायाधीश भी समाचारपत्र या टीवी से ऐसी सामग्री का खंडन प्रकाशित करने की अपेक्षा कर सकता है| न्यायपालिका का गठन नागरिकों के अधिकारों और प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए किया जाता है न कि स्वयं न्यायपालिका की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए| न्यायपालिका की संस्थागत छवि तो निश्चित रूप से एक लेख मात्र से धूमिल नहीं हो सकती और यदि छवि ही इतनी नाज़ुक या क्षणभंगुर हो तो स्थिति अलग हो सकती है| जहां तक न्यायाधीश की व्यक्तिगत बदनामी का प्रश्न है उसके लिए वे स्वयम व्यक्तिगत कार्यवाही करने को स्वतंत्र हैं| इस प्रकार अनुदार भारतीय न्यायपालिका द्वारा अवमान कानून का अनावश्यक प्रयोग समय समय पर जन चर्चा का विषय रहा है जो मजबूत लोकतंत्र की स्थापना के मार्ग में अपने आप में एक गंभीर चुनौती है|

न्यायालयों में सुनवाई के सार का  सही एवं विश्वसनीय रिकार्ड, फाइलिंग एवं सक्रिय सहभागिता  एक सशक्त , पारदर्शी  और विश्वसनीय न्यायपालिका की कुंजी है | 1960 के दशक से ही पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका के विकसित देशों में आंतरिक रिकोर्ड रखरखाव की प्रक्रिया की प्रभावशीलता में सुधार के लिए मांग उठी| सामान्यतया अधिक लागत वाली श्रम प्रधान (हाथ से संपन्न होने वाली) प्रक्रिया की तुलना में स्वचालित रिकार्ड करने और स्टेनोग्राफी के उपकरणों की ओर परिवर्तन को उत्तरी अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के बाहर एक चुनौती के रूप में देखा जाता है| विकसित राष्ट्रों में  न्यायालयों को सशक्त सूचना संचार तकनीक ढांचे और कुशलता का लाभ मिलता है जिससे रोजमर्रा की कार्यवाहियों का ऑडियो वीडियो रिकार्ड, स्टेनो मशीन और बहुत से अन्य कार्य कंप्यूटर प्रणालियाँ के माध्यम से करना अनुमत है |

विकासशील और संघर्षरत राष्ट्रों में तकनीकि ढांचे का सामान्यतया अभाव है| इसलिए स्वस्थ न्यायिक तंत्र के निर्माण या पुनर्निर्माण में अन्तर्वलित महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दों के अतिरिक्त विकासशील और संघर्षरत राष्ट्रों को न्यायसदन में रिकार्डिंग प्रणाली में सुधारों को प्रभावी बनाने हेतु तकनीकि ढांचे में भी सुधार करने चाहिए| आज अमेरिकी राज्यों सहित नाइजीरिया, बुल्गारिया, कजाखस्तान और थाईलैंड में मशीनीकरण पर भूतकालीन और चालू अनुभव  के आधार पर अध्ययन करने वाले निकाय हैं| मशीनीकृत रिकार्डिंग प्रणाली वाले न्यायसदन स्थापित करने और विकसित करने का ज्ञान रखने  वाले  निकाय दिनों दिन बढ़ रहे हैं| इन अध्ययनों में पश्चिमी विकसित  और विकासशील -दोनों- देशों में कुशल न्यायसदन रिकार्डिंग प्रणालियाँ स्थापित करने में चुनौतियाँ उभरकर सामने आई हैं | इन अध्ययनों में विकासशील राष्ट्रों की न्यायसदन में हाथ से  रिकार्डिंग की प्रणाली से अधिक दक्ष स्वचालित रिकार्डिंग प्रणाली की ओर परिवर्तन में सहायता करने के महत्त्व की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है और इससे होने वाले लाभों की सूची भी दी गयी है|

विकसित, विकासशील और संघर्षरत राष्ट्रों में इस उच्च तकनीकि परिवर्तन में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है जैसे लागत में वृद्धि, सामान्य कानून एवं सिविल कानून में साक्ष्य रिकार्डिंग के भिन्न भिन्न मानक, उपकरणों के उपयोग के लिए प्रारंभिक एवं उतरवर्ती प्रशिक्षण, सुविधाओं का अभाव और मशीनीकरण के कारण बेरोजगारी| उच्च तकनीकि रिकार्डिंग प्रणालियाँ स्थापित करने के लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति के साथ साथ पर्याप्त वितीय संसाधनों की आवश्यकता है| दूसरे राष्ट्र  ऊँची लगत वाली उन्नत रिकार्डिंग मशीनों की लागत वसूली के लिए संघर्ष करते रहते हैं| अमेरिका में मेरीलैंड राज्य में और कजाखिस्तान गणतंत्र में  राजनैतिक इच्छाशक्ति और  वितीय संसाधन दोनों ही विद्यमान थे तथा वहाँ परंपरागत रिकार्डिंग प्रणाली से नई उन्नत तकनीक की ओर  परिवर्तन सफल रहा |
मेरीलैंड के अध्ययन से प्रदर्शित होता है कि नई रिकार्डिंग मशीन प्रणाली लगाने की एकमुश्त लागत प्रतिपूर्ति करने वाले दीर्घकालीन लाभों- वेतन भत्तों में कमी  आदि - को देखते हुए न्यायोचित है| अन्यथा एकमुश्त लागत एक चुनौती ही रहती है| कजाखिस्तान जैसे कई राष्ट्रों ने वितीय चुनौतियों पर विजय पाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से साझेदारी भी की गयी है| दीर्घकालीन लाभों को देखते हुए मुख्य न्यायालयों में उच्च तकनीक वाली रिकार्डिंग प्रणाली लगाया जाना तुलनात्मक रूप में वहनीय हो सकता है| किसी भी सूरत में  समस्त विकासशील या संघर्षरत देशों में राजनैतिक इछाशक्ति, आधारभूत ढांचा और या साझी संस्थाओं के साथ नवीन प्रणाली स्थापित करने के संबंधों का अभाव है| वर्तमान में युद्धजर्जरित लाइबेरिया में न्यायाधीश सुनवाई हेतु  बैठने के लिए स्थान पाना मुश्किल पा रहे हैं| ढांचे विद्युत शक्ति सहित- को स्थिर करना भी एक समस्या है|

वितीय पहलू के अतिरिक्त न्यायालय अपने ऐतिहासिक परम्पराओं के कारण भी एक चुनौती का सामना कर सकते हैं| परंपरागत आपराधिक कानून मौखिक साक्ष्य और मौखिक रिकार्ड को उच्च प्राथमिकता देता है जबकि सिविल न्याय मौखिक रिकार्ड को कम महत्त्व देता है| गवाह न्यायाधीश के सामने साक्ष्य देते हैं (भारत में व्यवहार में न्यायाधीश की अनुपस्थिति में भी साक्ष्य चलता रहता है), और न्यायाधीश इसका सार  रजिस्ट्रार को देता है जोकि इसे टाइप करता है| पक्षकार/साक्षी को समय-समय पर इसे पुष्ट करने के लिए कहा जाता है कि क्या  यह सही है और पक्षकार को जहाँ कहीं वह उचित समझे दुरुस्त कराने के लिए प्रेरित किया जाता है| आडियो वीडियो प्रणाली से अवयस्कों और उन लोगों का भी परीक्षण संभव है जो मुख्य न्यायालय में सुनवाई में उपस्थित नहीं हो सकते हैं|

फ़्रांस में न्यायालय क्लर्क न्यायाधीश और पक्षकारों के मध्य विनिमय किये गए समस्त रिकार्ड का लेखाजोखा रखने के दयित्वधीन है| वहाँ कोई मौखिक रिकार्ड नहीं रखा जाता है |इस प्रकार फ़्रांसिसी सिविल मामलों में मौखिक परीक्षण का रिकार्ड रखने के बजाय परीक्षण कार्यवाही के सार पर बल दिया जाता है | आपराधिक मामलों में फ़्रांस में दृष्टिकोण थोडा भिन्न है| इन मामलों में न्यायाधीश ऑडियो वीडियो रिकार्ड की अपेक्षा कर सकता है | फ़्रांस में आपराधिक मामलों में ऑडियो वीडियो रिकार्डिंग स्वतः नहीं है अपितु न्यायाधीश के विवेक पर है| ऐसी रिकार्डिंग जो स्पष्टतया अनुमोदित नहीं हो मुख्य न्यायाधीश द्वारा 18000 यूरो से अन्यून दंडनीय है| ऐतिहासिक मामलों में ऑडियो वीडियो रिकार्डिंग संग्रहालय में भी संधारित की जाती हैं| उदाहराणार्थ  उक्रेन में मामले  के दोनों अथवा एक पक्षकार द्वारा आवेदन करने या न्यायाधीश द्वारा पहल करने के अतिरिक्त कार्यवाही की रिकार्डिंग नहीं की जाती है| परिणामस्वरूप अधिकांश कार्यवाही पुराने परंपरागत ढंग से स्टेनो, टाइप आदि द्वारा जारी रहती है| सामान्यतया न्यायाधीशों द्वारा भी इस नवीन प्रणाली का प्रतिरोध किया जाता है| जहाँ कहीं भी नए कानूनी प्रावधान मौखिक रिकार्डिंग के पक्ष में हैं न्यायाधीश परिवर्तन का विरोध करते हैं|
भारत में भी सिविल मामलों में यद्यपि गवाह  द्वरा बयान शपथ पत्र द्वारा वर्ष 1999 से ही अनुमत किया जा चुके हैं किन्तु अभी भी गवाहों को बयान के लिए कठघरे में बुलवाने की परम्परा जारी है| मार्क्स ज़िमर के अनुसार सिविल न्यायाधीश ऐसी पारदर्शिता से भयभीत हैं जो  मौखिक परीक्षण रिकार्डिंग से उद्भूत होती हो और वे मामले के पक्षकारों को ऐसी पारदर्शिता से होने वाले  सामाजिक लाभों  को ही विवादित करते हैं| सिविल न्यायाधीश मानते हैं कि पारदर्शिता से अपीलों की संख्या और न्यायाधीशों के विरुद्ध अनाचार के व्यक्तिगत मामले दोनों में वृद्धि होगी| यद्यपि आज तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि ये भय न्यायोचित हैं अथवा निर्मूल हैं| वर्तमान में कजाखस्तानी न्यायाधीश मौखिक साक्ष्यों की रिकार्डिंग की ओर बदलाव कर रहे  हैं| मौखिक साक्ष्यों की रिकार्डिंग की स्वीकार्यता में उनके मानसिक परिवर्तन और शुद्धता, पारदर्शिता, और अन्ततः सुरक्षा जो मौखिक रिकार्ड से न्यायाधीश एवं पक्षकार दोनों को उपलब्ध हो रही है| दक्षिण अफ्रीका में भी साक्ष्यों की ऑडियो रिकार्डिंग पर्याप्त समय से प्रचलन में है और इस उद्देश्य के लिए वहाँ अलग से स्टाफ की नियुक्ति की जाती है जो ऐसी प्रतिलिपि को सुरक्षित रखता है| न्यायालयों में प्रयोज्य उपकरणों के दक्ष उपयोग के लिए प्रारंभिक और लगातार प्रशिक्षण आवश्यक है| प्रत्येक प्रशिक्षण का वातावरण भिन्न होता है और समयांतराल से परिपक्व होता है|
जिन राष्ट्रों में न्यायालयों में काफी ज्यादा स्टाफ है उनमें मशीनीकरण से बेरोजगारी उत्पन्न होने का भय विकसित राष्ट्रों के बजाय ज्यादा है| न्यायालय स्टाफ को नवीन प्रक्रिया के योग्य बनाकर, स्वेच्छिक सेवा निवृति, अन्य विभागों में स्थानांतरण करके अथवा सेवा निवृतियों को ध्यान में रखकर चरणबद्ध मशीनीकरण कर इसका समाधान किया जा सकता है| स्वतंत्रता से पूर्व देशी राज्यों  के मध्य आयात पर जगात (आयात कर) लगता था | स्वंत्रता के उपरांत जगात  समाप्त कर स्टाफ का राज्यों द्वारा विलय कर लिया गया था| इसी प्रकार हाल ही में चुंगी समाप्त कर स्टाफ का समायोजन किया जाना एक अन्य उदाहरण हैन्यायालयों में सारांशिक कार्यवाही के योग्य सिविल एवं आपराधिक मामलों का दायरा बढाकर भी त्वरित न्याय दिया जा सकता है| वैश्वीकरण के बहाव में कुछ वर्ष पूर्व कम्प्यूटरीकरण, दक्षता एवं लाभप्रदता में वृद्धि के लिए बैंकों और अन्य सार्वजानिक उपक्रमों में स्वेच्छिक सेवा निवृति और निष्कासन योजना को प्रोत्साहन दिया गया था| यद्यपि इस योजना का श्रम संघों द्वारा विरोध किया गया था किन्तु न्यायालयों एवं विधायिका दोनों द्वारा इसे उचित ठहराया गया था| अतः इसे अब न्यायालयों में लागू करने में भी कोई बाधा प्रतीत नहीं होती है|

कजाखिस्तान, बुल्गारिया, बोस्निया, हेर्ज़ेगोविना और अन्य बहुत से राज्यों में मशीनीकरण और आधुनिकीकरण के सकरात्मक परिणाम मिले हैं| इनमें समय की बचत ,पारदर्शिता एवं शुद्धता में वृद्धि, न्याय सदन की उन्नत प्रक्रियाएं, न्यायपालिका में विश्वास में वृद्धि ,अपील प्रक्रिया का अधिक दक्ष उपयोग  आदि प्रमुख हैं| दृश्य श्रव्य (ऑडियो-वीडियो) और उच्च तकनीकि न्यायालय रिकार्डिंग मशीनों से उच्च पारदर्शिता आती है क्योंकि वे सुनवाई का अच्छी तरह से सही और सम्पूर्ण रिकार्ड प्रस्तुत करती हैं| इससे से भी आगे कि परीक्षण न्यायालय का रिकार्ड अपीलीय न्यायालय द्वारा आसानी से अवलोकन किया जा सकता है| अधिकांश मामलों में रिकार्डिंग मशीनों द्वारा तैयार रिकार्ड असंपादित होता है, शब्दशः रिकार्ड जिसकी अपेक्षा करने पर मूल रूप में न्यायाधीश और पक्षकार दोनों द्वारा समीक्षा की जा सके| सही एवं शुद्ध रिकार्ड न्यायालय की प्रक्रिया में सुधार लाते हैं क्योंकि दावे के समस्त पक्षकार और न्यायाधीश सभी जानते हैं कि उनका व्यवहार रिकार्ड पर है |


दृश्य श्रव्य रिकार्डिंग से न्यायिक प्रक्रिया का संरक्षण होता है क्योंकि इससे सभी पक्षकारों  को वास्तविक कार्यवाही के प्रति जिम्मेदार ठहराये जाने के लिए इसे मोनिटरिंग उपकरण के रूप में प्रयोग किया जा सकता है| न्यायिक प्रक्रिया और प्रोटोकोल का सही सही एवं संकलित और पूर्ण विवरण  प्रदान करने से यह प्रणाली नागरिकों को अपने अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति प्रेरित करती है जिससे  अंततोगत्वा न्यायसदन में न्यायाधीश और पक्षकार दोनों के निष्पादन में सुधार आता है| यह ज्ञात होने पर कि इसे न्यायाधीश द्वारा विस्तार से देखा जा सकता है पक्षकार अधिक स्पष्ट और सही बयान देंगे| न्यायिक आचरण भी इससे मोनिटर किया जा सकता है और इससे अपील के आधारों की स्पष्टता और प्रमाणिकता बढती है |परिणामतः इससे निर्णय देने और मामला प्रस्तुत करने सम्बंधित प्रोटोकोल और व्यावसायिकता का निर्णयन में सही उपयोग करने को प्रोत्साहन मिलता है| न्यायाधीशों की  समयनिष्ठा एवं अनुशासनबद्धाता के साथ-साथ न्यायिक प्रक्रिया में  दुरभिसंधियों पर भी इससे अंकुश लगता है| भारत में यद्यपि एक लाख बैंक शाखाओं के कम्प्यूटरीकरण  का कार्य दस वर्ष में पूर्ण कर लिया गया किन्तु 1991 में प्रारम्भ की गयी इ-कोर्ट योजना के अंतर्गत अभी तक 20 हाई कोर्ट भी पूरी तरह कम्प्यूटरीकृत नहीं हो पाए हैं और उनके आदेश एवं निर्णय तक उपलब्ध नहीं हैं| मद्रास हाई कोर्ट द्वारा तो आज भी निर्णय की प्रति पुरानी  टाइप मशीन से ही टाइप करके दी जाती है|  उक्त तथ्य देश की न्यायपालिका से जुड़े लोगों की निष्ठा और समर्पण पर गंभीर प्रश्न उठाते हैं चाहे वे भाषण में कुछ भी कहते रहे हैं  |  


Sunday, 1 June 2014

अपराधियों को सरकारी सुरक्षा उपलब्ध करवाना समाज विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देना है

राजनीति  का अपराधीकरण  या अपराधियों का राजनीतिकरण देश सामने एक बड़ी चुनौती है |  ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश में एक अपराधी राजनेता को जनता के धन से सुरक्षा उपलब्ध करवाने का इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सामने विचारण हेतु आया | मामले के तथ्य इस प्रकार हैं कि याची डॉ. पंकज त्रिपाठी के पिता सिविल सर्जन थे और दिनांक 25 मई 1980 को उनकी मिर्जापुर (उ.प्र.) में हत्या कर दी गयी थी व इस आशय की ऍफ़ आई आर दर्ज हुई और जांच के बाद प्रतिवादी विजय कुमार मिश्र के विरुद्ध आरोप पत्र दाखिल किया गया| यह मामला न्यायालय में परीक्षण हेतु विगत 34 साल से बकाया है| विजय कुमार मिश्र अब सत्तासीन पार्टी से विधायक हैं|  याची डॉ. पंकज त्रिपाठी के जीवन को  ख़तरा समझते हुए राज्य ने उन्हें 28 अप्रेल से 27 अक्टूबर 2011 तक सुरक्षा उपलब्ध करवाई थी जो आदेश दिनांक 6 अप्रेल 2012 से वापिस ले ली गयी|  याची ने तत्पश्चात इलाहाबाद के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को कई प्रतिवेदन देकर सुरक्षा उपलब्ध करवाने की विनती की जोकि अभी तक बकाया रहे| दूसरी ओर  आदेश दिनांक 25 अक्टूबर 2013 से विजय कुमार मिश्र की पुत्री सीमा को एक्स श्रेणी की सुरक्षा मुहैया करवाई गयी और एक अन्य आदेश दिनांक 31 अक्टूबर 2013 से विजय कुमार मिश्र को वाई श्रेणी की सुरक्षा उपलब्ध करवाई गयी| राज्य सरकार के ऐसे आदेश से व्यथित होकर याची ने इलाहाबाद उच्च न्यालय में यह रिट याचिका दायर की| याचिका पर विचार करते हुए न्यायालय   ने पाया कि विजय कुमार मिश्र के विरुद्ध 60 आपराधिक मुक़दमे चल रहे हैं| न्यायालय ने राज्य सरकार को  निर्देश दिए कि वह राज्य स्तरीय सुरक्षा समिति की बैठकों के विवरण उपलब्ध करवाए जिनमें कि जीवन को खतरे की संभावना पर विचार किया गया हो| किन्तु यह पाया गया कि ऐसा कोई विचारण नहीं किया गया था| न्यायालय ने यह भी निर्देश प्रदान किये कि प्रतिवादीगणों को प्रदत्त एक्स व वाई श्रेणी की सुरक्षा तुरंत वापिस ले ली जाए | राज्य सरकार ने यद्यपि उक्त सुरक्षा वापिस ले ली किन्तु उसकी एवज में विजय कुमार मिश्र को उनके पद के अनुरूप एक बंदूकची व उनकी पुत्री को भी एक बंदूकची की सुरक्षा उपलब्ध करवा दी गयी| इस आदेश को याची द्वारा एक अन्य संशोधन आवेदन द्वारा चुनौती दी गयी|

न्यायालय ने आगे विचारण  में पाया कि याची के चाचा  प्रतिवादी विजय कुमार मिश्र के पिता की हत्या के अभियुक्त रहे हैं और दोनों परिवारों के बीच शत्रुता है| पुलिस रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट हुआ कि विजय कुमार मिश्र के नाम 2 राइफल और 1 पिस्तौल हैं तथा  एक राइफल व एक रिवाल्वर उनकी माँ के नाम व एक डबल बेरल गन उनके  भाई के नाम भी हैं| न्यायालय के आदेश पर मूल रिकार्ड प्रस्तुत किये जाने पर ज्ञात  हुआ कि सरकार के आदेश दिनांक 25 अप्रेल 2001 से एक माह के लिए सुरक्षा उपलब्ध करवाई गयी थी जिसे अधिकतम तीन माह के लिये  आगे बढाया जा सकता था किन्तु इससे आगे मात्र सुरक्षा समिति की विशेष सिफारिश पर ही आगे बढ़े आजा सकता था| फिर भी राज्य सरकार के आदेश में खतरे की संभावना क्या है यह नहीं बताया गया था| राज्य सरकार के उक्त आदेश में यह भी बल दिया गया था कि ऐसे व्यक्ति को सुरक्षा उपलब्ध नहीं करवाई जायेगी जो आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त है और सुविधा का उनके द्वारा दुरूपयोग किया जा सकता हो|
ऐसे ही एक अन्य मामले गयूर हसन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य  में इसी न्यायालय ने धारित किया था  कि यदि कोई  व्यक्ति समाज विरोधी आपराधिक  गतिविधियों में संलिप्त है और इससे उसके जीवन व स्वतन्त्रता को कोई ख़तरा है तो इसके लिए वह स्वयं जिम्मेदार है  तथा वह आम नागरिक के खर्चे पर सरकार से सुरक्षा की मांग नहीं कर सकता| हमारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था में कोई चाहे जो पद धारण करे उसे कर दाताओं की कीमत पर सुरक्षा उपलब्ध करवाने का कोई औचित्य नहीं हैअन्यथा ऐसा करना समाज विरोधी गतिविधियों को प्रोत्साहन देना होगा| यह पाया गया कि सुरक्षा को खतरे का आकलन किये  बिना ऐसे आदेश मुख्यमंत्री स्तर से जारी किये गए| राज्य सुरक्षा समिति की बैठकों में ऐसी कोई विषय वस्तु उपलब्ध नहीं थी जिससे यह ज्ञात हो सके कि किस प्रकार का ख़तरा संभव है| श्रीमती सीमा मिश्र को एक्स श्रेणी की सुरक्षा महज इस कारण उपलब्ध करवाई गयी कि वह राजनैतिक क्षेत्र में उतर रही है अत: वह ख़तरा महसूस करती है| इस बारे में कोई जांच नहीं की गयी थी| विजय कुमार मिश्र को राजनैतिक शत्रुता के कारण वाई श्रेणी की सुरक्षा की सिफारिश की गयी थी| न्यायालय की लखनऊ पीठ ने पूर्व में भी नूतन ठाकुर बनाम  उत्तरप्रदेश राज्य में  भी धारित कर रखा है कि आपराधिक गतिविधियों वाले लोगों को प्रदत्त समस्त सुरक्षाएँ  वापिस ले ली जाएँ| न्यायालय ने यह भी पाया कि श्रीमती सीमा मिश्र चूँकि विजय मिश्र की पुत्री है और भावी उम्मीदवार है मात्र इस कारण सुरक्षा उपलब्ध नहीं करवाई जानी चाहिए |
न्यायालय का विचार रहा कि ऐसे आधारों पर सुरक्षा उपलब्ध नहीं करवाई जा सकती | तदनुसार प्रदान की गयी सुरक्षा अवैध है| मात्र इस कारण कि आदेश उच्च स्तर  से जारी हुए हैं कर दाताओं के धन से ऐसा खर्चा नहीं उठाया जाना चाहिए| जब एक व्यक्ति को शस्त्र लाइसेंस दे दिया गया हो तो राज्य ने उसके जीवन की रक्षा के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध करवा दी है | राज्य को समाज में कुछ व्यक्तियों की बजाय  वृहत स्तर  पर समाज की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है| न्यायालय का विचार रहा कि  ऐसे व्यक्तियों को सुरक्षा उपलब्ध करवाने का अर्थ समाज के हितों के विरुद्ध ऐसे व्यक्तियों की गतिविधियों को बढ़ावा देना होगा| एक व्यक्ति जो हिंसा का रास्ता चुनता है और जिसके लिए  मानव जीवन का कोई मूल्य नहीं हो उसे यह मांग करने  का कोई अधिकार नहीं है कि शत्रुओं से उसके  जीवन की रक्षा के लिए सरकार को विशेष उपाय करने चाहिए| तदनुसार रिट याचिका डॉ. पंकज त्रिपाठी बनाम उत्तर प्रदेश  राज्य अनुमत करते हुए उच्च  न्यायालय ने दिनांक 9 अप्रेल 2014 को आदेश दिया कि विपक्षियों को प्रदत्त समस्त सुरक्षा तुरंत प्रभाव से वापिस  ले ली जाए|



Monday, 26 May 2014

भारत में न्यायिक व पुलिस सुधार की लीलाएं

व्यवहार प्रक्रिया संहिता, 1908   में सारांशिक  कार्यवाही के लिए 10 दिन के नोटिस का प्रावधान किया गया था तब न तो उचित परिवहन सुविधाएं थीं और न ही डाकघर की सेवाएं सर्वत्र उपलब्ध थीं | किन्तु आज हम इलेक्ट्रोनिक युग में जी रहे हैं फिर भी इन समय सीमाओं की पुनरीक्षा कर इन्हें समसामयिक नहीं बनाया गया है | देश में न्यायिक या समाज सुधार के नाम पर कार्य करने वाले ठेकदारों  की बानगी बताती है कि वे समय व्यतीत करने या लोकप्रियता हासिल करने और सरकार में कोई पद पाने की लालसा में  यह अभ्यास कर रहे हैं और उनमें से भी अधिकाँश लोग अपना अतिरिक्त समय नहीं दे रहे हैं बल्कि सार्वजनिक कार्यालयों में बैठकर कार्यालय समय का ही दुरुपयोग कर रहे हैं| इनमें सुधार कम और आडम्बर ज्यादा है| पाठकों को याद होगा कि पत्नि को यातना देने वाले एक व्यक्ति ने  नारी हिंसा पर सीरियल व पत्नि के एक हत्यारे ने मोस्ट वांटेड नामक सीरियल बनाए थे| सुधार के नाम पर अखबारों की सुर्ख़ियों में रहने वाले ये अधिकाँश लोग भी इसी श्रेणी में आते हैं| अन्यथा कोई सुधार दिखाई क्यों नहीं देते, देश के हालात तो दिन प्रतिदिन बद से बदतर होते जा रहे हैं|
 सरकार में अधिकारीवृन्द कार्यरत होते हुए इसी कुप्रबंधित व्यवस्था का सुदृढ़ अंग बन कर कार्य करते हैं अन्यथा वे इस व्यवस्था में टिक ही नहीं पाते  और सेवानिवृति  के बाद भी उन्हें किसी न किसी आयोग  या कमिटी में नियुक्ति दे दी जाती है जिसका कार्य सुधार करना या न्याय देना होता है| जो व्यक्ति कल तक इसी स्वयम्भू नौकरशाही का हिस्सा रहे हों वे किस प्रकार सुधार या न्याय  कर सकते हैं अथवा अपनी बिरादरी के विरुद्ध कोई मत  किस व्यक्त कर  सकते हैं

हमारी इस विद्यमान व्यवस्था में जो व्यक्ति जितना अधिक अवसरवादी, कुटिल, बेईमान,भ्रष्ट और डरपोक है वह सत्ता में उतना  ही ऊँचा पद पा सकता है इस दुश्चक्रिय व्यवस्था में परिवर्तन या  सुधार के लिए गठित होने वाले आयोगों आदि में भी आई ए एस, आई पी एस या संवैधानिक न्यायालयों के न्यायाधीशों को नियुक्त किया जाता है जिन्हें धरातल स्तरीय बातों का कोई व्यावहारिक ज्ञान, अनुभव  या साक्षात्कार नहीं होता है| इन लोगों ने जीवनभर मात्र प्रचलित परिपाटियों, परम्पराओं  और प्रोटोकोल का अनुसरण किया है व कोई मौलिक क्रांतिकारी परिवर्तन में तो इनका दिमाग ही काम नहीं करता है| यदि मौलिक परिवर्तन करने में ये लोग सक्षम होते तो 30 वर्ष से अधिक समय की गयी अपनी ऊर्जावान सार्वजनिक सेवा के दौरान ही रंग दिखा सकते थे और किसी आयोग या कमेटी के गठन की आवश्यकता ही नहीं रहती | अत: इन उपयोगिता खो चुके ऊर्जाविहीन सेवानिवृत लोगों को किसी भी आयोग या कमिटी का कभी भी सदस्य नहीं बनाया जाना चाहिए|
हमारे राजनेता जनता को गुमराह करते हैं कि आजादी के बाद हमने बड़ी तरक्की की है | किन्तु प्रश्न यह है कि हमने  कितनी तरक्की की है और  उसमें से आम नागरिक को क्या मिला है| दूर संचार विभाग की वेबसाइट 1970 में बन  गयी थी किन्तु नागरिकों को तो यह सुविधा 20 वर्ष बाद ही मिलने लगी है| सीएनएन ने 1971 का भारत पाक युद्ध अमेरिका और कनाडा में लाइव प्रसारित किया था| क्या हम आज भी इस स्थिति में हैं? अमेरिका के एक बैंक का व्यवसाय ही भारत के सारे बैंकों के व्यवसाय से ज्यादा है|     भ्रष्टाचार के कुछ पैरोकार यह भी कुतर्क देते हैं कि रिश्वत तो तब ली जाती है जब कोई देता है| किन्तु रिश्वत कोई दान –दक्षिणा नहीं है जो स्वेच्छा से दी जाती हो अपितु यह तो  मजबूरी में ही दी जाती है| उन लोगों का दूसरा सुन्दर तर्क  यह भी होता  है कि बाहुबलियों द्वारा सरकारी अधिकारियों या न्यायाधीशों को भय  दिखाया जाता है कि वे रिश्वत स्वीकार कर कार्य करें अन्यथा उनके लिए ठीक नहीं होगा|  सभी सरकारी कर्मचारी सेवा में आते समय शपथ लते हैं कि वे भय, रागद्वेष और पक्षपात से ऊपर उठकर कार्य करेंगे तो ऐसी स्थति में उनका यह तर्क भी बेबुनियाद है| ये तर्क ठीक उसी प्रकार आधारहीन हैं जिस प्रकार हमारे पूर्व वित्त –मंत्री चिदम्बरम   ने कर बढाने के विषय पर जवाब दिया था कि लोग 10 रूपये में पानी खरीद कर पी रहे हैं अत: वे कर तो दे  ही सकते हैं | किन्तु वे भूल रहे हैं कि स्वच्छ पेय जल उपलब्ध करवाना सरकार का संवैधानिक कर्तव्य है और सरकार इसमें विफल है अत: लोगों को  पानी भी खरीद कर    पीना पड़ता है| पानी जीवन की एक आवश्यकता है और यह कोई विलासिता या दुर्व्यसन  नहीं जिसके लिए  यह माना जाए कि लोग कोई अपव्यय कर रहे हैं| ऐसा प्रतीत होता है कि देश में अपरिपक्व  ,दुर्बुद्धि और दुर्जन लोगों का कोई अभाव नहीं है|
देश में 80 प्रतिशत  जनता ग्रामीण पृष्ठ भूमि से है और एयरकन्डीशन   में रहे इन आई पी एस, आई ए एस या उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को तो इस पृष्ठ भूमि के स्वाद का कोई अनुभव व व्यावहारिक ज्ञान तक नहीं है ऐसी स्थिति में इनकी नियुक्ति कितनी सार्थक हो सकती है| देश में जो डॉक्टरेट किये हुए लोग हैं वे भी प्राय: व्यावहारिक अनुभव व वास्तविक शोध  के बिना मात्र किताबी कीड़े ही हैं| पाठकों को याद होगा कि  गाज़ियाबाद  किडनी घोटाले में संलिप्त चिकित्सक एक आयुर्वेदिक वैद्य ही था किन्तु उसने अपने अनुभव के आधार पर सैंकड़ों किडनी प्रत्यारोपण के मामलों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया था क्योंकि उसके पास ज्ञान और व्यावहारिक अनुभव था चाहे उसने इस हेतु कोई डिग्री हासिल न की हो| वैसे भी तो भारत में डिग्रियां  और डॉक्टरेट मोल मिल जाती हैं उनके लिए अध्ययन की कोई ज्यादा आवश्यकता नहीं है| देश में उपलब्ध  चिकित्सा सुविधाओं पर राजनेताओं का कोई ज्यादा विश्वास  नहीं  है और वे अक्सर अपने इलाज के लिए विदेश जाते रहते हैं| जब देशी चिकित्सकों  पर राजनेताओं को विश्वास नहीं है फिर देशी न्यायाधीशों पर भी क्यों विश्वास किया जाए कि  वे बिना पक्षपात के न्याय कर देंगेवैसे भी देश के न्यायाधीश एक पीड़ित पक्ष को राहत देने से इनकार करने के लिए  जी तोड़ मेहनत करते देखे जा सकते हैं| उनका मानना है कि यदि सभी को न्याय दिया जाने लगा तो मुकदमें अनियंत्रित हो जायेंगे|  क्रिकेट व होकी के खेलों  के प्रशिक्षण के लिए भी तो हमारे यहाँ विदेशी लोगों का आयात किया ही जा रहा है |
न्याय का स्थान तो हृदय  में ही होता है उसका अन्य बातों से बहुत कम सम्बन्ध है| जो अन्याय हो रहा है वह अज्ञानता या ज्ञान के अभाव में नहीं हो रहा है| न्याय के लिए न्यायदाता में समर्पण भाव होना आवश्यक है न  कि उसके लिए कोई ऊंचा  पारिश्रमिक| जिस प्रकार एक हरिण घास खाकर भी अन्न खाने वाले घोड़े से तेज दौड़ सकता है उसी प्रकार कम वेतन पाने वाला निष्ठावान व्यक्ति, जिसके हृदय में न्याय का निवास हो,  भी न्याय कर सकता है और दूसरी ओर यह भी आवश्यक नहीं है कि  अधिक वेतन पाने वाला व्यक्ति निश्चित रूप से न्याय कर ही देगा|  देश की न्यायिक सेवाओं में प्रत्येक स्तर की भर्ती  से पूर्व उनकी बुद्धिमता, सामान्य ज्ञान के अतिरिक्त अमेरिका की भांति भावनात्मक परीक्षण भी होना चाहिए ताकि उनकी प्रवृति और रुझान  का ज्ञान हो सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि आशार्थी में वांछनीय गुण विद्यमान हैं| मात्र किसी विषय का ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है  जिस प्रकार सरकारी अस्पतालों और विद्यालयों में योग्य लोग होते हैं किन्तु फिर भी उनकी सेवाएं निजी क्षेत्र के संस्थाओं की तुलना में श्रेष्ठ ही पायी जाती हैं| जहां सलेम एडवोकेट बार एसोसिएशन के मामले में बार की नकारात्मक और सुधार-विरोधी भूमिका सामने आयी वहीं  कनाडा में बार संघों द्वारा न्यायिक सुधार हेतु स्वयं सर्वे व शोध करवाया जाता है| यह भी देखने में आया है न्यायाधीश अपने स्वामिभक्त वकीलों के समय पर न  पहुँचने पर उनके लिए प्रतीक्षा करते हैं अन्यथा आम नागरिक को तो सुनवाई का कोई पर्याप्त अवसर तक नहीं देते हैं| जहां न्यायाधीश स्वयं हितबद्ध होते हैं वहां वे वकील पर दबाव बनाकर पैरवी में शिथिलता ला देते हैं| वकील को भी अपने पेट के लिए रोज उनके सामने ही याचना करनी  है अत: वह विरोध नहीं कर पाता है क्योंकि उसे भी यह ज्ञान है कि प्रतिकूल फैसले की स्थिति में ऊँचे स्तर  पर यदि अपील कर भी दी गयी तो पर्याप्त संभव है कि वहां पर भी  निचले न्यायाधीश के पक्ष में  स्वर उठेगा और वांछित परिणाम नहीं मिल पायेंगे| इस बात का निचले न्यायाधीशों को भी ज्ञान और विश्वास है कि लगभग सभी मामलों में उनके उचित –अनुचित कृत्यों-अकृत्यों  की पुष्टि हो ही जानी है| ऊपरी न्यायाधीश भी तो कोई अवतार पुरुष या देवदूत नहीं हैं, वे भी कल तक न्यायालय स्टाफ और पुलिस को टिप्स देकर कार्य को गति प्रदान करवाते रहे हैं परिणाम स्वरुप वे सफल वकील कहलाये| उनके पास न तो कोई चरित्र प्रमाण पत्र है न ही उन्होंने कोई प्रतिस्पर्धी योग्यता परीक्षा पास कर रखी है| संवैधानिक न्यायालयों के अधिकांश न्यायाधीशों के सम्बन्ध में भी उनके गृह राज्यों से उनके पूर्व चरित्र के विषय में कोई सुखद रिपोर्टें  नहीं मिलती हैं| ऐसे उदाहरण भी हैं जहां जेल के निरीक्षण पर आये उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने भ्रष्टाचार के आरोपी से जेल में आवेदन लेकर तत्काल ही जमानत मंजूर कर दी! जानलेवा हमले के एक मामले में जिसमें दोषी ने पीड़ित की हथेली काटकर ही अलग कर दी थी, राजस्थान उच्च न्यायालय ने मात्र 7 दिन की सजा को ही पर्याप्त समझा|कहने को अच्छा वकील भी वही बन पाता है जिसमें एक कुशल व्यापारी के समान विक्रय कला हो न कि  उसे कानून का अच्छा ज्ञान हो|  क्योंकि कानून का अच्छा ज्ञान तो भारत के अधिकाँश न्यायाधीशों में भी नहीं है  अत: यदि किसी वकील में कानून का अच्छा ज्ञान हो तो भी उसका मूल्याङ्कन करने में स्वयम न्यायाधीश ही समर्थ नहीं हैं| एक प्रकरण में सामने आया कि  उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश को आपराधिक शिकायतकी परिभाषा और दायरे जैसी प्रारंभिक बात का भी  ज्ञान नहीं था किन्तु ऊपर वरदहस्त होने के कारण यह पद प्राप्त हो गया | इसी  आपराधिक मामले में न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा परिवादी पर खर्चा लगा दिया गया किन्तु कानून में उसे ऐसी शक्ति प्रदत्त नहीं है| मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया और फिर भी निर्णय को सही बताया गया| जब मजिस्ट्रेट ने खर्चा वसूली की कार्यवाही प्रारंभ की तो उसे पुन: बताया गया कि उसे खर्चा लगाने की कोई शक्ति ही नहीं तब कार्यवाही बंद की गयी|

 राज्य सभा की समिति ने यद्यपि उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के लिए लिखित परीक्षा की अनुशंसा की थी किन्तु यह प्रक्रिया अस्वच्छ राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति में बाधक है अत: इस पर कोई अग्रिम कार्यवाही नहीं की गयी| भारत के न्यायाधीश तथ्यों और कानून को तोड़मरोड़कर उनका मनचाहा अर्थ निकालने में सिद्धहस्त अवश्य हैं|  इस कारण समय समय पर विरोधाभासी व असंगत निर्णय आते रहते हैं  और हमारी न्याय व्यवस्था जटिल से जटिलतर बनती जा रही है|  विडंबना है कि कानून के विषय में तो यहाँ अपवादों को छोड़कर ब्रिटिश काल से चली आ रही अस्वच्छ और जनविरोधी परम्पराओं का अनुसरण और सरकार व अधीनस्थ न्यायालयों का समर्थन मात्र किया जा रहा है, प्रजातंत्र के अनुकूल कोई नवीन मौलिक  शोध नहीं हो रहा है|  सरकारी अधिकारियों को भी विश्वास है कि न्यायालयों के आदेश कागजी घोड़े हैं  और उनकी अनुपालना करने की कोई आवश्यकता भी नहीं है व उनका कुछ भी बिगडनेवाला नहीं है| गत वर्ष तरनतारन (पंजाब) में पुलिस द्वारा महिल्ला की सरे आम पिटाई और बिहार में अध्यापकों पर लाठी बरसाने के मामलों का सुप्रीम कोर्ट ने स्वप्रेरणा से संज्ञान लिया था तब जनता को यह भ्रान्ति हुई कि देश में कानून का शासन जीवित है किन्तु यह प्रकरण दिनांक 4 मार्च 2014 को बिना कोई अंतिम व समुचित आदेश पारित किये चुपचाप बंद कर दिया गया|  अभी हाल में सुप्रीम कोर्ट ने अक्षरधाम काण्ड के अभियुक्तों को दोषमुक्त करते हुए कहा है  कि पुलिस द्वारा निर्दोष लोगों को फंसाया गया है जबकि इन्हें संदेह के आधार पर नहीं छोड़ा गया है| एक अभियुक्त भी सक्षम गवाह होता है और निर्दोष फंसाए जाने पर वह स्वयम गवाह के रूप में प्रस्तुत हो सकता है और प्रति परीक्षा के उपरान्त उसका बयान महत्वपूर्ण होता है|  किन्तु घोर आश्चर्य है कि बचाव पक्ष के वकीलों ने ऐसा नहीं किया जिससे निर्दोष नागरिकों को 12 वर्ष जेल में अनावश्यक ही बिताने पड़े|  आश्चर्य है कि ऐसी स्थिति में सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय ने इन्हें दोषी मान लिया| फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने न  तो पुलिस के विरुद्ध कोई कार्यवाही के लिए आदेश दिया है और पीड़ितों को अनावश्यक जेल के लिए कोई क्षतिपूर्ति भी स्वीकृत नहीं की है|  जब विद्यमान कानून में ही किसी  निर्दोष को फंसाकर फर्जी सबूतों के आधार पर सजा  दिलवाई जा सकती है तो फिर दोषी लोग क्यों बच निकलते हैं? हमारे कानून में दोष से कई गुना अधिक न्यायतंत्र में भ्रष्टाचार है|  कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक मामले में दिनांक  7 जुलाई 2010  को पश्चिम बंगाल सूचना आयोग को आदेश दिया था कि द्वितीय अपील का निपटान 45 दिन में करे किन्तु प.बं. सू . आयोग के भयमुक्त आयुक्त ने दिनांक 20 सितम्बर 2008  को दायर एक द्वितीय अपील पर 58  महीने बाद दिनांक 24 जुलाई 2013 को  अपना निर्णय घोषित कर कीर्तिमान स्थापित किया है| न्यायालयों के प्रति सरकारी अधिकारियों के सम्मान का यह प्रतीक है| वर्तमान परिस्थितियों में यह भी स्पष्ट नहीं है कि न्यायालयों और सूचना आयोगों के आपसी सम्बन्ध कितने प्रगाढ़  हैं अथवा उनकी जन छवि कैसी है| मैंने  असम राज्य सूचना आयोग की वेबसाइट से पाया है कि उन्होंने किसी भी न्यायालय के विरुद्ध आज तक कोई प्रकरण निर्णित नहीं किया है|  यदि भय के कारण किसी नागरिक ने कोई प्रकरण दायर ही नहीं किया है तो यह और भी गंभीर है तथा लोकतंत्र को चुनौती है| उस राज्य में पुलिस के विरुद्ध भी आज तक 10 से कम मामले दायर हुए हैं| अनुमान लगाया जा सकता है कि सूचना का अधिकार अधिनियम पारदर्शिता लाने में कितना कामयाब हुआ है | क्या कोई न्यायविद बता सकता है कि भारत में कानून, शक्ति, लाठी, गोली  या आतंक में से किसका शासन चलता है ? पाठक अनुमान लगा सकते हैं कि न्यायालयों के प्रति आम नागरिक के मन में भय या सम्मान क्या अधिक है |

जहां परिवादी या अभियुक्त (आशाराम जैसे) उच्च श्रेणी का हो वहां पुलिस उसके लिए हवाई यात्रा का प्रबंध करती है अन्यथा आम नागरिक यदि गवाह के तौर पर पेश हो तो भी उसे पुलिस या न्यायालय द्वारा रेल या बस का किराया तक नहीं दिया जाता है| इन सब घटनाक्रमों को देश के संवैधानिक न्यायालय भी मूकदर्शी बनकर देखते रहते हैं| भारत में तो जो कुशल मुंशी होते हैं वे कालान्तर में सफल  वकील बन जाते हैं और स्टाफ के साथ उनकी अच्छी पटरी खाती अत: उनका कोई काम बाधित  नहीं होता| वे तरक्की पाते हैं और न्यायाधीश बन जाते हैं | हमारे उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश कपाडिया ने भी अपना व्यावसायिक जीवन सफर  कुछ इसी प्रकार तय किया था| भारत का न्यायिक वातावरण तो मुंशीगिरी करने वालों के लिये  ज्यादा उपयुक्त है, ईमानदार और विद्वान की यहाँ कोई आवश्यकता नहीं है|  देश में ढूंढने  पर भी ऐसा प्रैक्टिसरत   वकील मिलना कठिन है जिसने अपने व्यावसायिक जीवन में न्यायालय स्टाफ या पुलिस वालों को कभी टिप न दी हो| वास्तव में देखा जाये तो न्याय में विलम्ब के लिए इनमें से कोई भी वर्ग चिन्तित नहीं है और न ही इनमें से कोई न्यायिक या पुलिस सुधार के लिए हृदय से इच्छुक है | न्यायालयों में प्रतिदिन बड़ी संख्या में न्यायार्थी आते हैं किन्तु उनके बैठने या विश्राम के लिए कोई स्थान तक नियत नहीं है और उनकी स्थिति याचकों  जैसी है | जहां कहीं उनको कोई आश्रय उपलब्ध करवाया गया है उस पर वकील समुदाय ने अतिक्रमण कर रखा है|  दिल्ली में तो न्यायालयों के कैंटीन  व अन्य स्थानों पर वकील समुदाय ने कब्जा कर रखा है और पेंट करवा रखा है कि  यह स्थान वकीलों के लिए आरक्षित  है और मुवक्किलों के लिए पैर रखने के लिए भी कोई स्थान देश की राजधानी दिल्ली के न्यायालयों में आरक्षित नहीं हैये लोग भूल रहे हैं कि  न्यायालयों या वकीलों का अस्तित्व मुवक्किलों से ही हैं अन्यथा नहीं|  

कुछ समय पहले न्यायाधिपति स्वतंत्र कुमार,जिन्हें मात्र 8 दिन के लिए उच्चतम न्यायालय में नियुक्ति दी गयी थी, पर यौन शौषण के आरोप लगे तो उनके समाचार के प्रसारण को रोकने के लिए लगभग 50 से अधिक वकीलों का दल उच्च न्यायालय में पैरवी हेतु उपस्थित हो गया और उसी समुदाय से जब हिरासत में अथवा फर्जी मुठभेड़ में मारे गये लोगों के हितार्थ पीड़ित मानवता की सेवा में आगे आने के लिए आह्वान किया गया तो एक भी आगे नहीं आया| यह इस व्यवसाय और  इन व्यवसाइयों की नैतिकता को दर्शाता  हैकमजोर तबके को कानूनी सहायता उपलब्ध करवाने के लिए सामान्यतया सुप्रीम कोर्ट में पैरवी हेतु 10000 रूपये व गुजरात जैसे विकसित कहे जाने वाले राज्यों में उच्च न्यायालय के लिए 500 रूपये  की सहायता दी जाती है वहीं सरकार द्वारा अपने मामलों की ट्रिब्यूनलों में पैरवी के लिए मात्र 1000 रूपये पारिश्रमिक दिया जाता है और वकील समुदाय छिपे हुए उद्देश्यों के लिए इस अल्प पारिश्रमिक पर भी कार्य करने को लालायित रहते हैं | दिल्ली के जिला स्तर के न्यायालयों में मौके की रिपोर्ट देने के लिए कमिश्नरों  को लाखों रूपये पारिश्रमिक दिया जाता है और इस प्रकार उपकृत होने वाले वकील अधिकांशत: न्यायाधीशों के रिश्तेदार या घनिष्ठ मित्र होते हैं| पंचनिर्णय के मामलों में भी भारी शुल्क ऐंठने और भ्रष्टाचार की शिकायतें प्राप्त होती रहती हैं | जब न्यायालय अपनी चारदीवारी के भीतर भी नागरिकों का शोषण नहीं रोक सकते तो फिर जनता द्वारा उनसे कितनी अपेक्षाएं रखना उचित व व्यावहारिक है| संभव है कुछ निहित हितोंवाले लोग इन विचारों से सहमत न हों किन्तु उनके सहमत अथवा असहमत होने से तथ्य, तश्वीर और भारतीयों की तकदीर  नहीं बदल जाते|


हमारी राज्य सभा ने उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृति आयु बढाने के लिए सिफारिश की कि देश में स्वास्थ्य के स्तर में सुधार के परिणाम स्वरुप न्यायाधीशों की सेवानिवृति आयु में बढ़ोतरी करना उचित है क्योंकि विदेशों में भी यह ऊँची है| किन्तु राज्य सभा की समिति को शायद ज्ञान नहीं है की जहां पाश्चात्य देशों में औसत आयु 88 वर्ष है वहीं भारत में औसत आयु आज भी मात्र 64 वर्ष है अत: विदेशों से तुलना की कोई सार्थकता नहीं है| भारत में न्यायाधीशों का प्रारम्भिक वेतन औसत भारतीय की  आय से 10 गुना है जो किसी भी प्रकार से न्यायोचित नहीं है व संविधान के समाजवादी स्वरूप के ठीक विपरीत है किन्तु इसके पक्ष में देश के न्यायाधीश तर्क देते हैं कि इससे न्यायाधीश ईमानदार बने रहेंगे| किन्तु इस तर्क को वास्तविकता के धरातल पर परखा जाए तो यह नितांत खोखला है | फिर भौतिकवाद तो अशांति का जनक  है| देश में सुप्रिम कोर्ट के 95% न्यायाधीश उच्च आय वर्ग और उच्च मध्यम आय वर्ग से रहे हैं | क्या ये  सभी  ईमानदार होने का नाम अर्जित कर पाए हैं ? देश में 65 प्रतिशत  जनता गरीब है, क्या वे सभी बेईमान हैं ? क्या आर्थिक अपराधियों में बहुसंख्य लोग धनाढ्य नहीं हैं? भ्रष्टाचार की जड़ तो लालच में निहित है न की गरीबी में | देश में जहां गरीबों को न्याय सुलभ करवाने के लिए न्यायमित्र  को थोड़ी सी रकम दी जाती हैं वहीं सरकारी वकीलों को लाखों रूपये देकर रातोंरात मालामाल कर दिया जाता है | क्या यह कानून के समक्ष समानता है? जो सार्वजनिक धन लोक सेवकों के पास जनता की धरोहर के रूप में है उसका वे मनमाना और सरलता से विरासत में प्राप्त की तरह प्रयोग कर रहे हैं और सार्वजनिक  बर्बादी का खेल खेल रहे हैं बिहार राज्य में तो 50 लाख रुपयों में से मात्र 50  हजार रूपये गरीबों को सहायता दी गई और शेष रकम स्टाफ के खर्चों आदि में लगा दी गयी  और गरीबों को कानूनी सहायता के नाम क्रूर मजाक किया गया | कमोबेश यही हाल अधिकाँश राज्यों के हैं| सरकार द्वारा पुलिस एवं न्यायाधीशों की कमी का बनावटी बहाना बनाकर न्याय में देरी का बचाव किया जाता है| जबकि मध्य प्रदेश में दिनांक 26.12.12 को राजकुमार द्वारा बलात्कार किये जाने पर उसे सत्र न्यायालय द्वारा दो माह से भी कम अवधि में दिनांक  05.02.13 को दण्डित कर दिया गया और उच्च न्यायालय ने दिनांक  27.06.13 को अपील पर निर्णय देते हुए मृत्यु दंड की पुष्टि भी कर दी तथा दिनांक  25.02.14 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी अंतिम आदेश सुना दिया गया है|  ठीक इसी प्रकार दिल्ली  गैंग रेप मामले में एक वर्ष के भीतर कानून में सुधार और निर्णय दोनों हो गए|  बी एम डब्ल्यू काण्ड में परिवार जनों की गवाही के बिना भी एक शक्तिशाली अपराधी को सजा हो गयी| इन सब तथ्यों से यही प्रतीत होता है कि भारत की संवेदनहीन नौकरशाही मात्र दबाव पर ही कार्य करती है और न्याय के प्रशासन तत्व का अभाव लगता है| यदि न्याय प्रशासन विद्यमान है तो फिर अन्य समान मामलों में विलम्ब क्यों होता है| क्या पुलिस या वकीलों द्वारा की जाने वाली विलम्ब की चेष्टाओं को रोकने का जजों को कोई अधिकार नहीं है ?   न्यायिक सुधारों के लिए सरकारों द्वारा संसाधनों की कमी बतायी जाती है किन्तु सस्ती लोकप्रियता के लिए लैपटॉप, मोबाइल, साड़ियाँ बांटने और बागों में नेताओं की मूर्तियाँ व  प्रतीक चिन्ह के लिए संसाधनों की कोई कमी नहीं है| आश्चर्य तब और भी बढ़ जाता है जब कोई नागरिक इस अपव्यय को रोकने के लिए न्यायालय से आदेश चाहता है तो न्यायालय भी मदद नहीं करते | ऐसा लगता है हमारे न्यायाधीश, राजनेता ज्यादा और न्यायविद  कम  हैं |